सीकर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल धर्म देशना आचार्य धर्म सागर सभागृह दंग की नसिया में देते हुए कहा कि उत्तम क्षमा से बड़ा धर्म दूसरा नहीं। उन्होंने कहा कि इच्छा के विपरीत प्रतिकूल कार्य होने से क्रोध आता है। क्रोध से स्वयं का नाश होता है क्योंकि, क्रोध महाअग्नि है जो स्वयं का नाश करती है। क्रोध से तनाव होता है तनाव से बीमारियां बढ़ती हैं। इसलिए सभी को क्षमा धारण करना चाहिए। क्षमा से पुण्य का अर्जन और पाप का नाश क्षय होता है। क्षमा वीरों का आभूषण है। धार्मिक पर्वों को तन्मयता आंतरिक आनंद श्रद्धा भक्ति से मनाने पर शांति, शांति से मुक्ति की राह मिलती है। देखा जाए तो क्षमा विश्वशांति का महापर्व है।
आचार्य श्री ने हमलावरों को किया क्षमा
डॉ. राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने क्षमा के अनेक उदाहरण बताए। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का राजाखेड़ा में प्रवास था तब कुछ विधर्मी व्यक्तियों ने आचार्य श्री संघ पर प्राणघातक हमला कर दिया, जो महान पुण्यात्मा जीव होते हैं उन्हें भविष्य के संकट का पूर्वाभास हो जाता है। आचार्य श्री को तप बल से प्राकृतिक परिस्थिति से कुछ अनिष्ट की आशंका का संकेत मिला। इसलिए संघ को भीतर कमरे में बैठकर धार्मिक कार्य करने का निर्देश दिया। हमलावरों का समाज ने प्रतिकार किया। पुलिस ने हमलावरों को पकड़ लिया। आचार्य श्री ने हमलावरों को क्षमा कर दिया। यह आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कहा कि क्रोध के कारण द्वारिका नगरी नष्ट हो गई। क्षमा आत्मा का स्वभाव है। क्षमा स्वयं से, परिवार से, समाज से रखना चाहिए।
दसलक्षण धर्म के मंडल विधान पर अर्घ्य किए समर्पित
इसके पूर्व प्रातः काल आचार्य श्री सानिध्य में श्री जी का पंचामृत अभिषेक शांतिधारा विनायका परिवार ने की। दसलक्षण धर्म का मंडल विधान विभिन्न अनाजों से सुंदर बनाया गया हैं। जिस पर प्रतिदिन अर्घ्य समर्पित किए जाते हैं। धर्मसभा में आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी सौभाग्यशाली परिवार ने भेंट की। दोपहर को आचार्य श्री ने तत्त्वार्थसूत्र की विवेचना में सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र, मोक्ष मार्ग, 7 तत्वों, 5 मति, श्रुत, अवधि, मन, पर्यय और केवल ज्ञान की विवेचना की। शाम को श्री जी और आचार्य श्री की आरती के बाद ज्ञानवर्धक धार्मिक प्रतियोगित का आयोजन हो रहा है।




