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	<title>Sudhasagar Maharaj श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>धर्म सभा में दिए प्रवचन : जिसमें दुर्गुण है उसमें नियम से कोई न कोई गुण जरूर है- मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sun, 01 Dec 2024 04:38:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सागर। हम धर्म को अच्छा समझते हैं और उसकी प्रशंसा भी करते हैं, लेकिन वह धर्म हमें अच्छे का आनंद नहीं दे पाता। पूज्य समन्तभद्र स्वामी ने यह खोज की कि संसार बुरा नहीं है, संसारी बुरा है। धन बुरा नहीं है, धनी बुरा है। .ह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सागर। हम धर्म को अच्छा समझते हैं और उसकी प्रशंसा भी करते हैं, लेकिन वह धर्म हमें अच्छे का आनंद नहीं दे पाता। पूज्य समन्तभद्र स्वामी ने यह खोज की कि संसार बुरा नहीं है, संसारी बुरा है। धन बुरा नहीं है, धनी बुरा है। .ह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> हम धर्म को अच्छा समझते हैं और उसकी प्रशंसा भी करते हैं, लेकिन वह धर्म हमें अच्छे का आनंद नहीं दे पाता। पूज्य समन्तभद्र स्वामी ने यह खोज की कि संसार बुरा नहीं है, संसारी बुरा है। धन बुरा नहीं है, धनी बुरा है। .ह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि पूज्य कुन्दकुन्द स्वामी ने 6 द्रव्यों को अच्छा-बुरा नहीं कहा, उन्होंने तत्वों की चर्चा की और कहा कि तत्वों पर श्रद्धा रखो। प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है, न यह किसी को बाधा देता है और न किसी से बाधित होता है। विनाश की लीला सुनते ही हमें भय उत्पन्न होता है, इसलिए द्रव्यदृष्टि करने के लिए कहा जाता है कि हम भय से दूर हो जाएं। द्रव्यदृष्टि के लिए संसार और मोक्ष, हेय और उपादेय के मायने नहीं होते। मात्र एक ज्ञायक स्वरूप जाग्रत होता है जब द्रव्यदृष्टि जागती है, तब कुछ करने का मन नहीं होता।</p>
<p><strong>कैसे हम सप्त भयों से मुक्त हो सकते हैं?</strong></p>
<p>उन्होंने द्रव्यदृष्टि बनाने का सूत्र दिया—ज्ञान को आँखों के समान बनाओ, कानों, रसना, और नासिका के समान नहीं। आँखों की सबसे ज्यादा निंदा की गई, क्योंकि यही सबसे ज्यादा कबाड़ा करती है, लेकिन यह निश्चित रूप से समझो कि जहाँ कोई सबसे बड़ा दुर्गुण हो, वहां कोई न कोई गुण भी छिपा होता है। गुणी में तो गुण हमने बहुत बार देखे हैं, अब कुछ नया करो—किसी दुर्गुणी में गुण देखने का प्रयास करो। यदि दुर्गुणी में तुमने गुण देख लिया, तो तुम कोयले की खान से डायमंड पा सकोगे।</p>
<p><strong>दार्शनिक व्यक्ति को कुछ बुरा दिखता ही नहीं, सब अच्छा ही दिखता है</strong></p>
<p>जब तुम्हें चारों ओर सब अच्छा ही अच्छा दिखने लगे, तो समझो तुम एक बड़े दार्शनिक हो। संसार का कोई भी व्यक्ति तुम्हें दुखी नहीं कर सकता, तुम दरिद्र नहीं हो सकते, तुम मरते हुए भी नहीं मर सकते, क्योंकि तुम्हारी दृष्टि में जहाँ देखो, कोई न कोई गुण नजर आ जाएगा। समस्त शास्त्रों में शरीर की निंदा की गई है, लेकिन समन्तभद्र स्वामी ने कहा कि मैं इसी शरीर की पूजा कराता हूँ, और मेरे पास एक कला है—इस शरीर को जो छुएगा, वह अपवित्र से भी पावन हो जाएगा। जल गिरेगा और गंधोदक हो जाएगा, बस रत्नत्रय प्रकट करना है।</p>
<p><strong>प्रकृति की हर चीज अनुशासन में है, इसलिए प्रकृति को माँ भी कहते हैं, क्योंकि वह अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करती</strong></p>
<p>जो पेड़ जिस नाम से बना है, उस पर वही फल लगेगा, जो पेड़ जिस ऋतु में फैलता है, उसी में फलेगा, अन्य में नहीं। कभी-कभी प्रकृति उल्लंघन कर देती है, तबाही मच जाती है। सबसे ज्यादा उल्लंघन करने वाला जीव है—संसारी जीव, हम और आप। यह संसार गंदा नहीं था, हमने अपने राग-द्वेष और कषायों से इसे गंदा कर दिया। संसार स्वच्छंद नहीं है, स्वतंत्र है।</p>
<p><strong>व्यक्ति मरकर तीन लोक में कहीं भी, किसी भी योनि में जन्म ले सकता है</strong></p>
<p>बस इतना सा ज्ञान करो—तुम मनुष्य में कैसे जन्मे? तुम कीड़े-मकोड़े, नारकी भी बन सकते थे। कुछ न कुछ तो है, नियम से कर्म ने मुझे मनुष्य बनाया, और मैं वह जीवन जीकर ही मरूँगा। क्योंकि तुम पूर्वभव में मान-कषाय से रहित थे, कम परिग्रह में संतुष्ट थे, इसलिए तुम मनुष्य बने हो, ताकि तुम्हें सम्मान मिले। जो सम्मान नहीं करते, उन्हें सम्मान नहीं मिलता।</p>
<p><strong>तुम मनुष्य बने तो भारत में ही जन्म क्यों हुआ?</strong></p>
