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	<title>todaraisingh &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>todaraisingh &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी का जैन भवन में मंगल प्रवेश : माताजी ने कहा-नई प्रतिभावान पीढ़ी को सही दिशा दिखाना समाज का महत्वपूर्ण कर्तव्य  </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 12 Jan 2026 07:25:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ का रविवार को शहर के जैन भवन में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। प्रातः 9 बजे समाज बंधुओं ने बस्सी चौराहे पर आर्यिका संघ की अगवानी की। वहां से गाजे बाजे के साथ सकल जैन समाजजन नाचते-गाते प्रमुख मार्गों से होते हुए आर्यिका संघ को जैन भवन लाए। टोडारायसिंह से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ का रविवार को शहर के जैन भवन में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। प्रातः 9 बजे समाज बंधुओं ने बस्सी चौराहे पर आर्यिका संघ की अगवानी की। वहां से गाजे बाजे के साथ सकल जैन समाजजन नाचते-गाते प्रमुख मार्गों से होते हुए आर्यिका संघ को जैन भवन लाए। <span style="color: #ff0000">टोडारायसिंह से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>टोडारायसिंह।</strong> गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ससंघ का रविवार को शहर के जैन भवन में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। प्रातः 9 बजे समाज बंधुओं ने बस्सी चौराहे पर आर्यिका संघ की अगवानी की। वहां से गाजे बाजे के साथ सकल जैन समाजजन नाचते-गाते प्रमुख मार्गों से होते हुए आर्यिका संघ को जैन भवन लाए। इस दौरान जगह जगह भक्तों ने गुरु मां की आरती कर पाद प्रक्षालन कर आर्शीवाद लिया। जैन भवन के प्रवेश द्वार पर गुरु मां का 51 विशेष थाल सजाकर पाद प्रक्षालन किया। इस दौरान मंदिर परिसर भगवान के जयकारों से गुंज उठा। जैन समाज अध्यक्ष संतकुमार जैन और प्रवक्ता मुकुल जैन ने बताया कि इस मौके पर धर्मसभा हुई। कार्यक्रम की शुरूआत चित्र अनावरण से की गई। चित्र अनावरण अग्रवाल चौरासी समाज के नवनियुक्त अध्यक्ष अनिल मित्तल और सभी जैन मंदिरों के अध्यक्ष ने किया। इंदु मित्तल ने मंगलाचरण किया। आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि आजकल बेवकूफ बच्चे पैदा होना बंद हो गए हैं। नई प्रतिभावान पीढ़ी को सही दिशा दिखाना समाज का महत्वपूर्ण कर्तव्य है, नहीं तो इनकी प्रतिभा का उपयोग गलत हो जाएगा।</p>
<p><strong>जैन श्रावक को पिच्छी और कमंडल का उपासक होना चाहिए</strong></p>
<p>माताजी ने कहा कि समय के साथ सबकुछ बदल जाए लेकिन देव ,शास्त्र, गुरु की भक्ति मत बदलना। धर्म की अंगुली पकड़कर चलते रहेंगे तो जीवन धन्य हो जाएगा। यदि धर्म छूट गया तो जीवन में विपदाओं की बाढ़ आ जाएगी। उन्होंने टोडा में मंगल प्रवेश को वात्सल्य प्रवेश बताया। इस अवसर पर उन्होंने टोडा में स्वाध्याय शुरु करने के लिए महिला-पुरुषों की टीम का गठन किया। इस अवसर पर समाज अध्यक्ष संतकुमार जैन ने कहा कि टोडा के लोगों का सौभाग्य है कि आर्यिका माताजी का टोडा में आगमन हुआ है। एक जैन श्रावक को पिच्छी और कमंडल का उपासक होना चाहिए और हर जैन मुनि और आर्यिका संघ का प्रवेश-आहार-विहार पूरी भक्ति और श्रद्धा के साथ कराना चाहिए।</p>
<p><strong>मुनि-आर्यिका और श्रावक-श्राविका धर्म के चार पहिए</strong></p>
<p>आर्यिका श्री ने कहा कि जिस प्रकार एक रथ को चलाने के लिए चार पहियों की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार धर्मरूपी रथ को आगे बढ़ाने के लिए मुनि-आर्यिका और श्रावक-श्राविका रूपी चार पहियों की बहुत जरूरत है। अगर एक भी पहिया अपने दायित्व और कर्तव्य से पीछे हटा तो धर्म का पहिया वहीं रुक जाएगा। इस अवसर पर सकल जैन समाज के साथ पीपलू, केकड़ी, देवली,राजमहल, झिराना आदि जगह से सैकड़ों श्रावक उपस्थित रहे। संचालन पंडित संजीव कासलीवाल ने किया।</p>
