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	<title>updesh &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>बचे हुए पैसे से कभी पाप मत करना : मुनि श्री सुधासागर जी को सुनने के लिए दूर-दूर से आ रहे गुरु भक्त </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Apr 2025 07:48:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को धर्म सभा में अपने प्रवचन में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश दिया। उन्होंने जीवन का सार समझाया। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; कटनी। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपने प्रवचनों के माध्यम से जैन समाज को उपयोगी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने गुरुवार को धर्म सभा में अपने प्रवचन में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश दिया। उन्होंने जीवन का सार समझाया। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपने प्रवचनों के माध्यम से जैन समाज को उपयोगी मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि अच्छाइयों को समझ लेने से हम अच्छे बन जाएंगे, ये उम्मीद मत रखना, मंजिल को समझ लेने से हमें मंजिल मिल जाएगी, ये उम्मीद मत करना। रोटी मिल जाएगी तो तुम खा लोगे, ये मत समझना। पानी पी लोगे तो प्यास बुझ जाएगी ये मत समझना। भगवान, गुरु मिल जाएंगे तो कल्याण हो जाएगा। ये मत समझ लेना। उच्च कुल, वज्र वृभषनाराच संहनन मिल जाएगा तो मत समझना कि तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। ये सब पॉजिटिव एक पक्ष है और एक पक्ष से नदी नहीं बहती है। हमारी जितनी लग्न मोक्ष के प्रति है, उतनी लगन यदि तुम मोक्ष मार्ग के प्रति लगा लो तो मंजिल के प्रति लगन न होते हुए भी मंजिल मिल जाएगी। हर व्यक्ति अमीर बनना चाहता है लेकिन, कोई ये पूछने नहीं आता कि ये अमीर क्यों बना, कैसे बना, पूछना ही नहीं चाहता और बताएं तो सुनना नहीं चाहता। ये अमीर इसलिए बना है क्योंकि, इसने बहुत दान दिए हैं, बहुत करुणा की है, मंदिर बनाए हैं, धर्मशाला खोली, गरीबों की सहायता की है। इसलिए आज अमीर बना।</p>
<p><strong>गरीबी क्यों है इसकी खोज</strong></p>
<p>जब दो व्यक्ति जबरदस्त लड़ रहे हो तो लड़ते हुए व्यक्तियों को नाग की उपमा दी कि ये नाग हैं, जब दो नाग लड़ रहे हो तो उन्हें अलग करने का प्रयास मत करना, वे दोनों नाग मिलकर के तुम्हें निपटा देंगे। फिर वो लड़ेंगे। ऐसे ही मानी, मायाचारी और लोभी व्यक्ति को मत समझना, चारों कषायों की जब तीव्रता हो, तब आप धर्म का उपदेश नहीं देना, यदि दुर्जन है तो, उसकी कषाय मंद पड़ने दो। मध्यम कषाय वाले को ही शांति से समझाया जाता है, उपदेश दिया जाता है। हम साध्य के प्रति बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते है। रोने से किस्मत अच्छी नहीं हो जाएगी, ये विचार करो कि किस्मत क्यों खराब है। गरीबी का रोना रोने से गरीबी दूर नहीं होगी, कितने ही रोते रहना, कितने ही विधान, पंचकल्याणक करते रहना, गरीबी क्यों है इसकी खोज करो। क्यों पर विचार नही करते, इसलिए हमारा भगवान, गुरु पर से विश्वास उठ जाता है।</p>
<p><strong>5 रुपये कम खर्च करके 5 रूपए का दान करो</strong></p>
<p>बचे हुये पैसे से पाप मत करना, अपने उपभोग में से कांटकर करना हो तो कर लेना क्योंकि, बचा हुआ पैसा नियम से तुम्हारें पुण्य कर्म से बचा है। मानकर चलिए तुम्हारा सौ रुपये निश्चित है तो 5 रुपये कम खर्च करके 5 रूपए का दान करो। तुम्हे और भी अनाव सनाव पैसा खर्च करना है तो अपने उपयोग में से कम कर दो, एक आवश्यक वस्तु कम खरीदो लेकिन, बचे हुए पैसे से पाप मत करना, वह तुम्हारे पुण्य की मेहरबानी है, अन्यथा पैसा बच ही नहीं सकता। तुमने वहाँ पुण्य किया है, जहाँ मंदिर में जरूरत नहीं थी, फिर भी तुमने कहा मैं तो मंदिर में दान दूँगा। भगवान को पीतल का छत्र लगा है, जरूरत नही है लेकिन मैं तो छत्र सोने का चढ़ाऊँगा।</p>
<p><strong>जानने के लिए चरित्र पढ़ना</strong></p>
<p>भगवान को जानने के लिए भगवान का चरित्र नहीं पड़ना, भगवान कैसे बने हैं उसको जानने के लिए चरित्र पढ़ना। भगवान का स्वरूप तो बहुत 2 मिनिट में आ जाएगा। अब सारी जिंदगी में समझ में आ जाए कि भगवान बनने की विधि क्या है? उस विधि को सीखों। महानुभाव एक पाप का भी त्याग नहीं है और तुम अपने आपको भगवान मान रहे हो तो तुम्हारी दशा उसी शराबी जैसी है, जिस भिखारी ने शराब की बोतल लगा ली और कहता है- आई एम गॉड।</p>
<p><strong>नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ो</strong></p>
<p>एक दान होता है- जरूरत का दान, मंदिर में जो जरूरत है वो दे देना, मंदिर बन रहा है इस मंदिर में मेरा कुछ न कुछ लगेगा। दूसरा जो कहता है जरूरत नही है तो भी मैं मंदिर में दान दूँगा। हर व्यक्ति को अच्छे समय में तैयारी करना है कि बुरा समय आ जाए तो क्या तैयारी है? आप यात्रा पर जा रहे हो गाड़ी नहीं है लेकिन रास्ते में पंचर हो गई तो क्या तैयारी है? पक्ष की ही नहीं विपक्ष की भी तैयारी रखो, यदि इससे उल्टा हुआ तो क्या तैयारी है? रात में सकुशल सो रहे हो, कुछ भी नही, यदि रात में सोते-सोते मर गए तो क्या तैयारी है? जैन दर्शन है कहता है उस एक प्रतिशत की तैयारी करो। नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ो, जब तक मेरी निद्रा है तब तक मैं सब कुछ अन्न जल परिग्रह का त्याग करता हूँ, प्रभु मेरे व तेरे अलावा कोई नही, अब निद्रा में मर भी जाएगा तो वही गति होगी जो एक त्यागी की होती है, जो णमोकार मंत्र पढ़ते पढ़ते मरने वाले की गति होती है, ये है समझदार व्यक्ति।</p>
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		<title>सबसे अधिक भय उस व्यक्ति को है जो सबसे ज्यादा सुखी: मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचनों में धर्म प्रभावना से लबरेज हो रहे भक्त </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Mar 2025 07:49:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं की अपार मौजूदगी ने धर्म सभा का पूरा लाभ अर्जित किया है। गुरुवार को मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचनों में नियम, संयम, धैर्य, कर्तव्य और धर्म आराधना के संदेश दिए जा रहे हैं। इससे सकल जैन समाज लाभान्वित हो रहा है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं की अपार मौजूदगी ने धर्म सभा का पूरा लाभ अर्जित किया है। गुरुवार को मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचनों में नियम, संयम, धैर्य, कर्तव्य और धर्म आराधना के संदेश दिए जा रहे हैं। इससे सकल जैन समाज लाभान्वित हो रहा है। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू और शुभम पृथ्वीपुर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी</strong>। मुनिश्री सुधासागर जी ने गुरुवार को अपने प्रवचनों में मौजूद भक्तजनों से कहा कि सबकुछ हमारे पास है लेकिन, डर लग रहा है कि कहीं यह चला न जाए। हम जिंदा हैं तो हमें जिंदा रहने की खुशी नहीं है। हमें मरने का डर लग रहा है। सब मिला भी तो हम निर्भय नहीं हो पाए, सब पाने के बाद भी हम कंगाल बने रहे। बच्चा घूमने जा रहा है लेकिन, डर है कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए। नियम लेने के बाद डर रहता है कि कहीं नियम न टूट जाए। सबसे ज्यादा भय वो व्यक्ति कर रहा है जो सबसे ज्यादा सुखी है। पूज्य समंतभद्र स्वामी ने कहा कि सर्वस्व तुम्हारे पास है लेकिन, सर्व भौमपना तुम्हारे पास नहीं है। हमने जो कुछ भी पाया है, अपने लिए पाया है, हमने कभी जगत की चिंता नहीं की। हमने सबको लूटकर अपने को धनी को बनाया है। सब की तरफ ध्यान न देकर खुद सुखी बनने का प्रयास किया है, आप सुखी नहीं रह पाओगे। या तो तुम एक नियम ले लो-न देना न लेना, मगन रहना। हमें किसी से कुछ लेना नहीं, हम किसी को कुछ देंगे नहीं।</p>
