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	<title>Special Articles श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का समाधिमरण :  राष्ट्र निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध थे आचार्य श्री </title>
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		<pubDate>Sun, 25 Feb 2024 07:48:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी, देशवासियों के हृदय और मन-मस्तिष्क में सदैव जीवंत रहेंगे। आचार्य जी के संदेश उन्हें सदैव प्रेरित और आलोकित करते रहेंगे। पढ़िए उनके महाप्रयाण पर सुरेश जैन(आईएएस) और न्यायमूर्ति विमला जैन का विशेष आलेख आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने 6 फरवरी, 2024 को अपना आचार्य पद [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज जी, देशवासियों के हृदय और मन-मस्तिष्क में सदैव जीवंत रहेंगे। आचार्य जी के संदेश उन्हें सदैव प्रेरित और आलोकित करते रहेंगे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए उनके महाप्रयाण पर सुरेश जैन(आईएएस) और न्यायमूर्ति विमला जैन का विशेष आलेख</span></strong></p>
<hr />
<p>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने 6 फरवरी, 2024 को अपना आचार्य पद अपने द्वारा सर्वप्रथम दीक्षित ज्येष्ठ और श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण समयसागर जी महाराज को सौंप दिया तथा 14 फरवरी, 2024 को उन्होंने उपवास और अखण्ड मौन लेकर परम समाधि की दिशा में प्रस्थान शुरू कर दिया। आचार्य श्री विद्यासागर जी के त्याीग और वैराग्य के यश का जो सूर्य 1970 और 1980 के दशक में नैनागिरि में चमकना शुरू हुआ था, वह 2024 में चन्द्रगिरि में अस्त हो गया। उनके अंतिम दर्शन के लिए शताधिक आध्यासत्मिक संत, अनेक राजनेता तथा लाखों श्रद्धालु चन्द्रगिरि पहुंच गए।</p>
<p><strong>आचार्य विद्यासागर जी </strong><br />
जन्म् 10 अक्टूबर 1946<br />
महाप्रयाण 18 अक्टू्बर 2024</p>
<p>2. 17 और18 फरवरी 2024 की अर्धरात्रि में 2.30बजे जन-जन के आराध्य विद्यासागर जी के महाप्रयाण से भले ही पूरे अध्या्त्म् जगत को असाधारण क्षति हुई तद्यपि विद्याधर ने विद्यासागर के पथ पर सतत चलते हुए चन्द्रणगिरि अतिशय क्षेत्र पर समाधिमरण का परम लक्ष्य प्राप्त कर लिया। हम श्रमण परंपरा के इस ध्रुवतारे के चरणों में अपनी भावपूर्ण विनायांजलि समर्पित करते हैं।</p>
<p>3. मध्य प्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश पर जैन मुनि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के देहावसान पर राज्य शासन के द्वारा प्रदेश में 18 फरवरी 2024 को आधे दिन का राजकीय शोक घोषित किया गया। इस दौरान राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहा तथा राजकीय समारोह-कार्यक्रम आयोजित नहीं किए गए।<br />
4.देश के प्रायः सभी मुनिवरों ने 18 फरवरी 2024 को उपवास किया। जैन समाज के सभी आचार्यों, मुनिवरों, हिन्दू समाज, राष्&#x200d;ट्रीय स्वयं सेवक संघ, सिख समाज और मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों ने उनके प्रति अपनी विनयांजलि प्रस्तुत कर यह सिद्ध कर दिया कि आचार्य विद्यासागर सहस्रों जैन संतों के ही नहीं अपितु देश के वरिष्ठतम संत रहे है। विद्यासागर जी ने सहस्रों संतों के रूप में चल तथा अनेक विशाल मंदिरों के रूप में अचल तीर्थों का निर्माण किया। देश के अनेक बुद्धिजीवियों ने इन तीर्थों के निर्माण की मुक्त कंठ और अश्रुपूरित नयनों से सराहना की।</p>
<p>5.यह उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले में जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर दूर स्थित डोंगरगढ़ नगर मां विमलेश्वदरी देवी के लिए प्रसिद्ध है। इसी पहाड़ी के समीप स्थित चन्द्र गिरि पर्वत पर भगवान चन्द्ररप्रभु मंदिर के निर्माणाधीन परिसर में ही आचार्य श्री अपने जीवन के अंतिम दिनों में विराजमान रहे। श्री स्वरदेश उत्तेमचन्द्र डोंगरगांव (अमरमौ) ने गुरुदेव के समाधिस्थ होने की जानकारी तुरंत ही नैनागिरि में हमें, हमारे प्राचार्य श्री सुमति प्रकाश जैन के माध्येम से दी। कुछ क्षण के लिए हम निशब्द और स्तब्ध हो गए। जैन जगत ही नहीं, बल्कि विश्व् मानव समुदाय को अपूरणीय आध्यात्मिक क्षति हो गई।</p>
