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	<title>uttam arjav dharm श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>दसलक्षण पर्व के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म के बारे में जानें : वाणी का करें सदुपयोग ,अप्रिय, कटु, कठोर, शब्द नहीं बोलें </title>
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		<pubDate>Thu, 12 Sep 2024 01:30:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज उत्तम सत्य धर्म का दिन है। जहां क्षमा , मार्दव , आर्जव , शौच आत्मा का स्वभाव है , वहीं सत्य- संयम- तप त्याग इन गुणों को प्रगट करने के उपाय हैं , या कहें कि ये वो साधन हैं जिनसे हम आत्मिक गुणों की अनुभूति और प्रकट कर सकते हैं। जैसा देखा या [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आज उत्तम सत्य धर्म का दिन है। जहां क्षमा , मार्दव , आर्जव , शौच आत्मा का स्वभाव है , वहीं सत्य- संयम- तप त्याग इन गुणों को प्रगट करने के उपाय हैं , या कहें कि ये वो साधन हैं जिनसे हम आत्मिक गुणों की अनुभूति और प्रकट कर सकते हैं। जैसा देखा या सुना हो, उसे वैसा नहीं कहना बताना ही झूठ है। जिन वचनों से किसी धर्मात्मा या निर्दोष प्राणी का घात हो, ऐसे सत्य वचन बोलना भी झूठ कि श्रेणी में आता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ. सुनील जैन संचय का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>आज उत्तम सत्य धर्म का दिन है। जहां क्षमा , मार्दव , आर्जव , शौच आत्मा का स्वभाव है , वहीं सत्य- संयम- तप त्याग इन गुणों को प्रगट करने के उपाय हैं , या कहें कि ये वो साधन हैं जिनसे हम आत्मिक गुणों की अनुभूति और प्रकट कर सकते हैं।</p>
<p>जैसा देखा या सुना हो, उसे वैसा नहीं कहना बताना ही झूठ है। जिन वचनों से किसी धर्मात्मा या निर्दोष प्राणी का घात हो, ऐसे सत्य वचन बोलना भी झूठ कि श्रेणी में आता है। छल-कपट, राग-द्वेष रहित वचन बोलना, सर्व हितकारी, प्रामाणिक, मितकारी, कोमल वचन बोलना , प्राणियों को दुःख पहुचाने वाले वचन न कहना &#8220;उत्तम सत्य धर्म&#8221; है।</p>
<p>जहां बोलने से धर्म की रक्षा होती हो, प्राणियों का उपकार होता हो, वहां बिना पूछे ही बोलना और जहाँ आपका व अन्य का हित नहीं हो वहां मौन ही रहना उचित कहा है।</p>
<p>नीतिकारों ने कहा है कि सत्य गले का आभूषण है, सत्य से वाणी पवित्र होती है। सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो। क्रोध, लोभ, भय और हँसी-मजाक आदि के कारण ही झूठ बोला जाता है। जहाँ न झूठ बोला जाता है, न ही झूठा व्यवहार किया जाता है वही लोकहित का साधक सत्यधर्म होता है।अप्रिय, कटुक, कठोर, शब्द नहीं बोलें।साबुन से वस्त्र स्वच्छ होता है। वैसे ही वाणी सत्य से निर्मल होती है। सत्य पर सारे तप निर्भर करते हैं। जिन्होंने सत्य का पालन किया, वे इस संसार से पार हो गए, मुक्त हो गए। सत्य ही संसार में श्रेष्ठ है।</p>
<p>हित-मित-प्रिय बोलें : सत्य बोलो और धर्म का आचरण करो। क्रोध, लोभ, भय और हँसी-मजाक आदि के कारण ही झूठ बोला जाता है। जहाँ न झूठ बोला जाता है, न ही झूठा व्यवहार किया जाता है वही लोकहित का साधक सत्यधर्म होता है। हमें कठोर, कर्कश, मर्मभेदी वचनों का प्रयोग नहीं करना चाहिए । जब भी बोलें हित- मित- प्रिय वचनों का प्रयोग अपने व्यवहार में लाना चाहिए तथा कहा भी गया है- ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय, औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय।। कठोर वचन सत्य की श्रेणी में नहीं आते।</p>