<p>उसमें भी बुंदेलखंड में, उसमें भी सागर में, उसमें भी जैन जाति में क्यों हुआ? और जैन जाति में इस कुल में क्यों हुआ? जहाँ गुरु महाराज सामने बैठे हैं। नियम से कोई न कोई कारण है, क्योंकि पापियों को अच्छी संगति का भाव नहीं होता। कर्म कहता है कि यह प्रवचन सुनने के लिए नहीं चला जाए, क्योंकि गुरुओं के प्रवचन पापियों के लिए नहीं, पुण्यात्माओं के लिए होते हैं।</p>
<p><strong>किसी भी वस्तु को देखने के बाद तीन परिणाम होते हैं</strong></p>
<p>पहला—यह वस्तु मेरे काम की है। दूसरा—यह वस्तु मेरे काम की नहीं है। यह है स्वार्थ दृष्टि, निकृष्ट दृष्टि। ऐसा व्यक्ति कर्म को बांधता है, और जितना कर्म का बंधन करेगा, कल के दिन वह वस्तु को देखने लायक भी नहीं रहेगा, क्योंकि देखते ही यह समझ में आ जाएगा कि यह वस्तु मेरे लायक है।</p>
<p><strong>चारों संज्ञाएं—पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े को भी होती हैं, क्योंकि वे संसार में यही देखते रहते हैं कि मेरे काम की चीज क्या है?  </strong></p>
<p>यह वस्तु मेरे काम की है या नहीं, बस यही है राग-द्वेष। हम तो भगवान को भी नहीं छोड़ते, यह भगवान मेरे काम के हैं, तो उसी मंदिर जाते हैं। कहीं न कहीं उसका स्वार्थ होना चाहिए। यह मंदिर हमारे पूर्वजों ने बनवाए हैं। संसारी गंदा होता है और बदनाम होता है, लेकिन संसार को भोगना पड़ता है। संसार में छलकपट नहीं है, लेकिन संसारी में छलकपट है। लक्षण बनाओ कि जिसमें दुर्गुण है, उसमें नियम से कोई न कोई गुण जरूर है। नीम में जो गुण है, वह अन्य पदार्थों में नहीं है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन :  सम्मोहन में व्यक्ति आकर्षित करता है और श्रद्धा में व्यक्ति आकर्षित हो जाता है : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 23 Oct 2024 07:13:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हम सब कुछ पाकर धन्य हो जाते हैं यह पूर्ण महानता नहीं है, हमें पाकर के दुनिया धन्य हो जाए यह पूर्ण महानता है। तीन प्रकार की दृष्टि होती है ज्ञेय दृष्टि, उपकारी दृष्टि, उपादेय दृष्टि। ज्ञेय दृष्टि जब होती है तो हमें ज्ञेय का ज्ञान होता है, ये ज्ञेय है और ज्ञेय के सम्बन्ध [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>हम सब कुछ पाकर धन्य हो जाते हैं यह पूर्ण महानता नहीं है, हमें पाकर के दुनिया धन्य हो जाए यह पूर्ण महानता है। तीन प्रकार की दृष्टि होती है ज्ञेय दृष्टि, उपकारी दृष्टि, उपादेय दृष्टि। ज्ञेय दृष्टि जब होती है तो हमें ज्ञेय का ज्ञान होता है, ये ज्ञेय है और ज्ञेय के सम्बन्ध में हम पूरा जानने का प्रयास करते है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> हम सब कुछ पाकर धन्य हो जाते हैं यह पूर्ण महानता नहीं है, हमें पाकर के दुनिया धन्य हो जाए यह पूर्ण महानता है। तीन प्रकार की दृष्टि होती है ज्ञेय दृष्टि, उपकारी दृष्टि, उपादेय दृष्टि। ज्ञेय दृष्टि जब होती है तो हमें ज्ञेय का ज्ञान होता है, ये ज्ञेय है और ज्ञेय के सम्बन्ध में हम पूरा जानने का प्रयास करते है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि आत्मा को, भगवान को भी जानना ज्ञेय दृष्टि है। मात्र जानों कौन क्या है, नरक को, स्वर्ग को, पंच परमेष्ठी को जानों ज्ञेय दृष्टि है, ज्ञेय दृष्टि विहंगम होती है। अच्छा बुरा नही, मात्र ज्ञेय दृष्टि। उन्होंने कहा कि सबसे पहले ज्ञेय दृष्टि का हमें अभ्यास करना चाहिए, मैं सब कुछ जानना चाहता हूँ पाप भी। पाप करना नहीं चाहता, पाप को जानना चाहता हूँ। बुरी वस्तुओं को भी जानों, शराब पीना नहीं है, शराब को जानों। ज्ञेय दृष्टि इतनी बड़ी हो जाये कि संसार की हर वस्तु हमारे ज्ञान के अंदर आ जाये, सारा जगत हमारे ज्ञान की मुट्ठी में आ जाये। तुम ज्ञान को कण-कण में बिखेर दो। यदि ज्ञेय ने तुम्हारे ज्ञान को अपने आकार में ले लिया तो तुम बंधी बन जाओगे, ज्ञेय के।</p>
<p><strong>ज्ञेय हमें आकर्षित कर रहा</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि हम दुनिया के सामने झुक रहे हैं, दुनिया को हम नहीं झुका पा रहे हैं क्योंकि ज्ञेय हमें आकर्षित कर रहा है। मार्किट हमें बुला रहा है बल्कि हमें वो सेठ बनना है कि मार्किट हमारे दरवाजे आ जाये। बाजार मत छोड़ो, बाजार से गुजरों, पर खरीददार मत बनना।