साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है। पढ़िए राजेश रागी बकस्वाहा की रिपोर्ट...
दमोह। साइंस ऑफ लिविंग के इस सत्र में हम आपको मंत्र और मूर्ति की शक्ति विशेष से परिचय करवाने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति अनादि काल से, मंत्र और मूर्ति की आराधक रही है। वेदों, पुराणों और ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है। कुछ कतिपय अज्ञानी, दुराग्रही और विदेशी आक्रमणकारियों ने भारतीय सनातन संस्कृति के अस्तित्व पर बहुत बड़ा कुठाराघात किया है। इतिहास में स्पष्ट मिलता है कि किस तरह नालंदा विश्वविद्यालय जो कि भारतीय सनातन संस्कृति शिक्षा का केंद्र था। वहां छह माह लगातार वेदो-पुराणों और ग्रन्थों की होली जलाई गई। किस तरह मूर्ति विरोधियों द्वारा मूर्तियों को क्षति पहुचाई गई। आस्था और संस्कृति के केंद्र मंदिरों को तोड़ा गया। यहां तक धर्मान्तरण के लिए भी बाध्य किया गया।धर्म निरपेक्षता ही भारतीय संविधान का आधार

एक ऐसा दौर हुआ जिसमें धर्म और धार्मिक क्रियाओं को खुलेआम करना भी अपराध माना जाता था। यह भारतीय सनातन संस्कृति बहुत कुछ झेल चुकी है। परन्तु अब इस स्वतन्त्र भारत में भी कुछ लोग इस संस्कृति पर और सांस्कृतिक परिवेश पर कुठाराघात करने मे लगे हुए हैं। धर्म निरपेक्षता ही भारतीय संविधान का आधार है जिसके माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपनी धार्मिक क्रियाओं को करने के लिए स्वतन्त्र है। आज भी कई असामाजिक तत्व मन्त्र और मूर्ति का विरोध कर इस भारतीय सनातन संस्कृति पर आघात पहुँचने से पीछे नहीं हट रहे हैं। पाषाण-पाषाण कहकर परमात्मा(मूर्ति) का अपमान करना कहां तक ठीक है। पाषाण हृदय वाला व्यक्ति ही परमात्मा को पाषाण कह सकता है, मंत्र को मिथ्या कह सकता है। श्रद्धा के अभाव में ऐसा विचार उनके मन में आ सकता है। ऐसे वचन उनके मुख से निकल सकते हैं। आचार्यो की वाणी, जिनेन्द्र देव की वाणी पर जिसे श्रद्धा नहीं है, वह कभी त्रिकाल में भी न तो स्वयं का कल्याण कर सकता है और न ही दूसरों का। जो न तो भगवान को मान रहा है और न तो भगवान की मान रहा है। ऐसा व्यक्ति मान कषाय के तीव्र उदय में अपने आपको भगवान मनवाने में लगा हुआ है और अपना मान - सम्मान करवाता हुआ स्वयं को भगवान मान रहा है।

प्रत्येक जीवात्मा के अंदर भगवान बनने की क्षमता

आचार्य कहते हैं प्रत्येक जीव शुद्ध नय से शुद्ध है। प्रत्येक जीवात्मा के भीतर भगवान बनने की क्षमता(शक्ति) विद्यमान है। चाहे वह एक इन्द्रिय ही क्यों न हो परंतु अभिव्यक्ति की अपेक्षा प्रत्येक जीव भगवान नहीं बन सकता। अभव्य जीव ऐसा परिणामिक भाव वाला जीव है। जो तीन काल मैं भी अपना कल्याण नही कर सकता। योग्यता और पद दोनों अलग-अलग चीजें है, लेकिन योग्यता के बिना पद का कोई मूल्य नहीं है। यदि हमारे पास दया नहीं, श्रद्धा नहीं, गुणवत्ता नहीं, योग्यता नहीं तो हम किसी पद के लायक नहीं है। फिर इस प्रकार के अयोग्य व्यक्ति धर्म नायक कैसे मान सकते है? धर्म नायक हमारे भगवान है। उनकी परंपरा का अनुपालन करने वाले आचार्य, उपाध्याय और साधु हैं। जो व्यक्ति भगवान की तरफ पीठ करके खड़ा होता है, समझ लेता है उसकी शीघ्र ही दुर्गति होने वाली है। भगवान का दर्शन आपके लिए कभी भी अकल्याणकारी नही हो सकता है।