इंदौर। धर्मसभा में मुनि श्री सुधासागर जी ने भारतीय होने और जैन होने के गौरव को समझाते हुए कहा कि भारत तीर्थंकरों की पवित्र भूमि है। मनुष्य को यह विचार करना चाहिए कि उसे जन्म से ही कितने ऐसे धार्मिक और आध्यात्मिक अवसर मिले हैं, जो जीवन को संस्कार एवं साधना की दिशा देते हैं।
जैन कुल और संस्कारों का गौरव
मुनि श्री ने कहा कि भारत में जन्म लेने के साथ जैन कुल मिलना भी गौरव की बात है। जैन परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति को मां जिनवाणी, णमोकार महामंत्र, देव दर्शन, पूजन-अभिषेक, मुनिराजों को आहार देने का अवसर, शाश्वत जैन तीर्थ, शाश्वत पर्व, संतों के चातुर्मास और पंचकल्याणक जैसे धार्मिक अवसर प्राप्त होते हैं।
उन्होंने कहा कि अहिंसा के पालन और हिंसा से बचने के लिए मांसाहार एवं रात्रि भोजन के त्याग जैसे संस्कार भी जैन जीवन की विशेषता हैं। इन सभी अवसरों का मूल्य समझना चाहिए और अपने जैनत्व पर गर्व करना चाहिए।
भारतभूमि का महत्व समझें
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति को अपने जन्मस्थान और धर्म संस्कारों का महत्व समझना चाहिए। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक विरासत की तुलना करते हुए कहा कि जैन धर्म की समृद्ध परंपरा और संस्कारों के सामने भौतिक वैभव का कोई विशेष महत्व नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति भारत और जैन धर्म से मिले आध्यात्मिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारे।
अच्छा गुरु दोषों को दिखाता है
मुनि श्री सुधासागर जी ने कहा कि जो गुरु केवल आपकी अच्छाइयों पर दृष्टि रखे, वह अच्छा गुरु नहीं है। अच्छा गुरु वह है जो आपके दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने की दिशा दिखाए। उन्होंने कहा कि पिता और गुरु यदि व्यक्ति के दोषों की ओर ध्यान दिलाएं तो उनसे नाराज नहीं होना चाहिए, बल्कि शुभ भाव रखते हुए यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि उनकी दृष्टि में मुझमें कौन-कौन से दोष हैं।
आत्मसुधार के लिए दोष पहचानना जरूरी
उन्होंने कहा कि वही व्यक्ति सुधर सकता है जो सबसे पहले अपने भीतर अपनी बुराइयों को खोजे, उन्हें स्वीकार करे और स्वयं से कहे कि मुझे सुधारना है। गुरु इसलिए बनाना चाहिए कि जिन दोषों को व्यक्ति स्वयं नहीं देख पाता, उन्हें गुरु की दृष्टि पहचान सके।
उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि दुनिया आपके दोषों को देखे, उससे पहले गुरु को अपने दोष दिखा देना चाहिए। गुरु की सीख को स्वीकार करने से व्यक्ति के व्यक्तित्व और जीवन में निरंतर विकास संभव है।
मनुष्य जीवन सबसे श्रेष्ठ
मुनि श्री ने कहा कि 84 लाख योनियों में मनुष्य योनि को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस दुर्लभ मनुष्य जीवन को पाने के लिए देवता भी तरसते हैं। इसलिए मनुष्य को इस जीवन की दुर्लभता समझकर इसे धर्म, आत्मचिंतन, सदाचार और आत्मसुधार में लगाना चाहिए।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में मुनि श्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने जीवन में जैन संस्कारों को अपनाने, गुरु के मार्गदर्शन को स्वीकार करने और मनुष्य जीवन का सदुपयोग करने की प्रेरणा दी।



