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	<title>waterless fast &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक का पंचमेरू व्रत : निर्जला उपवास का पारणा 2 सितंबर को  </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Sep 2025 05:36:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक महास्वामीजी नांदणी का पंचमेरू व्रत का सोमवार को 5 वां निर्जला उपवास है। कल मंगलवार को पारणा नांदणी में है। पंचमेरु व्रत, जिसे पुष्पांजलि व्रत या पंचमेरु पूजा भी कहते हैं। नांदणी से पढ़िए, यह खबर&#8230; नांदणी। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील कोल्हापुर ने बताया कि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक महास्वामीजी नांदणी का पंचमेरू व्रत का सोमवार को 5 वां निर्जला उपवास है। कल मंगलवार को पारणा नांदणी में है। पंचमेरु व्रत, जिसे पुष्पांजलि व्रत या पंचमेरु पूजा भी कहते हैं। <span style="color: #ff0000">नांदणी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नांदणी।</strong> अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील कोल्हापुर ने बताया कि स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक महास्वामीजी नांदणी का पंचमेरू व्रत का सोमवार को 5 वां निर्जला उपवास है। कल मंगलवार को पारणा नांदणी में है। पंचमेरु व्रत, जिसे पुष्पांजलि व्रत या पंचमेरु पूजा भी कहते हैं। जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत है, जिसमें पंचमेरु नामक जैन तीर्थों की भक्ति भाव से पूजा की जाती है। इस व्रत को पांच वर्ष तक करने का विधान है और अंत में उद्यापन किया जाता है। इसमें जिनेन्द्र प्रभु की प्रतिमाओं को पुष्पों से पूजकर, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विभिन्न नियमों का पालन किया जाता है। नांदणी स्थित स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक पट्टाचार्य महास्वामी जी मठ का इतिहास 1300 वर्ष पुराना है। नांदणी मठ के आधिपत्य में दक्षिण महाराष्ट्र और उत्तर कर्नाटक के 743 गांव समाविष्ट है।</p>
<p>इन सभी गांव में जैन धर्म के सभी धार्मिक महोत्सव, विधि विधान, पंचकल्याणक, धर्म का प्रसार एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक पट्टाचार्य महास्वामीजी के आदेश से और आशीर्वाद से होते है। स्वस्तिश्री जिनसेन भट्टारक महास्वामीजी नांदणी उम्र में सबसे युवा भट्टारक जी हैं।</p>
<p>आप गांव-गांव भ्रमण करते हुए जिनधर्म कि सतत धर्म प्रभावना कर रहे हैं। धन्य हैं आपकी त्याग- तपस्या। आप स्वभाव के बडे विनम्र एवं मितभाषी हैं। आपके प्रवचन प्रभावशाली होते हैं। मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे जिनसेन महास्वामी जी के रूप में मुझे सच्चे गुरु एवं सच्चे मित्र मिले हैं। मेरी यही भावना है कि जीवन के अंतिम सांस तक गुरु-शिष्य का यह नाता बना रहे।</p>
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		<title>जैन दर्शन में अहिंसा धर्म का पालन ही चातुर्मास है : मुनिराजों ने बड़े जैन मंदिर में किया चातुर्मास प्रतिष्ठापन </title>
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		<pubDate>Wed, 09 Jul 2025 11:20:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान प्रवचन भी हुए। मुरैना से [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया। इस दौरान प्रवचन भी हुए। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong> मुरैना।</strong> जैन साधु साध्वियां पंच महाव्रत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य का मन वचन काय से निर्दाेष रूप से पालन करते हैं। अहिंसा महाव्रत का पूर्ण रूपेण पालन हो, इसीलिए जैन साधु, मुनिराज चातुर्मास करते हैं। बरसात के मौसम में असंख्यात सूक्ष्म जीव उत्पन्न होते हैं, जो दिखाई भी नहीं देते। इन्हीं जीवों की रक्षार्थ जैन साधु मुनिराज वर्षा ऋतु के चार माह पद विहार न करते हुए एक ही स्थान पर चार माह आत्म साधना करते हैं। स्व कल्याण के साथ साथ प्राणी मात्र के कल्याण हेतु प्रेरित करते हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर में चातुर्मास प्रतिष्ठापन