बांसवाड़ा (राजस्थान)। विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदीजी गुरुदेव की वेबिनार में विश्व मानव दिवस के अवसर पर मुनि श्री सुविज्ञसागरजी महाराज ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविताओं का पाठ किया। उन्होंने मानव जीवन के महत्व और उसके सदुपयोग पर प्रकाश डाला।
मानव जीवन की महानता का संदेश
मुनि श्री ने ‘मानव तू महान रे, मानव तू विश्व की शान रे, तू स्वयं को पहचान रे’ कविता के माध्यम से मानव जीवन की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म अमूल्य है और इसे परोपकार, आत्मसंयम तथा विश्वकल्याण की भावना के साथ सार्थक बनाया जा सकता है।
कविता में संकीर्णता छोड़कर सभी के प्रति सद्भाव रखने तथा जीवन को पवित्र भावों के साथ जीने की प्रेरणा दी गई। अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य जैसे व्रतों के पालन को आत्मविकास का मार्ग बताया गया।
‘अमूल्य मानव जीवन’ कविता का पाठ
मुनि श्री ने ‘मानव जन्म अनमोल रे, इसे धन से ना तोल रे’ कविता का भी पाठ किया। इसके माध्यम से कहा गया कि केवल खाना-पीना और सोना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं है। व्यक्ति को आत्महित, जीवकल्याण और विकासकारी कार्यों में जीवन लगाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपनी इंद्रियों और मन पर संयम रखते हुए सच्चा श्रम करना चाहिए। आत्मा की शुद्धि, करुणा, मैत्री और प्रमोद के भावों से जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा दी गई।
सभी जीवों के प्रति करुणा का आह्वान
वेबिनार में संदेश दिया गया कि मनुष्य जीवन दुर्लभ अवसर है, इसलिए इसे गलत कार्यों में न लगाकर आत्मकल्याण की दिशा में प्रयुक्त करना चाहिए। सभी जीवों के प्रति वात्सल्य, करुणा, मैत्री और उनके उत्थान का भाव रखना ही मानवता का सच्चा स्वरूप है।
कार्यक्रम की जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत, सागवाड़ा एवं अजीत कोठिया डडूका, बांसवाड़ा ने दी।
श्रीफल साथी : अजीत कोठिया डडूका, बांसवाड़ा