<p>6.नैनागिरि तीर्थ पर भगवान पार्श्वनाथ की विशाल तदाकार मूर्ति पार्श्वनाथ के 73 वें महामस्तकाभिषेक के अवसर पर आचार्य श्री के स्वस्थ&#x200d; होने के लिए 17 फरवरी, 2024 को प्रभु से हम सबने विशेष प्रार्थना की। रात्रि में ही आचार्य श्री देह से विदेह के पथ पर प्रस्थावन कर गए। 18 फरवरी 2024 को नैनागिरि तीर्थ पर आयोजित सभा में आचार्य श्री को विनयांजलियां प्रस्तुत करते समय हर आंख नम हो गईं। श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए। इस सभा में मध्यकप्रदेश उच्च न्यायालय तथा जिलों के न्यायाधीश, प्रदेश सरकार के प्रशासन, पुलिस, अभियांत्रिकी आदि प्रायः सभी विभागों के वरिष्ठ्तम शताधिक अधिकारियों ने अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित की। नैनागिरि तीर्थ के अध्यक्ष सुरेश जैन और मंत्री राजेश रागी ने गुरुदेव के अवदान को अपनी अश्रुपूरित भावनाओं के साथ स्&#x200d;मरण करते हुए अभिव्यवक्त किया कि गत शताब्दी के सत्तर और अस्सी के दशक में उनसे प्राप्त आत्मीय स्नेह की विराट पूंजी हमें सदैव स्वस्थ और प्रसन्न रखती है।</p>
<p>7.जन-जन मुख से निकली मन शुद्धि, वचन शुद्धि और काय शुद्धि की अनंत उद्घोषणाओं ने आचार्य श्री के प्रत्येक अंग और प्रत्यंग को पवित्र किया है। उनकी वाणी को मुखरता और पावनता प्रदान की है। नैनागिरि स्थित सिद्धशिला से मोक्ष पधारे वरदत्ताादि मुनिवरों ने आचार्य श्री को अत्ययधिक प्रभावित किया। भगवान पार्श्वनाथ की पावन रजकणों ने उन्हें अनुपम ऊर्जा प्रदान की। मध्य प्रदेश के आध्यात्मिक विकास के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया। गुरुदेव की दिव्य दृष्टि और सौम्या स्मित हास्य ने हमें और देश-विदेश में बसे हमारे पूरे परिवार को सदैव प्रभावित किया है। तत्कालीन न्यायमूर्ति विमला जैन जैसी युवतियों और अशोक पाटनी और हम जैसे प्रगतिशील युवकों को उन्होंने अपरिमित साहस और असाधारण आत्मविश्वास से समृद्ध किया है। हम सबके वयस्क जीवन को आध्यात्मिकता से आपूरित किया है। इस प्रकार 45 वर्षों तक उनके साथ रहे आत्मीय संपर्कों की स्मृातियां हमारे मन और मस्तिष्क में सदैव जीवंत रहेंगी।</p>
<p>8.आचार्य श्री का नैनागिरि तीर्थ से विशेष लगाव रहा। परिणामतः वर्ष 1978, 1981 और 1982 में नैनागिरि में आचार्य श्री के तीन चातुर्मास हुए। दो ग्रीष्मकालीन और दो शीतकालीन वाचनाएं हुई। आध्यात्मिक समृद्धि के इन सात सौ दिनों के अमृतकाल में आचार्य श्री के संघस्थ् साधुओं की संख्या में 15 गुना वृद्धि हुई। उनकी प्रेरणा से अस्सी के दशक में नैनागिरि के महावीर सरोवर में विशाल समवसरण मंदिर का निर्माण हुआ और उनके ही सान्निध्य में वर्ष 1987 में इस मंदिर में विराजमान भगवान पार्श्वनाथ की चार विशाल प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा संपन्न हुई।</p>
<p>9.नैनागिरि के इसी पंचकल्याणक एवं गजरथ महोत्सव के अवसर पर 11 फरवरी 1987 को गुरुदेव ने देश की 9 भाषाओं में अनुवादित अपने विश्व प्रसिद्ध मूकमाटी महाकाव्य का समापन किया। इस संबंध में आचार्य श्री की निम्नांकित पंक्तियां सतत पठनीय और स्मरणीय हैं..<br />
मढ़िया जी , जबलपुर में द्वितीय वाचना का काल था। सृजन का अथ हुआ और नयनाभिराम नैनागिरि में पूर्ण पथ हुआ। समवसरण मंदिर बना, जब गजरथ हुआ।</p>
<p>10. नैनागिरि में प्रवेश के अवसर पर सन् 1978 में आचार्य श्री के तीन शिष्य थे। तीव्र गति से बढ़ते हुये शिष्यों- शिष्याओं की संख्या 1987 में 45 हो गई। नैनागिरि में ही 1987 में 11 आर्यिकाओं और 12 क्षुल्लकों की दीक्षा संपन्न हुई। देश में इतनी बड़ी संख्या में सर्वप्रथम आर्यिका दीक्षा हुई। इस प्रकार प्रथम दशक 1978 से 1987 की अवधि में संघस्थ संतों की सदस्य संख्या में 15 गुनी वृद्धि हो गई।</p>