बाजार एक बहुत बड़ा ज्ञान का भंडार है- सम्पूर्ण सृष्टि का नाम शास्त्र है। जो शास्त्र में लिखा है वह बाजार में है, यहां थियोरी है, वहां प्रैक्टिकल। हमें दुनिया में रहना है लेकिन दुनिया के तलबगार मत बनना, कहीं दुनिया तुम्हारे लिए व्यसनी न बना दे। जिसके अभाव में हम जी न सके, उसी का नाम है व्यसन। व्यसनी बन जाता है हमारा मन, हमारी आँखे। ये देखना है मुझे, व्यसन हो गया, यह खाना है मुझे, व्यसन हो गया। व्यसनी नही, ज्ञाता बनो और व्यसनी जब व्यक्ति बन जाता है तो बर्बाद हो जाता है। जब जब तुम जिस वस्तु को चाहोगे, वो तुम्हे नचायेगी, वो तुम्हें गुलाम बनाएंगी, तुम्हे सम्मोहित करेगी और तुम्हारा सब कुछ नाश कर देगी। हमें सबसे पहले वस्तु देखना है कि दुनिया में मुझे कोई आकर्षित तो नहीं कर रहा है, मैं किसी के प्रभाव में तो नहीं आ रहा हूँ, श्रद्धा व सम्मोहन में यही अंतर है। वो कोई भी हो सकता है, मां-बाप मुझे सम्मोहित कर रहे है क्योंकि उन्होंने मेरे ऊपर इतने उपकार किए हैं, उनके उपकारों से हम दब गए और सम्मोहित व्यक्ति कभी मुक्ति नहीं पा सकता क्योंकि सम्मोहित व्यक्ति तो गुलाम है, दास है। हमें सम्मोहित कर लिया भगवान ने क्योंकि जब जब हमने उनकी भक्ति की हमारे पाप कट गए, हमारा पुण्य बढ़ा, हमारी मुक्ति नही होगी। हम गुरु से सम्मोहित है क्योंकि गुरु ने हमें बहुत कुछ दिया है।</p>
<p><strong>मूर्ति देखकर कटते हैं पाप</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि कोई एक मंदिर में मूर्ति बैठालता है, कितने लोगों का मंदिर में उस मूर्ति से उपकार हुआ, कितने लोगों ने पाप काटे, कितने लोगों को शांति मिली, तुमने एक मंदिर की मूर्ति नही बैठाली है, तुमने साधु संतों को भी पाप काटने का मौका दिया है। तपस्या से जो पाप नहीं कटते हैं, वो तुम्हारी मूर्ति देखकर पाप कट जाते हैं। जैसे पाषाण की मूर्ति स्थापना निक्षेप से भगवान बन जाती है, ऐसे ही मिट्टी की ईंट जब पन्नी लपेटकर के उसको दी जाती है तो वह मिट्टी की ईंट भी सोने की बन जाती है। बनी रहने दो ढाई रुपए की ईंट, तुम्हारे खाते में तो स्वर्ण ईंट का दान लिखा रहेगा। सम्मोहन में सामने वाला सम्मोहित करता है और श्रद्धा में व्यक्ति स्वयं सम्मोहित होता है। जब किसी से हम आकर्षक होते हैं तो वह श्रद्धा कहलाती है और जब कोई मुझे आकर्षित करता है तो सम्मोहन कहलाता है। भगवान से हम आकर्षित हुए है क्योंकि भगवान अच्छे थे, इसका नाम श्रद्धा है, श्रद्धा में हमने ऋण नही लिया। भगवान ने हमारे ऊपर उपकार नहीं किया, हम उपकृत हुए है। वो अच्छे है इसलिए अच्छे है, वो उपकारी है इसलिए अच्छे नही हैं, ये तो स्वार्थ है। उपकार करने के बाद भूल जाओ, मैंने उपकार किया ही नहीं है। उपकार करने वाला कर्तव्य कर रहा है और जिस पर उपकार हो रहा है वह उपकृत हो रहा है, इसमे कोई ब्याज नही लगेगा, कोई कर्जदार नही होगा, ये दान कहलाता है। उपकार दृष्टि-किसी ने मेरे ऊपर उपकार किया है तो कभी भूलना मत। उपकार दृष्टि, उपकार करने वाले की तरफ से नही, उपकृत होने वाले की तरफ से आना चाहिए। तुमने किसी पर उपकार किया है यह ऋण दृष्टि है, ये पाप दृष्टि है, स्व परघातक है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : जिस बाप की संपत्ति पर भाइयों में लड़ाई हो जाए, समझ लेना उस बाप की कभी सद्गति नहीं हो सकती: निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_father_over_whose_property_there_is_a_quarrel_between_brothers_understand_that_father_can_never_attain_salvation_muni_shri_sudhasagar_maharaj/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 Sep 2024 08:17:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[व्यक्ति को अपने जीवन को चलाने के लिए एक ही कारण नहीं होना चाहिए क्योंकि जीवन अनेक पहलुओं से चलता है। एक ही प्रकार का अधर्म नहीं है, तो एक ही प्रकार का धर्म भी नहीं है। अधर्म धर्म को मूल्यवान बनाता है। अंधकार से प्रकाश की, प्यास से पानी की, भूख से रोटी की [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>व्यक्ति को अपने जीवन को चलाने के लिए एक ही कारण नहीं होना चाहिए क्योंकि जीवन अनेक पहलुओं से चलता है। एक ही प्रकार का अधर्म नहीं है, तो एक ही प्रकार का धर्म भी नहीं है। अधर्म धर्म को मूल्यवान बनाता है। अंधकार से प्रकाश की, प्यास से पानी की, भूख से रोटी की कीमत बढ़ जाती है। अभाव सद्भाव को अनमोल बना देता है। इसलिए संसार एक समस्या है, तो मोक्ष उसका समाधान है। मिथ्यात्व समस्या है, तो सम्यकदर्शन उसका समाधान है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> व्यक्ति को अपने जीवन को चलाने के लिए एक ही कारण नहीं होना चाहिए क्योंकि जीवन अनेक पहलुओं से चलता है। एक ही प्रकार का अधर्म नहीं है, तो एक ही प्रकार का धर्म भी नहीं है। अधर्म धर्म को मूल्यवान बनाता है। अंधकार से प्रकाश की, प्यास से पानी की, भूख से रोटी की कीमत बढ़ जाती है। अभाव सद्भाव को अनमोल बना देता है। इसलिए संसार एक समस्या है, तो मोक्ष उसका समाधान है। मिथ्यात्व समस्या है, तो सम्यकदर्शन उसका समाधान है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि विरोधी तत्व ने अच्छी वस्तुओं को अनमोल कर दिया।</p>