<p><strong>दुनिया में तेरी आत्मा से अच्छी कोई हो ही नहीं सकती</strong></p>
<p>आचार्य समंतभद्र स्वामी ने भगवान की स्तुति करते हुए लिखा कि भगवन जब से आपने दीक्षा ली है, केवलज्ञान, मोक्ष प्राप्त किया, आप जागते ही रहते हैं। सोते ही नहीं, क्या देख रहे हो आप इन आंखों से, इसलिए ये निर्णय समझो कि साधु को दिखता नहीं, सो मत समझना। साधु के देखने की इच्छा नहीं है, सो भी मत समझना, बस इतना सा है कि कुंदकुंद भगवान कहते हैं कि इसके मन मे धारणा बैठ गई है कि दुनिया को क्या देखूं, मेरे से ज्यादा सुंदर दुनिया हो ही नहीं सकती। जब मैं अपनी आत्मा को देखता हूं तो सारा संसार फीका लगता है। तुम दुनिया में खोज रहे हो कि तुमसे अच्छा कौन है? दुनिया में तेरी आत्मा से अच्छी कोई हो ही नहीं सकती। बस यहां से होती है सिद्धि, अब कोई तुम्हें अंधा नहीं कर पाएगा, अब तुम कभी बोर नहीं हो सकते क्योंकि, अपनी आत्मा को देखना है, अपनत्व लाओ, हम पर को देखते है इसलिए थकते हैं। स्व को देखो, एक मां बेटे को देखते हुए नहीं थकती है क्योंकि, वो अपना है। साधु क्यों नहीं थक रहा है क्योंकि, वह अपनी आत्मा को देख रहा है।</p>
<p><strong>ऐसी धारणा बनाओ कि मेरे पास वह सबकुछ है </strong></p>
<p>सारी दुनिया से चोरी बंद हो सकती है बस एक भावना तुम्हें भाना है कि हे भगवन! जगत में हर व्यक्ति के पास इतना हो कि उसे चोरी करने की जरूरत ही न पड़े। जिस पर उसकी नियत जाए वो पहले से उसके पास है और बल्कि उससे अच्छा है। जब सारी दुनिया ऐसी हो जाएगी तो तुम्हे धन पाकर लुटने का डर रहेगा, नहीं क्यों? लूटने वाला कहेगा कि उसके पास क्या है जो मेरे पास नहीं है। जब भी तुम्हारी पर पर दृष्टि जाए तो एक धारणा बना लेना- मेरे पास जो है, उससे ज्यादा दुनिया के पास नहीं है। पर की तरफ दृष्टि जाना बता रहा है कि यह कंगाल है, तुम ऐसी धारणा बनाओ कि मेरे पास वह सबकुछ है, जो दुनिया के पास है, इसलिए मैंने साधना शुरू कर दी है कि न मुझे किसी से लेना है, न किसी को कुछ देना है।</p>
<p><strong>90 प्रतिशत बड़े आदमी और उनके बच्चे दुर्गुणी होते हैं</strong></p>
<p>आप नियम ले लो कि मैं सुख के दिनों में मंदिर नहीं आऊंगा, अमीरी में मैं दान नहीं करूंगा, जो पैसा है, उससे मौज मस्ती करूंगा, ठीक है अभी तेरे पुण्य का उदय है, इसलिए ऐसा कह रहा है लेकिन, जब गरीबी में दुःख के दिन तुम्हारे जिंदगी में आए तो मंदिर नहीं आना। 90 प्रतिशत बड़े आदमी और उनके बच्चे दुर्गुणी होते हैं। जब तुम्हारे जीवन में इतना पुण्य आ जाए, तुम्हारा इतना व्यापार चलें कि तुम्हे मंदिर जाने को, प्रवचन सुनने को समय न मिले तो मैं तुरंत समझ जाता हूं कि इसका पुण्य कह रहा है कि इसको मत बुलाओ, इसको हमें दुर्गति भेजना है। यदि तुम कमजोर हो और दुश्मन से बदला नहीं ले सकते हो तो तुम उसके हो जाओ। हर व्यक्ति चाहता है कि सारी दुनिया अच्छी हो मुझे छोड़ करके। यदि तुम रावण बनकर सीता को चाह रहे हो तो तुम धूल में मिल जाओगे, भस्म हो जाओगे। तुम राम बन जाओ, सीता को तुम्हें खोजना नहीं पड़ेगा, सीता तुम्हारे पास खुद मिल जाएगी। राम बनने की साधना नहीं हो रही और सब सीता चाहते हैं और साधना ये कहती है कि राम बनो, तुम सीता को नहीं चाहोगे, सीता तुम्हें चाहेगी।</p>
<p><strong>&#8230;क्योंकि गरीब बनकर भीख तो मांग लेगा</strong></p>
<p>जो-जो व्यक्ति तुम्हारी जिंदगी में आए और वह तुम्हें बीच में छोड़कर मर जाए। समझ लेना यह पूर्व भव का बैरी आया था जो तुम्हें मझधार में छोड़कर चला गया। तुम पति-पत्नी हो और पत्नी बीच में छोड़कर चली गई तो समझना भाई पूर्व की बैरन है। जो तुम्हें दुःख लेकर चल गई कि न तुम इधर के रहे, न उधर के। मां बेटे को भी छोड़कर जा सकती है। इसी तरह धन कहता है कि मैं तुम्हे बर्बाद करके रहूंगा, गरीब बनाकर नहीं, क्योंकि गरीब बनकर भीख तो मांग लेगा। कर्म कहता है मैं अमीर बनाकर मारूँगा, मैं तुझे इतना धन दूंगा कि चोर आकर सारे घर को सुलाएगा और सबकुछ लूट ले जाएगा। वो धन तुम्हारा बैरी बनकर आया था जबकि तुमने उसे अपना माना था क्योंकि, पूर्वभव में तुमने धन का अनादर दुरूपयोग किया था। तुमने धन से इतने पाप किए कि धन कहता है ले, यही धन तेरी मौत का कारण बनेगा।</p>
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		<title>आत्मसिद्धि के सामने संसार की कोई सिद्धि बड़ी नहीं हो सकतीः मुनि श्री सुधासागर जी ने अपने प्रवचन में दिए महत्वपूर्ण संदेश </title>
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		<pubDate>Tue, 25 Mar 2025 07:03:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद तीर्थ में प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने सोमवार को समयसार का महत्व बताया। महाराजश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230; कटनी। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद तीर्थ में प्रवचन कर रहे हैं। उन्होंने सोमवार को समयसार का महत्व बताया। महाराजश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब व्यक्ति असमर्थ होता है तो उसे बहुत कुछ करने का भाव आता है और जब व्यक्ति समर्थ होता है तो उसे सोने का या नहीं करने का भाव आता है। पूज्य कुंदकुंद स्वामी ने बार-बार पुण्य से बचने को कहा है। व्यक्ति पाप कर्म से तो डरता है कि मेरे जीवन में अशुभकर्म का उदय न आए लेकिन, कोई शुभ कर्म से नही डरता, ये सबसे बड़ी कमजोरी है। गरीबी से डरता है, अमीरी से नहीं डरता, अंधा होने से डरता है, नेत्रवान होने से नहीं डरता। जिसकी शादी नहीं हुई वो दुःखी हो रहा है लेकिन, जिसको अच्छी पत्नी मिली, वो दुःखी नहीं हो रहा है। हम अशुभकर्माे में दुःखी हुए, कभी पुण्यकर्म में दुःखी नहीं हुए, इसलिए आज तक अपना कल्याण नहीं हुआ।</p>
<p><strong>समयसार में आत्मसिद्धि बताई</strong></p>
<p>जो प्रकृति के, काल के, किस्मत के भरोसे रहते हैं, वो कभी जिंदगी में विकास नहीं कर सकते। सामने वाला इतना हावी है कि मैं कुछ नहीं कर सकता, ऐसा भाव तुम्हें आ जाए तो तुम कुछ काम के नहीं हो, तुम्हारा डाउन फॉल चालू हो जाएगा। जब-जब तुम्हें लगे कि कोई ऊपरी बाधा है, समझ लेना तुम्हारी सारी शक्तियां खत्म हो गई। जब-जब तुम निमित्त बुद्धि या पर बुद्धि लाए, तुम्हारा आत्मा का सबकुछ नाश हो जाता है। समयसार में आत्मसिद्धि बताई- आत्मा को वश में करो। आत्मसिद्धि के सामने संसार की कोई सिद्धि बड़ी नहीं हो सकती। जो सिद्धि अपनी आत्मा में है, जो मैं कर सकता हूं। मेरा काम सारी दुनिया मिलकर आ जाए तो भी नहीं कर सकती। सारी दुनिया मुझे सुखी-दुःखी नहीं कर सकती। समयसार पढ़ने वाले को मौत भी दुखी नहीं कर सकती।</p>
