आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के नगर में चल रहे पावन वर्षायोग चातुर्मास में धर्म, संस्कृति, संस्कार, कर्म आदि विषयों पर देशना से धर्मानुरागी धन्य-धन्य हो रहे हैं। उन्होंने प्रवचन के दौरान उपगुहन अंग पर प्रकाश डाला। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की खबर...
रामगंजमंडी। आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के नगर में चल रहे पावन वर्षायोग चातुर्मास में धर्म, संस्कृति, संस्कार, कर्म आदि विषयों पर देशना से धर्मानुरागी धन्य-धन्य हो रहे हैं। उन्होंने प्रवचन के दौरान उपगुहन अंग पर प्रकाश डाला। उन्होंने इसका अर्थ बताया ढंकना भावार्थ रूप में समझाते हुए कहा कि किसी अज्ञानता के कारण किसी धर्मात्मा का अवगुण आपकी दृष्टि में आ जाए तो उसे ढंकना चाहिए लेकिन, हमारी आदत तो उसे फैलाने की है, जब तक अवगुण हम लोगों को नहीं कह देते तब तक चैन भी नहीं पड़ता है।धर्म और धर्मात्मा को परेशान ना करें
आचार्यश्री ने कहा कि लोग दूसरे के दोषों को ऐसे कहते हैं, जैसे उस समय अमृत का पान कर रहे हों। बुराई बहुत जोर-जोर से करेगा, इसके विपरीत कोई व्यक्ति दूसरों के गुणों का गुणगान करेगा तो बहुत धीरे से करेगा। इस बात पर ध्यान दिलाया कि धर्मात्मा का यदि दोष आपके सामने आ जाए तो पहले उसे वहीं का वहीं दबा दो और उसे ढंक दो। उन्होंने कहा कि ऐसा भी सत्य मत बोलो किसी के प्राण संकट में आ जाए और धर्म और धर्मात्मा को परेशान ना करें और उससे धर्म कलंकित हो जाए। लोग धर्म से आस्था घटा ले, ऐसा भी सत्य नहीं बोलना चाहिए और वह झूठ सत्य से भी बड़ा होता है।
धर्मात्मा संरक्षण करना प्रत्येक जैनी का दायित्वप्राणों से ज्यादा धर्म का संरक्षण करना चाहिए। प्राण चले जाए कोई बात नहीं धर्म नहीं जाना चाहिए। धर्म का संरक्षण धर्मात्मा संरक्षण करना प्रत्येक जैनी का दायित्व है। आचार्य श्री ने आस्था को ठगने के विषय में कहा कि किसी की आस्था को ठगना अपनी आस्था को ठगना है। अपने आप को नरक निगोद भेजना है। अनंत काल के लिए अपने आपको कष्ट पीड़ा में तैयार करना है। धर्मात्मा व्यक्ति किसी को ठग नहीं सकता क्योंकि वह अच्छी तरह से समझता है।
धर्म की रक्षा करना अनिवार्यठगने का अर्थ क्या है, ठगने का फल क्या है वह अच्छी तरह से समझता है लेकिन, धर्मात्मा सहज में ठगे जाते हैं, समझ ही नहीं पाते हैं। ठगना अच्छी बात नहीं है। स्वयं को न दूसरों को अगर दूसरे को ठग रहे हो तो समझ लो तो उस समय तुम समझ लो उस समय तुम अपने आप को ठग रहे हो। व्यक्ति की रक्षा करना अनिवार्य नहीं है लेकिन, धर्म की रक्षा करना अनिवार्य है। धर्म की रक्षा से ही हमारा समाज सुरक्षित रहता है।
ऐसा उपक्रम करो कि वह पुनः स्थापित होआचार्य श्री ने कहा कि दिमाग मत लगाओ किसी की भूल में किसी की चूक में। आपके सामने किसी ने रात्रि भोजन का त्याग किया। भूल से उसे ध्यान नहीं रहा और आपके सामने रात्रि भोजन करते पाया गया तब चार लोगों को बुलाकर मत कहो। दिमाग मत लगाओ दिल लगाओ हो सकता है भूल गया हो। हो सकता है ध्यान नही रहा हो। हो सकता है भाव बदल गया हो। समझाओ बात करो उससे एकांत में ले जाकर पहले तो ढंक दो उसके बाद ऐसा उपक्रम करो कि वह पुनः स्थापित हो।
उपगुहन अंग को धारण करोलोग गड्ढा दूसरे के लिए खोदते है लेकिन, बाद में खुद उसी में गिर जाते हैं। अग्नि का गोला किसी को मारने के लिए उठाओगे तो पहले कौन जलेगा, स्वयं जलेंगे। ऐसे ही अगर आपने धर्मात्मा की बात को ढंका नहीं आपको इतनी हानि उठानी पड़ेगी। आप अनंत भवों तक सुलझ नहीं पाओगे। अच्छा तो यह है इसी भव में सुलझने का प्रयास करो और उपगुहन अंग को धारण करो ताकि आत्मा का कल्याण हो सके।