<p>कितने प्रकार हैं अधर्म के; हिंसा से बच जाता है व्यक्ति, तो झूठ में फंस जाता है। झूठ से बच जाता है, तो मायाचारी में फंस जाता है। माया से बचता है, तो लोभ में फंस जाता है। जिन 108 द्वारों से पाप हो रहा है, उन्हीं 108 द्वारों से पुण्य होने लग जाए, तो मामला बराबर का बैठ जाएगा। जिन कषायों से पाप का बंध होता है, उन्हीं कषायों से पुण्य का बंध होता है। क्योंकि स्थिति और अनुभाग तो कषाय ही डालते हैं, इसलिए कषाय का त्याग नहीं करना चाहिए; संसार में जीने के लिए कषाय चाहिए, मोक्ष के लिए नहीं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>क्रोध से बचें</strong></p>
<p>उन्होने कहा कि अभी क्रोध आया है तुम्हें अधर्म के लिए, पाप के लिए। अब क्रोध आना है तुम्हें धर्म कार्य के लिए; इतना क्रोध जितना व्यक्ति मर्डर करने के लिए करता है। जब व्यक्ति पाप नहीं कर पाता है, तो सुसाइड कर लेता है। बस वही गुस्सा चाहिए। तुम धर्म नहीं कर पा रहे हो, तो तुम्हें सुसाइड का भाव आना चाहिए। धर्म के लिए जब व्यक्ति सुसाइड का भाव करता है, तो उसका नाम सुसाइड नहीं, समाधि है; संल्लेखना है। सुसाइड वो करता है जिसको कोई उम्मीद नहीं है।</p>
<p>अब कोई बचाने वाला नहीं है। यदि उसको लगे कि कहीं से इस घाटे की पूर्ति होने की संभावना है, तो फिर वह मरने का भाव नहीं करता। इसी तरह, मैं जो धर्म करना चाहता था, अब मैं वो धर्म नहीं कर सकता। यदि थोड़ी भी बचने की गुंजाइश हो, तो वह समाधि नहीं लेता। मरने की अपेक्षा मुनिपद छूटे, तो छूट जाए; लेकिन दो प्रतिमा लेकर जिंदा रहने की गुंजाइश है, तो वह जिंदा रहेगा।</p>
<p><strong>कर्मों का ध्यान रखें</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि मैं गरीबों से कहता हूं, जिस दिन बोली लगे, उस दिन जरूर आया करो। इसलिए नहीं कि तुम्हें बोली लेना है, इसलिए कि तुम्हें जलाना है, रुलाना है। मैं भी जैन हूम, महाराज का भक्त हूँ। बोली दूसरे के नाम टूट गई, मैं पापी नहीं ले पाया। रोज सुबह उठने के बाद और सोने के पहले तुम्हें कर्म ठोककर रोना है। ये आर्त रौद्रध्यान नहीं है, धर्मध्यान है; क्योंकि तुम्हें रोना इसलिए आ गया कि मेरा धर्म छूट गया। बोली लेने में पुण्य नहीं है। ओहो भगवन! मैं इतना पुण्यशाली, मैंने बोली ले ली। जरूर मैंने जन्म-जन्म में कोई पुण्य किया होगा, तभी मेरे मन में ये भाव आया। लोग तुमसे पूछें, तुम्हारा सबसे बड़ा अशुभ दिन कौन सा है? कोई मर गया, कोई एक्सीडेंट हो गया; ये अशुभ दिन है। तो कहना नहीं। जिस दिन मैं जिनेन्द्र देव का दर्शन, अभिषेक नहीं कर पाऊं, णमोकार मंत्र की माला नहीं फेर पाऊं, जिस दिन मैं प्रतिक्रमण, सामायिक नहीं कर पाऊँ, वो मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा अशुभ दिन है।</p>
<p><strong>भविष्य को समझें</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि जिस बाप की संपत्ति पर भाइयों में लड़ाई हो जाए, समझ लेना उस बाप की कभी सद्गति नहीं हो सकती। तुम्हारी संपत्ति में दो बेटे हैं पूर्व भव के। पिता सोचता है, इनको कैसे निपटाऊँ। मैं बाप के नाते इनको दुःख दे नहीं सकता, तो मैं ऐसी धन-दौलत जोड़ूंगा कि ये दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे। दो भाई अपनी-अपनी कमाई पर लड़ रहे हैं, वो इतना बड़ा पाप नहीं है; लेकिन यदि दो भाई बाप की संपत्ति पर लड़ रहे हैं, तो ये बाप तुम्हारे पूर्व भव का बैरी था, जो स्वयं तो लड़ा नहीं, लेकिन तुम्हें लड़वा गया।</p>
<p>यदि सही पिता होगा, तो अपने जीते जी सब कुछ बंटवारा कर देगा। अलग करो या न करो, मेरे मरने के बाद मेरी संपत्ति पर मेरे जन्म-जन्म के प्यारे बेटे लड़ेंगे नहीं। हम उसका ऐसा बंटवारा करेंगे। इसलिए राजा लोग अपने सामने राजगद्दी अपने बेटों को सौंपते थे; उसका मूल कारण यही था, क्योंकि वे जानते थे कि भविष्य क्या है।</p>
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		<title>सुधादेशना समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन :           घर में लगे हुए चित्रों से पता चलता है इस घर के रहने वालों का चरित्र क्या है &#8211; मुनि श्री सुधासागर </title>
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		<pubDate>Fri, 10 Nov 2023 07:10:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[संत शिरोमणि आचार्य़श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन 9 नवंबर को हुआ। इस अवसर पर मुनि श्री के प्रवचन हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;. &#160; आगरा। संत [&#8230;]]]></description>