<p><strong>याद रखना रास्ता स्वयं बदनाम नहीं होता, रास्ता बदनाम होता</strong></p>
<p>लोगों ने देखा कि जब तक समयसार नही पढ़ते थे तब तक वे लोग मुनियों के लिए चौका लगाते थे, जिनेंद्र भगवान की पूजा करते थे लेकिन, देखा कि समयसार पढ़ने के बाद इनमे ये परिवर्तन आने लगा कि मुनियों को आहार देना, पूजा करना ये व्यवहार है, जड़ की क्रिया है, ये मानकर छोड़ दिया तो तब से लोगों ने संस्था विशेष से छपे समयसार को मंदिरों से बाहर निकाल दिया। याद रखना रास्ता स्वयं बदनाम नहीं होता, रास्ता बदनाम होता है रास्ते पर चलने वालों के कारण। यदि मुनियों को आहार देना व्यवहार की क्रिया है तो क्यों न मुनि स्वयं आहार बनाने लगे? 187 दिन तक ऋषभदेव घूमते रहे तीन अंजुली रस के लिए, उस समय जंगलों में गन्ने अपने आप होते थे, रस स्वयं अपने आप टपकता था, अंजुली लगाकर स्वयं से ले लेते, बेवजह परेशान हुए। क्यों नही किया? कैसा है जैनधर्म, 187 दिन घूमते रहे लेकिन, जब तक श्रावक नवधाभक्ति पूर्वक नहीं देगा, जिंदगी भर निराहार रह जाएगा, दिगंबर मुनि लेकिन, अपने हाथ से आहार ग्रहण नहीं करेगा।</p>
<p><strong>आप लोगों को धर्म की क्रिया में आगे बढ़ना चाहिए</strong></p>
<p>मैं तुमसे वादा करता हूं कि समयसार को मंदिरों में फिर से उच्चासन दिलवाऊंगा, बस एक काम तुम लोग कर लो, जितना जितना तुम लोग समयसार पढो, उतना उतना आप लोगों को धर्म की क्रिया में आगे बढ़ना चाहिए। अभी दर्शन करते थे, अब पूजा अभिषेक करना। अभी रात में पानी पीते थे, अब वो भी छोड़ देना। मुनियों को तो छोड़ो त्यागी व्रतियों का भी सम्मान करना, यदि समयसार को चाहते हो तो इतना बलिदान दे दो क्योंकि, समयसार के बहिष्कार का मूल कारण है समाज का बिगड़ना तो तुम बस सन्मार्ग पर आकर दिखा दो। अपने पूज्य समयसार ग्रंथ के लिए इतना तो तुम कर ही सकते हो।</p>
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		<title>जिंदगी में एक बार बैलगाड़ी से शिखरजी की वंदना करना: मुनिश्री सुधासागर जी ने जन्म कल्याणक पर दिए प्रभावी संदेश </title>
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		<pubDate>Mon, 24 Mar 2025 07:19:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्म प्रभावना के साथ मंगल संदेश से जैन जनमानस को सजग और उपकृत कर रहे हैं। भगवान आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक पर भी उन्होंने जैन समाज को प्रभावी संदेश देकर भगवान आदिनाथ की शिक्षाओं का स्मरण करवाया। कटनी बहोरीबंद से पढ़िए राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी इन दिनों कटनी क्षेत्र के बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में धर्म प्रभावना के साथ मंगल संदेश से जैन जनमानस को सजग और उपकृत कर रहे हैं। भगवान आदिनाथ जी के जन्म कल्याणक पर भी उन्होंने जैन समाज को प्रभावी संदेश देकर भगवान आदिनाथ की शिक्षाओं का स्मरण करवाया। <span style="color: #ff0000">कटनी बहोरीबंद से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी</strong>। मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने भगवान आदिनाथ के जन्म और तप कल्याणक का गूढ़ रहस्य बताया। उन्होंने धर्म सभा में कहा कि जब-जब हमें यह भाव आता है कि संसार का सबसे बड़ा धनी आदमी मैं बनूं समझ लेना तुमने संसार में सबसे बड़ा कंगाल बनने का बीज बो दिया। तुमने यह भाव किया कि संसार का सबसे बड़ा आदमी मैं बनूं यही कंगाली का लक्षण है। तुम्हारे मन मंे भाव आया कि मैं सबसे संसार का सबसे बड़ा ज्ञानी बनूं तो समझ लेना तुम संसार की सबसे बड़े मूर्ख बनोगे, तुमसे ज्यादा मूर्ख कोई नहीं होगा। तुम चाहते हो कि मेरा परिवार सबसे बड़ा हो, एक दिन तुम अकेले बचोगे। हर चीज में यह लगा लेना तुम संसार से आगे दौड़ना चाहते हो, सबसे बड़े पतन का कारण बनता है। किसी भी क्षेत्र में किसी को पीछे करके आगे आना यह पतन का लक्षण है, मन में भाव मत लाना, वचन व काया से भी नहीं। ये ‘सबसे’ शब्द खतरनाक है।</p>
<p><strong>एक काम करो ईष्या मत करो</strong></p>
<p>हमारे विफल होने का कारण क्या है? हम अच्छा होना चाहते हैं, हो ही नहीं पा रहे। हम अच्छा सोचना चाहते हैं, सोच ही नहीं पा रहे। इन सबके पीछे एक शब्द की अपनी गलती हुई है। हमेशा हमने हर चीज के पीछे ‘सबसे’ शब्द लगा दिया, आज हमें आदिनाथ जयंती पर यह सबसे शब्द का त्याग करना है। स्पर्धा व ईष्या यह दोनों हमारे पतन का कारण बनते हैं। ईष्या में समाने वाले को रोक रहा है और स्पर्धा में वह उसको पीछे कर रहा है। ईष्या तो इतनी खतरनाक है कि स्वयं बढ़ने का भाव नहीं कर रहा है। ये क्यों बढ़ रहा है। मेरा सम्मान नहीं हो रहा है। इसका गम्य नहीं, इसका क्यों हो रहा है, इसको कभी जीवन में पनपने मत देना। तुम कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम एक काम करो- ईष्या मत करना। ईष्या ऐसी अग्नि है जो जलाकर भस्म कर देती है।</p>
<p><strong>अधिक गुण लाओ तो जनता तुम्हारी जय करेगी</strong></p>
<p>इसका विकल्प मत करो कि मैं जुगनू हूं। बस एक विकल्प छोड़ दो कि मैं कभी सूरज को हटाने का भाव नहीं करुंगा क्योंकि, यदि सूरज हट गया तो इस अंधकार को कौन संभालेगा। पहले उसके गुण सीखो कि यह बड़ा आदमी क्यों है, वे सारे गुण अपने में लाओ, बराबरी के बन जाओ, फिर हटाओगे तो जनता तुम्हारे लिए कुछ नहीं कहेगी, वो हट गया, ये आ गया और पूजा करवाना चाहते हो तो जिसको तुम हटाना चाहते हो, उसमें जितने गुण हैं। उससे अधिक गुण लाओ तो सारी जनता तुम्हारी जय जयकार करेगी।</p>
<p><strong>पीछे करने का भाव मत करना</strong></p>
<p>स्पर्धा करने से हमारा डाउनफॉल चालू हो जाएगा। जो हमारे पास ताकत है, यह भी हम खो देंगे, अभी हम चमक रहे हैं, हम जुगनू भी नही रहेंगे क्योंकि, हमने सूरज से स्पर्धा की है। कभी पुण्यात्मा को पीछे करने का प्रयास मत करना। जब तुम्हें महसूस हो कि सामने वाला हमसे बड़ा है, धन में, पद में, बल में, तप में किसी भी चीज में बड़ा है तो कभी उसको पीछे करने का भाव मत करना, उसका कुछ नही बिगड़ेगा। आगे बढ़ना है लेकिन सबसे आगे नहीं। अमीर बनना है सबसे ज्यादा अमीर नहीं, ज्ञानी बनना है लेकिन, सबसे ज्यादा ज्ञानी नहीं। यदि तुम सबसे आगे हो तो किसी दिन भीड़ तुम्हें तुम्हें कुचल देगी क्योंकि, तुम पुण्यात्मा को पीछे करके आगे आए हो। सावधान तुम ट्रॉले के आगे चल रहे हो।</p>
<p><strong>सवाल यह कि तुमसे कितने लोग सुखी हैं </strong></p>
<p>सवाल यह नहीं है कि तुम सुखी हो? सवाल यह है कि तुमसे कितने लोग सुखी हैं। तुम कितने बड़े पापी बने रहना, तुम कितने ही गंदे बने रहना, मैं तुम्हें निकाल लूंगा बस एक ध्यान रखना- तुम्हारे पापी होने से कितने लोग पापी हो जाएंगे। तुम्हारे दुःखी होने से कितने लोग दुखी हो रहे हैं। तुम्हारे गलत रास्ते पर चलने से कितने लोग गलत रास्ते पर चले जाएंगे। बस अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं, तुम पापी हो, बचा लूंगा लेकिन, तुम्हारे पाप से दूसरा भी पापी हो रहा है, अब नहीं बचोगे। तुम्हें गलत रास्ते पर जाना है तो पहले पीछे देखो, वो भीड़ तुम्हारे पीछे तो नहीं आएगी।</p>
