धरियावद। भक्तामर विधान की 48 दिवसीय आराधना के क्रम में शनिवार को 22वें दिन पुण्यार्जक परिवारों एवं श्रावक-श्राविकाओं ने भक्तिभावपूर्वक भक्तामर विधान की पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर मंडप पर 48 अर्घ्य समर्पित किए गए। भक्ति, श्रद्धा और धार्मिक उल्लास से वातावरण भक्तिमय बना रहा।
क्या है वास्तविक अमृत?
विधान की आराधना के पश्चात आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्य कल्प पुण्यसागर जी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र की भावधारा को आगे बढ़ाते हुए कहा—“किम् अमृतम्? अमृत क्या है?”
आचार्यश्री ने कहा कि व्यवहार की दृष्टि से जो हमारे जीवन की रक्षा करे, वह अमृत कहलाता है। जल, भोजन और औषधि आदि जीवन की रक्षा करने वाले होने के कारण अमृत के समान हैं, लेकिन इनका प्रभाव इसी भव तक सीमित रहता है।
जिनवाणी ही ज्ञानामृत
आचार्यश्री ने कहा कि जिनवाणी, आचार्यों और सतगुरुओं से प्राप्त ज्ञान ही वास्तविक ज्ञानामृत है। यह ज्ञान जीव को भव-भव में मार्गदर्शन प्रदान करता है और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में धर्मश्रवण और गुरुवाणी को विशेष महत्व देना चाहिए।
समय का सदुपयोग जरूरी
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में अनेक सांसारिक कार्यों के बीच यह विचार करना चाहिए कि उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या है। व्यक्ति गुरुओं के उपदेश सुनने के लिए अनेक बहाने बनाता है, लेकिन टीवी, मोबाइल और अन्य सांसारिक गतिविधियों में अपना बहुमूल्य समय सहजता से व्यतीत कर देता है।
आचार्यश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि अनावश्यक कार्यों से समय निकालकर गुरुवाणी के अमृतमय उपदेश का श्रवण करना चाहिए। यही श्रवण जीवन को सार्थक करने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का माध्यम बन सकता है।
दुर्लभ मनुष्य जीवन का करें सदुपयोग
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है। इसे केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और मनोरंजन में व्यतीत करने के बजाय आत्मकल्याण, धर्मश्रवण और सद्गुरु के उपदेशों को जीवन में उतारने में लगाना चाहिए।
शाही सवारी के लिए दिया निमंत्र
इस अवसर पर आगामी 25 अगस्त को धरियावद में महादेव भक्त मंडल द्वारा आयोजित शाही सवारी के संबंध में भक्त मंडल के सदस्य परम पूज्य आचार्यश्री के दर्शन एवं आशीर्वाद लेने पहुंचे। उन्होंने समाजजनों को शाही सवारी में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित किया।
श्रद्धालुओं ने लिया धर्ममय जीवन का संकल्प
धर्मसभा के दौरान श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री के ज्ञानामृत वचनों को श्रद्धापूर्वक सुना। प्रवचन से प्रेरित होकर श्रद्धालुओं ने धर्मश्रवण, आत्मकल्याण और गुरुवाणी को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।