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<p>संत शिरोमणि आचार्य़श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन 9 नवंबर को हुआ। इस अवसर पर मुनि श्री के प्रवचन हुए। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;.</span></p>
<hr />
<p>&nbsp;</p>
<p>आगरा। संत शिरोमणि आचार्य़श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन 9 नवंबर को हुआ। शिविर के अंतिम दिन का शुभारंभ बालिकाओं के मंगलाचरण की प्रस्तुति के साथ किया। इसके बाद शिविरार्थियों ने विशेष अर्घ्यों से गुरु पूजन किया। इस दौरान सभी को गुरु भक्ति करने का अवसर मिला। शिविर के समापन पर सभी शिविरार्थियों ने हमेशा के लिए धर्म प्रभावना में अग्रसर होने का संकल्प लिया। भोजन व्यवस्था के लिए चातुर्मास समिति की प्रशंसा करते हुए उनका स्वागत सम्मान किया गया।</p>
<p><strong>किया गया सम्मानित</strong></p>
<p>इस दौरान मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज ने हजारों शिविरार्थियों को श्रमण संस्कृति संस्थान की नीति और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। शिविर में अच्छा प्रदर्शन करने वाले बालक -बालिकाओं को ट्रॉफी देकर सम्मानित किया गया। गुरु देव के सानिध्य में सम्मान पाकर यह पल किसी गौरव से कम नहीं था।</p>
<p><strong>जिंदगी को जीना सीखो</strong></p>
<p>शिविर के अंतिम दिन मुनिश्री ने भक्तों से कहा कि हमें सृष्टि और जीवन को बहुत गहराई से समझना है क्योंकि हमारी जिंदगी निकल रही है और हमें जिंदगी जीना है। जिंदगी जीने का आनंद हर क्षण ऐसा हो जो हमें लगे कि मैं धन्य हो रहा हूं। हर कार्य ऐसा हो कि हमें लगे कि मैं गौरवान्वित हो रहा हूं, एक आनंद की अनुभूति हो। ऐसी जिदंगी प्रकृति नही देने वाली, प्रकृति रॉ मटेरियल देती है। उससे क्या बनाना है वह निर्णय आपका है और बनाने का नाम ही विज्ञान है। हर वस्तु प्रकृति में है, विज्ञान किसी वस्तु का निर्माता नहीं है, वस्तु अविनाशी होती है। उस वस्तु का विशेष गुण जो प्रकट किया जाता है, वह प्रकृति के हाथ में नहीं है, हमारे तुम्हारे हाथ में है, कितनी वस्तुएं हैं जो संसार में भरी पड़ी हैं वनस्पति के रूप में लेकिन वैद्य उसे हाथ में जाते ही औषधि बना देता है। पृथ्वी में पड़े हुए हैं सारे रत्न, पृथ्वी तो कहती है ये सब हमारे लिए पृथ्वीकाय हैं, कोई अंतर नहीं है एक सेंडस्टोन और रत्नों के पत्थर में।</p>
<p>बड़ों का सम्मान करो</p>
<p>उन्होंने कहा कि जिंदगी में कभी भी हो बड़ों को सम्मान दे सको तो बहुत अच्छी बात है नहीं दे सको तो जिंदगी में एक कार्य जरूर करना, कार्य तुम करना और सम्मान तुम्हारे गार्जियन का हो। कहीं ऐसा ना हो कि तुम्हारे कार्य से उन्होंने जो इज्जत कमाई है वो धूल में मिल जाए। बेटा जब भी गलती करता है, दुनिया उसके बाप पर जाती है, शिष्य कभी कोई गलती करता है, सीधा गुरु पर लांछन जाता है, रास्ते में कोई लूटता है सीधा वह रास्ता बदनाम होता है। धर्मी गलती करता है बदनाम धर्म होता है। जैनी गलती करता है बदनामी जैनधर्म, जैनजाति की होती है। अपनी जिंदगी में देखो तुम्हारे ऊपर किन-किन के उपकार हैं- जन्मदाता का, कुल का, जाति का, उसके बाद संस्थान का धर्म का, पढ़ने वालों का, हम साधुओं का इन सब की लिस्ट बना लो और प्रतिज्ञा कर लो इन सबको सम्मान दिला पाऊं या ना दिला पाऊं, मेरे कारण से कभी इनका अपमान नहीं होने दूंगा। तुम्हारे 24 घंटे की हर हरकत में कोई भी हरकत बदनामी कर सकती है तुम्हारे कपड़ों से भी बदनामी हो सकती है, तुम यह मत समझना कि बदनामी का अर्थ है व्यसन करना, दुर्गुणी होना। तुम्हारी पहनने की पोशाक भी इन सबको बदनाम कर सकती है। पोशाक ही नहीं, पोशाक के साथ-साथ आपका खान-पान आपकी थाली इन सबको बदनाम कर सकती है। विचार ऐसे बनाओ जिससे स्वयं को भी गर्व हो और तुम्हारे विचार जो सुने उसको भी गर्व हो जाए कि तुम्हारे इतने अच्छे विचार। संस्थान को भी, मां-बाप को भी, हमें भी गर्व हो कि मेरे बच्चों के ये विचार हैं।</p>
<p>गुरु का ऋण नहीं चुका सकते</p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि तुम्हें कितने ही क्रोध आ जाए, शास्त्री का क्रोध अलग होना चाहिए। थोड़ा गाली पुराण पढ़ो, शास्त्री के मुख से निकली हुई गाली में थोड़ी सभ्यता होगी। अधिक से अधिक अज्ञानी कहीं का मूढ़। जैन दर्शन में किसी भी क्रिया में न पाप है न पुण्य है, सवाल यह है कि कौन कर रहा है। वह कर रहा है जो जगत में उच्चासन पा चुका है। मोबाइल पर भी तुम्हारे संस्थान की पहचान हो। फोन भी संस्थान की ध्वजा लेकर चले। गुरु का ऋण चुकाया नहीं जाता है, कुछ ऐसा करो कि गुरु ऋण माफ कर देता है। वह घर में कैलेंडर नहीं टंगा है, तुम्हारे चरित्र का प्रमाण पत्र टंगा है। वह कार्य करो जिंदगी में, जिससे स्वयं को भी गर्व हो, स्वयं भी मस्तक उठाने का भाव करें,स्वयं की नजरों में उठना सीखो। दुनिया की नजरों से गिरो या ना गिरो सबसे ज्यादा निकृष्ट व्यक्ति वह है स्वयं की नजरों में गिर गया। आप कभी अपनी खुद की नजरों में मत गिरना। कहीं ऐसा ना हो तुम्हारे खुद के कृत्य से तुम बाजार में निकलने मे शर्म कर रहे हो, मन्दिर जाने में शर्म लग रही हो।</p>
