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	<title>Swastishri Charukirti Bhattaraka Mahaswamiji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>जगद्गुरु स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक महा स्वामी जी का 55वां दीक्षा दिवस : एक जीवन जो समाज को नई दिशा दे गया </title>
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		<pubDate>Fri, 13 Dec 2024 00:30:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक महा स्वामी जी का जीवन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की उनकी अद्वितीय सोच से भी प्रेरणादायक है। उन्होंने न केवल अपने अनुयायियों को धर्म की राह दिखाई, बल्कि समाज के लिए एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जिसे हमेशा याद किया जाएगा। स्वामी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक महा स्वामी जी का जीवन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने की उनकी अद्वितीय सोच से भी प्रेरणादायक है। उन्होंने न केवल अपने अनुयायियों को धर्म की राह दिखाई, बल्कि समाज के लिए एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत किया, जिसे हमेशा याद किया जाएगा। स्वामी जी का जीवन हमेशा से प्रेरणा का स्रोत रहा है। उन्होंने हमेशा धर्म, समाज और मानवता के उच्च आदर्शों को स्थापित करने का कार्य किया। उनका जीवन सत्य, अहिंसा, और प्रेम के सिद्धांतों से प्रेरित था। उनका विश्वास था कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए। <span style="color: #ff0000">उनके 55वें दीक्षा दिवस पर जानते हैं उनके बारे में&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>जगद्गुरु  कर्मयोगी स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक महा स्वामी जी, जिनके नाम से हर कोई उन्हें जानता है, आज उनका 55वां दीक्षा दिवस है। वह आज हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें और उनके द्वारा दिया गया मार्गदर्शन हमारे बीच हमेशा जीवित हैं। स्वामी जी ने समाज को जो दिशा दी, वह आज भी हमारे जीवन में प्रासंगिक है। उनके द्वारा किए गए कार्य और उनके सिद्धांत आज भी हमारे बीच हैं और हमें प्रेरित करते हैं। आज हम उनके बारे में कुछ महत्वपूर्ण बातें जानेंगे, जो हमें यह एहसास दिलाएंगी कि उन्होंने अपने जीवन में धर्म और समाज के लिए जो कार्य किए, वे हम सभी के लिए अत्यंत उपकारी हैं। ऐसे उपकारी महापुरुष को याद करना और उनके योगदान को समझना हमारा कर्तव्य है।.</p>
<p><iframe title="जैन संस्कृति 1। स्वस्ति श्री चारुकीर्ति भट्टारक महा स्वामी जी :धर्म, समाज और सेवा का प्रतीक एक जीवन" width="1320" height="743" src="https://www.youtube.com/embed/OQCqlki4cQ0?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></p>
<p><strong>आइए, आज हम उनके जीवन और कार्यों पर एक नजर डालते हैं।</strong></p>
<p>-1 मई 1949 को वारंग (कर्नाटक) में जन्म</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-12 दिसंबर 1979 को दीक्षा हुई</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-19 अप्रैल 1970 को पट्टाभिषेक हुआ</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-वर्तमान में स्वामी जी के 10 शिष्य भट्टारक है</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-1988 में इंग्लैंड में 7 फीट ऊंची भगवान बाहुबली की प्रतिमा स्थापित करवाई</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-धवला आदि 40 महाग्रंथों का कन्नड़ अनुवाद करवाया</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-1997 से गाड़ी उपयोग नहीं की</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-2001 से फोन का उपयोग नहीं किया</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-श्रवणबेलगोला में 1981, 1993, 2006, 2018 में महामस्तकाभिषेक करवाए</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-भट्टारक परम्परा को पुनः