आगरा। रकाबगंज, छीपीटोला स्थित निर्मल सेवा सदन में पर्युषण पर्व के छठवें दिन उत्तम संयम धर्म के अवसर पर आत्मस्पंदन ध्यान शिविर उत्साह, श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ संपन्न हुआ। संतचर्या शिरोमणि आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर महाराज के प्रभावक शिष्यों—लोकप्रिय रूप से ‘गूगल बाबा’ कहे जाने वाले श्रमण मुनि श्री 108 समत्वसागर महाराज, मुनि श्री 108 शीलसागर महाराज एवं मुनि श्री 108 सुप्रभातसागर महाराज के सान्निध्य में शिविर आयोजित हुआ। पंडित प्रदीप शास्त्री, दमोह का भी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

शिविरार्थियों ने पूजन, अभिषेक एवं शांतिधारा में भक्तिभाव से सहभागिता की। इसके पश्चात दीप प्रज्ज्वलन, पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट एवं अन्य मांगलिक क्रियाएं संपन्न हुईं।

कषायों की मलिनता हटे तो सत्य दिखता है

मुनि समत्वसागर महाराज ने मंगल प्रवचन में कहा कि अंतरंग शांति की दिशा में बढ़ने के लिए सर्वप्रथम क्रोध, मान, माया और लोभ रूपी कषायों के मल को अपने भीतर से हटाना आवश्यक है। जब धर्म भी कषाय के साथ किया जाता है तो वह दूषित हो जाता है।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मटमैले अथवा खौलते पानी में अपना चेहरा दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार कषायों से भरे अंतरंग में सत्य का दर्शन संभव नहीं है। मन की निर्मलता बढ़ने पर ही सत्य स्पष्ट दिखाई देता है और व्यक्ति को यह बोध होता है कि कौन-सा मार्ग सुखदायी है तथा कौन-सा दुख का कारण है।

संयम की नदी में डुबकी का आनंद

मुनिश्री ने कहा कि संयम का मार्ग कष्ट का नहीं, सत्य और शीतलता का मार्ग है। असंयम का सुख क्षणिक मुखौटा है, जबकि संयम का आनंद वास्तविक और स्थायी होता है।

उन्होंने जलधारा का उदाहरण देते हुए कहा कि नदी के समीप जाने से शीतलता का अनुभव होता है, उसके तट पर बैठने से आनंद बढ़ता है और उसमें डुबकी लगाने पर अनुभव और गहरा हो जाता है। उसी प्रकार संयम की धारा में जितना गहराई से व्यक्ति उतरता है, उतनी ही परम शांति और आनंद की अनुभूति उसे होती है।

बाहरी नहीं, भीतर की शीतलता जरूरी

मुनिश्री ने कहा कि मुनिराज के दर्शन से मिलने वाली शीतलता उनके संयम और अंतरंग की निर्मलता का परिणाम है। बाहर की सुविधाएं क्षणिक आराम दे सकती हैं, लेकिन वास्तविक शांति भीतर के संयम भाव से ही आती है।

उन्होंने कहा कि पांच इंद्रियों के विषयों और पांच पापों में मिलने वाला आनंद अंततः पश्चाताप और संताप देता है। जो व्यक्ति इंद्रिय-विषयों से स्वयं को अलग करने का पुरुषार्थ करता है, उसके भीतर की शीतलता बनी रहती है।

वाणी-संयम का स्मरण

मुनिश्री ने कहा कि पूर्व दिवस के उत्तम सत्य धर्म में वाणी-संयम की सीख मिली थी। संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए कषायों को शांत करना और धर्म को जीवन का आधार बनाना आवश्यक है। मंच संचालन सतेंद्र जैन साहुला ने किया।

कार्यक्रम में रहे उपस्थित

श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के रमेश जैन, मनोज जैन, मुकेश जैन, प्रवीण जैन पद्मावती, शैलेश जैन, मुकेश जैन लले, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, आशीष जैन बाबा, सतेंद्र जैन साहुल, दीपक जैन, रोहित जैन, मीडिया प्रभारी राहुल जैन एवं सकल जैन समाज उपस्थित रहा।

आज होगा उत्तम तप धर्म का आयोजन

मीडिया प्रभारी राहुल जैन ने बताया कि 22 सितम्बर 2026 को प्रातः 7 बजे मुनि श्री 108 समत्वसागर महाराज के सान्निध्य में दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन उत्तम तप धर्म की आराधना होगी। इस अवसर पर अभिषेक, पूजा एवं विधान निर्मल सेवा सदन, छीपीटोला, आगरा में संपन्न होगा।