श्रीफल की विशेष श्रृंखला ‘दस दिन–दस परिवार’ में आज मिलिए इंदौर के आनंद गोधा और नवीन गोधा परिवार से।
दशलक्षण महापर्व किसी परिवार की दिनचर्या में केवल पूजा-पाठ का बदलाव नहीं लाता, बल्कि समय, भोजन, सेवा और जिम्मेदारियों का पूरा स्वरूप बदल देता है। श्रीफल समूह की संपादक रेखा जैन से विशेष बातचीत में सामाजिक संसद इंदौर के अध्यक्ष आनंद गोधा और नवीन गोधा ने बताया कि पर्व के इन दस दिनों में उनका परिवार सुबह से रात तक धर्म-साधना और चातुर्मास की व्यवस्थाओं से जुड़ा रहता है।
आनंद गोधा ने बातचीत में बताया कि दिन की शुरुआत सुबह जल्दी उठने के साथ होती है। इसके बाद परिवार के सदस्य गुरुजी के सान्निध्य में पहुंचते हैं, जहां अभिषेक, शांतिधारा और पूजन का क्रम चलता है। गुरुजी के प्रवचन सुनना भी उनकी दैनिक दिनचर्या का प्रमुख हिस्सा है। इसके बाद शिविरार्थियों की आहारचर्या और अन्य व्यवस्थाओं में सहयोग किया जाता है।
गोधा परिवार में इन दस दिनों के दौरान भोजन में भी विशेष संयम रखा जाता है। आनंद गोधा ने बताया कि परिवार के सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार एकासन करते हैं। एक ही समय बैठकर भोजन और पानी ग्रहण किया जाता है। पर्व के दिनों में बाहर के भोजन से दूरी रखी जाती है और शुद्ध, मर्यादित आहार को प्राथमिकता दी जाती है।
दोपहर का समय भी धर्म-अध्ययन और सेवा के कार्यों में बीतता है। गुरुजी की कक्षाओं में सहभागिता, शिविरार्थियों के साथ धार्मिक अध्ययन, शाम को शंका समाधान और आरती—इन सबके कारण दिन का अधिकांश समय धार्मिक वातावरण में ही गुजरता है। आनंद गोधा के अनुसार इन दिनों सुबह कब शाम में बदल जाती है, इसका पता ही नहीं चलता।
चातुर्मास की व्यवस्थाओं में परिवार की सक्रिय भूमिका
सामाजिक संसद के अध्यक्ष होने के कारण आनंद गोधा के लिए दशलक्षण पर्व और चातुर्मास के दिनों में जिम्मेदारियां और भी बढ़ जाती हैं। मुनि सुधा सागर जी के प्रवचन, कक्षाएं, शिविरार्थियों की व्यवस्था, भोजन, आवागमन और अन्य व्यवस्थाओं में समाज के लोगों के साथ निरंतर समन्वय करना पड़ता है।
बातचीत में उन्होंने बताया कि परिवार की महिलाएं और बहनें भी एकासन और धार्मिक नियमों का पालन करते हुए व्यवस्थाओं में सहयोग करती हैं। परिवार के लिए धर्म-साधना केवल व्यक्तिगत नियमों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज और शिविरार्थियों की सेवा भी उसका महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।
प्रतिदिन 150 से 200 शिविरार्थियों के भोजन की व्यवस्था
गोधा परिवार से जुड़ी सबसे बड़ी सेवाओं में शिविरार्थियों के भोजन की व्यवस्था भी शामिल है। आनंद गोधा ने बताया कि क्लर्क कॉलोनी समाज और अन्य समाजजनों के सहयोग से प्रतिदिन लगभग 150 से 200 शिविरार्थियों के भोजन की व्यवस्था की जाती है।
भोजन तैयार कराने से लेकर शिविरार्थियों तक पहुंचाने और उन्हें बसों से लाने-ले जाने तक कई व्यवस्थाएं संभालनी पड़ती हैं। इसमें नवीन गोधा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वे दिनभर समाज के कार्यकर्ताओं के साथ समन्वय करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी शिविरार्थी को असुविधा न हो।
