आगरा। निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला में आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी के शिष्य श्रमण मुनि श्री 108 समत्व सागर जी, श्रमण मुनि श्री 108 शीलसागरजी, श्रमण मुनि श्री 108 सुप्रभात सागर जी ससंघ के सानिध्य में 16 से 25 सितंबर तक दसलक्षण पर्व पर आत्म स्पंदन ध्यान शिविर (सामायिक भक्ति ध्यान का दिव्य संगम) की प्रेसवार्ता में पोस्टर विमोचन किया गया। मुनि श्री 108 समत्व सागर जी प्रेस वार्ता में कहा कि
16 सितंबर से यहां पर दशलक्षण पर्व प्रारंभ होने जा रहा है और उस पर्युषण महापर्व के अंतर्गत यह वह महान पर्व है, जो वर्ष में वैसे तो तीन बार आया करते हैं, किंतु तीन बार के अतिरिक्त भी जो सबसे अहम पर्युषण पर्व होते हैं, वे वर्षा योग के समय होते हैं। यहां साधना मात्र दिगंबर मुनि ही नहीं किया करते हैं, जैन श्रावक भी साधना का अंग होते हैं और 10 दिन वे पूर्ण रूप से अपने लौकिक कार्यों को विश्राम देकर वह धर्म की भावनाओं से युक्त होकर 10 दिन उपवास आदि की साधना के साथ धर्ममय वातावरण हुआ करता है। यह वह संस्कार हुआ करते हैं, जो पूरे साल भर जीव को ऊर्जा प्रदान किया करते हैं। जिस प्रकार से एक मोबाइल की बैटरी बिना चार्ज के नहीं चलती है, ऐसे ही श्रावक के जीवन में धर्म के बिना उसका उत्साह, शक्ति नहीं बनी रह सकती। इसलिए यह 10 दिन मानो श्रावक के जीवन में सब कुछ भर दिया करते हैं और पुनः उत्साह भरने वाले यह 10 पर्व हुआ करते हैं।
10 धर्म नहीं होते हैं, जीवन उत्कृष्ट नहीं हो सकता
मुनिश्री ने कहा कि एक यहां पर आज विषय यह है कि 10 धर्मों में- उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य, ये 10 धर्म हैं और ये 10 धर्म मात्र पूजा पद्धति के नहीं हैं, ये जीवन के ढंग हैं अर्थात जीवन में जब तक ये 10 धर्म नहीं होते हैं, जीवन उत्कृष्ट नहीं हो सकता है। किंतु विडंबना यह है कि आज भले ही अंग्रेज नहीं रहे, लेकिन उनकी जो पद्धति अंग्रेजों ने यहाँ छोड़ गए हैं, वह आज भी अपनाई जा रही है। अर्थात हमारे सारे स्कूल्स, कॉलेजेस में चाहे गणेश चतुर्थी का पर्व आज से प्रारंभ हो रहा हो या 10 लक्षण पर्व हमेशा एक साथ होते हैं। किंतु स्कूलों महाविद्यालयों में हमेशा इसी समय पर परीक्षाओं का आयोजन करना जैसे वृक्ष को जड़ों से काट देना है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि आपके माध्यम से मीडिया के माध्यम से यह बात सरकार तक पहुंचे कि जब भी धार्मिक आयोजन होते हैं, भारतीय संस्कृति जिस पर आधारित है, यदि इन धार्मिक कार्यक्रमों के समय ही यदि परीक्षाओं को रखा जाएगा तो फिर हमारे बच्चे कभी भी नैतिक शिक्षाओं से धार्मिक मूल्यों से नहीं जुड़ पाएंगे और जो समस्या आज भारतवर्ष की बन रही है-जेन-जी जनरेशन, जिनके पास में संस्कारों का अभाव दिखाई दे रहा है, विवेक का अभाव दिखाई दे रहा है, जोश तो दिखाई देता है लेकिन होश हमारी जेन-जी जनरेशन खोती जा रही है।
महापर्व के दौरान परीक्षाओं का आयोजन न हो