<p><strong>आदिनाथ भगवान कहते हैं कि तुम कितनों को ज्ञानी बना सकते हो</strong></p>
<p>हमें मंजिल मिले या न मिले लेकिन, हमें मंजिल का रास्ता बनाना आना चाहिए। किसी को उठाकर मंजिल तक ले जाने की ताकत तुम में नहीं है, कम से कम जहां से तुम चलो, उस रास्ते को बना देना तो भी तुम तीर्थंकर कहलाओगे। तुम्हारे पास जो कुछ भी है उन चीजों से तुम कितनों को वो बना सकते हो जो तुम्हारे पास है। ज्ञान तुम्हारे पास है, आदिनाथ भगवान कहते हैं कि तुम कितनों को ज्ञानी बना सकते हो। जिनको तुम ज्ञान दोंगे, उसमे तुम्हारा अपमान होगा, तुम्हे नीचे उतरना पड़ेगा। तीर्थंकर कहते है यदि मेरे दीपक से किसी का दीपक जलता है तो मैं झुकने को तैयार हूं। ये प्रसंशनीय नहीं कि तुम्हारे पास दीपक है, ये बताओ इस दीपक से तुम कितने दीपक जला सकते हो।</p>
<p><strong>जैनियों के यहां खेती जरूर होना चाहिए</strong></p>
<p>यदि खेती करना पाप होता तो तीर्थंकर जैसी महान आत्माएं कभी खेती का उपदेश नहीं देती। उन्होंने खुद सिखाया। आज दुनिया में जितने बूचड़ खाने खुल रहे हैं, जितने नंदी कट रहे हैं, ये सब वो ही पापी हैं, जो खेती ट्रैक्टर से कर रहे हैं। तुम मात्र एकंेद्रियों को बचा रहे हो और सारे बैल कटने जा रहे हैं, बूचड़खाने। यदि हल से खेती होने लग जाए तो सारे बैल बच जाएंगे। आज गाय को पालने में सबसे बड़ा प्रश्न है कि बछड़े का क्या करेंगे तो उसके लिए खेती ही एक मात्र सहारा है। ऋषभदेव ने बैल का उपदेश इसलिए दिया है। अन्यथा ये बैल कटेंगे, वे अवधिज्ञानी थे गाड़ी का, ट्रेक्टर का उपदेश दे सकते थे। जैनियों के यहां खेती जरूर होना चाहिए या तो तलवार उठाओ या फिर हल उठाओ। जिंदगी में एक बार बैलगाड़ी से शिखरजी की वंदना करना और गाड़ी से जिंदगी भर की हजारों वंदना करना, वो एक वंदना श्रेष्ठ हैं, क्योंकि बैल की बचत है।</p>
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		<title>धर्म की रक्षा करोगे तो वह तुम्हारी रक्षा करेगा: मुनिश्री सुधासागर जी ने बताई धर्म, कर्म और कर्तव्य की महत्ता </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Mar 2025 08:33:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी की धर्मसभा इन दिनों कटनी क्षेत्र में जैन समाज के लोगों को जीवन के विभिन्न रहस्यों और जिम्मेदारियों से परिचय करवा रही है। मुनिश्री के प्रवचनों का लाभ लेने के लिए बड़ी संख्या में समाजजन अतिशय क्षेत्र में चल रही धर्मसभा में पहुंच रहे हैं। बुधवार को भी उन्होंने समाजजनों को धर्म, [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी की धर्मसभा इन दिनों कटनी क्षेत्र में जैन समाज के लोगों को जीवन के विभिन्न रहस्यों और जिम्मेदारियों से परिचय करवा रही है। मुनिश्री के प्रवचनों का लाभ लेने के लिए बड़ी संख्या में समाजजन अतिशय क्षेत्र में चल रही धर्मसभा में पहुंच रहे हैं। बुधवार को भी उन्होंने समाजजनों को धर्म, कर्म और कर्तव्यों की महत्ता बताई। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू/शुभम जैन पृथ्वीपुर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने बहोरीबंद अतिशय क्षेत्र में अपने प्रवचनों से लोगों को धर्म कर्म और कर्तव्यों के प्रति जागृत किया है। बुधवार को भी उन्होंने यहां धर्मसभा में कहा कि व्यक्ति यह सोच लेता है कि मेरे पास जो है उससे मैं मालामाल हूं लेकिन, जब दुनिया की तरफ् देखते हैं तो हमसे भी बड़े रईस हैं। लोगों को बड़ी उम्मीदें होती हैं। अब बड़ा आदमी खड़ा हो गया है तो कुछ न कुछ तो मिलेगा लेकिन, देखने में यही आया कि देना तो दूर रहा, जो था वह भी कुचलकर चला गया। हम भूल जाते हैं कि दुनिया में हम ही जीने के लिए नहीं जन्मे हैं, वह भी जीना चाहता है, जिसे हमको कुचल रहे हैं। तुम अच्छा सोचना चाहते हो तो दुनिया भी अच्छा सोचना चाहती है। तुम अच्छा खाना चाहते हो तो दुनिया भी अच्छा खाना चाहती है फिर क्यों भिखारी को बासी रोटी देते हो। जिस दिन यह सोच आ जाए कि जो भोजन मुझे अच्छा लगता है वही तो भिखारी को भी लगेगा, हम क्यों उसकी मजबूरी का लाभ उठाएं। हम क्यों बासी रोटी उसके कटोरे में डालें। एक दिन बाद देने की अपेक्षा, उसी दिन दे दो न ताजी तो ताजी भी हो जाएगी और तुरंत हो जाएगी।</p>
<p><strong>सुख नहीं दे सकते तो रुलाने का भी अधिकार नहीं</strong></p>
<p>स्व की तरफ देखो क्योंकि, तुम्हारी अलावा भी दुनिया वैसी ही है, जैसे तुम हो। या तो दुनिया को तुम कुछ नहीं कर सकते हो तो कुचलने का भी तुम्हें अधिकार है। तुम झोपड़ी बनाकर नहीं दे सकते तो झोपड़ी उजाड़ने का अधिकार भी नहीं है। तुम पेड़ को नहीं सींच सकते तो पेड़ को काटने का भी अधिकार नहीं है। तुम किसी को सुख नहीं दे सकते तो रुलाने का भी अधिकार नहीं है। तुम किसी को सहारा नहीं दे सकते तो धक्का मारने का भी अधिकार नहीं है, उसको छोड़ दो अपने ऊपर। दूसरे का सहयोग करने की अपेक्षा उजाड़ने में हमें ज्यादा मजा आता है। 90 प्रतिशत लोग किसी के दुःख से सुखी रहते हैं। जिनवाणी ने कहा कि तुम्हें अपने आप को ही सुखी रखना है तो पर को सहारा देना बाद में छोड़ना, पर का सहारा लेना छोड़ दो। हम पर का सहारा तो लेना तो चाहते हैं लेकिन, पर को सहारा नहीं देना चाहते, यही जिंदगी का सबसे बड़ा डाउन फॉल है, यहीं से शुरू होता है व्यक्ति का पतन। तुम अपनी कहानी तो दूसरों को सुनाना चाहते हो लेकिन, दूसरों के दुख सुनना नहीं चाहते, बस तुम्हारे विनाश का समय निश्चित है, कभी दुःख दूर नहीं होगा।</p>
<p><strong>तुम धर्म की रक्षा करोगे तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा</strong></p>
<p>ये पेड़ हमें फल दें लेकिन, पेड़ को हम खाद-पानी नहीं देना चाहते तो वो फल तुम्हें पचेगा ही नहीं। यदि तुम छाया लेना चाहते हो तो पेड़ की सुरक्षा करो, प्रकृति कहती है कि छाया तुम्हें अच्छी लगती है तो पेड़ को बचाओ, उसको काटो मत। कभी भाव नहीं आता कि इससे हवा प्रदूषित हो जाएगी, हमेशा एक ही भाव कहते हो कि मुझे अच्छी हवा मिलती रहे। ये कब भाव आया है कि मैं अच्छी हवा चाहता हूं तो मेरा प्रयास रहेगा मैं हवा को गंदा नहीं करूंगा। हम सोचते है हमें पानी अच्छा मिलें, कभी हम ये नहीं सोचते कि पानी को अच्छा रखूंगा। यही स्थिति धर्म क्षेत्र में भी आ रही है, हर व्यक्ति धर्म से चाहता है लेकिन, कभी धर्म की सुरक्षा करने का भाव नहीं करता। तुम धर्म की रक्षा करोगे तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा। जिस दिन तुम्हारा ये भाव आ जाए कि मैं धर्म की रक्षा करूंगा, पर तुम्हें अपनी रक्षा की याचना करना नहीं है, अपने आप तुम्हारी रक्षा होगी।</p>
<p><strong>एक वेदी, नहीं मिले तो मंदिर में फर्श लगाना</strong></p>
<p>पिता स्वयं के मरने के बाद, बेटे का इंतजाम करता है कि एक गद्दी तो बना दो और गुरु तुम्हारे मरने के बाद का इंतजाम करते हैं, उन्हें चिंता है कि गर तुम मर गए तो कम से कम बाप का बना बनाया मकान तो मिल जाए, पिता की गद्दी तो मिल जाए। मेरे भक्तांे से कहना है कि जिंदगी में एक मंदिर बनाकर मरना, एक वेदी, नहीं मिले तो मंदिर में फर्श लगाकर मरना, मंदिर की शिखर, मंदिर में किवाड़ और कुछ न मिले तो जब शिलान्यास हो तो एक ईंट लगाकर मरना, वो ईंट साधारण नहीं है, वो ईंट तुम्हारे मरने के बाद का इंतजाम है। जीते जी तो तुम्हारी व्यवस्था तुम्हारे बाप ने कर दी, मैं तुम्हारे मरने के बाद की व्यवस्था कर रहा हूं।</p>
