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	<title>Sunil Jain Sanchay &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>लखनऊ में &quot;प्रभावना पुरुषोत्तम&quot; की उपाधि से किया गया अलंकृत : आचार्य श्री विशुद्धसागर पुरस्कार से सम्मानित हुए युवा मनीषी डॉ. सुनील संचय </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Oct 2024 03:11:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने हेतु संकल्पित उत्कर्ष समूह भारत द्वारा प्रतिवर्ष समाजसेवा, श्रुत संवर्द्धन, देव-शास्त्र-गुरु के प्रति समर्पण, साहित्यिक अवदान, प्रभावना आदि के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले किसी एक विशिष्ट व्यक्तित्व को संयम पुरुषोत्तम श्रमणाचार्य श्री विशुद्धसागर पुरस्कार प्रभावना पुरुषोत्तम उपाधि के साथ प्रदान किया जाता है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230; ललितपुर। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने हेतु संकल्पित उत्कर्ष समूह भारत द्वारा प्रतिवर्ष समाजसेवा, श्रुत संवर्द्धन, देव-शास्त्र-गुरु के प्रति समर्पण, साहित्यिक अवदान, प्रभावना आदि के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले किसी एक विशिष्ट व्यक्तित्व को संयम पुरुषोत्तम श्रमणाचार्य श्री विशुद्धसागर पुरस्कार प्रभावना पुरुषोत्तम उपाधि के साथ प्रदान किया जाता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ललितपुर।</strong> जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने हेतु संकल्पित उत्कर्ष समूह भारत द्वारा प्रतिवर्ष समाजसेवा, श्रुत संवर्द्धन, देव-शास्त्र-गुरु के प्रति समर्पण, साहित्यिक अवदान, प्रभावना आदि के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले किसी एक विशिष्ट व्यक्तित्व को संयम पुरुषोत्तम श्रमणाचार्य श्री विशुद्धसागर पुरस्कार प्रभावना पुरुषोत्तम उपाधि के साथ प्रदान किया जाता है। वर्ष 2024 का यह पुरस्कार और उपाधि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में श्रमण मुनिश्री सुप्रभसागर महाराज और श्रमण मुनिश्री प्रणतसागर महाराज के सान्निध्य में नगर के युवा मनीषी, अनेक कृतियों के संपादक, निरंतर लेखन कार्य में संलग्न, अनेक सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होकर समाजसेवा में संलग्न डॉ. सुनील जैन संचय (ललितपुर) को उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए समारोह पूर्वक 20 अक्टूबर, रविवार को प्रदान किया गया।</p>
<p>साथ ही उन्हें &#8220;प्रभावना पुरुषोत्तम&#8221; उपाधि से भी अलंकृत किया गया। उत्कर्ष समूह द्वारा डॉ. सुनील संचय को तिलक, माला, श्रीफल, साहित्य, पुरस्कार प्रशस्ति पत्र, उपाधि प्रशस्ति पत्र, माला, शाल, पगड़ी, पुरस्कार राशि, अंग वस्त्र आदि के साथ भव्य रूप से सम्मानित किया गया। संचालन राजेन्द्र जैन महावीर सनावद ने किया। सम्मान समारोह के पूर्व विदुषी जैन लखनऊ ने मंगलगीत प्रस्तुत किया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-68807" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241023-WA0001.jpg" alt="" width="1040" height="535" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241023-WA0001.jpg 1040w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241023-WA0001-300x154.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241023-WA0001-1024x527.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241023-WA0001-768x395.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/IMG-20241023-WA0001-990x509.jpg 990w" sizes="(max-width: 1040px) 100vw, 1040px" />इन्होंने किया प्रदान</strong></p>
