मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री उदारसागरजी महाराज ने कहा कि श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चलेगा। धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को बाहरी परिस्थितियों अथवा शरीर के स्वरूप को देखकर अपनी श्रद्धा को कमजोर नहीं करना चाहिए। उन्होंने जैन धर्म के निर्विचिकित्सा अंग की व्याख्या करते हुए कहा कि यह आत्मा की रक्षा करने वाला महत्वपूर्ण अंग है। आचार्यश्री ने कहा कि रत्नत्रयधारी दिगंबर मुनिराज के शरीर को देखकर ग्लानि का भाव नहीं होना चाहिए, बल्कि उनके सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक चरित्र जैसे आत्मगुणों के प्रति प्रीति और श्रद्धा रखनी चाहिए। शरीर स्वभाव से अशुद्ध है, जबकि आत्मा के गुण पवित्र होते हैं। इसलिए साधु के शरीर को देखने के बजाय उनकी साधना, त्याग और आत्मगुणों को देखना चाहिए

माला के उदाहरण से समझाया सम्मान का भाव

आचार्यश्री ने नीम का उदाहरण देते हुए कहा कि नीम स्वभाव से कड़वा होता है, लेकिन वह अपनी प्रकृति को नहीं छोड़ता। उसी प्रकार शरीर का स्वभाव जैसा है, वह वैसा ही रहेगा, लेकिन रत्नत्रयधारी मुनिराज के आत्मगुण और साधना उन्हें पूजनीय एवं वंदनीय बनाते हैं। आचार्यश्री ने सम्मान समारोह का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सम्मान के दौरान माला पहनाई गई और उसने माला उतारकर वहीं रख दी। बाद में उसी माला को दूसरे व्यक्ति के सम्मान में पहना दिया जाए तो वह व्यक्ति स्वाभाविक रूप से प्रश्न कर सकता है कि दूसरे के गले से उतारी हुई माला मुझे क्यों पहनाई गई? यदि सम्मान के लिए माला ही उपलब्ध नहीं थी तो सम्मान के लिए बुलाने का औचित्य क्या था?

वादिराज मुनिराज और कड़वी तुमणी का प्रसंग

उन्होंने कहा कि इस उदाहरण से समझना चाहिए कि किसी वस्तु का केवल बाहरी स्वरूप ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उसके उपयोग, उद्देश्य और उसके पीछे के भाव को भी समझना आवश्यक है। इसी प्रकार धर्म में भी साधु के शरीर को देखकर भावना नहीं बनानी चाहिए, बल्कि उनके गुणों और आत्मसाधना को पहचानना चाहिए। प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने वादिराज मुनिराज के प्रसंग का उल्लेख करते हुए शरीर और आत्मगुणों के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कड़वी तुमणी का उदाहरण देते हुए कहा कि कड़वी तुमणी खाने योग्य नहीं होती। उसे खाने से उल्टी हो सकती है, लेकिन वही तुमणी सूख जाने के बाद नदी पार कराने के काम आती है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि किसी वस्तु या व्यक्ति को केवल उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके गुण, उपयोग और उद्देश्य से पहचानना चाहिए। इसी प्रकार दिगम्बर मुनिराज के शरीर को नहीं, उनके रत्नत्रय और आत्मसाधना को देखना चाहिए।

औदारिक शरीर का बताया अर्थ

आचार्यश्री ने औदारिक शरीर की व्याख्या करते हुए कहा कि ‘उदार’ का अर्थ केवल बड़ा होना नहीं है, बल्कि दूसरों के काम आना और उदारता का भाव रखना भी है। मनुष्य का शरीर तभी सार्थक है, जब उसका उपयोग धर्म, आत्मसाधना और परहित के कार्यों में किया जाए। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि श्रद्धा को संशय से कमजोर न होने दें। रत्नत्रयधारी मुनिराज के शरीर को देखने के बजाय उनके आत्मगुणों को देखें और उनके गुणों में प्रीति रखते हुए निर्विचिकित्सा अंग को अपने जीवन में धारण करें। यही सच्ची धर्मश्रद्धा है।

शशि जैन के मंगलाचरण किया पेश

धर्मसभा का शुभारंभ शशि जैन के मंगलाचरण से हुआ। इसके बाद समाज जनों द्वारा भगवान के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया। कार्यक्रम का संचालन विद्वत् नवनीत जैन शास्त्री ने किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजबंधु एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे और उन्होंने आचार्यश्री के मंगल प्रवचन को भक्तिभावपूर्वक श्रवण किया ।