<p><strong>किसी के काम आने पर मिलता है संतोष</strong></p>
<p>जब तुम पेड़ की कटिंग भी करते हो तो वह पेड़ कहता है कि भले ही मैं कट गया लेकिन, इनका तो मनोरंजन हो गया। कोई बात नहीं लेकिन, तूने तो यूं तोड़ा और यूं फंेक दिया, वो एक पत्ता तुम्हारी जिंदगी को बर्बाद कर देगा, मैं तो अपनी जिंदगी में सुख नहीं ले पाया लेकिन, मेरी जिंदगी से कोई दूसरा भी सुख नहीं ले पाया। हाथ पैर बिना कारणों के कोई पत्ता भी नहीं तोडना। पानी के लिए कोई बात नहीं तुम पियो, अभिषेक करो, पानी को खुशी है कि भली मैं नष्ट हो गया लेकिन, किसी की प्यास बुझ गई लेकिन, तुमने तो एक गिलास पानी पिया और फेंक दिया। अब पानी कहता है कि मैं तो कंही का नहीं रहा, मैं मिट्टी में मिल के बर्बाद हो गया और किसी के काम भी नहीं आया। किसी के काम आता तो संतोष रहता कि भली मैं मिट गया लेकिन, किसी की प्यास बुझ गई।</p>
<p><strong>साधु का समय है मूल्यवान </strong></p>
<p>अन्न का कण और साधु का क्षण कभी बर्बाद मत करना क्योंकि, वो मूल्यवान है। अन्न मूल्यवान है, प्राण बचाता है तो उसके कण को बर्बाद मत करना। साधु का समय भी मूल्यवान है, एक क्षण को मिले तो जीवन को धन्य कर लो। कीमती चीज ज्यादा देर संयोग में नहीं रहती क्योंकि, वो कीमती है। मैं अपने समय की कीमत करूं या ना करूं साधु का समय बर्बाद नहीं करूंगा। जितना साधु अपनी साधना में रहेगा और जो अतिशय प्रकट होगा, इसका लाभ तुम्हें मिलना है।</p>
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		<title>धर्म, संस्कार, संयम, त्याग, प्रभु की भक्ति से ओतप्रोत हैं भक्त: मुनि श्री सुधासागर जी की धर्मसभा से जाग रही है आध्यात्मिक चेतना </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_devotees_are_filled_with_religion_rituals_restraint_sacrifice_and_devotion_to_god/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Mar 2025 08:38:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों धर्मसभा में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को अपने प्रबोधन से धर्म, संस्कार, संयम, त्याग, प्रभु की भक्ति आदि के बारे में जाग्रत कर रहे हैं। सोमवार को उन्होंने परिवार से संबंध, प्रभु की भक्ति, परस्पर विश्वास आदि के बारे में बताया। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों धर्मसभा में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को अपने प्रबोधन से धर्म, संस्कार, संयम, त्याग, प्रभु की भक्ति आदि के बारे में जाग्रत कर रहे हैं। सोमवार को उन्होंने परिवार से संबंध, प्रभु की भक्ति, परस्पर विश्वास आदि के बारे में बताया। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों धर्मसभा में जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को अपने प्रबोधन से धर्म, संस्कार, संयम, त्याग, प्रभु की भक्ति आदि के बारे में जाग्रत कर रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि चले अपन उन दिनों को याद करें जो दिन आनंदमय, सुखमय होते हैं। जिसमें सुकून मिलता है, जिसमें हम अपने आप को पूर्णतः की अनुभूति करते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे मेरे पास सब कुछ है, ऐसे क्षण इस दुनिया में बहुत कम आते हैं क्योंकि, दुनिया का स्वरूप है। तृष्णा निरंतर वृद्धि को प्राप्त होती है, आज तक कोई भी व्यक्ति इस संसार में तृप्त नहीं हो पाया। पता नहीं इस सृष्टि का स्वभाव क्या है, सबकुछ मिल जाता है, फिर भी आगे की चाहत बनी रहती है। पेटभर जाता है लेकिन, खाने की ललक कम नहीं होती। मुझे पत्नी मिल जाए, मेरा बेटा हो जाए, मेरा व्यापार अच्छा चल जाए, ऐसी इच्छा करनें में कोई पाप नहीं है।</p>
<p><strong>मेरी उम्र मेरे बेटे को लग जाए</strong></p>
<p>कैसे माने कि ये हमारा संबंधी है। मां-बेटे का, गुरु- शिष्य का। जब तुम्हारे अंदर तुम्हारी खुद की कमाई, खुद के सुख के दिन, खुद का पसीना जिसे देने का भाव आ जाए, समझ लेना यही हमारा जन्म-जन्म का संबंधी है। मेरी उम्र मेरे बेटे को लग जाए। बस हो गया संबंध और दूसरों की कमाई लेने का भाव आए तो ये डाकू का लक्षण है। डाकू तो दूसरे की संपत्ति पर नियत खराब करता है, तुमने तो बाप की संपत्ति पर नियत खराब की।</p>
<p><strong>पराई वस्तु पर नियत खराब मत करो</strong></p>
<p>महानुभाव कभी चोरी का भाव आ जाए तो सारी दुनिया में डाका डाल लेना लेकिन अपनों के यहां चोरी करने का भाव मत करना। कर्म सिद्धांत कहता है कि तुम बाप की संपत्ति पर नियत खराब नहीं कर सकते, उसको हड़पने का प्रयास मत करो, ये डाकुओं का काम है। नियत खराब होने पर व्यक्ति किसी भी स्तर पर उतर जाता है, इसलिए हम कहते हैं कि किसी पराई वस्तु पर नियत खराब मत करो, चाहे वह बाप की संपत्ति ही क्यों न हो।</p>
<p><strong>अकाट्य विश्वास किसी न किसी बनाकर रखो</strong></p>
<p>कोई भी बुरी घटना या अशुभ घटना घटे तो आपको ये चिंतन करना है, ये दुर्घटना नहीं हुई है। बहुत छोटे में निकल गई है। यदि तुम्हारी श्रद्धा मजबूत है तो कहना उपसर्ग आ ही नहीं सकता, हमारा कुछ बिगड़ ही नहीं सकता, अब इतना विश्वास तुम्हारे पास हो तो बिना णमोकार मंत्र, बिना सिद्धि के आज अभी चमत्कार हो सकता है, नाग का हार बन सकता है, बस विश्वास बताओ, दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति है जिस पर तुम्हारा ऐसा विश्वास हो, कुछ भी घट जाए। हमें पूरा विश्वास है तो आज भी सूली सिंहासन बन सकती है लेकिन, हमें संदेह आता है क्या पता। धर्म क्षेत्र में इतनी श्रद्धा अड़िग रखो कि कहीं गड़बड़ होने का सवाल ही नहीं, ऐसा अकाट्य विश्वास किसी न किसी एक पर बनाकर रखो।</p>
<p><strong>घर पार्टनर शिप की कंपनी है</strong></p>
<p>गृहस्थी पार्टनर शिप की बहुत बड़ी कंपनी है। जो अकेले नहीं चलती पार्टनर शिप चलती ही है। इस कथन से मैं आपको मोटिवेशन दे रहा हूं। यदि कोई घर में बीमार है और उसका एक सदस्य यदि मंदिर जा रहा है, बराबर उसका पुण्य उसके खाते जाएगा क्योंकि, घर पार्टनर शिप की कंपनी है, वह सबका घर है, बस तुम्हें उसके प्रति चाहत होना चाहिए और तुम यह कहो की भक्ति मैं करुंगी लेकिन, पुण्य जाना चाहिए मेरे पति को, कमाई मैं करूँगी और जो पैसा मिले, फलाने खाते में जाना है।</p>
<p><strong>यदि आपने अनुमोदना की है तो&#8230;</strong></p>
<p>इस माला में पार्टनरशिप है, घर में एक व्यक्ति पुण्य करता है, अभी सारे घर के लोग उसकी अनुमोदना करें तो वह पुण्य सारे घर को बंटता है, यदि तुम विरोध में गए तो नही। पाप करें तो एक करता है, सारे परिवार को पाप लगता है। यदि आपने अनुमोदना की है तो। जैसे दुकान के बंटवारे में जितने लोगों का हक तो अपने दुकान से एक लाख दान में दिए तो जितने जितने लोगों का हक उसमे है, पुण्य भी उतने ही लोगों के खाते में जाएगा, दिया एक ने है, बस बाकी लोगों को झगड़ा नही करना है।</p>
<p><strong>माला का पुण्य परिवार में बंट रहा</strong></p>