जीवंत किया</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-1981 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कर्मयोगी की उपाधि दी थी</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-2017 में कर्नाटक सरकार ने स्वामी जी को महावीर शांति पुरस्कार दिया</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-बाहुबली पॉलिटेक्निक कॉलेज, बाहुबली इंजीनियरिंग कॉलेज, अंबिका प्री प्राइमरी एवं प्राइमरी हाई स्कूल, अंबिका इंग्लिश मीडियम स्कूल सहित अनेक शिक्षा संस्थाएं स्थापित की</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-बाहुबली शिशु अस्पताल की स्थापना 2006 में हुई</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-जन मंगल कलश का पुरे भारत में भ्रमण 1981 में करवाया</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-100 बेड के अस्पताल का शुभारंभ 2018 में करवाया था</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-त्यागियों के प्रति, विद्वानों व मां जिनवाणी के प्रति अटूट श्रद्धा, विश्वास, आस्था और समर्पण था</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-कभी भी वह किसी विवाद में नहीं रहे।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-उन्होंने हमेशा जब दूसरों को मार्गदर्शन दिया तो उनके मार्गदर्शन में जैन संस्कार, संस्कृति, इतिहास को सुरक्षित रखने की बात कही गई।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-आज वो हमारे बीच में नहीं है लेकिन उनकी यादें उनकी स्मृतियां हमारे बीच में है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-श्रवणबेलगोला के 40 मंदिरों का और आस पास के कई मंदिरों का जीर्णोद्धार जो उन्होंने करवाया है वह सब देखने लायक है</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&#8211; गुरुकुल की स्थापना भी की</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>स्वामी जी के शिष्य</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-परम पूज्य कारकल मठ के स्वस्तिश्री ललितकीर्ति भट्टारक स्वामी</p>
<p>-परम पूज्य कनकगिरी जैन मठ के स्वस्तिश्री भुवनकीर्ति भट्टारक स्वामी</p>
<p>-कम्ब्दहल्ली जैन मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री भानुकीर्ति भट्टारक स्वामी</p>
<p>-अर्हतगिरि जैन मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री धवलकीर्ति भट्टारक स्वामी</p>
<p>&#8211; मूडबद्री जैन मठ के वर्तमान परम पूज्य स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी</p>
<p>-हुमचा पद्मावती जैन मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री देवेन्द्रकीर्ति भट्टारक (धर्मकीर्ति) स्वामी</p>
<p>-नरसिंहराजपुर (ज्वालामालिणी) मठ के परम पूज्य लक्ष्मीसेन भट्टारक स्वामी जी</p>
<p>&#8211; सौन्दा मठ के परम पूज्य स्वस्तिश्री भट्टाकलंक भट्टारक स्वामी जी</p>
<p>-अरतिपुर के स्वस्ति श्री सिद्धांतकीर्ति भट्टारक स्वामी जी</p>
<p>-श्रवणबेलगोला मठ के अभिनव स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>स्वामी जी के नेतृत्व में अनेक स्कूल व विभिन्न कॉलेजों की स्थापना हुई, इनमें से प्रमुख हैं&#8230;</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-अंबिका प्री प्राइमरी एवं प्राइमरी हाई स्कूल, स्थापना 1982 में</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-अंबिका इंग्लिश मीडियम स्कूल, स्थापना वर्ष 2001 में</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-अम्बिका पूर्व माध्यमिक स्कूल</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-श्रीमती श्रीयालम्मा नेमीराजय्या हाईस्कूल, स्थापना 1990 में</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-श्रेयालम्मा नेमीराजय्या प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज, स्थापना जुलाई, 1995 में</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-श्री बाहुबली पॉलिटेक्नीक कॉलेज</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-श्री बाहुबली इंजीनियरिंग कॉलेज, स्थापना 1997 में</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>-बाहुबली स्कूल ऑफ नर्सिंग, स्थापना वर्ष 2001 में</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>&#8211; लौकिक शिक्षा के साथ जैन धर्म, प्राकृत भाषा आदि का ज्ञान कराने के लिए श्रुतकेवली एज्युकेशन ट्रस्ट की स्थापना, इसके अंतर्गत गोम्मटेश्वरम् विद्यापीठ ब्रह्मचर्य आश्रम खोला गया।</p>
