मुरादाबाद। यहां के सीनियर एडवोकेट पीके गोस्वामी ने बोले कि भारतीय न्यायशास्त्र का मूल सिद्धांत है-जमानत एक नियम है जबकि, जेल एक अपवाद है। गोस्वामी दी बार एसोसिएशन एंड लाइब्रेरी की ओर से राष्ट्र के लिए मध्यस्थता-विवाद नहीं, संवाद समाधान विषय पर आयोजित सेमिनार में बोल रहे थे। उल्लेखनीय है, वरिष्ठ वकीलों में बार अध्यक्ष आनंदमोहन गुप्ता और महासचिव कपिल गुप्ता के अलावा केवल पीके गोस्वामी को ही सेमिनार को एड्रेस करने का मौका मिला। बार हाल में आयोजित सेमिनार में दीगर न्यायालयों के न्यायाधीशों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही। लारा कोर्ट के न्यायाधीश जियागमुद्दीन, एडीजे 11 घनेंद्र कुमार, डीएलएसए सेक्रेट्री तपस्या त्रिपाठी, सिविल जज निमिषा गुप्ता ने भी सेमिनार में अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किए।
मुख्य मकसद न्याय प्रक्रिया को सुचारू बनाना है
गोस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट के सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई, अर्नेश कुमार वर्सेज स्टेट ऑफ बिहार,सिद्धार्थ बनाम स्टेट ऑफ यूपी आदि केसों को उद्धरण करते हुए कहा कि सतेंद्र अंतिल का निर्णय व्यक्तिगत आज़ादी और मानवीय गरिमा को मजबूत करता है। यह अति महत्वपूर्ण फैसला यह संदेश देता है। पुलिस और अदालतों को बिना वैध कारणों के नागरिकों को जेल नहीं भेजना चाहिए। गोस्वामी ने कहा कि लॉ का मुख्य मकसद न्याय प्रक्रिया को सुचारू बनाना है, न कि बिना दोषसिद्धि के सजा देना।
इनकी रही गरिमामयी मौजूदगी
सीनियर एडवोकेट ने सेमिनार में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के चुनिंदा केसों- बच्ची देवी बनाम यूपी स्टेट आदि को गोस्वामी ने बच्ची देवी के निर्णय को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपराधिक न्याय प्रक्रिया के संतुलन को एक उत्कृष्ट उदाहरण करार दिया। सेमिनार में सीनियर एडवोकेट्स में अभिषेक भटनागर, अनिल भारती, आदेश श्रीवास्तव, महेश त्यागी, संजीव राघव की भी मौजूदगी रही। अध्यक्षता आनंदमोहन गुप्ता ने की, संचालन का निर्वहन कपिल गुप्ता ने किया।




