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	<title>Thermometer &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>हमें हमारे विचारों का थर्मामीटर मापना जरूरी: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी ने धर्म देशना में भक्तों को दिया मार्गदर्शन  </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 07:02:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी का यहां चातुर्मास चल रहा है। धर्मसभा में वे धर्म देशना दे रहे हैं। उन्होंने अपने प्रवचन में लेश्या के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि मन की अंतस चेतना में आने वाले भाव लेश्या है। यदि शुभ के भाव आते हैं तो वह शुभ लेश्या है। अशुभ के भाव आते है तो अशुभ लेश्या है। उन्होंने कहा कि हम अंतस चेतना से अपने बारे में सोचते हैं। दूसरे के बारे में नहीं, लौकिक जीवन कहता है कि दूसरे के बारे में भी सोचें यदि नहीं सोचते हैं तो नुकसान हमारा है। इसे स्वार्थ एवं अज्ञानता कह सकते हैं। हम बुद्धि लेकर आए है लेकिन, हम विद्या का प्रयोग करते हैं।</p>
<p>जीवन कंप्यूटर लैपटॉप गूगल नहीं है। जीवन में बुद्धि का प्रयोग जरूरी है। यदि हम बुद्धि का प्रयोग करेंगे तो अज्ञान का काम नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई समय नहीं है। जब हमारे अंतस चेतना में भाव उत्पन्न नहीं होते हैं। हम दुनिया का चक्कर लगा लेते हैं। हमारे पास कंट्रोल पावर नहीं है। हमारे शराब का त्याग है फिर भी हम उसके बारे में सोचते हैं, जो हमें पसंद नहीं, हम वह भी सोच लेते हैं। मन द्वारा हम कहीं भी पहुंच जाते हैं हमारे मन में कंट्रोल नहीं।</p>
<p><strong>आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हर चीज का माप होता है दूध आदि कोई भी पदार्थ हो सबका एक माप होता है। जैन दर्शन कहता है कि हमें हमारे विचारों और भावों को मापते रहना चाहिए, समझते रहना चाहिए। सार्थक तब होगा जब हम अपने आप को मापेंगे। हमने कभी अपने आप को मापा नहीं। हमें भी अपना थर्माेमीटर मापना चाहिए की हम कितने पॉजिटिव हैं कितने नेगेटिव है। कितने ज्ञानी है।अच्छा ज्ञानी धर्मात्मा होता है लेकिन हम होते नहीं। अपने आप को मापंे कि हम कितना पॉजिटिव कितना नेगेटिव है और कोशिश करें कि हम कितने सकारात्मक हो सकते हैं। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए आचार्यश्री ने कहा कि स्वाध्याय हमारा थर्मामीटर है। उसी से हम समीक्षा कर सकते हैं कि हम कितने सकारात्मक हैं। जैन दर्शन कहता है कि आपको अपनी बैलेंस शीट बनाना चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि व्यापार अर्जन की चीज है विसर्जन की नहीं। हम कितना पापों में सुधार कर सकते हैं। हम कितनी अपने को धार्मिकता दे सकते हैं। ऐसी वस्तुओं को क्या ग्रहण करना जो हमें खराब बनाती है।</p>
<p><strong>हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि कंट्रोल पावर सबके पास है इंद्रिय विषयों ग्रहण करें बिना जीवन नहीं चलता व्यक्ति अंतस चेतना में जो भाव करता है तो लेश्या उत्पन्न करता है। सोच लिया यह मेरा घर है यह मेरी चीज है तो यह अशुभ लेश्या है और मान लिया कि यह मेरा संयोग है तो यह शुभ लेश्या है। उन्होंने कहा हम आधुनिक भौतिकवादी स्टैंडर्ड हो गए हैं आधुनिकता दुर्गति कराती है। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि ऐसी आधुनिकता किस काम की जो जीवन यापन नहीं कर सके। ऐसी आधुनिकता किस काम की जो सही दिशा देने वाली नहीं है। हम बाहरी दुनिया के ढोल बजा रहे हैं और अच्छा बुरा भाव बना रहे हैं यदि हम माला जप रहे हैं तो माला जैसे भाव होना चाहिए।</p>
