मुरैना। श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज ने ज्ञान और आचरण के समन्वय को जीवन की सार्थकता का आधार बताया। उन्होंने कहा कि केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारना भी आवश्यक है। ज्ञान मार्ग दिखाता है और आचरण उस मार्ग पर चलकर मंजिल तक पहुंचाता है। आचार्यश्री ने कॉलेज के एक छात्र का उदाहरण देते हुए समझाया कि जब छात्र कम्पास बॉक्स खरीदता है तो उसमें नक्शा और शीशा भी लगा होता है। नक्शा रास्ता दिखा सकता है, लेकिन व्यक्ति को पहले यह समझना होगा कि वह स्वयं भटका कहां है। यदि उसे अपनी भटकन का बोध ही नहीं है, तो सही नक्शा होने के बावजूद मंजिल तक पहुंचना कठिन है। इसी प्रकार संसार की भटकन से बचने के लिए शास्त्र हमें सही मार्ग और जीवन के वास्तविक लक्ष्य का बोध कराते हैं।
ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यवहार और चरित्र में प्रकट हो
उन्होंने कोल्हू के बैल का उदाहरण देते हुए कहा कि बैल दिनभर चलता रहता है और उसे लगता है कि वह बहुत आगे बढ़ गया होगा, लेकिन आंखों की पट्टी हटाने पर पता चलता है कि वह उसी स्थान पर खड़ा है। इसी प्रकार मनुष्य भी जीवनभर दौड़ता रहे, लेकिन यदि उसकी दिशा सही नहीं है, तो वह मंजिल तक नहीं पहुंच सकता। जीवन की सफलता केवल चलने में नहीं, बल्कि सही दिशा में चलने में है। आचार्यश्री ने राजपुरोहित के प्रसंग के माध्यम से बताया कि व्यक्ति का सम्मान केवल उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके आचरण से भी निर्धारित होता है। जो व्यक्ति दूसरों को धर्म और सदाचार का उपदेश देता है, उसके अपने जीवन में भी उन सिद्धांतों का पालन दिखाई देना चाहिए। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यवहार और चरित्र में प्रकट हो। इसलिए शास्त्रों का अध्ययन करने के साथ उनके संदेश को जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है।
ज्ञान को जीवन में उतारना ही वास्तविक धर्म
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में ज्ञान का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह उसके विचारों, व्यवहार और आचरण में दिखाई दे। शास्त्रों को पढ़ना, प्रवचन सुनना और धर्म की बातें करना अच्छी बात है, लेकिन इनसे जीवन में परिवर्तन नहीं आता, तो आत्मकल्याण का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार भोजन के बारे में जानने मात्र से भूख शांत नहीं होती, बल्कि भोजन करना आवश्यक होता है, उसी प्रकार धर्म का ज्ञान प्राप्त करने मात्र से आत्मा का कल्याण नहीं होता। ज्ञान को अपने जीवन में धारण करना पड़ता है। यदि व्यक्ति क्रोध, मान, माया, लोभ और कषायों से घिरा रहता है, तो उसे अपने ज्ञान के वास्तविक स्वरूप पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यदि ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी हमारे विचारों में विनम्रता, वाणी में मधुरता और व्यवहार में करुणा नहीं आती, तो हमें आत्मचिंतन की आवश्यकता है। सच्चा ज्ञान वही है, जो अहंकार को कम करे, विवेक को बढ़ाए और जीवन को सदाचार की दिशा में आगे ले जाए। मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि शास्त्रों में बताए गए सिद्धांतों को केवल सुनकर या पढ़कर न छोड़ें, बल्कि उन्हें अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं। ज्ञान और आचरण का समन्वय ही आत्मविकास का मार्ग है। जब मनुष्य अपने विचारों और व्यवहार को धर्म के अनुरूप बनाता है, तभी उसका जीवन वास्तविक अर्थों में सार्थक बनता है। धर्मसभा में दोनों संतों के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को ज्ञान, आत्मचिंतन और सदाचरण के महत्व का संदेश दिया।
श्री महावीर दि. जैन नसियाजी में होगा संत निवास का उद्घाटन
अम्बाह रोड पर फाटक बाहर स्थित श्री महावीर दिगम्बर जैन नसियां जी जैन मंदिर में आचार्यश्री उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ससंघ सान्निध्य में 01 नवंबर को प्रातः 8 बजे आचार्यश्री ज्ञानसागर निलय संत निवास का उद्घाटन होगा। ज्ञातव्य हो कि जैन बगीची के नसियां जी जिनालय में नगर के श्रावक श्रेष्ठी महेशचंद्र बंगाली, पवन जैन इंडस्ट्रीज के विशेष सहयोग एवं सकल जैन समाज की सहभागिता से एक भव्य संत निवास का निर्माण किया गया है । जिसका आचार्यश्री के ससंघ सान्निध्य में शुभारंभ होगा। कार्यक्रम समापन पर सभी के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था रखी गई है।