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		<title>राजस्थान के जैन संत 17 भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी ने अमूल्य साहित्य का सृजन और संरक्षण किया:  राजस्थान की धरती पर बड़ी तादाद में रचा गया हिन्दी साहित्य </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Mar 2025 00:30:06 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजस्थान के संत]]></category>
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					<description><![CDATA[राजस्थान के जैन संतों में भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी का अलग ही स्थान है। इन्होंने अमूल्य साहित्य का सृजन किया और हिन्दी साहित्य का ग्रंथ संग्रहालय में संरक्षित भी करवाया। इनका पट्टााभिषेक सांगानेर में हुआ था। ये भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी के शिष्य थे। जो आमेर गादी के संस्थापक थे। जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>राजस्थान के जैन संतों में भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी का अलग ही स्थान है। इन्होंने अमूल्य साहित्य का सृजन किया और हिन्दी साहित्य का ग्रंथ संग्रहालय में संरक्षित भी करवाया। इनका पट्टााभिषेक सांगानेर में हुआ था। ये भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी के शिष्य थे। जो आमेर गादी के संस्थापक थे। <span style="color: #ff0000">जैन धर्म के राजस्थान के दिगंबर जैन संतों पर एक विशेष शृंखला में 17वीं कड़ी में श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल का भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी के बारे में पढ़िए विशेष लेख…..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> राजस्थान के जैन संतों में भट्टारक नरेंद्रकीर्ति जी का अलग ही स्थान है। इन्होंने अमूल्य साहित्य का सृजन किया और हिन्दी साहित्य का ग्रंथ संग्रहालय में संरक्षित भी करवाया। भट्टारकों की पंक्ति के वे अपने समय के उत्कृष्ट विद्वान थे। पंथवादी होने के कारण इनका विरोध भी खूब हुआ, लेकिन धर्म, संस्कृति और जनजागरण में कमी नहीं आई। नरेंद्रकीर्तिजी अपने समय के विद्वान भट्टारक थे। ये शुद्ध बीस पंथ को मानने वाले थे। ये खंडेलवाल श्रावक थे और सौगाणी इनका गौत्र था। एक भट्टारक पट्टावली के अनुसार नरेंद्रकीर्ति जी संवत 1691 में भट्टारक बने थे। इनका पट्टााभिषेक सांगानेर में हुआ था। इसकी पुष्टि बख्तराम साह ने अपने बुद्धि विलास में की है। ये भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी के शिष्य थे। जो आमेर गादी के संस्थापक थे। संपूर्ण राजस्थान में ये प्रभावशाली थे। मालवा, मेवात तथा दिल्ली आदि के प्रदेशों में इनके भक्त रहते थे और जब वे जाते तब उनका खूब स्वागत किया जाता।</p>
<p>दिगंबर जैन समाज के प्रसिद्ध तेरह पंथ की उत्पत्ति भी इन्हीं के समय में हुई थी। यह पंथ सुधारवादी था और इसके द्वारा अनेक कुरीतियों का जोरदार विरोध किया गया था। नरेंद्रकीर्ति का अपने समय में ही विरोध होने लगा था और इनकी मान्यताओं का विरोध करने के लिए कुछ समाज सुधारकों ने तेरहपंथ नाम के पंथ को जन्म दिया, लेकिन विरोध होते हुए भी नरेंद्रकीर्ति अपने मिशन के पक्के थे और जगह-जगह घूमकर साहित्य और संस्कृति का प्रचार किया करते थे। यह अवश्य था कि ये संत अपने आध्यात्मिक उत्थान की ओर कम ध्यान देने लगे थे तथा लौकिक रूढि़यों में फंसते जा रहे थे। इसलिए इनका धीरे-धीरे विरोध बढ़ रहा था। जिसने महापंडित टोडरमल के समय उग्र रूप धारण कर लिया और इन संतों के महत्व को ही सदा के लिए खत्म कर दिया।<br />
