दशलक्षण पर्व के दस दिन आते हैं तो घर में क्या बदलता है? लोनारा के आशीष कुमार जैन परिवार में इसका जवाब केवल मंदिर और पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। इन दिनों भोजन की थाली बदलती है, घर की बातचीत में धर्म बढ़ जाता है और कोशिश रहती है कि क्रोध, मान, माया और लोभ भी कम हों।

श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दशलक्षण और निमाड़ के परिवार’ में आज मिलिए लोनारा के आशीष कुमार जैन परिवार से। श्रीफल साथी सन्मति जैन काका से बातचीत में आशीष कुमार जैन ने बताया कि उनके परिवार को धार्मिक संस्कार विरासत में मिले हैं। दादा से पिता और फिर बच्चों तक धर्म की यह परंपरा आगे बढ़ी है।

आशीष कहते हैं, “सामान्य दिनों में भी हमारा परिवार धार्मिक नियमों से जुड़ा रहता है, लेकिन दशलक्षण आते ही धर्म-ध्यान, तप और त्याग बढ़ जाता है।”

दादा-पिता को देखकर पूजा-पाठ बना दिनचर्या का हिस्सा

आशीष बताते हैं कि उनके दादा लख्मीचंद जैन, पिता रमेशचंद्र जैन और अंकल ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन का धार्मिक जीवन परिवार के लिए हमेशा प्रेरणा रहा है। पिता रमेशचंद्र जैन वर्षों से प्रतिदिन मंदिर की सामग्री धोने और परिवार के सदस्यों के लिए पूजन की थाली तैयार करने का काम करते हैं। दादा और पिता को नियमित अभिषेक-पूजन करते देख अगली पीढ़ी के लिए भी मंदिर जाना और धार्मिक क्रियाएं करना सहज दिनचर्या बन गया।

ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन की प्रेरणा का प्रभाव घर के वातावरण पर भी दिखाई देता है। परिवार में टीवी पर भी धार्मिक चैनलों को ही प्राथमिकता दी जाती है।

दशलक्षण आते ही सबसे पहले बदलती है भोजन की थाली

आशीष कहते हैं कि दशलक्षण का सबसे सीधा असर परिवार की भोजन की थाली पर दिखाई देता है।

दस दिनों में परिवार का हर सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार उपवास, एकासन या दो समय भोजन का नियम लेता है। प्रत्येक दिन वार के अनुसार एक रस का त्याग रखकर भोजन तैयार किया जाता है। कंद-मूल और हरी पत्तेदार सब्जियों का भी दस दिनों के लिए त्याग रहता है।

हालांकि संयम केवल पर्व तक सीमित नहीं है। पूरे वर्ष अष्टमी और चतुर्दशी पर राजेंद्र जैन और आशीष जैन एकासन का नियम रखते हैं।

घर में धार्मिक चर्चा, मन के विकारों को भी कम करने की कोशिश

दशलक्षण में घर का माहौल भी बदल जाता है। परिवार में बातचीत का बड़ा हिस्सा धर्म, स्वाध्याय और पर्व से जुड़े विषयों पर रहता है।

आशीष कहते हैं कि केवल भोजन की वस्तुएं छोड़ देना ही पर्याप्त नहीं है। कोशिश यह भी होनी चाहिए कि इन दस दिनों में क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे भाव कम हों।

यानी थाली में संयम आए तो उसके साथ विचार और व्यवहार में भी बदलाव दिखाई दे। परिवार दशलक्षण को इसी आत्मचिंतन का अवसर मानता है।

मां और पत्नी भी स्वाध्याय-प्रतिक्रमण से जुड़ीं

आशीष की माता प्रमिलाबाई जैन और पत्नी सारिका जैन भी परिवार की धार्मिक गतिविधियों में नियमित रूप से सहभागी रहती हैं।

स्वाध्याय और प्रतिक्रमण केवल दशलक्षण के दस दिनों में नहीं, बल्कि सामान्य दिनों में भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा है। पर्व आने पर पूजा-पाठ, तप-त्याग और धार्मिक आयोजनों के लिए समय और बढ़ जाता है।

इस तरह परिवार के हर सदस्य का नियम अलग हो सकता है, लेकिन धर्म से जुड़े रहने की भावना सभी में समान है।

