अशोकनगर। ‘साइंस ऑफ लिविंग’ के अंतर्गत आयोजित ‘साइंस ऑफ ऑस्टेरिटी’ सत्र में मुनिश्री निरंजनसागरजी महाराज ने कहा कि कर्म क्षय के लिए जो तप किया जाता है, वही वास्तविक तप है। आचार्यों ने तप को संवरपूर्वक निर्जरा का प्रमुख साधन बताया है। तप धर्म भी है, संवर भी है और निर्जरा का मार्ग भी है।

बाह्य तप से प्रभावना, अंतरंग तप से आत्मविकास

मुनि श्री ने कहा कि चारित्र का परिपक्व और परिष्कृत रूप तप है। शरीर के आश्रित तप को बाह्य तप तथा मन और भावों के आश्रित तप को अंतरंग तप कहा जाता है। बाह्य तप से जिनशासन की प्रभावना होती है, जबकि अंतरंग तप आत्मा के विकास का माध्यम बनता है।

उन्होंने कहा कि तप के द्वारा तीर्थंकर जैसी महान विभूतियों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। गुरु की आज्ञा से किया गया तप ही जीवन को ऊंचा उठाता है। विषय-भोग जीवन को कठिन बनाते हैं, जबकि तपस्या जीवन को सरल और सार्थक बनाती है।

दूध और घी के उदाहरण से समझाया तप

मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार दूध को तपाने से मलाई और फिर घी बनता है, वैसे ही तप के माध्यम से आत्मा में विशुद्धि आती है। घी किसी भी तरल पदार्थ में डालने पर ऊपर तैरता रहता है, उसी प्रकार तप से विशुद्ध हुई आत्मा लोक के अग्रभाग पर जाकर विराजमान होती है।

उन्होंने कहा कि निरंतर इच्छाओं से भरा मन कभी तृप्त नहीं हो सकता। इसलिए इच्छाओं पर नियंत्रण और गुरु आज्ञा के अनुसार तप की साधना आवश्यक है।

पूज्य बनने के लिए साधना जरूरी

मुनिश्री ने प्रतिमा और पाषाण खंड का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रतिमा पूजनीय इसलिए बनती है, क्योंकि उसने छेनी-हथौड़े के प्रहार सहकर अनावश्यक कलेवर का त्याग किया है। इसी प्रकार साधना और समर्पण से ही व्यक्ति पूज्य बनता है।

उन्होंने बताया कि विद्यार्थी अध्ययन की कठोर साधना से योग्यता पाता है, माता नौ माह गर्भधारण कर संतान का सुख पाती है, किसान परिश्रम से फसल पाता है और व्यापारी निरंतर श्रम से सफलता प्राप्त करता है। उसी प्रकार साधक वर्षों वीतरागता की साधना कर परमात्म पद की ओर बढ़ता है।

श्रीफल साथी : अशोकनगर विशेष संवाददाता