अयोध्या। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जीवनप्रकाश जैन ने कहा कि भगवान ऋषभदेव आदि पांच तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या, गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से विश्व के क्षितिज पर निरंतर अपनी आभा बिखेर रही है। उनके अनुसार तीर्थ के विकास, मंदिर निर्माण, प्रतिष्ठा महोत्सव और धार्मिक प्रभावना ने अयोध्या की प्राचीन जैन पहचान को व्यापक स्वरूप दिया।

वर्ष 1994 से आरंभ हुआ विकास का नया क्रम

डॉ. जैन ने बताया कि गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा से अयोध्या तीर्थ विकास का नया क्रम प्रारंभ हुआ। रायगंज स्थित परिसर में 13 से 24 फरवरी 1994 तक भगवान ऋषभदेव का राष्ट्रीय स्तर का महामस्तकाभिषेक महोत्सव आयोजित हुआ।

इसी परिसर में 19 से 23 फरवरी 1994 तक तीन चौबीसी जिनमंदिरों का निर्माण कर 72 जिनप्रतिमाओं का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। इसके बाद 15 से 20 फरवरी 1995 तक समवसरण जिनमंदिर के निर्माण के उपरांत भव्य पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ। 20 फरवरी 1995 को दोनों जिनमंदिरों के शिखरों पर कलशारोहण भी किया गया।

उन्होंने कहा कि इस अवधि में जन्मभूमि टोंकों, प्राचीन स्थलों तथा विभिन्न शासकीय स्थानों पर भी जीर्णोद्धार एवं निर्माण कार्य हुए। इससे अयोध्या के जैन तीर्थंकरों की जन्मभूमि होने की जानकारी व्यापक स्तर पर पहुंची।

ज्ञानमती माताजी को मिली मानद डी.लिट्. उपाधि

डॉ. जैन के अनुसार डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद के तत्कालीन कुलपति कांतीप्रसाद नौटियाल ने 5 फरवरी 1995 को दीक्षांत समारोह में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी को मानद डी.लिट्. (साहित्य वारिधि) की उपाधि प्रदान की थी।

इसी दिन माताजी के सान्निध्य में ऋषभदेव जैन शोधपीठ भवन का शिलान्यास हुआ। बाद में भवन का निर्माण पूर्ण होने पर वहां शोध एवं अध्ययन संबंधी गतिविधियां संचालित होने लगीं।

उन्होंने बताया कि 8 अप्रैल 2012 को तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद ने भी गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी को मानद डी.लिट्. की उपाधि से सम्मानित किया। कुलाधिपति सुरेश जैन ने इसे विश्वविद्यालय के लिए गौरवपूर्ण अवसर बताया।

टोंकों की प्राचीनता के संरक्षण का संदेश

वर्ष 2005 में अयोध्या आगमन के दौरान भगवान ऋषभदेव का महामस्तकाभिषेक आयोजित हुआ। इस अवसर पर गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने समिति को प्रेरणा दी कि पांचों जन्मभूमि टोंकों पर स्थित प्राचीन चरणों और शिलालेखों से छेड़छाड़ किए बिना सुंदर जिनमंदिरों का निर्माण किया जाए।

इस प्रेरणा के बाद विभिन्न वर्षों में टोंकों पर जिनमंदिर निर्माण एवं जिनप्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं आयोजित हुईं। डॉ. जैन ने कहा कि यह विकास कार्य प्राचीन धरोहर के संरक्षण और तीर्थ सुविधाओं के विस्तार का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

वर्ष 2019 और 2023 के प्रतिष्ठा महोत्सव

डॉ. जैन ने बताया कि गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल आगमन वर्ष 2019 में अयोध्या में हुआ। 10 से 29 मार्च 2019 तक भगवान ऋषभदेव का महामस्तकाभिषेक महोत्सव आयोजित किया गया।

इसके बाद 4 नवंबर 2019 को टिकैतनगर चातुर्मास के उपरांत माताजी पुनः अयोध्या पहुंचीं। 6 नवंबर को भगवान ऋषभदेव के मोक्षप्राप्त 101 पुत्रों के जिनमंदिर तथा 31 फुट ऊंची भगवान भरत स्वामी की खड्गासन प्रतिमा के मंदिर का शिलान्यास हुआ।

उन्होंने बताया कि 90 वर्ष की आयु में गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने जंबूद्वीप हस्तिनापुर से लगभग 650 किलोमीटर का पदविहार कर अयोध्या पहुंचकर तीर्थ की वंदना एवं विकास के संकल्प को आगे बढ़ाया। 30 अप्रैल से 5 मई 2023 तक बड़ी मूर्ति जैन मंदिर परिसर में तीस चौबीसी की 720 जिनप्रतिमाओं तथा 31 फुट ऊंची भगवान भरत प्रतिमा का ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ। 7 मई तक महामस्तकाभिषेक अनुष्ठान हुए।

तीनलोक रचना में 727 जिनप्रतिमाओं की प्रतिष्ठा

तीर्थ विकास के दूसरे चरण में 2 से 6 मार्च 2025 तक नवनिर्मित तीनलोक रचना में 727 जिनप्रतिमाओं एवं अन्य 1008 जिनप्रतिमाओं का राष्ट्रीय स्तर का पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव आयोजित हुआ।

डॉ. जीवनप्रकाश जैन ने कहा कि अयोध्या आज जैनत्व के प्राचीन इतिहास, तीर्थ परंपरा और धार्मिक प्रभावना का सशक्त केंद्र बनकर उभरा है। गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी की प्रेरणा और दूरदर्शिता से यह तीर्थ आने वाली पीढ़ियों के लिए जैन संस्कृति का महत्वपूर्ण स्मारक बना रहेगा।

श्रीफल साथी : श्री अभिषेक अशोक पाटील, अयोध्या