श्री अडिंदा। अतिशय क्षेत्र श्री अडिन्दा पार्श्वनाथ में 42 वें अभिनंदनीय वर्षायोग 2026 के लिए ससंघ विराजमान गणिनी आर्यिका श्री सुभूषण मति माताजी ने धर्मसभा में कहा कि आप सबके पास कान है, एक नहीं दो-दो कान है परंतु क्या कभी चिंतन किया कि कान का सदुपयोग क्या है? इसी प्रकार प्राप्त सभी इंद्रियों के बारे में सोंचे? आंखों, नाक, कान जिव्हा स्पर्श आदि का उपयोग जिनेंद्र भक्ति अर्थात आत्मकल्याण में लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैन कुल में जन्म लिया है बहुत पुण्य के उदय से उच्च कुल मिला है तो उच्च कुल के साथ आचरण भी उच्च होना चाहिए। उच्च आचरण अर्थात (जिनेंद्र भक्ति अभिषेक पूजन आदि आदि) देवपूजा गुरुपास्तिः स्वाध्यायः संयमस्तपः। दानं चेति गृहस्थानां, षट्-कर्माणि दिने दिने।।’
पूजा का पहला सोपान अभिषेक
आप यदि शंका करो कि काष्ट के बिम्ब से ही पंचामृत अभिषेक की परंपरा प्रारंभ हुई तो याद रखना अकृत्रिम जिन चैत्यालय जहां की सब व्यवस्थाएं अकृत्रिम होती है वहां भी अभिषेक किया जाता है। याद रखना अकृत्रिम व्यवस्थाएं एवं शाश्वत कर्मभूमि की व्यवस्थाएं कभी बदलती नहीं। परिवर्तित कर्म भूमि में भी आगमिक व्यवस्थाएं कभी परिवर्तित नहीं होती। अक्षुण्ण रूप से सतत प्रवाहित रहती है। ध्यान रखना! अभिषेक मूर्ति की सुरक्षा अथवा पारिवारिक, सामाजिक परंपरा के निर्वाह के लिए नहीं अपितु गृहस्थ कार्यों से संचित पाप कार्यों के प्रक्षालन के लिए है। इसलिए आचार्य कुंदकुंद देव ने श्रावक का मुख्य लक्षण दान और पूजा कहा है। दाणं पूजां मोक्खं सावणं
अभिषेक वह दर्पण है जो हमें मोक्ष मार्ग दिखाता है
याद रखना अभिषेक के लिए किया गया अल्प आरंभ सातिशय से पुण्य बंध का कारण है, परंतु गृहस्थ कर्तव्यों के निर्वाह हेतु किया गया आरंभ सारंभ मात्र पाप बंध का ही कारण है। जैसे शरीर के पोषण के लिए भोजन की नई-नई वैरायटी चाहिए इस प्रकार आत्मा के पोषण के लिए आत्मा के चिंतवन के लिए आत्म स्वरूप को पाने के लिए किया जाता है ’अभिषेक’। अभिषेक वह दर्पण है जो हमें मोक्ष मार्ग प्रशस्त कर देता है।
अभिषेक के महत्व को आत्मसात किया
हे! भगवान जो आपका भूतकाल था वह हमारा वर्तमान है और जो आपका वर्तमान है वह हमारा भविष्य काल हो अर्थात भगवान कभी आप भी हमारे जैसे थे पर अब आपके जैसा बन जाने के लिए ही में आपका अभिषेक करता हूं। जन्म मरण की श्रृंखला को स्टॉप करने का साधन है जिनेंद्र भगवान का अभिषेक। क्षेत्र पर एकत्रित भक्तों ने गुरु मां के श्री मुख से निसृत मित्रों के साथ पंचामृत अभिषेक किया एवं अभिषेक के महत्व को आत्मसात करते हुए गुरु मां का जयघोष करते हुए वन्दामी वन्दामी वन्दामी निवेदित करते निज धाम को प्रस्थित हुए।