<p><strong>आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी</strong></p>
<p>उन्होंने दान के विषय में भी प्रकाश डाला यदि आवश्यकता से अधिक धन है तो दान देना जरूरी है। जीवन यापन के अतिरिक्त यदि धन संग्रह है तो दान करना चाहिए। धन की परिभाषा है कि धन जीवन यापन के लिए कमाना चाहिए। दान के लिए नहीं धन कमाओ तो यह नहीं सोचे कि मुझे दान करना है। यह भी नहीं सोचा कि जब कमाऊंगा तो दूंगा ऐसा भाव भी नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि खेल भावों का है क्रिया का नहीं। क्रिया सावधानी से होनी चाहिए की भाव की हानि ना हो इधर-उधर देखकर हम प्रमाद कर रहे हैं इससे शुभ भावों की हानि है। सावधानी रखनी चाहिए कि पानी पीएतो एक बूंद भी जमीन पर नहीं गिरना चाहिए यदि हम दुरुपयोग कर रहे हैं तो क्रिया और भावों में हानि है। उन्होंने कहा कि इतने भी बड़े मत हो की पापों में वृद्धि हो जाए हम हम इतने भी बड़े नहीं हो जाए की पुण्य की हानि हो जाए। धर्म सब कुछ करने के लिए तैयार है सावधानी रखो। भाव क्रिया व्यवस्थित हो भावों में हानि ना हो शुभ काम शुभ भाव शुभ लेश्या है अशुभ भाव है तो अशुभ लेश्या उत्पन्न होगी। उन्होंने कहा दिमाग काम करें लेकिन, समझ काम करनी चाहिए।</p>
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		<title>जब तक दुनिया में विश्वास है तभी तक धर्म है: मुनि श्री सुधासागर जी महाराज ने ज्ञान, नियम और संयम पर दी देशना </title>
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		<pubDate>Fri, 23 May 2025 16:50:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने विहार के दौरान कई नगरों और कस्बों में प्रवचन के माध्यम से धर्म जागरण का महती कार्य किया है। जैन धर्मानुयायियों को उन्होंने जीवन-दर्शन, आध्यात्म के गूढ़ रहस्यों और भक्ति भावना को प्रबल बनाने का संदेश दिया है। शुक्रवार को भी उन्होंने जबलपुर क्षेत्र में धर्मसभा की है। जबलपुर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपने विहार के दौरान कई नगरों और कस्बों में प्रवचन के माध्यम से धर्म जागरण का महती कार्य किया है। जैन धर्मानुयायियों को उन्होंने जीवन-दर्शन, आध्यात्म के गूढ़ रहस्यों और भक्ति भावना को प्रबल बनाने का संदेश दिया है। शुक्रवार को भी उन्होंने जबलपुर क्षेत्र में धर्मसभा की है। <span style="color: #ff0000">जबलपुर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जबलपुर।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने अपनी धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि कंगाल और बर्बाद होने के तरीके बहुत है, एक छोटी सी बुराई आ जाती है तो कितना ही बड़ा आदमी क्यों न हो, वह कंगाल हो जाता है। पूरी जिंदगी भर का किया हुआ पुण्य एक क्षण में विनाश हो सकता है, स्वयं की कमी के द्वारा। हमें कुछ पाना नहीं है, कुछ खोना है। हमने सफाई का ज्ञान किया, मैल का ज्ञान नहीं किया। हमने अच्छाइयों का ज्ञान किया, गंदगी का ज्ञान नहीं किया। हमने धर्म का ज्ञान किया, अधर्म का ज्ञान नहीं किया। तुम पाप करो या न करो, पाप का ज्ञान होना चाहिए। कितना भी धन कमा लेना, कितना भी अच्छा मकान बना लेना, तुम्हें चोर कला आना चाहिए- चोर कहा कहा से घुस सकता है, तभी तो ताला लगाओगे। जिनसेन स्वामी ने कहा- तुम धर्मात्मा बनना चाहते हो तो जल्दी धर्म की कलास में भर्ती न हो, पहले अधर्म समझों। एक शराबी शराब पी सकता है लेकिन वह शराब को जानता हो, ये कोई नियम नहीं, हमने अनादि काल से पाप किए हैं इसमें कोई संदेह नहीं है लेकिन कभी हमने पाप को समझने का प्रयास ही नहीं किया।</p>
