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	<title>Tirthankar Rishabhdev श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>विशेष दान करने का महापर्व है अक्षय तृतीया: अक्षय तृतीया से शुरू हुई थी आहारदान की परंपरा </title>
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		<pubDate>Thu, 09 May 2024 23:30:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भारतीय संस्कृति में पर्व, त्याहारों और व्रतों का अपना एक अलग महत्त्व है। ये हमें हमारी सांस्कृतिक परंपरा से जहां जोड़ते हैं वहीं हमारे आत्मकल्याण में भी कार्यकारी होते हैं। अक्षय तृतीया का दिन अपने आप में कई गाथाओं को समेंटे हुए है। यह दिन अन्य दिनों से बहुत खास रहता है। अक्षय तृतीया पर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भारतीय संस्कृति में पर्व, त्याहारों और व्रतों का अपना एक अलग महत्त्व है। ये हमें हमारी सांस्कृतिक परंपरा से जहां जोड़ते हैं वहीं हमारे आत्मकल्याण में भी कार्यकारी होते हैं। अक्षय तृतीया का दिन अपने आप में कई गाथाओं को समेंटे हुए है। यह दिन अन्य दिनों से बहुत खास रहता है। अक्षय तृतीया पर पढि़ए डॉ. सुनील जैन ‘संचय’ का विशेष आलेख&#8230; </strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> भारतीय संस्कृति में पर्व, त्याहारों और व्रतों का अपना एक अलग महत्व है। ये हमें हमारी सांस्कृतिक परंपरा से जहां जोड़ते हैं वहीं हमारे आत्मकल्याण में भी कार्यकारी होते हैं। अक्षय तृतीया का दिन अपने आप में कई गाथाओं को समेंटे हुए है। यह दिन अन्य दिनों से बहुत खास रहता है।</p>
<p><strong>अक्षय फल मिलता है-</strong></p>
<p>अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किए जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैसे तो सभी बारह महीनों की शुक्ल पक्षीय तृतीया शुभ होती है, किंतु वैशाख माह की तिथि स्वयंसिद्ध मुहूर्तों में मानी गई है। हिन्दू परंपरा में अक्षय तृतीया का अत्यधिक महत्त्व है वहीं जैनधर्म में भी इसका खास महत्त्व है। इस दिन जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव (आदिनाथ ) ने राजा श्रेयांस के यहां इक्षु रस का आहार लिया था, जिस दिन तीर्थंकर ऋषभदेव का आहार हुआ था। उस दिन वैशाख शुक्ला तृतीया थी। उस दिन राजा श्रेयांस के यहां भोजन, अक्षीण (कभी खत्म न होने वाला ) हो गया था। अत: आज भी श्रद्धालु इसे अक्षय तृतीया कहते हैं।</p>
<p><strong>दान की परंपरा की शुरुआत-</strong></p>
<p>जैन परम्परा के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन ही दान की परंपरा की शुरुआत हुई थी। जैन परंपरा में इस पर्व का बड़ा महत्त्व है। इसी कारण इसे विशेष श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। जैनधर्म में दान का प्रवर्तन इसी तिथि से माना जाता है, क्योंकि इससे पूर्व दान की विधि किसी को मालूम नहीं थी। अत: अक्षय तृतीया के इस पावन पर्व को देश भर के जैन श्रद्धालु हर्षोल्लास व अपूर्व श्रद्धा भक्ति से मनाते हैं। इस दिन श्रद्धालुजन व्रत-उपवास रखते हैं। विशेष पूजा-अर्चना करते हैं तथा दानादि प्रमुख रूप से देते हैं। जहां से इस परंपरा की शुरुआत हुई ऐसे हस्तिनापुर में भी इस दिन विशाल आयोजन किए जाने की परंपरा है। इस दिन श्रद्धालु व्रत, उपवास रखकर इस पर्व के प्रति अपनी प्रगाढ़ आस्था दिखाते हैं। दान सुपात्र को ही करना चाहिए। शास्त्रों में बताया गया है कि अक्षय तृतीया के पावन दिन दान करने से बहुत अधिक महत्त्व होता है। दान करने का फल कई गुना अधिक मिलता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन से प्रारम्भ किए गए कार्य अथवा इस दिन को किए गए दान का कभी भी क्षय नहीं होता।</p>