के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अहिंसा धर्म का पालन करना ही चातुर्मास का मुख्य उद्देश्य होता है। इन चार माह में सभी साधु साध्वियां पूर्वाचार्यों द्वारा रचित ग्रंथों का स्वाध्याय एवं अध्ययन करते हुए तत्व चिंतन करते हैं। जैन दर्शन में दिगंबर जैन संत संयम की साधना करते हुए कर्मों को नष्ट करने हेतु तप करते हुए भगवान महावीर स्वामी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को अंगीकार करते हैं। मुनि श्री ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी को श्री जिनेंद्र प्रभु की भक्तियों का वाचन कर कायोत्सर्ग कर चातुर्मास का प्रतिष्ठान किया जाता है और कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को चातुर्मास का निष्ठापन किया जाता है। सभी साधु व्रत उपवास कर सिद्ध भक्ति, आचार्य भक्ति आदि के माध्यम से संकल्पित होकर वर्षाकाल के चार माह एक ही स्थान पर रुककर अपने महाव्रतों का पालन करते हैं।</p>
<p><strong>बड़े जैन मंदिर में मुनिराजों ने किया चातुर्मास प्रतिष्ठापन</strong></p>
<p>प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी संजय भैयाजी (मुरैना वाले) ने बताया कि श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में विराजमान आचार्य विद्यासागरजी महाराज से दीक्षित आचार्यश्री आर्जव सागर महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विवोधसागरजी महाराज ने श्री जिनेंद्र भगवान के समक्ष भक्ति एवं निर्जल उपवास करते हुए संकल्प पूर्वक चातुर्मास की स्थापना की। इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज मुरैना ने श्रीफल अर्पण करके आशीर्वाद प्राप्त किया और संकल्प किया कि हम सभी आपकी साधना में निष्ठा, समर्पण, भक्ति के साथ सहभागी बनेंगे। युगल मुनिराजों ने सबको आशीर्वाद देते हुए कहा साधु अपनी साधना और अहिंसा धर्म का पालन करने के लिए चातुर्मास किया करते हैं। इसमें श्रावक की एक अहम भूमिका रहती है। साधुओं ने तो आपके यहां चातुर्मास करने का संकल्प ले लिया। अब आपका उत्तरदायित्व है कि साधुओं की चर्या में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो, इस हेतु संपूर्ण समाज को एकजुटता के साथ सहभागिता निभाने को दृढ़ संकल्पित होना होगा।</p>
<p><strong>चातुर्मास साधु और श्रावक दोनों के लिए </strong></p>
<p>मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज ने बताया कि जैन दर्शन में चातुर्मास साधुओं और श्रावकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। यह आत्म-सुधार, धार्मिक गतिविधियों में संलग्नता और आध्यात्मिक विकास, अध्यात्म के प्रति पुरुषार्थ करने का समय होता है । भूलवश, अज्ञानतावश, जाने अनजाने में हमसे जो पाप हुए हैं, उनको नष्ट करने हेतु इन चार माह में प्रभु आराधना का समय होता है चातुर्मास । जैन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है, जैन साधु एवं श्रावक वर्षा ऋतु के चार महीनों में तप त्याग संयम की साधना के साथ इसे मनाते है। इस दौरान जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रुकते हैं और धार्मिक गतिविधियों जैसे-स्वाध्याय, प्रवचन और तपस्या में संलग्न होते हैं। श्रावक (गृहस्थ जैन) भी इस दौरान विशेष रूप से धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हैं, उपवास, प्रतिक्रमण और अन्य धार्मिक कार्यों द्वारा आत्म-सुधार का प्रयास करते हैं। श्रावकों के लिए चातुर्मास आत्म-सुधार और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने का एक महत्वपूर्ण समय होता है। इस समय का सभी को सदुपयोग करते हुए लाभ उठाना चाहिए।</p>
<p><strong>विधान में सिद्धों की भक्ति के साथ 1024 अर्घ्य होंगे समर्पित</strong></p>
<p>बड़े जैन मंदिर में चल रहे आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान में सातवें दिन सिद्धों की आराधना करते हुए 512 अर्घ्य समर्पित किए गए। जिसमें पंच परमेष्ठी को स्मरण करते हुए पूजा संपन्न हुई एवं पूज्य युगल मुनिराजों के माध्यम से मंत्रोचार किए गए। गुरुवार को आठवें दिन 1024 अर्घ्य समर्पित करते हुए सिद्ध परमेष्ठि की आराधना पूर्ण होगी। शुक्रवार 11 जुलाई को विश्व शांति महायज्ञ का आयोजन होगा। विश्व शांति एवं कल्याण की भावना के साथ महायज्ञ में आहुति दी जाएगी। महायज्ञ के पश्चात श्री जिनेंद्र प्रभु की भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। श्री जिनेंद्र प्रभु को पांडुक शिला पर विराजमान कर कलशाभिषेक किए जाएंगे।</p>