<p>मां मंदिर आई है वो बेटे की मां है, पति की पत्नी है, भाई की बहन है, बहू की सासु है। इन सबका उसके ऊपर कोई न कोई संबंध है, वो माला फेर रही है। इस माला का पुण्य परिवार में बंट रहा है। बस इतनी अनमोदना करना है, मेरी सासू मेरी मां मंदिर गई है, ओहो मैं तो नही जा पाउँगा लेकिन, मां तुझे छूट है, आपने अपना अधिकार दे दिया, पूरे परिवार को पुण्य लगेगा।</p>
<p><strong>अपने हिस्से की भागीदारी खत्म कर लें</strong></p>
<p>चाहे पिता हो, भाई हो या बेटा हो गलत कार्य में अपने अधिकार का प्रयोग करो, आपका अधिकार है तो आपको रोकना ही चाहिए और बेटा तुमने नहीं रोका तो तुमने वह पाप नहीं किया तब भी तुम्हारे खाते में पाप जाएगा। बुरे कार्यों के समय, अपन को कोई भी हो, यदि उसको न रोक सको क्योंकि, वह बड़ा है, बाप है, बड़ा भाई है तो कम से कम विरोध जताकर के अपने हिस्से की भागीदारी खत्म कर लेना चाहिए। अपने से बड़े या छोटी कोई अच्छा कार्य करें तो कभी रोकने का प्रयास मत करना, बल्कि यह कहना क्यों पूछ रहे हो- हमारा ऐसा भी लगा कर आ जाते तो मैं अहोभाग्यशाली हूं।</p>
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		<title>जैन दर्शन के आदिदेव भगवान मंगलकारी हैं : मुनि श्री सुधासागर जी के प्रवचनों का ले रहे धर्म लाभ  </title>
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		<pubDate>Sun, 16 Mar 2025 16:59:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज अपने प्रवचनों के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना से परिचय करवा रहे हैं। वे कटनी के समीप बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में विराजित हैं। नित प्रवचनों से जैन समाज को धर्म प्रभावना दे रहे हैं। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230; कटनी। पहली बात यह कि हम दुनिया के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज अपने प्रवचनों के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना से परिचय करवा रहे हैं। वे कटनी के समीप बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में विराजित हैं। नित प्रवचनों से जैन समाज को धर्म प्रभावना दे रहे हैं। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी</strong>। पहली बात यह कि हम दुनिया के संबंधों की उपयोगिता नहीं समझते, हम पर को यूज करना चाहते है पर मानकर। पर की वस्तु पर मानकर यूज करेंगे तो वह अपराध है, उसी वस्तु को यदि हम विधि पूर्वक, धर्म पूर्वक, समाज पूर्वक, परिवार पूर्वक, कानून पूर्वक अपना बनाकर के ग्रहण करेंगे तो वह पर तो है लेकिन, अपराध की कोटि में नही आएगा। यह प्रबोधन मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में दिया। उन्होंने कहा कि पर वस्तु को भोगने, देखने, सुनने, सम्बन्ध बनाने की मनाही नहीं है, पर वस्तु को ग्रहण करने के लिए कानून, विधि, समाज, धर्मशास्त्र है। शास्त्रों में सर्वज्ञ भगवान ने पर वस्तु को ग्रहण करने की मनाही नहीं की क्योंकि, संसार अवस्था में कोई भी वस्तु स्वतंत्र रह ही नहीं सकती, उसको कहीं न कहीं पर का सहारा लेना ही पड़ेगा, अपनी आत्मा को छोड़कर के। अपनी आत्मा के सहारे के बिना चल जाएगा लेकिन, पर के सहारे के बिना नहीं चलेगा।</p>
<p><strong>पर के सहारे के बिना तुम जी नहीं पाओगे</strong></p>
<p>जैन साधु दीक्षा लेते समय ही संकल्प करता है कि तिल तुष् मात्र भी परिग्रह मेरा नहीं है और प्रकृति का ये नियम है पर के सहारे के बिना तुम जी नहीं पाओगे, अब ये दोनों विरोधी बातें है। जिनवाणी माँ कहती है कि तू किसी की तरफ देखेगा भी नहीं, गर्दन भी नहीं हिलाएगा, कुछ भी नहीं करना तुझें। ओहो जिनवाणी की ये कठोर बातें सुनकर के आनंद आता है।</p>
<p><strong>मेरी माँ है, मेरा अहित तो कभी कर ही नहीं सकती।</strong></p>
<p>जन्म -जन्म तक ऐसी माँ मिलती रहें, ये नदी किनारे मेरे अहित के लिए नहीं भेज रही है, इसी में मेरा हित है क्योंकि वो मेरी माँ है, मेरा अहित तो कभी कर ही नहीं सकती। मुझे दुःख देने का तो सवाल ही नहीं। माँ को सुलाने के साथ जगाना भी पड़ता है, चादर खिंचती है, डाँट देती है, यहाँ तक कि नहीं उठता तो थप्पड़ मार देती है। सही बेटे होओगें तो गुस्सा नहीं करोगे, अंदर से आवाज आएगी कि माँ जगा रही है तो नियम से मेरा जागने में ही हित है, नहीं तो माँ क्यों जगाएगी।</p>
<p><strong>ज्ञानी बालक को जगाने वाली माँ अच्छी लगती है</strong></p>
<p>कभी- कभी माँ को मन मारकर वो कार्य करना पड़ता है जो बेटे को दुखदाई है। ऐसी ही है हमारी जिनवाणी माँ, मुमुक्षु स्वीकार कर लेता है कि माँ ने कहा है तो नियम से ये कष्ट उठाये बिना मेरा कल्याण नहीं हो सकता। अज्ञानी बालक को सुलाने वाली माँ अच्छी लगती है और ज्ञानी बालक को जगाने वाली माँ अच्छी लगती है। जगाने वाली माँ तुम्हें अच्छी लगने लग जाए तो तुम्हें मातृत्व छाया मिलना चालू हो गया, माँ का आशीर्वाद तुम्हे फलना शुरू हो गया। सुलाने वाली माँ तुम्हें अच्छी लग रही है तो समझना न तुम्हे माँ मिली है, न तुम बेटा हो, तुमने जन्म जरूर लिया है पशुओं के समान। यदि मनुष्य की माँ मिली है तो उस समय अच्छी लगना चाहिए जिस समय वह जगा रही है।</p>
<p><strong>उनकी वसीयत नहीं फलेगी</strong></p>
<p>यदि तुम्हे पिता इसलिए अच्छे लग रहे कि तुम्हे जो चाहिए, जब चाहिए, वह देते है। नहीं, अभी तुम्हें पिता का आशीर्वाद, उनकी वसीयत नहीं फलेगी। तुम इस वंश में वो चीज नहीं पा पाओगे, जो तुम्हारे पूर्वजों के पास था क्योंकि तुम्हें पिता इसलिए अच्छे लग रहे हैं कि वह तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर रहे हैं। उस दिन पूछ रहा हूँ जिस दिन पिता तुम्हारी कोई इच्छा पूरी न करें तब वह कैसे लग रहे है? यदि बुरी लग रहे हैं तो अब तुम्हें पिता का आशीर्वाद, उनकी वसीयत नहीं फलेगी।</p>
<p><strong>पहले गुरु की शरण में चले जाओ</strong></p>
<p>अपराध करने के बाद तुम गुरु की शरण में जाओगे तो ये महा अपराध है क्योंकि तुम्हारे कारण से तुम्हारा गुरु, भगवान भी अपराधी की कोटि में आ सकता है, इसलिए कार्य करने के पहले गुरु की शरण में चले जाओ, जिससे तुम्हारी और गुरु महाराज दोनों की इज्जत बचे इसलिए अपराध करने के पहले हमें मंदिर जाना है। क्यों भेजा गया हमें सुबह मंदिर, मूल कारण है कि हमें दिन में अपराध करना है, न जाने क्या कार्य करना पड़े इसलिए भगवान मैं सुबह तेरे दर्शन करने आया हूँ कि मेरे से कोई गलत कार्य न हो जाए।</p>
<p><strong>पहली धोक मैं मंदिर में दूँगा क्योंकि&#8230;</strong></p>
<p>जैन भगवान पूर्णत: निरपराधी है, पापों से मुक्त है, अचौर्य व्रत है, इसलिए जैन दर्शन के भगवानों को संकट मोचक नहीं, मंगलकारी कहा। मंगल कार्य के पहले किया जाता है, इसलिए सुबह उठकर पहले मन्दिर, कोई कार्य शुरू करने के पहले पहली पाती, पहला नारियल मंदिर में जाएगा, पहली धोक मैं मंदिर में दूँगा क्योंकि, मैं घर से बाहर जा रहा हूँ। यदि तुम्हें ऐसा डाउट दिख रहा है कि यह कार्य करें या न करें तो करने के पहले बड़ों से, गुरु से पूछे, अनुमति मिलेगी तो ठीक, नहीं मिलेगी तो नहीं करूँगा, अब आपको गुरु की सिद्धि हो जाएगी।</p>
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		<title>देखकर अनदेखी कर दो जहां हम कुछ कर नहीं सकते: मुनिश्री सुधासागर जी ने अपने संदेशों में समाज को जगाया </title>
