दडूका (बांसवाड़ा)। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदी गुरुदेव ने पुनर्वास कॉलोनी, सागवाड़ा से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में कहा कि आत्मा को संयमित करने पर जीव इस लोक और परलोक में सुखी होता है। सभी दूसरों पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन सबसे पहले स्वयं पर विजय प्राप्त करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि दूसरों को संयमित करने की अपेक्षा स्वयं को संयमित करना आवश्यक है। सत्ता और संपत्ति के प्रभाव में मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी क्रूर हो सकते हैं। इसलिए क्रोध पर विजय तथा लोभ पर संतोष के माध्यम से नियंत्रण प्राप्त करना ही आत्मविजय है।

अंतरंग शुद्धि के लिए है साधना

कनकनंदी गुरुदेव ने कहा कि साधु का वेष धारण करना, केशलोंच करना अथवा नग्न रहना—ये सभी अंतरंग विशुद्धि के लिए हैं। जिन्होंने आचार्यश्री से ज्ञान प्राप्त किया है, वे दिखावा नहीं करते, निंदा नहीं करते और निंदा नहीं सुनते; वे गुणों की प्रशंसा करते हैं।

उन्होंने कहा कि इंद्रिय संयम, कषाय संयम, प्राणी संयम, वचन संयम और मन संयम से मन स्थिर होता है तथा उच्च विचार प्रकट होते हैं। बच्चों और युवाओं को भी पढ़ाई के तनाव के बीच मन को स्थिर रखने के लिए संयम एवं आत्मविश्वास का अभ्यास करना चाहिए।

निर्मल भाव से किया धर्मकर्म फलदायी

गुरुदेव ने आगम के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि दिखावे के साथ किया गया तप, दान, व्रत और संयम अपना प्रभाव खो देता है। इसके विपरीत निर्मल भाव और आत्मविशुद्धि के साथ किया गया छोटा-सा धर्मकार्य भी महान फलदायी होता है।

अहिंसा नगर जिनालय में हुई आराधना

अहिंसा नगर पार्श्वनाथ जिनालय में उत्तम संयम धर्म की आराधना भक्तिभाव से की गई। पंचामृत अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं विधान संपन्न हुए। रात्रि में आरती एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।

कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा ने दी।

श्रीफल साथी : अजीत कोठिया, दडूका-बांसवाड़ा