स्तोत्रों की हिन्दी गद्य टीका करने वाले ‘अखयराज’ इनके ही शिष्य नरेंद्र कीर्ति जी ने अपने समय में आमेर के प्रसिद्ध भट्टारकीय शास्त्र भंडार को सुरक्षित रखा और उसमें नई-नई प्रतियां लिखवाकर विराजमान करवाई। संवत 1722 तक ये भट्टारक रहे और इसी वर्ष महापंडित आशाधर कृत प्रतिष्ठा पाठ की एक हस्त लिखित प्रति इनके शिष्य आचार्य चंद्रकीर्ति, घासीराम, पंडित भीवसी एवं मयाचंद के पठनार्थ भेंट की गई। कितने ही स्तोत्रों की हिन्दी गद्य टीका करने वाले अखयराज इन्हीं के शिष्य थे। संवत 1717 में संस्कृत मंजरी की प्रति इन्हें भेंट की गई थी। टोडारायसिंह के प्रसिद्ध पंडित कवि जगन्नाथ इन्हीं के शिष्य थे।</p>
<p><strong>लोग शास्त्रों के अभ्यास अपने ज्ञान की वृद्धि के लिए करते थे</strong></p>
<p>पंडित परमानंद ने नरेंद्रकीर्ति के विषय में लिखते हुए कहा कि इनके समय में टोडारायसिंह में संस्कृत पठन-पाठन का अच्छा कार्य चलता था। लोग शास्त्रों के अभ्यास द्वारा अपने ज्ञान की वृद्धि करते थे। यहां शास्त्रों का भी अच्छा संग्रह था। लोगों को जैन धर्म से विशेष प्रेम था। अष्ट सहस्त्री और प्रमाण निर्णय आदि न्याय ग्रंथों का लेखन, प्रवचन, पंचास्तिकाय आदि सिद्धांत ग्रंथों आदि का प्रति लेखन कार्य तथा अनेक नूतन ग्रंथों का निर्माण हुआ था। कवि जगन्नाथ ने श्वेतांबर पराजय में नरेंद्र कीर्ति का मंगलाचरण प्रस्तुत किया है। नरेंद्र कीर्ति ने कितनी ही प्रतिष्ठाओं का नेतृत्व भी किया। पांवापुर संवत 1700 गिरनार 1708 मालपुरा 1710 हस्तिनापुर 1716 में होने वाली प्रतिष्ठाएं इन्हीं की देखरेख में हुई थीं।</p>
<p><strong>आमेर, सांगानेर, चाटसू और टोडारायसिंह प्रमुख केंद्र बने</strong></p>
<p>17वीं शताब्दी में राजस्थान में आमेर राज्य का महत्व बढ़ रहा था। आमेर के शासकों का मुगल बादशाहों से घनिष्ठ संबंध के कारण यहां अपेक्षाकृत शांति थी। इसके अतिरिक्त आमेर शासन में भी जैन दीवानों का प्रमुख हाथ था। वहां जैनों की अच्छी बस्ती थी और पुरातत्व एवं कला की दृष्टि से भी आमेर एवं सांगानेर के मंदिर राजस्थान भर में प्रसिद्धि पा चुके थे। इसलिए देहली के भट्टारकों ने भी अपनी गादी को दिल्ली से आमेर स्थानांतरित करना उचित समझा और इसमें प्रमुख भाग लिया भट्टारक देवेंद्रकीर्ति जी ने। जिनका पट्टाभिषेक संवत 1662 में चाटसू में हुआ था। इसके बाद तो आमेर, सांगानेर, चाटसू और टोडारायसिंह आदि नगरों के प्रदेश इन भट्टारकों की गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बन गए।</p>
<p>18वीं शताब्दी से गृहस्थ भी साहित्य सृजन करने लगे</p>
<p>इन संतों की कृपा से यहां संस्कृत एवं हिन्दी ग्रंथों का पठन-पाठन ही प्रारंभ नहीं हुआ बल्कि इन भाषाओं में ग्रंथ रचना भी होने लगी और आमेर, सांगानेर, टोडारायसिंह और फिर जयपुर में विद्वानों की मानों एक कतार ही खड़ी हो गई। 17वीं शताब्दी में तक प्रायः सभी विद्वान संत हुआ करते थे, लेकिन 18वीं शताब्दी से गृहस्थ भी साहित्य सृजन करने लगे। अजयराज पाटणी, खुशालचंद काला, जोधराज गोदीका, दौलतराम कासलीवाल महा पंडित टोडरमल, जयचंद्र छाबड़ा जैसे विद्वानों को जन्म देने का गर्व इसी भूमि को है।</p>
<p>संतों की दूरदर्शिता से अमूल्य साहित्य नष्ट होने से बचा</p>
<p>आमेर शास्त्र भंडार जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ संग्रहालय की स्थापना एवं उसमें अपभ्रंश, संस्कृत एवं हिन्दी ग्रंथों की प्राचीनतम प्रतिलिपियों का संग्रह इन्हीं संतों की देन है। आमेर शास्त्र भंडार में अपभ्रंश का जो महत्वपूर्ण संग्रह है, वैसा संग्रह नागौर के भट्टारकीय शास्त्र भंडार को छोड़कर राजस्थान के किसी भी ग्रंथ संग्रहालय में नहीं है। वास्तव में इन्हीं संतों की दूरदर्शिता के कारण देश का अमूल्य साहित्य नष्ट होने से बच गया।</p>
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