श्रीफल की विशेष श्रृंखला में आज मिलिए कसरावद के उत्तमचंद जैन (साटकुर) परिवार से। यहां दशलक्षण के साथ धर्म शुरू नहीं होता, बल्कि सालभर से चली आ रही धार्मिक दिनचर्या इन दस दिनों में और गहरी हो जाती है। तीन पीढ़ियां साथ अभिषेक करती हैं, घर में तत्त्व चर्चा होती है और बच्चे भी पढ़ाई के साथ अपने धार्मिक नियम निभाते हैं।

श्रीफल साथी सन्मति जैन काका से बातचीत में परिवार के प्रमुख उत्तमचंद जैन बताते हैं कि दशलक्षण में उनकी दिनचर्या बहुत ज्यादा नहीं बदलती। फर्क इतना है कि मंदिर और स्वाध्याय के लिए समय बढ़ जाता है, तप-त्याग के नियम बढ़ते हैं और अपने भाव-विचारों को शुद्ध रखने का प्रयास अधिक होता है।

तीन पीढ़ियां साथ करती हैं अभिषेक, घर की चर्चा से बच्चों को मिले संस्कार

परिवार की तीन पीढ़ियां सुबह साथ मिलकर जिनाभिषेक और पूजन करती हैं। सामान्य दिनों में करीब एक से दो घंटे मंदिर में बीतते हैं, जबकि दशलक्षण में यह समय बढ़कर तीन से चार घंटे हो जाता है।

दोनों समय मंदिर में स्वाध्याय होता है और घर में भी तत्त्व चर्चा चलती रहती है। उत्तमचंद जी मानते हैं कि बच्चों के संस्कार बनाने में घर का यही वातावरण सबसे ज्यादा काम आता है। बच्चे बड़ों को धर्म करते देखते हैं, उनकी चर्चा सुनते हैं, सवाल पूछते हैं और धीरे-धीरे उन्हीं बातों को अपने जीवन में उतारने लगते हैं।

स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई के साथ बच्चे धर्म की पढ़ाई और धार्मिक प्रश्नोत्तरी में भी रुचि लेते हैं। घर से बाहर रहने पर भी दशलक्षण के नियम अपनी परिस्थिति के अनुसार निभाते हैं।

व्यवसाय के साथ चलते हैं तप-त्याग के नियम

परिवार में व्यवसाय और पढ़ाई की जिम्मेदारियां अपनी जगह चलती रहती हैं। दशलक्षण में इन्हीं के बीच धर्म के लिए अधिक समय निकाला जाता है। कोई बेला-तेला करता है, कोई एकासन, उपवास या रस-त्याग। सामायिक और प्रतिक्रमण भी दिनचर्या का हिस्सा रहते हैं।

उत्तमचंद जी स्वयं पूरे वर्ष अष्टमी को एकासन तथा चतुर्दशी को उपवास और प्रोषधोपवास करते हैं। बहू-बेटे भी अष्टमी और चतुर्दशी को एकासन का नियम रखते हैं। इसलिए दशलक्षण में किए जाने वाले कई नियम उनके लिए केवल दस दिनों की साधना नहीं, बल्कि सालभर के संयम का ही विस्तार हैं।

भोजन की मर्यादा भी बचपन से मिली

परिवार के भोजन में भी वर्षों से मर्यादा चली आ रही है। उत्तमचंद जी बताते हैं कि घर में आलू, प्याज और जमीकंद आदि नहीं आते और बच्चों ने भी इन्हें भोजन में नहीं अपनाया।

बच्चे रात्रि भोजन का त्याग रखते हैं, जबकि परिवार के बड़ों ने रात्रि में चारों प्रकार के आहार का आजीवन त्याग किया हुआ है।

यानी बच्चों के लिए भोजन का संयम किसी पर्व पर अचानक शुरू होने वाला नियम नहीं है। उन्होंने बचपन से घर में जैसा देखा, वही उनकी आदत का हिस्सा बन गया।

बेटियों ने तप और स्वाध्याय को बनाया अपनी साधना

परिवार की बेटियों में भी ये संस्कार साफ दिखाई देते हैं। छोटी बेटी प्रतिवर्ष दशलक्षण में दस उपवास की साधना करती हैं, जबकि बड़ी बेटी उपवास, एकासन और स्वाध्याय के माध्यम से पर्व की आराधना करती हैं।

परिवार में हर सदस्य की साधना अलग हो सकती है, लेकिन सभी अपनी क्षमता के अनुसार इन दस दिनों में संयम बढ़ाने का प्रयास करते हैं।

साधु सेवा से भी जुड़ी हैं परिवार की पीढ़ियां

परिवार साधु-संतों की सेवा में भी सक्रिय रहता है। आहार, विहार और निहार में बिना पंथ के भेद के सहयोग करने का भाव रखा जाता है।

उत्तमचंद जी का आचार्य श्री वर्धमानसागर महाराज से पुराना शैक्षणिक संबंध रहा है। उन्हें आचार्यश्री के साथ अध्ययन करने का अवसर मिला था। वहीं पुत्र अविनाश जैन ने मुनि श्री पूज्य सागर जी के साथ बचपन का समय बिताया है । संतों के इस सान्निध्य को परिवार अपने धार्मिक संस्कारों की महत्वपूर्ण कड़ी मानता है।

दशलक्षण में नियम ही नहीं, भाव भी बदलें

उत्तमचंद जी के लिए दशलक्षण का अर्थ केवल यह नहीं कि किसने कितने उपवास किए या मंदिर में कितना समय बिताया। वे मानते हैं कि इन दस दिनों में भाव अधिक निर्मल हों, विचारों में शुद्धता आए और व्यवहार में संयम बढ़े, तभी साधना का वास्तविक प्रभाव जीवन में दिखाई देता है।

इस परिवार की दिनचर्या भी यही बताती है। तीन पीढ़ियां साथ मंदिर जाती हैं, घर में धर्म की चर्चा होती है और बच्चों को नियम के पीछे का भाव समझने का अवसर मिलता है।

यही कारण है कि बड़ों के नियम अगली पीढ़ी के लिए केवल परंपरा नहीं रहे, बल्कि धीरे-धीरे उनके अपने संस्कार बन गए।

श्रृंखला का उद्देश्य

श्रीफल की विशेष ‘दशलक्षण और निमाड़ के परिवार’ श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है और धर्म, संयम व संस्कार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक किस तरह पहुंचते हैं।

कल फिर मिलेंगे निमाड़ के एक और परिवार से और जानेंगे कि दशलक्षण के दस दिन उनके जीवन में क्या बदलाव लेकर आते हैं।