चंदेरी। चातुर्मास के पावन अवसर पर आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आर्यिका श्री 105 अपूर्व मति माताजी एवं परम पूज्य आर्यिका श्री 105 अनुत्तर मति माताजी ने जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों का सरल एवं प्रेरणादायी विवेचन किया। उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण, संयम, सदाचार, समता और परिग्रह त्याग की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

मनुष्य जीवन आत्मकल्याण के लिए

आर्यिका श्री अपूर्व मति माताजी ने मंगल प्रवचन में कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। इसका उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएं, धन-संपत्ति और सांसारिक उपलब्धियां प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा पर अनादिकाल से बंधे कर्मों का क्षय करना है। उन्होंने कहा कि कर्मों की निर्जरा तभी संभव है, जब मनुष्य अपनी परिणति को अशुभ भावों से हटाकर शुभ भावों, सेवा, स्वाध्याय, संयम, तप, दान और धर्म की ओर अग्रसर करे।

कोरोना काल ने सिखाई अनित्यता

माताजी ने कोरोना काल की विभीषिका का स्मरण कराते हुए कहा कि उस समय धन, पद और प्रतिष्ठा से अधिक जीवन और स्वास्थ्य का महत्व समझ में आया। अनेक परिवारों ने कठिनाइयों, बिछोह और संघर्ष का सामना किया। उन्होंने कहा कि उस काल ने संसार की अनित्यता का बोध कराया। आज परिस्थितियां सामान्य हैं तो हमें समय का सदुपयोग करते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

परिग्रह कम होगा तो जीवन हल्का होगा

आर्यिका श्री अपूर्व मति माताजी ने कहा कि पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज सदैव कहते थे कि परिग्रह जितना कम होगा, जीवन उतना ही हल्का, शांत और आनंदमय बनेगा। आवश्यकता से अधिक संग्रह मन में भय, मोह और अशांति को जन्म देता है, जबकि सीमित आवश्यकताएं और संतोष आत्मिक सुख प्रदान करते हैं। समता, सादगी और संयम ही सच्चे धर्म की पहचान हैं।

प्रतिदिन करें आत्मनिरीक्षण

आर्यिका श्री अनुत्तर मति माताजी ने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि मनुष्य का प्रत्येक दिन आत्मनिरीक्षण का अवसर है। यदि हम प्रतिदिन अपने विचारों, वाणी और व्यवहार की समीक्षा करें तो अनेक दोष स्वतः दूर होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। धर्म परिवार, समाज और दैनिक व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। क्षमा, दया, करुणा, विनय, मैत्री और सहिष्णुता का आचरण ही जैन धर्म की सच्ची साधना है।

सुख-दुःख में समता ही साधना

माताजी ने कहा कि संसार में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान तथा संयोग-वियोग जीवन के स्वाभाविक प्रसंग हैं। जो व्यक्ति इन सभी परिस्थितियों में समभाव बनाए रखता है, वही वास्तविक साधक है। राग-द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ना ही मोक्ष मार्ग है। परिग्रह का त्याग, अहिंसा का पालन, संयमित जीवन और सद्भावपूर्ण व्यवहार व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाते हैं।

बच्चों को संस्कारों से जोड़ें

दोनों पूज्य माताजी ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे जीवन में परिग्रह को सीमित करें, समय का सदुपयोग करें तथा धर्म, सेवा और स्वाध्याय को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं। उन्होंने कहा कि बच्चों को भी संस्कार, सदाचार और जैन संस्कृति से जोड़ना आवश्यक है। समाज तभी सशक्त बनेगा, जब प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को संयम, समता और आत्मानुशासन से प्रकाशित करेगा।

आत्मकल्याण ही जीवन की सार्थकता

धर्मसभा में दोनों पूज्य माताजी ने स्पष्ट किया कि मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मा के कल्याण में है। परिग्रह का त्याग, समता का अभ्यास, संयमित जीवन और सद्भावपूर्ण व्यवहार आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। यही मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी है।