इंदौर।नेमी नगर जैन कॉलोनी के सन्मति समवशरण में धर्मसभा में आचार्य श्री सुनील सागर जी ने कहा चिंताएं चिड़िया के समान होती हैं, जिन्हें अपने करीब आने से तो नहीं रोका जा सकता लेकिन, उन्हें अपने मस्तिष्क में घोंसला बनाने से अवश्य रोका जा सकता है। यदि व्यक्ति चिंताओं को अपने दिमाग में घर बनाने की अनुमति दे देता है तो धीरे-धीरे उसकी मानसिक शांति समाप्त होने लगती है। इसलिए चिंताओं की नहीं, बल्कि आत्मतत्व की चिंता करनी चाहिए। दिखावे का जीवन जीने के बजाय ऐसा जीवन जीना चाहिए, जो आत्मकल्याण की दिशा में ले जाए। जीवन में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो कथनी और करनी में अंतर रखते हैं। उनकी बातें कुछ और होती हैं और कर्म कुछ और। ऐसे लोग बाहर से कुछ और दिखाई देते हैं, जबकि भीतर से कुछ और होते हैं। वास्तव में, दिखावे का जीवन जीना भले ही एक कला हो, लेकिन सच्चे अर्थों में जीवन की भलाई इसी में है कि व्यक्ति ढंग से जीवन जीना सीखे।
सही समय पर सही बात समझें तो जीवन स्वर्ग
व्यक्ति को अपने जीवन में सही समय पर सही बात समझने की कला विकसित करनी चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सही समय पर सही बात समझ ले और उसे समझाने वाला भी सही समय पर मिल जाए तो उसका जीवन स्वर्ग के समान बन सकता है। इसलिए जीवन में केवल अच्छी बातें करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन बातों को अपने आचरण में उतारना ही वास्तविक जीवन की सार्थकता है।