<p>यह प्रतिष्ठित पुरस्कार उत्कर्ष समूह के अध्यक्ष रविन्द्र जैन गहाणकर (अमरावती, महाराष्ट्र), संयोजक अरविंद बुखारिया (उज्जैन), संजीव जैन (लखनऊ), उपाध्यक्ष जागेश जैन (लखनऊ) आदि उत्कर्ष समूह के पदाधिकारियों के साथ ही इस मौके पर देश के मूर्धन्य मनीषियों जैसे डॉ. श्रेयांस कुमार जैन (बड़ौत, अध्यक्ष अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद), डॉ. जयकुमार जैन (मुजफ्फरनगर, अधिष्ठाता श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर, जयपुर), प्रोफेसर श्रीयांस सिंघई (जयपुर, राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जयपुर सेवानिवृत्त प्रोफेसर), ब्रह्मचारी जयकुमार निशांत (टीकमगढ़, महामंत्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद), प्रोफेसर अशोक कुमार जैन (वाराणसी, अध्यक्ष अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत् परिषद), प्रोफेसर अभय कुमार जी जैन (लखनऊ, उपाध्यक्ष शोध संस्थान लखनऊ), पंडित विनोद जैन रजवांस (उपाध्यक्ष अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद), ब्र. डॉ. अनिल जैन (प्राचार्य आचार्य संस्कृत महाविद्यालय सांगानेर, जयपुर), डॉ. विमल जैन (जयपुर), प्रोफेसर अनेकांत जैन (दिल्ली, प्रोफेसर लाल बहादुर संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली), पंडित पवन जैन (दीवान सागर, उपाध्यक्ष अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद), डॉ. पंकज जैन (इंदौर), राजेन्द्र जैन महावीर सनावद (सह संपादक जैन गजट), डॉ. आनंद जैन (वाराणसी, सह आचार्य काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी), डॉ. सोनल कुमार जैन (संयुक्तमंत्री अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद, दिल्ली), डॉ. बाहुबली जैन (इंदौर), पं. प्रद्युम्न शास्त्री (जयपुर), डॉ. राजेश शास्त्री (ललितपुर), मनीष विद्यार्थी, पंडित प्रिंस शास्त्री (लखनऊ) आदि ने अपने करकमलों से प्रदान किया।</p>
<p><strong>जैन समाज ने दी बधाई</strong></p>
<p>इस दौरान उत्कर्ष समूह भारत के अध्यक्ष रवींद्र गहाणकर ने बताया कि उत्कर्ष समूह भारत, श्रमण मुनि श्री सुप्रभसागर जी महाराज की प्रेरणा से स्थापित ऐसा समूह है जो जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने हेतु संकल्पित है। इस उपलब्धि पर उत्तर प्रदेश-उत्तरांचल भारतवर्षीय तीर्थक्षेत्र कमेटी, अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन शास्त्री परिषद, अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत् परिषद, प्रभावना जनकल्याण परिषद, दिगम्बर जैन पंचायत, प्रागैतिहासिक तीर्थक्षेत्र नवागढ़, करुणा इंटरनेशनल, आदि संस्थाओं ने हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं प्रेषित कर उज्ज्वल भविष्य की मंगल कामना की है। इस मौके पर मुनि श्री 108 सुप्रभसागर महाराज ने कहा कि पुरस्कार और सम्मान मिलने से सम्मानित व्यक्तित्व को और अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। पुरस्कृत व्यक्तित्व को मेरा मंगल आशीर्वाद है कि वे इसी प्रकार से प्रभावना करते रहें।</p>
