मुरैना। पर्युषण पर्व के अंतर्गत प्रथम धर्म उत्तम क्षमा पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा में आचार्य श्री 108 उदारसागरजी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन हमें क्रोध का नहीं बल्कि क्षमा का मार्ग दिखाता है। मनुष्य के जीवन में जब इच्छाएं पूरी नहीं होतीं तब उसके भीतर क्रोध उत्पन्न होता है। अपनी इच्छा को सर्वाेपरि मानना ही क्रोध का प्रमुख कारण बन जाता है। आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को परिस्थितियों को स्वीकार करने की कला सीखनी चाहिए। जीवन में हर इच्छा पूरी हो, यह संभव नहीं है। इच्छा के विपरीत परिस्थिति आने पर जो व्यक्ति अपने मन को संभाल लेता है, वही क्षमा धर्म का वास्तविक साधक है। क्रोध करके व्यक्ति सामने वाले को जितना नुकसान पहुंचाता है, उससे कहीं अधिक स्वयं की शांति और विवेक को नष्ट करता है।

अपनी कमजोरी समझकर उसे दूर करे

आचार्य श्री ने कहा कि उत्तम क्षमा केवल किसी से ‘माफ कर देना’ कह देने का नाम नहीं है, बल्कि मन में सामने वाले के प्रति द्वेष और वैरभाव को समाप्त करना ही सच्ची क्षमा है। जिसने हमें कष्ट दिया, उसके प्रति भी मैत्रीभाव रखना क्षमा धर्म की पहचान है। उन्होंने कहा कि क्रोध क्षणिक है, लेकिन उसके परिणाम लंबे समय तक रहते हैं; क्षमा क्षणिक प्रयास मांगती है, लेकिन जीवनभर शांति देती है। इसलिए हमें क्रोध को अपना स्वभाव नहीं, बल्कि अपनी कमजोरी समझकर उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए । धर्मसभा में संतों ने साधर्मीजनों से आह्वान किया कि उत्तम क्षमा धर्म को केवल पर्व के दिनों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने व्यवहार और दैनिक जीवन का हिस्सा बनाएं। क्रोध नहीं, क्षमा ही हमारा धर्म है।

मन की स्थिति और ग्रहण करने की क्षमता को समझना चाहिए

मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज ने कहा कि शारीरिक अक्षमता अथवा अपनी सीमाओं के कारण भी व्यक्ति के भीतर चिड़चिड़ापन और क्रोध पैदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में स्वयं को दोष देने के बजाय अपनी परिस्थिति को समझना और मन को संयमित रखना आवश्यक है। क्रोध समस्या का समाधान नहीं करता, बल्कि समस्या को और बढ़ा देता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ लोग बंदर जैसी चंचल प्रवृत्ति के होते हैं। ऐसे व्यक्ति को बार-बार समझाने या शिक्षा देने के बजाय पहले उसके मन की स्थिति और ग्रहण करने की क्षमता को समझना चाहिए। उपदेश तभी सार्थक होता है जब सामने वाला उसे ग्रहण करने के लिए तैयार हो। इसलिए दूसरों को बदलने से पहले स्वयं के भीतर क्षमा, धैर्य और संयम का विकास करना चाहिए।

सीख भी हर किसी को नहीं देना चाहिए

एक दृष्टांत के माध्यम से बताया कि बरसात में एक बंदर भींग रहा था, इस दृश्य को अपने घोसले से गौरिया देख रही थी। उसने बंदर से कहा कि तुम सकल सूरत से आदमी जैसे लगते हो, फिर तुम रहने के लिए घर या घोंसला क्यों नहीं बनाते। इतना सुनते ही बंदर क्रोधित हो गया और उसने गुस्से में गोरिया का घोंसला तहस-नहस करते हुए कहा कि मैं अपना घर बना नहीं सकता तो क्या हुआ, तेरा घर तोड़ तो सकता हूं। कहने का तात्पर्य यह है कि सीख भी हर किसी को नहीं देना चाहिए, अन्यथा अपना ही नुकसान होता है। मुनिश्री ने कहा कि क्रोध वास्तव में अपनी ही मूर्खता का परिणाम है। जब विवेक पर आवेश हावी हो जाता है, तब व्यक्ति ऐसा व्यवहार कर बैठता है जिसका बाद में उसे पश्चाताप होता है। क्रोध के शांत होने के बाद मनुष्य सोचता है कि उसने ऐसा क्यों किया। इस प्रकार क्रोध अक्सर पश्चाताप पर समाप्त होता है, जबकि क्षमा मन को शांति प्रदान करती है।

’पर्यूषण पर्व के प्रथम दिन उत्तम क्षमा धर्म की हुई आराधना’

जैन धर्मावलम्बियों का सबसे बड़ा त्यौहार पर्यूषण पर्व पर बुधवार को ज्ञान रत्नाकर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज के पावन सान्निध्य एवं प्रतिष्ठाचार्य पंडित महेंद्रकुमार शास्त्री (पूर्व प्राचार्य) के निर्देशन में प्रातःकालीन बेला में भगवान आदिनाथ स्वामी की प्रतिमा को पांडुक शिला पर विराजमान कर जलाभिषेक, शांतिधारा के पश्चात संगीतमय नित्यमह पूजन एवं उत्तम क्षमा धर्म की आराधना की गई। प्रथम कलश से अभिषेक एवं शांतिधारा करने का सौभाग्य पूर्व प्राचार्य एवं अध्यक्ष अनिलकुमार अंशुल जैन को प्राप्त हुआ। इसके साथ ही चार कलशों से अभिषेक का सौभाग्य वीरेंद्र जैन, विनोद जैन, मनोज जैन नायक, सीए गौरव जैन को प्राप्त हुआ।

गुरुवार को होगी उत्तम मार्दव धर्म की आराधना

दसलक्षण पर्व में प्रतिदिन धर्म के दसलक्षणों की आराधना, पूजा भक्ति, स्वाध्याय आदि किया जाता है। बुधवार को उत्तम क्षमा धर्म पर आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज एवं मुनिश्री उपशांतसागरजी महाराज का व्याख्यान हुआ। गुरुवार को उत्तम मार्दव धर्म की आराधना, पूजन, भक्ति, स्वाध्याय किया जाएगा। पर्यूषण पर्व के तृतीय दिन शुक्रवार को उत्तम आर्जव धर्म की उपासना होगी।