इसलिए आवश्यक है कि आप सबके माध्यम से यह विचार सरकार तक पहुंचे। लोकल जो यहां के कलेक्टर, जिलाधिकारी और सरकार जो उत्तर प्रदेश सरकार है। वह भी इस बात पर ध्यान दे कि जब भी ऐसे अनुष्ठान हों, वहां पर बच्चों को भी इस अनुष्ठान में भागीदारी निभाने के लिए कम से कम परीक्षाओं का आयोजन न हो। इसी समय कॉम्पिटिशन एग्जाम, परीक्षाएं या किसी भी प्रकार की गतिविधियां जो की जाती हैं स्कूलों में उनको न किया जाए और साथ ही साथ में, कुछ जैसे अनंत चतुर्दशी का दिन है, उस दिन सभी उपवास आदि को रखते हैं, तो इतनी सुविधा दी जाए कि अगर कोई बच्चा चाहे तो वह अपने एप्लिकेशन के माध्यम से उस दिन की छुट्टी ले सके।
बहुत सारी हिंसात्मक प्रवृत्तियों को यहां स्थान मिल गया
इसलिए यह 10 धर्म मात्र दिखावा नहीं है। यहां पर पर्व कहा जाता है, बहुत पर्व में बहुत लोग उत्साह मनाते हैं या पर्व में यह कहा जाए कि लोग पार्टी मनाते हैं, लेकिन जैन दर्शन के ये पर्व पार्टी मनाने के नहीं हैं, अपने अंतरंग को पहचानने के, अंतरंग की साधना के हैं, आत्म-विशुद्धि के हैं और जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिए हैं। इसलिए यह 10 दिन में मात्र 10 धर्म जैनियों के नहीं, ये दया भाव से संबंधित, अहिंसा से संबंधित 10 धर्म हैं। कम से कम यह भी आपके माध्यम से और मीडिया के माध्यम से यह बात लोगों तक पहुँचे कि उत्तर प्रदेश यदि है और इसे उत्तम प्रदेश बनाए रखना है, तो महावीर स्वामी के सिद्धांतों को हमें पुनः अपनाना पड़ेगा क्योंकि, यह भूमि, उत्तर प्रदेश 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकरों की जन्मभूमि है। यह भगवान आदिनाथ ऋषभदेव, जिसका वर्णन भागवत गीता में भी गाया गया और उस आदिनाथ भगवान की यह भूमि... किंतु विडंबना यह है कि अहिंसा का प्रचार होने की जगह बहुत सारी हिंसात्मक प्रवृत्तियों को यहां स्थान मिल गया है।
अहिंसा परमो धर्मः, जिओ और जीने दो के नारे पर आएं
अगर इन हिंसात्मक प्रवृत्तियों को हमने नहीं रोका, जिस प्रकार से जगह-जगह पर मांस, मदिरा आदि का प्रचलन बढ़ गया है, यह अपराध को बढ़ाने वाला है। जितना अधिक देश इस ओर प्रगति करेगा जहाँ हिंसात्मक प्रवृत्ति होगी, वहाँ नियम से देश की हानि होगी। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि हम इस पर नियंत्रण करें और अहिंसा परमो धर्मः, जिओ और जीने दो के नारे पर आएं। मुर्गी पालन, मत्स्य पालन केंद्र के नाम पर हिंसात्मक वह केंद्र हैं... पालन तो नहीं होता है, लेकिन मारने के लिए उनको कहा जाता है। कहा यह जा रहा है कि पालन केंद्र हैं, लेकिन यह पालन केंद्र न होकर उनके ही भक्षक हो गए हैं। तो महावीर भगवान के सिद्धांत हों, राम या कृष्ण भगवान के सिद्धांत हों, उनका यही तो उद्देश्य है कि जीव दया हो, सब अच्छे से रह सकें तो कम से कम यदि हम अभी बहुत बड़े स्तर पर इस पर काम नहीं कर पा रहे हैं तो इतना ही निवेदन है, इतना ही सबको आशिष है कि 10 दिन कम से कम मांस, मदिरा आदि प्रतिबंधित रहें और कहीं भी किसी भी प्रकार के स्लॉटर हाउस को कोई भी जगह नहीं दी जाए। ये 10 दिन कम से कम 10 दिन हम धर्म के साथ जिएंगे तो पूरे विश्व का वातावरण बदल जाएगा।
यह समाजजन मौजूद रहे
इस मौके पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के रमेश जैन, मुकेश जैन (लले), शैलेश जैन, सचिन जैन, आशु जैन (वीके), आशीष जैन (बाबा), विवेक जैन, राजीव, चक्रेश, दीपक, संभव, लव, धर्मेन्द्र, आशीष ( डब्बू), कैलाश जैन ( जयपुर) रोहित जैन मीडिया प्रभारी राहुल जैन आदि उपस्थित रहे।