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		<title>दसलक्षण (पर्यूषण पर्व) पर्व चौथा दिन -उत्तम शौच धर्म, 11 सितंबर पर विशेष : आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में खुद के निकट लाता है शौच धर्म </title>
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		<pubDate>Tue, 10 Sep 2024 16:25:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[क्रोध कषाय का अभाव होना &#8211; क्षमा धर्म है। मान कषाय का अभाव होना &#8211; मार्दव धर्म है। माया कषाय का अभाव होना &#8211; आर्जव धर्म है । अब आगे धर्म के दसलक्षणों के क्रम में चौथा है &#8220;शौच धर्म&#8221; और चार कषायों के क्रम में चौथी है &#8220;लोभ कषाय&#8221; यानि लोभ कषाय के अभाव [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>क्रोध कषाय का अभाव होना &#8211; क्षमा धर्म है। मान कषाय का अभाव होना &#8211; मार्दव धर्म है। माया कषाय का अभाव होना &#8211; आर्जव धर्म है । अब आगे धर्म के दसलक्षणों के क्रम में चौथा है &#8220;शौच धर्म&#8221; और चार कषायों के क्रम में चौथी है &#8220;लोभ कषाय&#8221; यानि लोभ कषाय के अभाव होने को शौच धर्म कहते हैं । <span style="color: #ff0000">पढ़िए डॉ सुनील जैन संचय का विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>क्रोध कषाय का अभाव होना &#8211; क्षमा धर्म है। मान कषाय का अभाव होना &#8211; मार्दव धर्म है। माया कषाय का अभाव होना &#8211; आर्जव धर्म है । अब आगे धर्म के दसलक्षणों के क्रम में चौथा है &#8220;शौच धर्म&#8221; और चार कषायों के क्रम में चौथी है &#8220;लोभ कषाय&#8221; यानि लोभ कषाय के अभाव होने को शौच धर्म कहते हैं ।जिस प्रकार समुद्र अनेक सरिताओं से भी तृप्त नहीं होता, उसी प्रकार इंसान विश्व की संपूर्ण दौलत को पाने के बाद भी तृप्त नहीं होता। सत्य के दर्शन करना चाहते हो तो अपने भीतर से लोभ कसाई को भी निकाल दो, आत्मा की वेदी को स्वच्छ कर लो बीजारोपण से पूर्व पृथ्वी को झांड़-झंकाड़, कंकड़-पत्थर से रहित कर दो ताकि आत्मा स्वच्छ, निर्मल हो जाये और सत्य का देवता आकर विराजमान हो जाये।</p>
<p>विषयों के प्रति आसक्ति, भोग की वस्तुओं के प्रति आवश्यकता से अधिक झुकाव को लोभ कहते हैं ।लोभ या लालच का संबंध केवल पैसे से ही नही है, अपितु किसी भी वस्तु के प्रति अधिक आसक्ति लोभ है। लोभ को &#8220;पाप का बाप&#8221; बताया है, सारे पापों की जड़ यह लालच ही है, कहा भी है कि &#8220;लालच बुरी बला है&#8221;।</p>
<p>दूसरे का वैभव, ऐश्वर्य, यश, ज्ञान, पुण्य का उदय, प्रभाव, स्त्री, संतान, धन, संपत्ति इत्यादि देख कर कभी ईर्ष्या नहीं रखना, अपनी अत्यन्त ही दुर्लभ इस मनुष्य पर्याय में जो है जितना है उसी में संतोष कर अशुभ भावों का अभाव करके आत्मा कि शुचि को करो।</p>
<p>यह भी सहज ही है कि जो लालची होगा वह अपनी विषय पूर्ति के लिए समय आने पर चोरी, मायाचारी, छल-कपट, हिंसा, परिग्रह, बैर-भाव भी करता ही रहेगा । उत्तम शौच धर्म हमें यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है, उसी में खुश रहो। परमात्मा का हमेशा शुक्रिया मानों और अपनी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही परम आनंद मोक्ष को प्राप्त करना मुमकिन है।</p>