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		<pubDate>Mon, 10 Mar 2025 07:43:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी प्रतिदिन अपने प्रवचनों में धर्म, कर्तव्य और ज्ञान की बातों से दिगंबर जैन समाज के भक्तों और श्रद्धालुओं को दिव्य संदेश प्रदान कर रहे हैं। रविवार को भी उन्होंने धर्मसभा के दौरान देशना में विश्वास, समझदारी और श्रद्धा के महत्व को समझाया। पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; कटनी। व्यक्ति [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी प्रतिदिन अपने प्रवचनों में धर्म, कर्तव्य और ज्ञान की बातों से दिगंबर जैन समाज के भक्तों और श्रद्धालुओं को दिव्य संदेश प्रदान कर रहे हैं। रविवार को भी उन्होंने धर्मसभा के दौरान देशना में विश्वास, समझदारी और श्रद्धा के महत्व को समझाया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए कटनी से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> व्यक्ति जब किसी भी कार्य करने के अभिमुख होता है तो उसके मन में एक संदेह उत्पन्न होता है कि मैं यह कार्य करुं या न करुं ये कार्य सफल होगा या नहीं, यह प्रश्न जब आत्मा में उत्पन्न हो जाता है वहीं से व्यक्ति अपनी शक्तियां खो देता है, इसलिए जैन दर्शन ने कहा मोक्ष मार्ग में पहले तुम निःशंकित हो जाओ। यदि तुम्हारे मन में शंका बनी रहेगी तो न तो तुम इधर के रहोगे और न उधर के। तुम अपना जीवन यूं ही गुजारते रहोगे, कुछ हासिल नहीं होगा।</p>
<p><strong>वहां बोलें जहां बोलने के बाद पाप और घटे</strong></p>
<p>घर मंे मां बहु को समझाने के लिए बेटी को डांटती है। समझदार बहु समझ जाती है कि ये मुझे समझाया जा रहा है। यदि वही बहु सास से झगड़ने लगे तो समझना वह सबसे ज्यादा मूर्ख है। फिर नीतिकारों ने कहा ऐसे व्यक्तियों को सीधे-सीधे समझाओ या फिर इन्हें बिगड़ने दो, मर रहे हैं तो मरने दो, अपन को कोई लेना देना नहीं। मध्यस्थ हो जाओ। देखकर अनदेखी कर दो, क्योंकि हम कुछ कर ही नहीं सकते, हम असमर्थ हैं, हम समझाएंगे तो यह कषाय और करेगा। तो क्या चुप रह जाने पर पाप का समर्थन नहीं होगा, नहीं होगा क्योंकि, बोलने के बाद वह पाप और बढ़ेगा, वहां बोलना चाहिए, जहां बोलने के बाद पाप और घटे, जैसे जानवरों की हिंसा, तुम रोक नहीं पाओगे, मना करने पर कषाय बढ़ेगी।</p>
<p><strong>नारकियों का वर्णन सुनकर सुधर जाओ</strong></p>
<p>गुरु के मुख से निकल जाए कि तुम पापी हो तो मान लो कि मैं पापी हूं, क्योंकि गुरु के मुख से कभी झूठ निकल ही नहीं सकता। यदि हो सके तो महानुभाव गुरु से कहिए कि आप तो सीधा-सीधा कहिए, आदेश दीजिए, परम भक्त हूं। यदि पापी हैं तो पापी कहिए, मैं बुरा नहीं मानूंगा। अब यदि दूसरा व्यक्ति है उससे तुम सीधी कहोगे तो बुरा मान जाएगा लेकिन, इसको इशारे से समझाओ तो यह समझ जाएगा। इसके लिए जिनवाणी ने उपदेश दिया, नारकियों की वेदना हमें बताई। इसलिए नारकियों का वर्णन सुनकर तुम सुधर जाओ। जब-जब तुम्हारे गुरु महाराज तुम्हें कहानी सुनाएं कि इसने ऐसा किया तो ये बना, इसने रात्रि भोजन किया तो शूकर, मार्जर बना तो अब तुम समझदार होंगे तो समझ जाओगे कि ये कोई शूकर की कहानी नहीं, हमें शूकर बनने से बचाने का तरीका होता है।</p>
<p><strong>मैं भाग्यवान हूं कि गुरु के चरण मेरे पास आए हैं</strong></p>
<p>क्यों नहीं हो रहा है मंगल, क्यों आ जाते हैं विघ्न क्योंकि, अपनी धारणा है कि गुरु के हाथ का आशीर्वाद मांगलिक है और लात बुरी। मां-बाप ने लात मार दी, अरे मूर्ख, जो चमत्कार गुरु के हाथों में नहीं, वो चमत्कार गुरु के पैरों में होता है। दुनिया चरणों के पास आती है और मैं भाग्यवान हूं कि गुरु के चरण मेरे पास आए हैं। भगवान, गुरु मंगल हैं, इनके दर्शन के बाद भी मंगल नहीं हो रहा है। णमोकार मंत्र पढ़ने के बाद भी मंगल नहीं हो रहा है क्यों? उस दिन तुम्हारा मंगल होगा, पहले ये बताओ तुम्हारी श्रद्धा, विश्वास कैसा है? सामने वाला सांप लाया है लेकिन मनोवती के मन में एक ही भाव है-‘मेरा ये अहित नहीं कर सकता।’ संदेह भी नहीं था और विश्वास का चमत्कार हुआ कि कलश में हाथ डाला और नाग का हार बन गया।</p>
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		<title>साथ उसका दो जिसका कोई साथ नहीं देता :  मुनिश्री ने कहा-बच्चों पर अपेक्षाओं का बोझ न बढ़ाएं </title>
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		<pubDate>Sun, 09 Mar 2025 12:08:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी के बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपनी देशना से धर्म प्रभावना बढ़ाकर जैन समाज और अनुयायियों को धर्म, कर्म, दान और सहयोग के प्रति प्रेरित कर रहे हैं। उनकी धर्मसभा में बड़ी संख्या में धर्मावलबियों की उपस्थिति नजर आ रही है। कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>मुनि श्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी के बहोरीबंद अतिशय तीर्थ में अपनी देशना से धर्म प्रभावना बढ़ाकर जैन समाज और अनुयायियों को धर्म, कर्म, दान और सहयोग के प्रति प्रेरित कर रहे हैं। उनकी धर्मसभा में बड़ी संख्या में धर्मावलबियों की उपस्थिति नजर आ रही है। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> सामान्य से हम दुनिया को देखते हैं तो न हमें गिरने का विचार आता है, न उठने का विचार आता है, न जागने का भाव आता है न सोने का भाव आता है, न रुकने का भाव आता है, न चलने का भाव आता है। बनने की कोई खुशी नहीं है और मिटने का कोई गम नहीं है लेकिन, उपलब्धि भी कुछ नहीं है। यह बात मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने कटनी के बहोरीबंद में धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कही।</p>
<p>उन्होंने कहा कि जब सामान्य दृष्टि हमारी बनती है तो व्यक्ति शून्य या निर्विकल्प हो जाता है लेकिन, यह निर्विकल्पता अकर्मण्यता कहलाती है। सब कुछ करने के बाद निर्विकल्प होना साधना कहलाती है। कुछ नहीं कर पाना और निर्विकल्प होना यह अकर्मण्यता कहलाती है। हाथ पर हाथ रखकर दो ही व्यक्ति बैठते हैं या तो जो कुछ कर नहीं पा रहा है या फिर जिसने सब कुछ कर लिया है। संसारी नहीं खाए तो कहते है कि खाने को नहीं है और परमार्थी जिंदगी भर नहीं खाए तो कहते है तपस्वी, उपवासी है। एक को मिला नहीं है और एक ने खाया नहीं है। साधु गरीब से भी गरीब हालात में जीता है तो भी वह तीन लोक में पूज्य परमेष्ठी और आदर्श होता है।</p>
<p><strong>ईमानदार व्यक्ति को परखना चाहिए</strong><br />
90 प्रतिशत जितने बच्चे सुसाइड करते हैं, माँ-बाप, परिवार के कारण करते हैं क्योंकि, वो कहते है कि हम असफल होकर वापस घर कैसे जाएंगे, सब ने बड़ी उम्मीद करके भेजा है और हम पास नहीं होंगे तो वह सुसाइड कर लेता है। इसलिए माता-पिताओं से कहना है कि बच्चों से इतनी ज्यादा अपेक्षाएं मत करो कि बच्चें को सुसाइड का भाव आ जाए, उसकी योग्यता समझो कितना वो कर सकता है।</p>
<p>धंधे पानी में यदि घाटा लग जाए तो तुम प्राण लेते हो, अरे नहीं कर पा रहा है तो क्या करें, हां, बेईमान होना अलग चीज है, ईमानदार व्यक्ति को परखना चाहिए। ईमानदार, असमर्थ, भाग्यहीन, अज्ञानी व्यक्ति को टॉर्चर नहीं। जो समर्थ होकर नहीं कर रहा है, उसे टॉर्चर करो। असमर्थ व्यक्ति को यदि टोकोगे तो तुम्हे हत्या का दोष लगेगा क्योंकि तुम पोलियो वाले से बार-बार कह रहे हो कि दिनभर घर पर पड़े रहते हो।</p>