<p>‘अस्यां तिथौ क्षयमुर्पति हुतं न दत्तं।</p>
<p>तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया॥</p>
<p>उद्दिष्य दैवतपितृन्क्रियते मनुष्यै:।</p>
<p>तत् च अक्षयं भवति भारत सर्वमेव॥’</p>
<p><strong>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया मनाए जाने का कथानक &#8211;</strong></p>
<p>जैन परंपरा में अक्षय तृतीया मनाए जाने का जैन शास्त्रों में वर्णन किया गया है। जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में विजयार्ध पर्वत से दक्षिण की ओर मध्य आर्यखण्ड में कुलकरों में अंतिम कुलकर नाभिराज हुए। उनके मरूदेवी नाम की पट्टरानी थी। रानी के गर्भ में जब जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव आए। तब गर्भकल्याणक उत्सव देवों ने बड़े ठाठ से मनाया और जन्म होने पर जन्म कल्याणक मनाया। फिर दीक्षा कल्याणक होने के बाद ऋषभदेव ने छ:माह तक घोर तपस्या की। छ: माह के बाद चर्या (आहार) विधि के लिए ऋषभदेव भगवान ने अनेक ग्राम नगर, शहर में पदविहार किया, किन्तु जनता व राजा लोगों को आहार की विधि मालूम न होने के कारण भगवान को धन, कन्या, पैसा, सवारी आदि अनेक वस्तु भेंट की। भगवान ने यह सब अंतराय का कारण जानकर पुन: वन में पहुंच छ:माह की तपश्चरण योग धारण कर लिया। अवधि पूर्ण होने के बाद पारणा करने के लिए चर्या मार्ग से ईर्यापथ शुद्धि करते हुए ग्राम, नगर में भ्रमण करते-करते कुरूजांगल नामक देश में पधारे। वहां हस्तिनापुर में कुरूवंश के शिरोमणि महाराज सोम राज्य करते थे। उनके श्रेयांस नाम का एक भाई था उसने सर्वार्थसिद्धि नामक स्थान से चयकर यहां जन्म लिया था। एक दिन रात्रि के समय सोते हुए उसे रात्रि के आखिरी भाग में कुछ स्वप्न आए। उन स्वप्नों में मंदिर, कल्पवृक्ष, सिंह, वृषभ, चंद्र, सूर्य, समुद्र, आग, मंगल द्रव्य यह अपने राजमहल के समक्ष स्थित हैं ऐसा उस स्वप्न में देखा तदनंतर प्रभात बेला में उठकर उक्त स्वप्न अपने जेष्ठ भ्राता से कहे, तब ज्येष्ठ भ्राता सोमप्रभ ने अपने विद्वान पुरोहित को बुलाकर स्वप्नों का फल पूछा। पुरोहित ने जबाव दिया- हे राजन! आपके घर श्री ऋषभदेव भगवान पारणा के लिए पधारेंगे, इससे सबको आनंद हुआ। इधर भगवान ऋषभदेव आहार (भोजन) हेतु ईर्या समितिपूर्वक भ्रमण करते हुए उस नगर के राजमहल के सामने पधारे तब सिद्धार्थ नाम का कल्पवृक्ष की मानो अपने सामने आया है, ऐसा सबको भास हुआ। राजा श्रेयांस को भगवान ऋषभदेव का श्रीमुख देखते ही उसी क्षण अपने पूर्वभव में श्रीमती वज्रसंघ की अवस्था में एक सरोवर के किनारे दो चारण मुनियों को आहार दिया था-उसका जाति स्मरण हो गया। अत: आहारदान की समस्त विधि जानकर श्री ऋषभदेव भगवान को तीन प्रदक्षिणा देकर पडग़ाहन किया व भोजन गृह में ले गए।</p>
<p><strong>‘प्रथम दान विधि कर्ता’ </strong></p>
<p>ऐसा वह दाता श्रेयांस राजा और उनकी धर्मपत्नी सुमतीदेवी व ज्येष्ठ बंधु सोमप्रभ राजा अपनी लक्ष्मीपती आदि ने मिलकर श्री भगवान ऋषभदेव को सुवर्ण कलशों द्वारा तीन खण्डी (बंगाली तोल) इक्षुरस (गन्ना का रस) तो अंजुल में होकर निकल गया और दो खण्डी रस पेट में गया। इस प्रकार भगवान ऋषभदेव की आहारचर्या निरन्तराय संपन्न हुई। इस कारण उसी वक्त स्वर्ग के देवों ने अत्यंत हर्षित होकर पंचाश्चर्य (रत्नवृष्टि, गंधोदक वृष्टि, देव दुदभि, बाजों का बजना व जय-जयकार शब्द होना) वृष्टि हुई और सभी ने मिलकर अत्यंत प्रसन्नता मनाई। आहारचर्या करके वापस जाते हुए ऋषभदेव भगवान ने सब दाताओं को ‘अक्षय दानस्तु’ अर्थात् दान इसी प्रकार कायम रहे, इस आशय का आशीर्वाद दिया, यह आहार वैशाख सुदी तीज को सम्पन्न हुआ था।</p>
