भैया भगवतीदास जी जैन का उपकार दिवस मना कर स्मरण किया। गुप्ति सदन में हुआ आयोजन।
इंदौर। लगभग 383 वर्ष आगरा की भूमि पर जन्म प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार एवं लेखक भैया भगवतीदास जैन का उपकार दिवस मनाकर उनके साहित्यिक अवदान को स्मरण किया गया। कार्यक्रम का आयोजन श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर गुप्ति सदन मंदिर व ज्ञान वर्द्धनी पाठशाला ने किया। इस अवसर पर वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि 343 वर्ष पूर्व भैया भगवतीदास जैन ने लगभग 2000 वर्ष पूर्व आचार्य श्री कुंदकुंद स्वामी द्वारा लिखी निर्वाण भक्ति को अनुवादित करते हुए एक ऐसी स्तुति लिखी, जो आज जैन समाज ने आस्था का केंद्र बन गई। पर अफसोस की आज समाज उस विद्वान का नाम नहीं जानती। यह आयोजन समाज में अपने प्राचीन आचार्य भगवंतो, मुनियों, विद्वान पंडितों, साहित्यकारों के बारे में जानकारी हो, इसलिए किया गया है। हम अपने प्राचीन इतिहास, साहित्यिक वैभव और पुरातात्विक धरोहर की जानकारी ख़ोज कर उसके प्रचार प्रसार में सहभागी बने। इस अवसर पर ज्ञान वर्द्धनी पाठशाला के अभय पाटोदी ने भी कहा कि आज बड़ी विपरित परिस्थितियों कि सामना समाज को करना पड़ रहा है। हाल ही वर्षों में मेरी भावना जो वर्षों से जैन मंदिर में स्तुति के रूप में पड़ी जाती है। जिसके रचयिता जैन विद्वान जुगल किशोर मुख्तियार ‘युगवीर’ थे। जिसे राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान के जीवन मूल्य/नैतिक शिक्षा’ की पुस्तकों में ’विद्यालय प्रार्थना’ के रूप में इसे बिना लेखक के नाम, या ‘लोकगीत’ ‘संत परंपरा’ अथवा अलग-अलग लेखक के नाम से छाप दिया गया है। जो ग़लत है।
राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्राप्त था
कुछ लोगों की नासमझी कहें अथवा सामाजिक विद्ववैष के कारण ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की जा रही है जिस पर अंकुश लगाना चाहिए क्या जैन समाज हर बार विरोध ही प्रकट करता रहेगा यह हमारे संस्कार में नहीं है परन्तु परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती है। यह रचना आज से लगभग 110 वर्ष पूर्व पंडित जुगलकिशोर मुख्तार ‘युगवीर’ ने फिरोजपुर में लिखी थी। इस रचना के भाव इतने अच्छे हैं कि इसे उस समय राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्राप्त था। लेखक ने रचना के अन्त में अपने नाम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि - ‘बनकर सब ’युगवीर’ हृदय से, देशोन्नति रत रहा करें’ जो स्पष्ट प्रमाण है फिर विवाद और नासमझी हटवादिता क्यों? पाटोदी ने कहा कि जब हमें अपने संत महात्मा विद्वानों पंडितों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी होगी तो ऐसे विवाद उत्पन्न होने से पहले ही समाप्त किए जा करेंगे।
इन समाजजनों ने पोस्टर का विमोचन किया
इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भी यही है कि हम हमारे अतीत को जाने। इस अवसर पर वर्द्धमानपुर शोध संस्थान द्वारा निर्वाण कांड भक्ति पर आधारित आचार्य कुंदकुंद स्वामी और भैया भगवतीदास जैन के ऊपर बनाए गए। पोस्टर का विमोचन समाज द्वारा किया गया। कार्यक्रम में प्रकाश पाटनी, सुनील बांझल, अखिल बाकलीवाल, हेमंत जैन, वीरेंद्र जैन, सुरेशचंद्र जैन दिल्ली वाले आदि समाज जन शामिल हुए।