<p>-नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्राकृत एवं रिसर्च सेंटर</p>
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		<title>आत्मचिंतन से शाश्वत प्रेरणा तक स्वामी जी का संदेश : अक्षर कलश और बाहुबली की प्रतिमा है आध्यात्मिक विचारों और संस्कृति का संगम </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Dec 2024 00:30:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हमारे जीवन में स्वाध्याय और आत्मचिंतन (अक्षर कलश) को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में जब हम भौतिकता के दौर में जी रहे हैं, आत्मिक शांति और ज्ञान की खोज के लिए हमें समय निकालना चाहिए। परम पूज्य जगतगुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी ने इस बात पर जोर दिया कि केवल [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>हमारे जीवन में स्वाध्याय और आत्मचिंतन (अक्षर कलश) को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में जब हम भौतिकता के दौर में जी रहे हैं, आत्मिक शांति और ज्ञान की खोज के लिए हमें समय निकालना चाहिए। परम पूज्य जगतगुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी ने इस बात पर जोर दिया कि केवल पूजा या परिवारिक जिम्मेदारियों से नहीं, बल्कि अक्षर कलश के माध्यम से ही हम अपने जीवन को सही दिशा दे सकते हैं और जैन परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित रख सकते हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए संपादक रेखा संजय जैन की विशेष रिपोर्ट&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> वर्ष 2006 के महामतकाभिषेक के दौरान परम पूज्य जगतगुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक महास्वामी जी ने श्रवणबेलगोला में भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा और अक्षर कलश के बीच गहरे संबंध का उल्लेख किया था। स्वामी जी के इस बयान ने उपस्थित विद्वानों और भक्तों को आत्मचिंतन करने के लिए प्रेरित किया और इस प्राचीन अवधारणा के बारे में गंभीरता से सोचने का मौका दिया।</p>
<p><iframe title="Evening bulletin 41।अक्षर कलश से श्रवणबेलगोला के भगवान बाहुबली की प्रतिमा का निर्माण ।" width="1320" height="743" src="https://www.youtube.com/embed/GnR3cdPheoc?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen></iframe></p>
<p><strong>अक्षर कलश का अर्थ: आत्मचिंतन का मार्ग</strong></p>
<p>स्वामी जी ने अपने भाषण में अक्षर कलश के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय (आध्यात्मिक अध्ययन) और आत्मविचार (आत्मचिंतन) ही वास्तविक अक्षर कलश हैं। अक्षर शब्द का अर्थ &#8216;अक्षय&#8217; या &#8216;अमर&#8217; है, और यह उस ज्ञान और शांति की ओर इशारा करता है, जो आत्मा को शाश्वत सत्य से जोड़ता है। स्वामी जी ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति अक्षर कलश करता है, वह &#8216;सरस्वती पुत्र&#8217; के समान होता है और ज्ञान की ओर अग्रसर होता है।</p>
<p><strong>अक्षर कलश और बाहुबली की प्रतिमा का संबंध</strong></p>
<p>स्वामी जी ने अक्षर कलश और बाहुबली की प्रतिमा के निर्माण के बीच गहरे संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि चामुंडराय की माता ने *आदिपुराण* के स्वाध्याय के माध्यम से भगवान बाहुबली की प्रतिमा के दर्शन करने का संकल्प लिया था। इस संकल्प के परिणामस्वरूप ही अद्वितीय बाहुबली प्रतिमा का निर्माण हुआ। जैसा कि जल कलश पूजा में आवश्यक होता है, उसी प्रकार अक्षर कलश, यानी आत्मचिंतन, जीवन के निर्माण और आत्मिक शांति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रक्रिया ने एक साधारण शिलाखंड को एक विश्व प्रसिद्ध प्रतिमा में बदल दिया।</p>
