अम्बाह (मुरैना)। दशलक्षण महापर्व के छठे दिन अम्बाह जैन बगीची में उत्तम संयम धर्म श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
संयम केवल बाहरी नियंत्रण नहीं
आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ने उत्तम संयम धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मन, वचन और काया पर नियंत्रण रखते हुए जीवों की रक्षा करना तथा इंद्रियों को संयमित रखना ही उत्तम संयम धर्म का सार है।
उन्होंने कहा कि संयम केवल बाहरी क्रियाओं पर नियंत्रण का नाम नहीं, बल्कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को शांत करने का माध्यम भी है।
जीवदया और करुणा का भाव जरूरी
माताजी ने कहा कि इंद्रिय संयम के साथ प्रत्येक जीव के प्रति अहिंसा, दया और करुणा का भाव रखना चाहिए। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति सहित चलायमान जीवों की रक्षा करना जैन धर्म में संयम का महत्वपूर्ण स्वरूप माना गया है।
जब मन संयमित होता है तो विचारों में शुद्धता आती है। वाणी पर संयम होने से व्यवहार और संबंध मधुर बनते हैं तथा काया के संयम से जीवन अहिंसा एवं आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है।
आत्मशुद्धि का मार्ग है संयम
आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि संयम जीवन को अनुशासन प्रदान करता है और आत्मा को विकारों से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है। दशलक्षण महापर्व आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि एवं सद्गुणों को जीवन में उतारने का अवसर है।
जैन बगीची में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर उत्तम संयम धर्म को जीवन में आत्मसात करने का संकल्प लिया।
श्रीफल साथी : मनोज जैन नायक
सहयोग : सन्मति जैन काका