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		<title>सुधादेशना समयसार प्रशिक्षण शिविर :  यदि किसी कार्य को करने के बाद यदि उदासीनता आए तो समझना गलत रास्ते पर हो &#8211; मुनि श्री सुधासागर </title>
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		<pubDate>Wed, 08 Nov 2023 15:22:17 +0000</pubDate>
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<p><span style="color: #000000;">संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर के ग्यारहवें दिन 8 नवम्बर को कार्यक्रम की शुरुआत शांतिनाथ महिला मंडल ने संत शिरमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं मुनिपुंगव श्री को नमन करते हुए मंगलाचरण के साथ की। इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि अदृश्य मुझे दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह मुझे देखना नहीं, उसको देखने से हमारा कोई उद्देश्य हल नहीं होता। दृश्यमान को देखकर के हमारे परिणाम आकुल -व्याकुल होते हैं। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट..</span></span></p>
<hr />
<p>आगरा। संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के शिष्य निर्यापक मुनिपुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के सानिध्य में हरीपर्वत स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर के अमृत सुधा सभागार में चल रहे श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर के ग्यारहवें दिन 8 नवम्बर को कार्यक्रम की शुरुआत शांतिनाथ महिला मंडल ने संत शिरमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं मुनिपुंगव श्री को नमन करते हुए मंगलाचरण के साथ की। मंगलाचरण के बाद महाराष्ट्र के रहने वाले श्रमण संस्कृति के विद्वान ने अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि गुरु नहीं मिलते तो हम मोक्ष मार्ग पर नहीं चल पाते। ये हमारा सौभाग्य है कि हमें गुरु का सानिध्य प्राप्त हो रहा है। श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर के अन्तर्गत गुरु दर्शन को आए गुरुभक्तों ने मुनिश्री को शास्त्र भेंट कर गुरु का आशीर्वाद लिया। इसी बीच गुरुभक्तों ने चित्र अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया।</p>
<p>गलत नहीं होना और सत्य होने में बहुत अंतर</p>
<p>इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि अदृश्य मुझे दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह मुझे देखना नहीं, उसको देखने से हमारा कोई उद्देश्य हल नहीं होता। दृश्यमान को देखकर के हमारे परिणाम आकुल -व्याकुल होते हैं। सामने वाला भी हमारे लिए अच्छा नहीं मानता। धर्म का अनुभव यही अटक रहा है। सब कुछ सही मानते हुए भी जब अनुभव से तौलता हूं तो धर्म बिल्कुल विपरीत नजर आता है। अभव्य भी कह रहा है कि शास्त्र में लिखा हुआ गलत नहीं है लेकिन यह कहा स्वीकार कर पा रहा है कि यही सत्य है। गलत नहीं होना और सत्य होने में बहुत अंतर है। नास्ति और अस्ति में बहुत अंतर है, यह गलत नहीं है। इसलिए सही है ये मत मान लेना, यह सही है इसलिए गलत नही है ये भी मत मान लेना। कई बार गलत चीज सत्य होती है और कई बार सत्य चीज गलत होती है क्योंकि यह स्थितियां बहुत बार गुजरती हैं। इसलिए तत्वार्थ सूत्रकार को लिखना पड़ता सत्य है लेकिन स्वीकार करने लायक नहीं है।</p>
<p>आत्मा का पर्याय है सत्य</p>
<p>उन्होंने कहा कि कितने कार्य हैं जो मुझे करने नहीं चाहिए लेकिन कर रहा हूं, बुद्धि पूर्वक कर रहा हूं क्योंकि उसे कार्य को किए बिना हमारे इष्ट की सिद्ध नहीं हो रही। कभी-कभी इष्ट की सिद्धि के लिए गलत कार्य भी करना पड़ता है, गलत का समर्थन करना पड़ता है। ये संसार की ऐसी विचित्रता है और इसी के परिणाम स्वरूप मन कह देता है गलत तो नहीं कहूंगा लेकिन मैं सत्य स्वीकार नहीं करूंगा। सत्य वो अनुभूत वस्तु है जो आत्मा की पर्याय बन सकती है। ये गलत नहीं, इतने कहने मात्र से जरूरी नहीं है इसने स्वीकार कर लिया। क्या जिनेंद्र भगवान गलत हैं, सदोष हैं, बिल्कुल नहीं निर्दोष हैं इतने कहने मात्र से मत समझ लेना उसने भगवान को स्वीकार कर लिया, इतने मात्र से जरूरी नहीं है कि हमे भगवान मिल गया। हीरा तुम्हारे हाथ में आ सकता है लेकिन तुम्हें मलकियत का अनुभव हो ऐसा कोई नियम नहीं