सेवा के इस कार्य में परिवार के सदस्य केवल व्यवस्था करने वाले नहीं, बल्कि स्वयं भी हर स्तर पर सहभागी रहते हैं। भोजन, आवागमन, समय और अनुशासन—हर व्यवस्था सामूहिक सहयोग से पूरी की जाती है।
परिवार के बच्चों में भी भोजन की मर्यादा
रेखा जैन से बातचीत में आनंद गोधा ने बताया कि परिवार के बच्चे भी दशलक्षण पर्व के दिनों में भोजन की मर्यादा का पालन करते हैं। पढ़ाई और कॉलेज की व्यस्तता के कारण सभी के लिए एकासन संभव नहीं हो पाता, लेकिन बाहर की वस्तुओं और बाजार के भोजन से दूरी रखी जाती है।
परिवार में यह समझ रखी जाती है कि प्रत्येक सदस्य अपनी उम्र, स्वास्थ्य और दिनचर्या के अनुसार नियम ले, लेकिन पर्व के मूल भाव—शुद्धता, संयम और मर्यादा—से कोई दूर न रहे।
यह पारिवारिक वातावरण बच्चों को भी सहज रूप से धर्म से जोड़ता है। बड़े सदस्य जब स्वयं नियम, एकासन, पूजा और सेवा करते हैं, तो नई पीढ़ी भी बिना किसी दबाव के उन्हीं संस्कारों को अपनाने लगती है।
नवीन गोधा के लिए सेवा ही दिनचर्या
नवीन गोधा ने भी रेखा जैन से बातचीत में बताया कि दशलक्षण और चातुर्मास के दिनों में उनका अधिकांश समय व्यवस्थाओं में बीतता है। शिविरार्थियों की सेवा, भोजन, बसों से आवागमन और समाज के लोगों के साथ समन्वय ही उनकी प्रमुख जिम्मेदारी रहती है।
उन्होंने कहा कि समाज की सेवा करते हुए थकान का अनुभव नहीं होता, क्योंकि यह कार्य धर्म प्रभावना और गुरु सेवा की भावना से किया जाता है। पूरे दिन की व्यस्तता के बावजूद परिवार के सदस्य आरती, प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रमों से जुड़े रहने का प्रयास करते हैं।
साधना और संगठन दोनों का संगम
रेखा जैन की आनंद गोधा और नवीन गोधा से हुई इस विशेष बातचीत से यह सामने आया कि गोधा परिवार के लिए दशलक्षण पर्व केवल व्यक्तिगत तप और पूजा का अवसर नहीं है। उनके लिए यह पर्व सेवा, संगठन, अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी का भी समय है।
एक ओर परिवार एकासन, अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, प्रवचन और आरती से जुड़ता है, तो दूसरी ओर 150 से 200 शिविरार्थियों के भोजन और आवागमन जैसी व्यवस्थाओं में सहयोग करता है। इसी कारण इन दस दिनों में उनका घर, समाज और धर्म-साधना एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं।
गोधा परिवार की दिनचर्या यह संदेश देती है कि दशलक्षण पर्व का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब व्यक्ति स्वयं नियम पालन करने के साथ दूसरों की सेवा और समाज की जिम्मेदारियों को भी धर्म का हिस्सा माने।
श्रृंखला का उद्देश्य
श्रीफल की इस विशेष “दस दिन–दस परिवार” श्रृंखला का उद्देश्य यह जानना है कि दशलक्षण पर्व के दिनों में जैन परिवारों की दिनचर्या में क्या बदलाव आता है, आम दिनों और इन दस दिनों में कितना अंतर होता है तथा इस पर्व का परिवार और जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है।
कल मिलेंगे एक और परिवार से, जो बताएगा कि दशलक्षण पर्व उनके घर में किस तरह आत्मशुद्धि, संस्कार और अनुशासन का वातावरण बनाता है।