<p>जब ऋषभदेव निरंतराय आहार करके वापस विहार कर गए उसी समय से अक्षय तीज नाम का पुण्य दिवस (जैनधर्म के अनुसार) का शुभारंभ हुआ। इसको आखा तीज भी कहते हैं।</p>
<p><strong>अक्षय तृतीया व्रत, विधि एवं मंत्र-</strong></p>
<p>यह व्रत जैन परम्परा के अनुसार वैशाख सुदी तीज से प्रारम्भ होता है। उस दिन शुद्धतापूर्वक एकाशन (एक समय शुद्ध भोजन ) करें या 2 उपवास या 3 एकाशन करें।</p>
<p>इसकी विधि यह है कि व्रत की अवधि में प्रात: नैत्यिक क्रिया से निवृत्त होकर शुद्ध भावों से भगवान की दर्शन, स्तुति करें। पश्चात् भगवान ऋषभदेव की प्रतिमा का अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजा भगवान आदि तीर्थंकर (ऋषभदेव) की पूजा एवं पंचकल्याणक का मण्डल जी मंडवाकर मण्डल जी की पूजा करें। तीनों काल (प्रात:, मध्यान्ह, सांय) निम्नलिखित मंत्र जाप्य करें एवं सामायिक करें-</p>
<p><strong>मंत्र &#8211; ओम् ह्रीं श्रीं क्लीं अर्हं श्री आदिनाथतीर्थंकराय नम: स्वाहा।</strong></p>
<p>प्रात: सांय णमोकार मंत्र का शुद्धोच्चारण करते हुए जाप्य करें। व्रत के समय में गृहादि समस्त क्रियाओं से दूर रहकर स्वाध्याय, भजन, कीर्तन आदि में समय यापन करें। व्रत अवधि में ब्रह्राचर्य से रहें। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों का अणुव्रत रूप से त्याग करें। क्रोध, मान, माया, लोभ कषायों को शमन करें।</p>
<p>व्रत पूर्ण होने पर यथाशक्ति उद्यापन करें। मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका चतुर्विध संघ को चार प्रकार का दान देवें। इस प्रकार शुद्धतापूर्वक विधिवत रूप से व्रत करने से सर्व सुख की प्राप्ति होती है तथा साथ ही क्रम से अक्षय सुख अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।</p>
<p>आरोग्य जीवन बिताने के लिए भी यह उपयोगी है। संयम जीवनयापन करने के लिए इस प्रकार की धार्मिक क्रिया करने से मन को शान्त, विचारों में शुद्धता, धार्मिक प्रवृत्रियों में रुचि और कर्मों को काटने में सहयोग मिलता है।</p>
<p><strong>अमिट हो गयी हस्तिनापुर की पहचान &#8211;</strong></p>
<p>बैसाख माह की शुदि तृतीय का जैन धर्म में विशेष महत्त्व है। हस्तिनापुर का इस तिथि से विशेष संबंध है। अक्षय तृतीया के दिन जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने निराहार तपस्या के बाद प्रथम बार यहीं पर आहार ग्रहण किया था और उसी दिन से हस्तिनापुर की पहचान अमिट हो गई।</p>
<p><strong>धर्मतीर्थ और दानतीर्थ &#8211;</strong></p>
<p>भगवान ऋषभदेव धर्मतीर्थ के प्रवर्तक प्रथम तीर्थंकर थे तो राजा श्रेयांस दानतीर्थ के प्रवर्तक प्रथम दातार थे। इस हस्तिनापुर नगर से ही दानतीर्थ का प्रवर्तन हुआ। अत: यह नगर उसी समय से पुण्यभूमि बन गई है। भरतक्षेत्र में दान देने की प्रथा उस समय से प्रचलित हुई और दान देने की विधि भी राजकुमार श्रेयांस से ही प्रगट हुई। दान की इस विधि से भरत आदि राजाओं को और देवों को बड़ा आश्चर्य हुआ। देवों ने आकर बड़े आदर से राजा श्रेयांस की पूजा की। महाराज भरत ने भी श्रेयांस के मुख से सारी बातों को सुनकर परम प्रीति को प्राप्त किया और राजा सोमप्रभ तथा श्रेयांस कुमार का खूब सम्मान किया। इसी कारण इस अक्षय तृतीया का जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्त्व समझा जाता है।</p>
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