इंदौर (ओम पाटोदी) आज़ से लगभग 383 वर्ष आगरा की भूमि पर जन्म प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार एवं लेखक भैया श्री भगवतीदास जी जैन को उपकार दिवस मना कर उनके साहित्यिक अवदान को स्मरण किया गया। कार्यक्रम का आयोजन श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर गुप्ति सदन मंदिर व ज्ञान वर्द्धनी पाठशाला के द्वारा किया गया।
इस अवसर पर वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने अपनी बात रखते हुए बताया कि आज से लगभग 343 वर्ष पूर्व एक ऐसी स्तुति भैया श्री भगवतीदास जी जैन ने लगभग 2000 वर्ष पूर्व आचार्य श्री कुंदकुंद स्वामी द्वारा लिखी निर्वाण भक्ति को अनुवादित करते हुए लिखी जो आज जैन समाज ने आस्था का केंद्र बन गई। पर अफसोस की आज समाज उस विद्वान का नाम नहीं जानती। यह आयोजन समाज में अपने प्राचीन आचार्य भगवंतो, मुनियों, विद्वान पंडितों, साहित्यकारों के बारे में जानकारी हो इसलिए किया गया है। हम अपने प्राचीन इतिहास, साहित्यिक वैभव और पुरातात्विक धरोहर की जानकारी ख़ोज कर उसके प्रचार प्रसार में सहभागी बने।
इस अवसर पर ज्ञान वर्द्धनी पाठशाला के अभय पाटोदी ने भी अपनी बात रखते हुए कहा कि आज बड़ी विपरित परिस्थितियों कि सामना समाज को करना पड़ रहा है। हाल ही वर्षों में मेरी भावना जो वर्षों से जैन मंदिर में स्तुति के रूप में पड़ी जाती है जिसके रचयिता जैन विद्वान श्री जुगल किशोर जी मुख्तियार "युगवीर" थे। जिसे राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान के जीवन मूल्य / नैतिक शिक्षा की पुस्तकों में विद्यालय प्रार्थना के रूप में इसे बिना लेखक के नाम, या "लोकगीत", "संत परंपरा" अथवा अलग अलग लेखक के नाम से छाप दिया गया है। जो ग़लत है कुछ लोगों की नासमझी कहें अथवा सामाजिक विद्ववैष के कारण ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न की जा रही है जिस पर अंकुश लगाना चाहिए क्या जैन समाज हर बार विरोध ही प्रकट करता रहेगा यह हमारे संस्कार में नहीं है परन्तु परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती है।
यह रचना आज से लगभग 110 वर्ष पूर्व पंडित जुगलकिशोर मुख्तार "युगवीर" ने फिरोजपुर में लिखी थी इस रचना के भाव इतने अच्छे हैं कि इसे उस समय राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्राप्त था। लेखक ने रचना के अन्त में अपने नाम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि - "बनकर सब युगवीर हृदय से, देशोन्नति रत रहा करें" जो स्पष्ट प्रमाण है फिर विवाद और नासमझी हटवादिता क्यों? पाटोदी ने कहा कि जब हमें अपने संत महात्मा विद्वानों पंडितों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी होगी तो ऐसे विवाद उत्पन्न होने से पहले ही समाप्त किए जा करेंगे। आज इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य भी यही है कि हम हमारे अतित को जाने। इस अवसर पर वर्द्धमानपुर शोध संस्थान द्वारा निर्वाण कांड भक्ति पर आधारित आचार्य कुंदकुंद स्वामी और भैया भगवतीदास जी जैन के उपर बनाएं गये पोस्टर का विमोचन समाज के द्वारा किया गया। कार्यक्रम में प्रकाश जी पाटनी, सुनील जी बांझल, अखिल जी बाकलीवाल, हेमंत जी जैन, विरेन्द्र जी जैन, सुरेश चंद्र जैन दिल्ली वाले आदि समाज जन शामिल हुए ।