है। बैंक में मैनेजर धन को हाथ से गिनता है लेकिन उसे धनीपने का आनंद नहीं आता। धन है और धनी नहीं है, गुरु है लेकिन शिष्य नहीं है, धर्म है लेकिन वो धर्मी नहीं है, ऐसा कोई नियम नहीं है। भगवान हैं लेकिन भक्त नहीं है क्योंकि वो यह नहीं कह पा रहा है, यही सत्स्वरूप है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-large wp-image-51527" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-1024x682.jpeg" alt="" width="1024" height="682" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-1024x682.jpeg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-300x200.jpeg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-768x512.jpeg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-1536x1023.jpeg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-414x276.jpeg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-470x313.jpeg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-640x426.jpeg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-130x86.jpeg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-187x124.jpeg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-990x660.jpeg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820-1320x879.jpeg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/11/9adf9033-3f78-46d7-87e2-4d6a8d761820.jpeg 1600w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" />धर्म असीम है</p>
<p>सम्यकदर्शन से पहले की भूमिका जैसे ही तुम्हें कोई अच्छी वस्तु दिखे और तुम्हें देखने का भाव आये, समझ लेना संदेह है, आकर्षण है, शायद मिथ्यादृष्टि हो। तुम और तुम्हें कोई भी चीज देखने का भाव आए मुझे नहीं देखना पूरी जिंदगी देखते ही तो रहा हूं क्या मिला, सब सुन लिया अब कुछ नहीं सुनना। आंख, नाक, कान जिस- जिस इन्द्रिय का हमने सेवन किया, उसी पर हमारी शक्ति क्षीण होती गई। पहले थर्मामीटर है बोरियत, दूसरा थर्मामीटर है अरुचि, कर तो रहे हो लेकिन रुचि नहीं है, तीसरा थर्मामीटर है तुम्हें थकान तो महसूस नहीं हो रही है, विराम का भाव तो नहीं आ रहा है। आप उसे देखिए जिसमें आपकी आंख थके नहीं, वो साधना करो। कोई आज तक दावा कर सके तो बताओ कि मैंने ऐसी चीज देखी है जिसमें मेरी आंख थकती नहीं है बल्कि आंखों की ज्योति और बढ़ती है। कभी हुआ है ऐसा? नही, इसलिए अपन सब कुछ देखते हुए भी सही नहीं देख पा रहे हैं, सही वह है जिसमें आंख थकती नहीं है। एक पाप ऐसा बताओ, जिसको करने के बाद कोई भी व्यक्ति थकता नहीं हो, थकता है, पाप असीम नहीं हो सकता और धर्म वो चीज है जिसमें गैप की जरूरत न पड़े, धर्म असीम है और हमने धर्म को सीमित कर दिया, पाप को असीमित कर दिया। मन्दिर जाने की सीमा है और घर जाने की कोई सीमा नहीं। इस दौरान सभी विद्वान पूरे जगत में धर्म का परचम लहरा रहे हैं। 29 अक्टूबर से शुरू हुए श्री समयसार प्रशिक्षण शिविर का समापन 9 नवम्बर को होगा। इसके साथ ही श्री दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति आगामी आयोजनों की तैयारियों में जूट गई है।</p>
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		<title>अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला सम्मेलन :     नारी गौरव की उपाधि से विभूषित हुईं  डॉ. इन्दु जैन </title>
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		<pubDate>Wed, 01 Nov 2023 11:26:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[निर्यापक मुनि पुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं सानिध्य में आयोजित वृहद महिला सम्मेलन में जिनधर्म रक्षक संगठन की संस्थापिका, विदुषीरत्न डॉ.इन्दु जैन राष्ट्र गौरव को अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला सम्मेलन में नारी गौरव की उपाधि से सम्मानित किया। पढ़िये ये विशेष रिपोर्ट&#8230; आगरा। निर्यापक मुनि पुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं [&#8230;]]]></description>