<p><strong>अक्षर कलश: जैन संस्कृति और इतिहास का संरक्षण</strong></p>
<p>स्वामी जी ने अक्षर कलश के माध्यम से जैन संस्कार, संस्कृति और इतिहास को संरक्षित करने के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय के माध्यम से हमें हमारे पूर्वजों का ज्ञान और उनके आदर्श प्राप्त होते हैं। अक्षर कलश जीवन में ज्ञान और संस्कारों को सहेजने का एक प्रभावी तरीका है, जो हमारे अतीत को वर्तमान में जीवित रखता है।</p>
<p><strong>बाहुबली की प्रतिमा पर प्रमुख व्यक्तित्वों की टिप्पणियां</strong></p>
<p>बाहुबली की प्रतिमा न केवल आध्यात्मिक साधकों बल्कि विश्व के प्रमुख नेताओं और चिंतकों के लिए भी एक गहरी प्रेरणा का स्रोत बन गई है। इस प्रतिमा का प्रभाव कुछ प्रसिद्ध व्यक्तित्वों की टिप्पणियों से स्पष्ट होता है:</p>
<p><strong>जवाहरलाल नेहरू (7 सितम्बर 1951): </strong></p>
<p>&#8220;मैं यहां आया, मैंने दर्शन किए और मैं इस प्रतिमा की विशालता और सौंदर्य से विस्मित रह गया।&#8221;</p>
<p><strong>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद:  </strong></p>
<p>&#8220;यह मूर्ति इतनी सुंदर रूप से बनाई गई है कि चाहे आप इसे दूर से देखें या पास से, हर अंग अपनी सही अनुपात में दिखाई देता है।&#8221;</p>
<p><strong>इंदिरा गांधी (21 फरवरी 1981):  </strong></p>
<p>&#8220;यह प्रतिमा शक्ति और सौंदर्य का प्रतीक है, और यह हम सबको प्रेरणा देती है कि हम अपने देश और समाज के गरीबों और निर्बल लोगों के लिए प्रार्थना करें।&#8221;</p>
<p><strong>डॉ. शंकर दयाल शर्मा (2 दिसम्बर 1993):  </strong></p>
<p>&#8220;गोम्मटेश्वर की यह प्रतिमा मूर्तिकला, प्रतीकार्थ और अभियांत्रिकी का एक आश्चर्य है।&#8221;</p>
<p><strong>पी.वी. नरसिंह राव (18 दिसम्बर 1993): </strong></p>
<p>&#8220;मैं भगवान बाहुबली के चरणों में त्याग का संदेश प्राप्त करने आया हूं, ताकि हमारे देश से गरीबी, अज्ञान और ऊंच-नीच के भेद को मिटाया जा सके।&#8221;</p>
<p><strong>आध्यात्मिक और कलात्मक दृष्टि से बाहुबली की प्रतिमा**</strong></p>
<p>प्रसिद्ध कलाप्रेमी और चिंतक हेनरिक जिमर ने बाहुबली प्रतिमा के बारे में कहा:</p>
<p>&#8220;यह मूर्ति यद्यपि मानवीय आकृति में है, तथापि यह मानवीय सीमा से परे, एक अमानवीय और अलौकिक रूप में प्रतीत होती है। यह मूर्ति एक स्थिर और शाश्वत ज्योतिस्तंभ के रूप में दिखती है, जो आत्मा की शुद्धता और शाश्वत ज्ञान की अभिव्यक्ति है। प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर व्यक्ति को एक अनोखी शांति और दिव्यता का अनुभव होता है, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।&#8221;</p>
<p><strong>अक्षर कलश का जीवन में समावेश</strong></p>
<p>स्वामी जी के इन विचारों से यह स्पष्ट होता है कि हमारे जीवन में स्वाध्याय और आत्मचिंतन (अक्षर कलश) को शामिल करना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान समय में जब हम भौतिकता के दौर में जी रहे हैं, आत्मिक शांति और ज्ञान की खोज के लिए हमें समय निकालना चाहिए। स्वामी जी ने इस बात पर जोर दिया कि केवल पूजा या परिवारिक जिम्मेदारियों से नहीं, बल्कि अक्षर कलश के माध्यम से ही हम अपने जीवन को सही दिशा दे सकते हैं और जैन परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक संरक्षित रख सकते हैं।</p>
<p>अतः स्वामी जी का संदेश यह है कि हम अपने जीवन में अक्षर कलश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए तन, मन और धन का उपयोग करें, ताकि हम अपने सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर को सुरक्षित रख सकें।</p>
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