<p><strong>सभी तीर्थंकर 46 मूलगुण मंडित होते हैं</strong></p>
<p>क्यों है एनर्जी पारसनाथ में, क्यों है वो संकटमोचक, उनके नाम, उनकी मूर्ति में वो एनर्जी है जो बाकी 23 तीर्थंकरों में नहीं है। सभी तीर्थंकर 46 मूलगुण मंडित होते हैं लेकिन, भक्तों ने पारसनाथ को क्यों महिमा मंडित किया, मात्र उन्होंने जिंदगी में एक विशेष काम किया था, जिस पर दुनिया कभी दया नहीं करती, जिसको देखकर दुनिया मारती है। उसे देखकर उन्होंने बचाने का भाव किया था। तीर्थंकर थे, राजकुमार थे, मनोरंजन के लिए जा रहे थे लेकिन, एक नाग-नागिन को जलते देखकर बचाने के लिए उतर गए, न बचा पाए लेकिन, बचाने का भाव तो किया, इसलिए जो व्यक्ति दुःखी है, परेशान है वे व्यक्ति पारसनाथ का नाम लेते है। इस प्रसंग से शिक्षा लो कि साथ उसका दो, जिसका कोई साथ नहीं देता। दया उस पर करो, जिस पर कोई दया नहीं करता, सहयोग उसका करो जिसका कोई सहयोग नहीं करता, किस्मत भी जिसका साथ नहीं दे रही हो उसका साथ दो, रोटी उसे खिलाओ, जिसके पास रोटी नहीं है।</p>
<p><strong>त्याग कर देने का नाम है साधु, साधना, त्यागी</strong><br />
दो व्यक्तियों को दान देना-एक वह जिन्होंने रोटी छोड़ दी है, एक वह जिनकी किस्मत में रोटी है नहीं। या तो अपना जीवन उनको समर्पित कर दो, जो तुमसे आगे है, पुण्यवान है, पवित्र है, जो पापों से मुक्त हो गए, वो खेती, व्यापार नहीं करना चाहते क्योंकि, उनको पाप नजर आ रहा है। सारे पाप कर सकता है व्यक्ति फिर भी त्याग कर देने का नाम है साधु, साधना, त्यागी। असमर्थ या पलायनवादी का नाम नहीं है, पाप नहीं कर पाया तो पाप छोड़ दिए। किनको छाया देना है जो जगत को छाया देने वाला है। जगत को छाया देने वाले को जो छाया देता है वो छत्ता नहीं, छत्र कहलाता है। जो स्वयं छाया से रहित हो गए, ऐसे व्यक्ति को छाया दे देना, जाओ सारी दुनिया तुम्हें मिटाने आएगी और तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होगा।</p>
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		<title>तुम गृहस्थ हो तो सारी क्रियाओं में अंतराल करना : कटनी में मुनिश्री के प्रवचनों से बह रही धर्म प्रभावना </title>
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		<pubDate>Sun, 16 Feb 2025 08:39:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचन जन उपकारकारी साबित हो रहे हैं। उनकी नित धर्मसभाओं में बड़ी संख्या में जैन श्रावक-श्राविकाएं शामिल होकर धर्म लाभ ले रही हैं। मुनिश्री के उपदेश और संदेश गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाते हुए धर्म के मार्ग पर ले जाने के लिए प्रेरक साबित हो रहे हैं। कटनी से पढ़िए राजीव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचन जन उपकारकारी साबित हो रहे हैं। उनकी नित धर्मसभाओं में बड़ी संख्या में जैन श्रावक-श्राविकाएं शामिल होकर धर्म लाभ ले रही हैं। मुनिश्री के उपदेश और संदेश गृहस्थ जीवन को सुखमय बनाते हुए धर्म के मार्ग पर ले जाने के लिए प्रेरक साबित हो रहे हैं। <span style="color: #ff0000">कटनी से पढ़िए राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कटनी।</strong> मुनिश्री सुधा सागर जी महाराज ने कटनी में अपनी धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जो परमार्थ का मार्ग होता है वह निरंतर होता है, उसमें गैप नहीं होता। जब भी परमात्मा की उपलब्धि होती है, वह शाश्वत होती है। पर्याय तीन प्रकार की होते हैं- अनादि अनंत पर्याय, सादि शांत पर्याय और एक सादि अनंत पर्याय। तीन पर्यायों से यह संपूर्ण सृष्टि की व्यवस्था बनी हुई है। पर्याय की परिभाषा है-जो उत्पन्न हो और समाप्त हो लेकिन, एक पर्याय मात्र दुनिया में ऐसा है अभयत्व पर्याय, जो न उत्पन्न होता है और न मिटता है, निरन्तर बना रहता है और फिर भी पर्याय है। दूसरा भव्यत्व पर्याय जो अनादिकाल से कभी उत्पन्न तो नहीं हुआ लेकिन, नाश जरूर होगा। सादि अनंत पर्याय तो वह है जो परमार्थ रूप है, जिसे अपन सिद्धत्व कहते हैं, उत्पन्न तो होगा लेकिन, कभी सिद्धत्व का नाश नहीं होगा। अपन जिस जिंदगी में जी रहें, अपनी सारे पर्यायें सादि शांत हैं।</p>
<p><strong>अब बीच का रास्ता यह है अधर्म को सादि शांत पर्याय बनाओ</strong></p>
<p>यदि गृहस्थ ने अधर्म को निरंतर बना दिया कि निरंतर राग द्वेष, कषाएं करता है तो तुम पूर्णतः बर्बाद हो जाओगे। अपनी जिंदगी को पूरा पापमय मत बनाना। आंखों और कानों से राग द्वेष की बातें सुनकर ही संतुष्ट मत होना। ये शरीर दिन-रात आरंभ परिग्रह के कार्य में न जाए। अपने परिवार को भी संसार का साधन मत बनने देना। धन भी संसार के लिए मत कामना, जो कुछ भी करते हो उसको थोड़ा सा विराम देना। पूर्ण धर्मात्मा बन गए तो गृहस्थ नहीं रह पाओगे, मुनि बनना पड़ेगा और पूर्ण अधर्मी बन गए तो गृहस्थी बर्बाद हो जाएगी। अब बीच का रास्ता निकालते हैं अधर्म को सादि शांत पर्याय बनाओ। यदि बर्बाद नहीं होना है तो थोड़ा गैप करो, मन से थोड़ा अधर्म की बातें सोचना बंद करो, आंखों से पाप की बातें मत देखो, कहो भी मत। नियम लो हम 24 घंटे में एक घंटे, दो घंटे, तीन घंटे, या 10 मिनट मन में गलत विचार नहीं लाएंगे, संसार के संबंध में नहीं सोचेंगे और क्रोध, मान, माया, लोभ नहीं करेंगे।</p>
<p><strong>कानों से हम राग की बात नहीं सुनेंगे</strong></p>
<p>एक मिनट के लिए सही संकल्प करना है। इतने बजकर इतने मिनट में मैं अपने मन मे कोई सावद्य की बात नही सोचूंगा। 24 घंटे में हम राग की बात नहीं देखेंगे। जिसकों देखने के बाद राग जागता हो। कानों से हम राग की बात नहीं सुनेंगे। कुछ अंतराल करना है। मैं 24 घंटे में मुंह से कोई संसार की बात नहीं बोलूंगा- एक घंटे, आधे घंटे, 5 मिनिट। सम्यक दृष्टि जिंदगी भर के लिए कोई कषाय या पाप का त्याग नहीं कर देता है, बीच में गैप कर देता है। पाप का निषेध नहीं कर रहे, अष्टमी को मत करना। भोजन का निषेध नहीं कर रहे, रात में मत करना। सारी क्रियाओं में अंतराल कराना है। सवाल पाप को छोड़ने का नहीं है, सवाल पाप में गैप करने का है। एक दिन का गैप कर दो बस, वो गैप करने से वासना काल टूट गया, वासनाकाल टूटते ही जो अनंतानुबंधी कषाय निरंतर थी, उसमें टुकड़ा आ गया।</p>
<p><strong>न राग द्वेष होगा, होगा तो शुभोपयोग होगा </strong></p>
<p>क्यों देवदर्शन जरूरी बता दिया। मात्र आंख को गैप करना है, आंख 24 घंटे अशुभ, रागी द्वेषी वस्तुओं को देखती है, 10 मिनट के लिए मंदिर चला जा, इन आंखों से वीतराग मुद्रा देख ले, जिसको देखकर न राग है, न द्वेष। 10 मिनट सही हम वो बातें सुनेंगे जिन बातों में न आरंभ होगा, न राग द्वेष होगा, मात्र होगा तो शुभोपयोग होगा। क्या होता है पूजा करने से, जितनी देर पूजा बोलोगे उतनी देर वचन से सावद्य का गैप हो गया। इन पैरों से दिन भर संसार के कार्यों में घूमते रहते हो, 10 मिनट के लिए मंदिर चले जाओ, सावद्य-आरंभ में गैप हो गया। धन में गैप करो-मैं परोपकार और परमार्थ के लिए कमाऊंगा।</p>
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