<p>सत्यवादी की जग में सदा ही विजय होती है। इसीलिए कहा है &#8216;सत्यमेव जयते&#8217;। अत: हमें अपने जीवन में सदा सत्य का पालन करना चाहिए । व्यवहार में वाणी के सदुपयोग को सत्य कहते हैं।दुर्लभ वाणी का सदुपयोग करने वाला ही धर्मात्मा कहला सकता है। हित—मित और प्रिय वचन बोलना ही वाणी का सदुपयोग है। कटु, कर्वश एंव निन्दापरक वचन बाण की तरह होते हैं, जो सुनने वाले के हृदय में घाव कर देते हैं ।</p>
<p>व्यवहार में वाणी के सदुपयोग को सत्य कहते हैं।दुर्लभ वाणी का सदुपयोग करने वाला ही धर्मात्मा कहला सकता है। हित—मित और प्रिय वचन बोलना ही वाणी का सदुपयोग है। कटु, कर्वश एंव निन्दापरक वचन बाण की तरह होते हैं, जो सुनने वाले के हृदय में घाव कर देते हैं ।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-65957" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034.jpg" alt="" width="1237" height="1240" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034.jpg 1237w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034-300x300.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034-1022x1024.jpg 1022w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034-150x150.jpg 150w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034-768x770.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034-65x65.jpg 65w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240911-WA0034-990x992.jpg 990w" sizes="(max-width: 1237px) 100vw, 1237px" />&#8220;अनगार धर्मामृत” के अनुसार —</strong></p>
<p>जो वचन प्रशस्त , कल्याणकारक , तथा सुनने वाले को आह्लाद उत्पन्न करने वाले , उपकारी हों ऐसे वचनों को ही सत्यव्रतियों ने सत्य कहा है। किन्तु उस सत्य को सत्य न समझना जो अप्रिय और अहितकर हो।</p>
<p>बोलने से पहले विचार अवश्य करना चाहिये , यदि वसु राजा झूठ बोलने से पहले एक बार विचार करता तो आज वह जीव नरक में नहीं होता। लोक में कहावत चलती है —</p>
<p>ऊँचे सिंहासन बैठि वसु नृप ,</p>
<p>धरम का भूपति भया।</p>
<p>वच झूठ सेती नरक पहुँचा ,</p>
<p>सुरग में नारद गया।।</p>
<p>बोलना एक सुंदर कला है परन्तु मौन रहना उससे भी श्रेष्ठ।</p>
<p>असत्यवादी लोग अपने गुरु, मित्र और बंधुओं के साथ भी विश्वासघात करके दुर्गति में चले जाते हैं। किन्तु सत्य बोलने वाले लोगों को वचन सिद्धि हो जाया करती है। क्रमश: सत्य के प्रभाव से वे दिव्यध्वनि के स्वामी होकर असंख्य प्राणियों को धर्म का उपदेश देकर मोक्ष मार्ग का प्रणयन करते हैं। इसलिए हमेशा सत्य धर्म का आदर करना चाहिये।</p>
<p>जाप्य—ॐ ह्रीं उत्तमसत्यधर्माङ्गाय नम:।</p>
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		<title>कहानी उत्तम शौच धर्म की : जीवन में कभी लालच न करें </title>
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		<pubDate>Tue, 10 Sep 2024 23:30:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उत्तम शौच धर्म का अर्थ होता है उत्तम शुद्धता और स्वच्छता का धर्म। यह विचारधारा दर्शाती है कि स्वच्छता केवल शारीरिक या बाहरी स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आत्मिक स्वच्छता को भी महत्व देती है। यह बताता है कि कभी किसी की वस्तु पर बुरी नजर नहीं रखनी चाहिए। आज पढ़िए [&#8230;]]]></description>
