नवागढ़। उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले में स्थित श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र नवागढ़ आस्था, अध्यात्म, इतिहास और पुरातात्त्विक विरासत का अनूठा संगम है। लगभग एक हजार वर्ष प्राचीन मूलनायक भगवान अरनाथ की कायोत्सर्ग प्रतिमा का विध्वंस के बावजूद सुरक्षित रहना स्वयं में एक बड़ा अतिशय माना जाता है। जैन समाज के साथ आसपास के ग्रामीण एवं जैनेतर समाज की भी भगवान अरनाथ के प्रति गहरी आस्था है।
’भूमिगत मंदिर से हुआ प्राकट्य’
नवागढ़ के विकास की आधारशिला वर्ष 1959 में प्रतिष्ठाचार्य पं. गुलाबचन्द्र जी ‘पुष्प’ के प्रयासों से पड़ी। उन्होंने टीले पर इमली के वृक्ष के नीचे खंडित जैन प्रतिमाएं देखीं। उत्खनन के दौरान लगभग 10 फीट नीचे भौंयरे में 4.75 फीट ऊंची भगवान अरनाथ की कायोत्सर्ग प्रतिमा प्राप्त हुई। पं. पुष्प जी ने भगवान की पुनः प्रतिष्ठा एवं क्षेत्र के विकास का संकल्प लिया। वर्ष 1960 में भौंयरे का जीर्णाेद्धार तथा बाद में मूलनायक मंदिर, बाहुबली जिनालय और धर्मशाला का निर्माण हुआ।
’अतिशय और वार्षिक मेला’
नवागढ़ को अतिशय क्षेत्र के रूप में विशेष श्रद्धा प्राप्त है। श्रद्धालु यहां विधान, जाप्यानुष्ठान एवं भक्ति के माध्यम से भगवान अरनाथ के चरणों में आराधना करते हैं। फाल्गुन शुक्ल तृतीया, भगवान अरनाथ के गर्भकल्याणक के अवसर पर वार्षिक मेला एवं महामस्तकाभिषेक आयोजित होता है।
’संतों के चरणों से पावन’
नवागढ़ में आचार्यश्री विद्यासागरजी, आचार्यश्री वर्धमानसागरजी, आचार्यश्री विरागसागरजी, आचार्यश्री ज्ञानसागरजी, आचार्यश्री विशुद्धसागरजी, आचार्यश्री विभवसागरजी, आचार्यश्री विनिश्चयसागरजी सहित अनेक आचार्यों, मुनिराजों एवं आर्यिका माताजी के संघों का आगमन हो चुका है। मुनिश्री सरलसागरजी महाराज का वर्ष 2019 में चातुर्मास भी सम्पन्न हुआ। मई 2018 में आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने पपौराजी में नवागढ़ की पुरासंपदा का अवलोकन कर उसके संरक्षण एवं वकास के संबंध में मार्गदर्शन दिया था।
’पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण’
नवागढ़ धार्मिक महत्व के साथ पुरातात्त्विक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां पाषाणकालीन औजार, शैलचित्र, गुफाएं, शैलाश्रय, प्राचीन प्रतिमाएं और स्थापत्य अवशेष प्राप्त हुए हैं। गुप्तकालीन कायोत्सर्ग मुद्रा, चरण चिह्न तथा विभिन्न कालखंडों की जैन प्रतिमाएं इसकी प्राचीन धार्मिक परंपरा के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों में नवागढ़ का संबंध प्राचीन नन्दपुर से जोड़ा जाता है। यहां कभी जैन मंदिरों एवं धार्मिक गतिविधियों से सम्पन्न समृद्ध नगर होने के प्रमाण मिलते हैं। विभिन्न कालखंडों में हुए विध्वंस की गवाही आज भी संग्रहालय में सुरक्षित विशाल एवं खंडित तीर्थंकर प्रतिमाएं देती हैं।
समृद्ध पुरासंपदा
नवागढ़ में प्रतिहारकालीन विशाल भगवान आदिनाथ, भगवान शांतिनाथ, पद्मासनस्थ भगवान पार्श्वनाथ, विशाल तोरण सहित लगभग 200 कलाकृतियां संरक्षित हैं। यह पुरासंपदा क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास की साक्षी है। इन दुर्लभ धरोहरों के वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित संरक्षण की आवश्यकता है
धर्म, शिक्षा और सेवा
पं. गुलाबचन्द्र जी ‘पुष्प’ की स्मृति में श्री नवागढ़ गुरुकुलम् संचालित है, जहां विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ संगीत, कला, योग, पूजा, स्वाध्याय, प्रवचनकला एवं खेलकूद का प्रशिक्षण दिया जाता है। क्षेत्र में त्यागी-व्रती साधकों के लिए आश्रम तथा यात्रियों के लिए आवास, आहारशाला, स्वाध्याय सामग्री और सभागार जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। चिकित्सा, नेत्र परीक्षण, कम्बल, वस्त्र एवं अन्न वितरण जैसे सेवा कार्य भी समय-समय पर किए जाते हैं।
पं. गुलाबचन्द्र ‘पुष्प’ का योगदान’
नवागढ़ के विकास में प्रतिष्ठाचार्य पं. गुलाबचन्द्र जी ‘पुष्प’ का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने अपना जीवन क्षेत्र के विकास एवं धर्म प्रभावना को समर्पित किया और अंतिम समय में अपनी विद्या एवं दायित्व ब्र. जयकुमार जी ‘निशान्त’ को सौंपे। 5 जनवरी 2015 को समाधिपूर्वक देह त्यागने वाले पं. पुष्प जी का नवागढ़ को गौरवशाली तीर्थ के रूप में विकसित करने का संकल्प आज भी आगे बढ़ रहा है।
’संरक्षण की जरूरत’
नवागढ़ की प्राचीन प्रतिमाएं, शिल्प, शैलचित्र, गुफाएं और अन्य पुरातात्त्विक अवशेष भारतीय संस्कृति एवं जैन धर्म की प्राचीन परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं। इनके संरक्षण के लिए समाज एवं प्रशासन के समन्वित प्रयास आवश्यक हैं। नवागढ़ केवल एक जैन तीर्थ नहीं, बल्कि आस्था, साधना, इतिहास और पुरातत्व की जीवंत विरासत है, जहां भगवान अरनाथ की दिव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं को अध्यात्म से जोड़ती है और प्राचीन धरोहरें भारतीय संस्कृति की गौरवगाथा सुनाती हैं।