<p><strong>हल्दी में इतनी बड़ी ताकत </strong></p>
<p>विश्वास पर पूरा संसार चल रहा है, पिता ने कह दिया कि तू मेरा बेटा है और माँ ने कह दिया कि ये तेरे पिता है बात खत्म। बस इतना सा थर्मामीटर दिया कि तकलीफ तुम्हें होती हो और आंसू माँ को आ जाये, समझ लेना यही असली माँ है। फैल तुम हुये हो और चेहरा पिता का उतर जाए, समझ लेना असली पिता है। खुशी तुम्हें मिली है और माँ-बाप मिठाई बांट रहे हैं, आनंद से झूम रहे हैं, बस असली माँ-बाप हैं। जब तक दुनिया में विश्वास है तभी तक धर्म है तभी तक अच्छाई है, तभी तक इस पृथ्वी में हरियाली है। अकेली बिटिया को पराए घर में भेज रहे हैं, कोई रजिस्ट्री नहीं, मात्र बीच में क्या था? दोनों हाथों के बीच में हल्दी साक्षी थी, हल्दी में इतनी बड़ी ताकत कि जिंदगी भर दोनों साथ निभाते हैं। तुम हमारी हो और हम तुम्हारे हैं बस इतने वचन से जिंदगी बड़े आराम से निकल रही है और रजिस्ट्री वाले फैल है। कोर्ट मैरिज वालों में 50ः से ऊपर उनके डायवोर्स होते है, डायवोर्स न हो तो जिंदगी में सुख तो होता ही नहीं।</p>
<p><strong>मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगा। जिससे राष्ट्र बदनाम हो</strong></p>
<p>तुम बलिदान दो अपने मन का, कहो कि हे भगवन! ये मन मुझे मिला है आपकी बात पर विचार करने का, आपके संबंध में ध्यान करने का, अच्छी बातें सोचने के लिए मन मिला है। मन मिला ही इसलिए था तुम बहुत अच्छे इंसान थे, तुम 24 घंटे धर्मध्यान करते थे, इसलिए कर्म ने कहा कि यह कभी बुरा नहीं विचारता, बुरा नहीं सोचता, ये सदा अच्छा सोचता है, परोपकार व भगवान के सम्बंध में सोचता है, कर्म ने कहा इसको अच्छा मन दे दो। तुम्हें भारत देश में इसलिए मिला होगा कि कभी तुमने संकल्प किया होगा- मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगा। जिससे राष्ट्र बदनाम हो जाए क्योंकि राष्ट्र मुझे प्राणों से प्यारा है, ये संकल्प करते समय तुम्हारा मरण हुआ है, कर्म ने कहा कि इतना बड़ा संकल्प कर रहा है इसलिए उसने तुम्हे भारत में जन्म दे दिया और तुम भारत को छोड़ने पर उतारू हो, थोड़ी से लोभ में तुम भारत के विरुद्ध कार्य करने को तैयार हो, तुम भारत में रहकर विदेशी कंपनियों को सहारा दे रहे हो, यह सब तुम्हारे विरोध है। आज तुम्हें मम्मी के हाथ का भोजन बुरा लगता है, विदेशी वस्तुये अच्छी लगती है।</p>
<p><strong>जिनवाणी में लिखा है इसलिए, तुम्हें जैनकुल मिला </strong></p>
<p>तुमने कितनी संकल्प किए होंगे तब जाकर के तुम्हें जैन जाति मिली, पूर्वभव में मरते समय भाव आया होगा कि हे भगवन! मुझे उच्च कुल मिल जाए, मैं वायदा करता हूँ मैं कभी कुल को कलंकित नहीं करूंगा, कुल के विरुद्ध कार्य नहीं करूंगा, जो हमारे कुल की परंपराएं हैं उनका निर्वाह करूंगा, यह वचन तुम्हारा था जिनवाणी में लिखा है इसलिए तुम्हें जैनकुल मिल गया। ये लक्ष्मी ऐसे ही नहीं मिल गयी, जरूर तुमने मरते समय कहा होगा कि मैं एक पैसे का भी दुरुपयोग नहीं करूंगा, मैं कोई व्यसन नहीं करूंगा, बस एक बार मुझे इस गरीबी से ऊपर उठा लो, इसलिए तुम्हे धन मिला। जितने गरीब हैं यह सब कल अमीर थे, बस उन्होंने धन के माध्यम से खूब अय्याशी की, अत्याचार किये, भोगविलासता की, तब लक्ष्मी ने अभिशाप दिया- मुझे सारी दुनिया चाहती है और तेरे पास आने से तू मुझसे पाप-व्यसन कर रहा है, जा एक एक कोड़ी को तरसेगा। दुनिया तुम्हे बद्दुआ दे देगी, उसके उपाय हैं लेकिन तुम्हारा पुण्य तुम्हें अभिशाप न दे दे।</p>
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