धरियावद। भक्तिभाव से हुआ भक्तामर विधान महावीर वाटिका स्थित पुण्यसागर सभागृह में चल रहे 48 दिवसीय भक्तामर महामंडल विधान के 20वें दिन धार्मिक उल्लास और भक्तिभाव का वातावरण रहा। 11 पुण्यार्जक परिवारों ने विधान में सम्मिलित होकर विधि-विधानपूर्वक पूजन-अर्चन किया तथा मंडप पर 48 अर्घ समर्पित किए। संगीतमय वातावरण में श्रावक-श्राविकाओं ने भक्तामर स्तोत्र की आराधना कर धर्मलाभ लिया।
11 परिवारों ने किया पुण्यार्जन
विधान के दौरान 11 पुण्यार्जक परिवारों ने श्रद्धाभाव से धार्मिक अनुष्ठान में सहभागिता की। पूजन-अर्चन के साथ 48 अर्घ समर्पित किए गए। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और भक्ति का वातावरण दिखाई दिया।
“दुनिया में अंधा कौन?” विषय पर प्रवचन
विधान की समाप्ति के बाद परमपूज्य आचार्य कल्पपुण्यसागर जी महाराज ने अपनी प्रवचन श्रृंखला में “दुनिया में अंधा कौन?” विषय पर प्रेरणादायी उद्बोधन दिया। आचार्यश्री ने कहा कि केवल आंखों से दिखाई न देना ही अंधापन नहीं है। जिसके पास आंखें होते हुए भी विवेकपूर्वक कार्य करने की क्षमता नहीं है, वास्तव में वही अंधा है।
आंखों का सदुपयोग जरूरी
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी आंखों का सदुपयोग करते हुए जीवन में सही और गलत का निर्णय विवेक से करना चाहिए। आंखें केवल संसार को देखने के लिए नहीं, बल्कि अपने आचरण और कर्मों को सही दिशा देने के लिए मिली हैं।
उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति पलक झुकाकर जीता है, दुनिया उसे पलकों पर उठाती है।” वहीं यदि कोई व्यक्ति संसार की नजरों में गिर जाता है तो दोबारा सम्मान प्राप्त करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
विनम्रता से बढ़ता है सम्मान
आचार्यश्री ने विनम्रता का महत्व बताते हुए कहा कि बड़े लोगों के चरणों में झुकने से वे हमें अपने हृदय से लगा लेते हैं और गुरुओं के चरणों में झुकने से आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसलिए जीवन में अहंकार को त्यागकर विनम्रता को अपनाना चाहिए।
आंखों और इंद्रियों का करें सदुपयोग
आचार्यश्री ने कहा कि आंखें मनुष्य के लिए अनमोल साधन हैं, इसलिए उनका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। आंखों से बुराई देखने, गलत मार्ग पर चलने और विषय-विकारों में फंसने के बजाय उनका उपयोग सद्विचार, सदाचार और धर्म के मार्ग को देखने के लिए करना चाहिए।
उन्होंने चेताया कि आंखों के दुरुपयोग का परिणाम जीव को अगली पर्याय में अंधे बनकर भुगतना पड़ सकता है।
धर्म और सदाचार की ओर बढ़ने का आह्वान
अंत में आचार्यश्री ने श्रावक-श्राविकाओं से आह्वान किया कि अपनी आंखों और इंद्रियों का सदुपयोग करें, विवेकपूर्वक जीवन जिएं तथा धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलते हुए अपने जीवन को सही दिशा प्रदान करें।