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		<title>त्याग और तप की प्रतिमूर्ति जैन सन्तः जैन साध्वी ज्ञानमती माताजी ने किया केशलोच </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 31 Mar 2025 13:26:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने भव्य केशलोच किया। जैन ग्रंथ के अनुसार दिगम्बर साधु-साध्वियों को साल में 3 बार यह प्रक्रिया प्रत्येक 4 माह में करनी होती है। जिसमें प्रातःकाल भगवान ऋषभदेव की 39 फुट उत्तुंग प्रतिमा का मस्तकाभिषेक सम्पन्न किया गया एवं विश्वशांति की कामना के लिए भगवान के मस्तक पर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने भव्य केशलोच किया। जैन ग्रंथ के अनुसार दिगम्बर साधु-साध्वियों को साल में 3 बार यह प्रक्रिया प्रत्येक 4 माह में करनी होती है। जिसमें प्रातःकाल भगवान ऋषभदेव की 39 फुट उत्तुंग प्रतिमा का मस्तकाभिषेक सम्पन्न किया गया एवं विश्वशांति की कामना के लिए भगवान के मस्तक पर शांतिधारा सम्पन्न की गई। <span style="color: #ff0000">पढ़िए उदयभान जैन की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रायगंज।</strong> भगवान ऋषभदेव दिगम्बर जैन मंदिर बडी मूर्ति रायगंज अयोध्या में जैन साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने किया भव्य केशलोच। जिसमें प्रातःकाल भगवान ऋषभदेव की 39 फुट उत्तुंग प्रतिमा का मस्तकाभिषेक सम्पन्न किया गया एवं विश्वशांति की कामना के लिए भगवान के मस्तक पर शांतिधारा सम्पन्न की गई एवं वरिष्ठ जैन साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने अपने हाथों से अपने केशों को उखाड़ा जैन ग्रंथ के अनुसार दिगम्बर साधु-साध्वियों को साल में 3 बार यह प्रक्रिया प्रत्येक 4 माह में करनी होती है।</p>
<p><strong>दीक्षा के पश्चात् अपने हाथों से अपने केश को निकालना </strong></p>
<p>जैन मंदिर के विजय कुमार जैन ने बताया कि पूज्य भारत गौरव गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने केशलोच किया। जिसके अन्तर्गत दिगम्बर जैन साधु एवं साध्वियों को दीक्षा के पश्चात् अपने हाथों से अपने केश को निकालना होता है। जिसे शरीर से निर्ममता का प्रतीक समझा जाता है। जैन साधु अपने केश अपने हाथ से निकालते हैं एवं उस दिन निर्जल उपवास करते हैं।</p>
<p><strong>केशलोच वर्ष में चार बार किया जाता है</strong></p>
<p>वर्तमान में सारे देश के अन्दर 1750 दिगम्बर संत विराजमान हैं। जो साल में 4 बार इस प्रक्रिया को अपने हाथों से सम्पन्न करते हैं। त्याग और संयम की साधना करते हुए सिर्फ दिन में एक बार आहार ग्रहण करते हैं। दवाई, पानी आदि उसी समय लेते हैं यदि भोजन में अन्तराय आ जाए तो 24 घंटे पश्चात् जल की बूंद ग्रहण करते हैं। पदयात्रा करते हैं। किसी भी वाहन का प्रयोग नहीं करते हैं। बिस्तर आदि का प्रयोग ठंडी गर्मी बरसात में नहीं करते हैं। जैन साधुओं का ये मुख्य गुण होता है।</p>
<p><strong>माताजी ने 550 से अधिक ग्रंथों का सृजन किया </strong></p>
<p>परमपूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी 73 वर्ष से संयम की आराधना से जीवन यापन कर रही हैं। त्याग की प्रतिमूर्ति महासाधिक विदुषी संत हैं जिन्होंने 550 से अधिक ग्रंथों का सृजन अपनी लेखनी से किया है।</p>
<p><strong>केशलोच साधु की मुख्य क्रिया है </strong></p>
<p>पीठाधीश स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी ने बताया कि प्रत्येक जैन साधु को यह प्रक्रिया करना अनिवार्य होता है। साधु बनने के पूर्व सबसे पहले केशलोच करना होता है। उसके पश्चात् ही उनके मस्तक पर संस्कार गुरु के द्वारा किए जाते हैं। जिससे वह दीक्षा ग्रहण करते हैं। यह अपने आप में कठोर तपश्चरण है, क्योंकि वर्तमान युग में केश ही श्रृंगार का मुख्य आकर्षण है। लेकिन जैन संत घास के समान इसको अपने हाथों से निकालते हैं।</p>
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