सिद्धक्षेत्र ऊन पास होने से साधु सेवा का मिलता रहा अवसर

लोनारा के पास सिद्धक्षेत्र पावागिरी ऊन होने का लाभ भी परिवार को मिला है। क्षेत्र में साधु-संतों का आवागमन रहता है, इसलिए परिवार को उनके आहार-विहार और सेवा से जुड़ने के अवसर मिलते रहते हैं।

आशीष बिल्डिंग व्यवसाय से जुड़े हैं, लेकिन व्यापार के साथ साधु-संतों की सेवा के लिए समय निकालना अपनी प्राथमिकताओं में रखते हैं। वे बताते हैं कि लोनारा में साधु-संतों का आगमन होने पर परिवार चौका लगाकर आहार देने और उनकी सेवा में आगे रहने का प्रयास करता है। पावागिरी ऊन के आसपास भी साधु-संतों के आहार-विहार में परिवार समय देता है।

2002 का वह प्रसंग, जिसने गांव में बढ़ाई धर्म प्रभावना

आशीष वर्ष 2002 का एक प्रसंग भी याद करते हैं। उनके अनुसार तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मतिसागर महाराज से अलग होकर मुनि श्री सुनीलसागर जी और मुनि श्री सुंदरसागर जी—जो वर्तमान में आचार्य हैं—लोनारा आए थे और करीब आठ दिन यहां रहकर धर्म प्रभावना की थी।

इसके बाद भी अनेक साधु-संतों का लोनारा आगमन होता रहा। सिद्धक्षेत्र ऊन की निकटता के कारण संतों का सान्निध्य परिवार और गांव को लगातार मिलता रहा है।

धार्मिक यात्रा में साथ जुड़ने लगे गांव के दूसरे परिवार भी

परिवार वर्ष में एक-दो बार धार्मिक यात्रा पर जाने की परंपरा भी बनाए हुए है। खास बात यह है कि इन यात्राओं में केवल परिवार के सदस्य ही नहीं, बल्कि गांव के अन्य जैन और जैनेतर लोग भी साथ जुड़ते हैं।

इससे बच्चों को धर्म केवल घर और मंदिर में ही नहीं, बल्कि तीर्थयात्रा, संत-सान्निध्य और सामूहिक धार्मिक वातावरण के माध्यम से भी देखने-समझने का अवसर मिला।

पीढ़ी बदली, लेकिन धर्म से जुड़ाव बना रहा

आशीष मानते हैं कि परिवार में धर्म केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहा। दादा लख्मीचंद जैन से पिता रमेशचंद्र जैन और ब्रह्मचारी राजेंद्र जैन तक जो धार्मिक वातावरण बना, उसी में अगली पीढ़ी बड़ी हुई।

आशीष के अनुसार परिवार के मुनि भक्ति और धार्मिक वातावरण से जुड़े रहने के कारण उनके पुत्र और पुत्री के वैवाहिक संबंध भी मुनि भक्त परिवारों में होने का संयोग बना।

उनकी मंगल भावना यही है कि आने वाली पीढ़ियों में भी धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रहे, परिवार में सुख-शांति रहे और जीवन संयम तथा सद्मार्ग की ओर आगे बढ़ता रहे।

दस दिन—थाली का संयम मन तक पहुंचे

आशीष कुमार जैन परिवार की दशलक्षण दिनचर्या एक सीधी बात सामने रखती है—संस्कार तब पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते हैं, जब बच्चे उन्हें घर में रोज होते हुए देखते हैं।

यहां दादा-पिता का अभिषेक-पूजन, मां और पत्नी का स्वाध्याय-प्रतिक्रमण, साधु-संतों की सेवा और धार्मिक यात्राएं अगली पीढ़ी के लिए धर्म को जीवन का हिस्सा बनाती गईं।

दशलक्षण के दस दिनों में यही भावना और मजबूत होती है। भोजन में त्याग बढ़े, लेकिन उसके साथ क्रोध-मान-माया-लोभ भी घटें—तभी थाली से शुरू हुआ संयम मन और व्यवहार तक पहुंचता है।

श्रृंखला का उद्देश्य

श्रीफल की विशेष ‘दशलक्षण और निमाड़ के परिवार’ श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, सामान्य दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा घर से मिले धार्मिक संस्कार अगली पीढ़ी तक कैसे पहुंचते हैं।

कल फिर मिलेंगे निमाड़ के एक और परिवार से और जानेंगे कि दशलक्षण के दस दिनों में उनके घर की दिनचर्या, भोजन और व्यवहार में क्या बदलाव आता है।