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<p><span style="color: #333333"><strong>उत्तम शौच धर्म का अर्थ होता है उत्तम शुद्धता और स्वच्छता का धर्म। यह विचारधारा दर्शाती है कि स्वच्छता केवल शारीरिक या बाहरी स्वच्छता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आत्मिक स्वच्छता को भी महत्व देती है। यह बताता है कि कभी किसी की वस्तु पर बुरी नजर नहीं रखनी चाहिए। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए उत्तम शौच धर्म की कहानी&#8230;.</span></strong></span></p>
<hr />
<p>चम्पापुर नाम का छोटा-सा नगर था। यहां अभय वाहन नाम का एक राजा रहता था। उस नगर में लुब्धक नाम का सेठ भी रहता था। उसके पास बहुत सारे गहने और पैसे थे। लेकिन था वह बहुत ही कंजूस। उसने अपने सोने से बहुत सारे पशु-पक्षियों के जोड़े बनवा रखे थे। जिसमें मोर, कबूतर, हिरण, शेर आदि शामिल थे। इन सभी जोड़ों को उसने मोतियों से बहुत ही अच्छी तरह से सजा रखे थे। इन सबमें उसने एक बैल भी बनवाया था, लेकिन बैलों का जोड़ा नहीं बनवा पाया था, क्योंकि दूसरा बैल बनवाने के लिए उसके पास सोना नहीं बचा था। अतः वह परेशान रहने लगा और रात-दिन बैल का जोड़ा बनवाने के लिए सोचने लगा एक बार चम्पापुर नगर में बहुत जोरों की बारिश हो रही थी। पूरे सात दिन तक लगातार बारिश होती रही। लुब्धक के घर के पास नदी में इतना पानी भर गया कि वहां जाने की किसी में हिम्मत नहीं थी। लेकिन लुब्धक को तो सिर्फ अपने बैल के जोड़े बनाने की चिंता थी।</p>
<p>वह बिना सोचे ही पानी में जाकर लकड़ी उठाकर उनके गठ्ठे बनाने लगा। लुब्धक को यह सब करते हुए चम्पापुर की रानी देख रही थी, उसने राजा को बुलाकर ये दिखाया। राजा को लुब्धक पर बड़ी दया आई, उन्होंने सोचा कि यह शायद बहुत गरीब है, जो इतनी बारिश में भी अपनी जान की परवाह करे बगैर लकड़ियां इकट्ठी कर रहा है। रानी की निगाह उन्होंने तुरंत अपने सैनिकों से लुब्धक को बुलवाया। राजा ने लुब्धक को अपने खजाने में से जितना चाहे पैसे लेने को कहा। तब लुब्धक ने कहा- महाराज मुझे पैसे नहीं चाहिए।</p>
<p>मुझे तो अपने बैल का जोड़ा पूर्ण करना है। लुब्धक राजा को लेकर अपने घर आया। राजा उसके घर में रखे सोने के जोड़ों को देखकर आश्चर्यचकित रह गया। तभी लुब्धक की पत्नी एक थाल में बड़े ही सुंदर रत्न लेकर आई। यह देखकर लुब्धक घबरा गया। उसे लगा कि कहीं मेरी पत्नी यह रत्न राजा को न दे दे। उसने तुरंत ही अपनी पत्नी से वह थाल ले लिया। राजा ने देखा कि लुब्धक के हाथ कांप रहे थे। तब राजा ने कहा- लुब्धक तूकितना कंजूस है। तुम किसी को कैसे कुछ दे सकते हो? तुम्हारे हाथ ही कांप रहे हैं। इतना कह कर राजा वहां से चले गए। लेकिन लुब्धक को इस घटना से कुछ फर्क नहीं पड़ा। उसके दिमाग में तो अभी भी सोना ही घूम रहा था। लालच बुरी बला लुब्धक पैसा कमाने के लिए दूसरे देश चला गया। वहां उसने बहुत सारा सोना कमाया। वह अपनी कमाई लेकर अपने देश आ ही रहा था कि समुद्र में बड़ा तूफान आया। इस तूफान में उसका पैसा भी डूब गया। और तो और, वह स्वयं भी डूब कर मर गया।</p>