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<p>निर्यापक मुनि पुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं सानिध्य में आयोजित वृहद महिला सम्मेलन में जिनधर्म रक्षक संगठन की संस्थापिका, विदुषीरत्न डॉ.इन्दु जैन राष्ट्र गौरव को अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला सम्मेलन में नारी गौरव की उपाधि से सम्मानित किया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िये ये विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>आगरा। निर्यापक मुनि पुंगवश्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं सानिध्य में आयोजित वृहद महिला सम्मेलन में जिनधर्म रक्षक संगठन की संस्थापिका, जैनधर्म-दर्शन-संस्कृति-प्राकृत-अपभ्रंश,संस्कृत-हिन्दी भाषा,ब्राह्मी लिपि के संरक्षण-संवर्धन में निरंतर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने एवं नवीन संसद भवन के ऐतिहासिक भूमि पूजन एवं उद्घाटन समारोह में जैनधर्म का प्रतिनिधित्व कर जैन समाज को गौरवान्वित करने वालीं, विद्वत् परिषद की सदस्या, शाकाहार प्रचारक, अंतरराष्ट्रीय जैन प्रतिनिधि, विदुषीरत्न डॉ.इन्दु जैन राष्ट्र गौरव को अखिल भारतीय दिगंबर जैन महिला सम्मेलन में भारत के विभिन्न प्रांतों से आईं लगभग 5000 महिलाओं के वृहद सम्मेलन में श्री दिगंबर जैन महिला महासमिति की राष्ट्रीय अध्यक्षा शीला जैन डोडिया एवं महामंत्री इंदु गांधी, डॉ.ऋचा जैन एवं महिला महासमिति की मुख्य पदाधिकारियों द्वारा ताज पहनाकर एवं प्रशस्ति पत्र देकर नारी गौरव की उपाधि से सम्मानित किया। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने जिनधर्म रक्षकसंगठन के माध्यम से नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ने एवं जैनधर्म की निरंतर प्रभावना करने के लिए डॉ. इन्दु जैन को आशीर्वाद दिया ।</p>
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		<title>भगवान अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक मनाया गया : सोच को बदला जा सकता है सत्य को नहीं &#8211; मुनि सुधासागर महाराज </title>
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		<pubDate>Sun, 26 Mar 2023 12:24:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव जगतपूज्य मुनिपुंगव सुधासागर महाराज के सानिध्य में बडी धूमधाम से मनाया गया। मुनिश्री के सानिध्य में अतिशयकारी मूल नायक भगवान अजितनाथ का महामस्तकाभिषेक किया और शांति धारा की गई। पढ़िए राजीव सिंघाई की विशेष रिपोर्ट&#8230; महरौनी (ललितपुर)। भगवान अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव जगतपूज्य मुनिपुंगव सुधासागर महाराज के सानिध्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव जगतपूज्य मुनिपुंगव सुधासागर महाराज के सानिध्य में बडी धूमधाम से मनाया गया। मुनिश्री के सानिध्य में अतिशयकारी मूल नायक भगवान अजितनाथ का महामस्तकाभिषेक किया और शांति धारा की गई। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजीव सिंघाई की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी (ललितपुर)।</strong> भगवान अजितनाथ का मोक्ष कल्याणक महोत्सव जगतपूज्य मुनिपुंगव सुधासागर महाराज के सानिध्य में बडी धूमधाम से मनाया गया। मुनिश्री के सानिध्य में अतिशयकारी मूल नायक भगवान अजितनाथ का महामस्तकाभिषेक किया और शांति धारा की गई। शांतिधारा करने का सौभाग्य प्रशांत सिंघई बंटी एवं प्रमोद सिंघई को प्राप्त हुआ, वहीं पांडूशिला पर शांतिधारा भागचंद सिलौनिया और अनिल मिठया द्वारा की गई। इस मौके पर निर्वाण लाडू चढ़ाया गया।</p>
<p><strong>धर्मसभा को किया संबोधित</strong></p>
<p>यशोदय तीर्थ पर मुनिपुंगव सुधासागर महाराज ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बहुत कुछ करने की इच्छा है लेकिन कुछ नहीं कर पा रहे। अतृप्त होकर जो मरते हैं, वह व्यंतर की योनि में भटकते रहते हैं। सोच को बदला जा सकता है लेकिन सत्य को नहीं बदल सकते। अपनी दृष्टि सही हो तो सत्य को खोजने के लिए किताबों की आवश्यकता नहीं है। सृष्टि को नहीं दृष्टि को बदलो, तभी उद्धार होगा । मिथ्यात्व यह है कि हम अपने स्वार्थ के लिए हर गलत क्रिया को भी सही मान रहे हैं। सत्य को बदला नहीं जा सकता है परन्तु सोच को सत्य के साथ बदल सकते हैं।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-40862" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024.jpg" alt="" width="1600" height="1200" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/03/IMG-20230326-WA0024-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" /></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>श्रीफल अर्पित किया</strong></p>
<p>ललितपुर से वाहन रैली के रूप में सैकड़ों युवा मुनिश्री सुधासागर महाराज के दर्शन किए पधारे और दिगम्बर जैन पंचायत ललितपुर के अध्यक्ष अनिल अंचल के नेतृत्व में सभी ने मुनि संघ को श्रीफल अर्पित कर ललितपुर के सानिध्य हेतु निवेदन किया। मुनिश्री सुधासागर महाराज को आहार देने का सौभाग्य अजित खंजाची और क्षुल्लक गम्भीर सागर को आहार देने का सौभाग्य अनिल दिलीप मिठया को प्राप्त हुआ।</p>
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