<p>मनुष्य में लोभ ही समस्त पापों की जड़ है, जिसके वशीभूत होकर मानव पाप-अपराध करते हैं। लोभ सबसे बड़ा शत्रु है। लोभ के कारण ही भाई, भाई का शत्रु और पुत्र, पिता का शत्रु बना है। समाज में व्याप्त हिंसा, अनाचार, भ्रष्टाचार, चोरी, अपहरण हत्या, अपराध सब लोभ के कारण ही होता है। जिसमें लोभ की प्रवृत्ति रहेगी, उसमें शुचिता-पवित्रता संभव ही नहीं। इन मलिन विकारों पर विजय प्राप्त करने के लिए निर्मलता, समता भाव का होना अति आवश्यक है। जो संतोष रूपी जल से लोभ रूपी मल को धोता है, उसे निर्मल शौच धर्म होता है, शौच-धर्म को धारण करने के लिए मनुष्य को पंचेन्द्रिय विषयों में आसक्ति, धन संबंधी सामग्री को संचित करने की प्रवृत्ति का त्याग करना आवश्यक है।</p>
<p>उत्तम शौच का अर्थ है पवित्रता। आचरण में नम्रता, विचारों में निर्मलता लाना ही शौच धर्म है। बाहर की पवित्रता का ध्यान तो हर कोई रखता है लेकिन यहां आंतरिक पवित्रता की बात है। आंतरिक पवित्रता तभी घटित होती है जब मनुष्य लोभ से मुक्त होता है।</p>
<p>शौचधर्म का प्रयोजन तो &#8220;आत्मा को&#8221; पवित्र करने से होता है, इसका इस देह से कोई सम्बन्ध नहीं मानना। अनादिकाल से यह आत्मा लोभ रूपी मल से मलिन हो रखा है उसे पवित्र करना तथा करने का भाव आना ही शौचधर्म है।</p>
<p>शौच धर्म कहता है कि आवश्यक्ता, आकांक्षा, आसक्ति और अतृप्ति के बीच को समझकर चलना होगा क्योंकि जो अपनी आवश्यक्ताओं को सामने रखकर चलता है वह कभी दुखी नहीं होता और जिसके मन में आकांक्षाएं हावी हो जाती हैं वह कभी सुखी नहीं होता। हावी होती हुई आकांक्षाएं आसक्ति(संग्रह के भाव) की ओर ले जाती है और आसक्ति पर अंकुश न लगाने पर अतृप्ति जन्म लेती है, अंततः प्यास, पीड़ा आतुरता और परेशानी बढ़ती है ।</p>
<p>भौतिक संसाधनों और धन दौलत में खुशी खोजना यह महज आत्मा का एक भ्रम है। उत्तम शौच धर्म हमे यही सिखाता है कि शुद्ध मन से जितना मिला है उसी में खुश रहो।लोभ छोड़ने से ही आत्मा में उत्तम शौच धर्म प्रकट होता है। अनादि काल से यह आत्मा लोभ रूपी मल से मलिन हो रखा है उसे पवित्र करना तथा करने का भाव आना ही शौचधर्म है।</p>
<p>हम जानते ही हैं की लालची जीव किसी भी अवस्था में संतुष्टि को प्राप्त नहीं होता वह तो सदैव ही असंतुष्ट रहता है, और असंतुष्ट जीव की आशाएं,अपेक्षाएं और संसार कभी ख़त्म नहीं हो सकते।</p>
<p>आज की दौड़-भाग भरी जिंदगी में जहां इंसान को चार पल की फुर्सत अपने घर-परिवार के लिए नहीं है, वहां खुद के निकट पहुंचने के लिए तो पल-दो पल भी मिलना मुश्किल है। इस मुश्किल को आसान और मुमकिन बनाने के लिए जब यह पर्व आता है, तब समूचा वातावरण ही तपोमय हो जाता है।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-65877" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240910-WA0051.jpg" alt="" width="330" height="304" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240910-WA0051.jpg 330w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/09/IMG-20240910-WA0051-300x276.jpg 300w" sizes="(max-width: 330px) 100vw, 330px" />कविवर द्यानतराय जी दसलक्षण धर्म की पूजन में लिखते हैं-</p>
<p>धरी हिरिदे संतोष, करहु तपस्या देह सों ।</p>
<p>शौच सदा निरदोष, धरम बड़ो संसार में ।।</p>
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