<p>मरने के बाद अगले जन्म में वह सांप बना और अपने सोने की रक्षा करने लगा। वह सोने के पास किसी को भी नहीं आने देता था। एक दिन लुब्धक के बड़े बेटे ने गुस्से में आकर सांप को मार दिया। उसे यह तो पता नहीं था कि यह सांप पिछले जन्म में उसके पिता थे। लुब्धक ने हमेशा अपने मन में लालच रखा, इसीलिए वह तिर्यंच बना। बाद में नर्क चला गया। कहानी की सीख इसीलिए हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। यही तो है उत्तम शौच धर्म।</p>
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		<title>कहानी उत्तम आर्जव धर्म की : जैसा बोलें, उसी के अनुरूप काम करें </title>
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		<pubDate>Mon, 09 Sep 2024 13:30:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उत्तम आर्जव धर्म का पालन करने से समाज में विश्वास और सामंजस्य बढ़ता है, और यह व्यक्ति के स्वयं के मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए भी आवश्यक है। यह सिद्धांत भारतीय संस्कृति में आदर्श आचरण का एक महत्वपूर्ण भाग है और जीवन को एक नैतिक और सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>उत्तम आर्जव धर्म का पालन करने से समाज में विश्वास और सामंजस्य बढ़ता है, और यह व्यक्ति के स्वयं के मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए भी आवश्यक है। यह सिद्धांत भारतीय संस्कृति में आदर्श आचरण का एक महत्वपूर्ण भाग है और जीवन को एक नैतिक और सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। <span style="color: #ff0000">आज पढ़िए उत्तम आर्जव धर्म की कहानी&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>आंखों से देखा और कानों से सुना सत्य नहीं होता, मात्र ज्ञान से जाना हुआ ही सत्य होता है। वस्तुनि ष्ठ कथनों का आचरण करना चा हिए। चरित्र ही धर्म का मूल है तथा चरित्र का मूल सम्यक दर्शन है। वर्षा काल का वह समय, जब जीव जंतु वर्षा के कारण जमीन से बाहर विचरण करने लगते हैं। ऐसे समय में संतजन जीव दया मात्र को लेकर जीवों की हिंसा न हो, इसके लिए एक स्थान पर बैठकर वर्षा काल के समय चार माह तक एक ही स्थान पर रुककर साधना करते हैैं।</p>
<p>इसे ही चातुर्मास कहा गया है। एक बार गुणनिधि नामक मुनिराज एक पर्वत पर मौन होकर तपस्या कर रहे थे। तप के प्रभाव से उन्हें आकाश में चलने की दिव्य शक्ति मिली हुई थी। अतः चार्तुमास समाप्त होने के बाद वे आकाश मार्ग से चले गए। उसी समय मृदुमति मुनि आकर गांव में आहार के लिए गए। गांव के लोगों को लगा कि ये तो गुणनिधि महाराज है। अतः सभी ने उनका आदर सत्कार किया। उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। मृृदुमति महाराजा यह समझ गए थे कि गांव वालों से समझने में भूल हुई है।</p>
<p>भोजन के स्वाद में आसक्त होकर मृदुमति ने किसी से कुछ नहीं कहा। उन्होंने लोगों के साथ धोखा किया। इसके लिए उन्हें तिर्यंच गति मिली। उन्होंने अगले जन्म में हाथी के रूप में जन्म लिया। कहानी से सीख हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम कभी भी मायाचारी या किसी के साथ धोखा न करें। हमेशा सरल बने रहें। हमें आर्जव धर्म यही सिखाता है। जैसा हमारे मन में है, हमें वैसा ही बोलना चाहिए और काम भी उसी के अनुरूप करना चाहिए।</p>
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