बांसवाड़ा। “आचार्यों ने मान के आठ कारण बताए हैं—कुल, जाति, रूप, ज्ञान, धन, बल, तप और प्रभुता। इनका अहंकार छोड़कर मनुष्य अपने भावों में मृदुता और सरलता लाए तो उत्तम मार्दव धर्म जीवन में प्रकट हो सकता है।” श्री दिगंबर जैन 20 पंथी आम्नाय अतिशय क्षेत्र अडिंदा पार्श्वनाथ में पर्युषण पर्व के दूसरे दिन गणिनी आर्यिका रत्न श्री सुभूषणमति माताजी ने धर्मसभा में यह बात कही।

गुरु परंपरा गौरव, आगमिक प्रखर वक्ता, चर्या शिरोमणि गणिनी आर्यिका रत्न सुभूषणमति माताजी यहां अपने 42वें अभिनंदनीय वर्षायोग के लिए ससंघ विराजमान हैं।

‘भगवान बनने की राह में कषाय ही रुकावट’

माताजी ने कहा कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की संभावना है, लेकिन इस मार्ग में क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषाय बाधा बनती हैं।

उन्होंने कहा कि दस धर्मों में पहले क्रोध को शांत कर क्षमा धारण करने की प्रेरणा दी गई है, क्योंकि शांत चित्त वाला व्यक्ति ही सही चिंतन कर सकता है। इसके बाद मान के अभाव में उत्तम मार्दव धर्म आता है।

‘मृदु भावः मार्दवः’

मार्दव का अर्थ समझाते हुए माताजी ने कहा—“मृदु भावः मार्दवः”, अर्थात मृदुता और सरलता ही मार्दव है। मन, वचन और काय की वक्रता का त्याग कर सरलता लाना मार्दव धर्म की बुनियाद है।

उन्होंने “विद्या ददाति विनयम्” और “विद्या विनयेन शोभते” का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञान की वास्तविक शोभा विनय से होती है।

‘सम्मान पत्र सजाते हैं, कभी क्रोध पत्र सजाते देखा?’

माताजी ने मान-कषाय को सरल उदाहरण से समझाते हुए कहा कि व्यक्ति क्रोध से बचना चाहता है, लेकिन प्रशंसा और सम्मान उसे अच्छे लगते हैं। वह प्रशंसा करने वालों को अपने पास रखना चाहता है।

उन्होंने सवाल किया—“मान-सम्मान का पत्र हर कोई घर में सजाकर रखता है, लेकिन क्या कभी किसी को क्रोध का पत्र सजाते देखा है?”

इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने बताया कि मान-कषाय कई बार इतनी सूक्ष्म होती है कि व्यक्ति उसे दोष के रूप में पहचान ही नहीं पाता।

‘विचारों में मृदुता आए तो बैर समाप्त हो जाए’

माताजी ने कहा कि आज भोजन, वस्त्र, बिस्तर और भौतिक सुविधाओं में मनुष्य को कोमलता चाहिए, लेकिन वास्तविक आवश्यकता अपने विचारों को मृदु बनाने की है।

“अंतरंग विचारों में मृदुता आ जाए तो बैर समाप्त हो सकता है।”

उन्होंने कहा कि मान-कषाय जिनेंद्र प्रभु के प्रति श्रद्धा, जिनागम में विश्वास और साधु भक्ति के भाव को प्रभावित करती है। मानवीयता के लिए भी अहंकार का विसर्जन आवश्यक है।

‘क्रोध में व्यक्ति अंधा, मान में बहरा हो जाता है’

माताजी ने कहा कि क्रोध में व्यक्ति अंधा और मान में बहरा हो जाता है। अहंकार व्यक्ति को दूसरों की बात सुनने और अपनी कमियां स्वीकार करने से रोकता है।

उन्होंने कहा कि परिवार, समाज और व्यापक स्तर पर होने वाले अनेक विवादों के पीछे मान-कषाय भी एक कारण बनती है। इसलिए अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया और लोभ का त्याग करने की साधना करनी चाहिए।

‘मन के मोबाइल में मार्दव का एंटीवायरस लगाएं’

आधुनिक उदाहरण देते हुए माताजी ने कहा कि जिस प्रकार मोबाइल को वायरस से बचाने के लिए एंटीवायरस की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार “अपने मन के मोबाइल में मार्दव का एंटीवायरस लगा लो, तो मान के खतरनाक वायरस से बच सकोगे।”

उन्होंने कहा कि पर्युषण पर्व मनुष्य को अपने भीतर जमा मान-अहंकार के कचरे को बाहर निकालकर सरलता, विनम्रता और मृदुता अपनाने का अवसर देता है।

प्रवचन के बाद श्रद्धालुओं ने जयकारों से क्षेत्र को गुंजायमान कर गुरु मां के चरणों में वंदना की। कार्यक्रम की जानकारी अंजली जैन, खतौली-मुजफ्फरनगर एवं अजीत कोठिया डडूका ने दी।