<p>11.गत शताब्दी के सातवें और आठवें दशक में नैनागिरि में विराजमान रहते हुए आचार्य श्री के आध्याात्मिक व्यक्तित्व ने तेजी से हिमालयीन ऊंचाई प्राप्त की। पूरे बुन्देलखण्ड में आध्यात्मिक क्रांति ने जन्म लिया। आचार्य पुष्पदंतसागर, उपाध्या य गुप्तिसागर, मुनिवर क्षमासागर तथा मुनिवर सुधासागर आदि संतों ने नैनागिरि में दीक्षा प्राप्त&#x200d; कर अपने आचार्य को सर्वोच्च ऊंचाई प्रदान की। सहस्रों युवक-युवतियों ने मोक्ष पर आगे बढ़ने के व्रत लिए। नैनागिरि में सांस्कृुतिक संस्कारों की धारा तीव्र गति से निकली और पूरे राष्ट्र में प्रवाहित हुई। यहां जन्में संतों की आध्यात्मिक ऊर्जा पूरे देश में उद्घाटित हुई। सर्वत्र विकीर्ण हुई।</p>
<p>12.आचार्य श्री की प्रेरणा से पूरे देश में 57 विशाल मंदिरों का निर्माण और पंचकल्याणक संपन्न हुए। इनमें से नैनागिरि का समवसरण मंदिर, कुण्डलपुर का सहस्रकूट मंदिर, इन्दौर, भोपाल, नेमावर और अमरकण्टक के विशाल मंदिर की चर्चा पूरे विश्व् में की जाती है। सागर में भाग्योदय चिकित्साकलय, जबलपुर में पूर्णायु आयुर्वेदिक कॉलेज स्थापित हुआ। 120 से अधिक गौशालाएं स्थापित हुईं, जिनके द्वारा हजारों गायों की रक्षा हो रही है।</p>
<p>13. पूज्य विद्यासागर जी की अनुकंपा से बालिकाओें को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के उद्देश्य से देश के इन्दौर, जबलपुर, टीकमगढ़, डोंगरगढ़ और ललितपुर में प्रतिभास्थ्ली स्थापित की गई। जिनके द्वारा सहस्रों बालिकाओ को संस्कारित, शिक्षित और प्रशिक्षित किया जा रहा है। प्रदेश की जेलों में संस्थापित हाथकरघा केन्द्रों से सैकड़ों कैदियों को नई जिन्दगी मिली।</p>
<p>14.आचार्य विद्यासागर जी संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, मराठी और कन्नड़ के विद्वान रहे हैं। उन्होंने हिन्दी और संस्कृत में अनेक रचनाएं की हैं। सौ से अधिक शोधार्थियों ने उनके साहित्य का अध्ययन कर मास्टर्स और पीएचडी की उपाधियां प्राप्त कीं। आचार्य विद्यासागर जी के शिष्य मुनि क्षमासागर जी ने उन पर आत्मान्वेषी जीवनी लिखी है। आचार्य श्री की दीक्षा के दुर्लभ मूल चित्र विदेश से लाकर इस जीवनी में सर्वप्रथम प्रकाशित कराने का हमें परम सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद भी भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो चुका है। मुनि प्रणम्यसागर जी ने उनके जीवन पर अनासक्त महायोगी नामक काव्य की रचना की है।</p>
<p>15.भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी सहित शताधिक नेताओं ने आचार्य श्री के असाधारण अवदान का स्मरण किया। मोदी जी नई द&#x200d;िल्ली में आयोज&#x200d;ित भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में जैन आचार्य विद्यासागर को याद कर भावुक हो गए। उन्होंने समस्त देशवासियों की ओर से श्रद्धा और आदरपूर्वक नमन करते हुए विनयांजलि प्रदान की। पूरे देश तथा प्रदेश के जैन समाज के व्यवसायियों ने अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रखे।</p>
<p>16. यह अत्यधिक सराहनीय है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा आचार्य श्री के अवदान पर लिखित अत्यं&#x200d;त सामयिक लेख सम्यक ज्ञान, दर्शन और चरित्र की त्रिवेणी शर्षक से दैनिक भास्कार में, जीवन का हर अध्याय अद्भुत ज्ञान, असीम करुणा और मानवता के उत्थान की प्रतिबद्धता से सुशोभित रहा शीर्षक से पत्रिका में, हमने एक अद्भुत मार्गदर्शक खो दिया है शीर्षक से पीपुल्स समाचार में तथा राष्ट्र हित की सोचते थे आचार्य श्री राज एक्ससप्रेस में 21 फरवरी को प्रकाशित किया गया। इस लेख के माध्यम से मोदी ने आने वाली पीढ़ियों से आग्रह किया कि राष्ट्र निर्माण के प्रति आचार्य श्री की प्रतिबद्धता और पक्षपात विहीन विचारों का व्यापक अध्ययन करें।</p>
<p>17. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपनी शोक संवेदना व्यक्त की। मंत्री चैतन्य कश्यप ने आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की अंतिम यात्रा में शामिल होकर मध्यप्रदेश सरकार की ओर से श्रद्धांजलि दी। मंत्री उदय प्रताप सिंह ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर का आदर्शपूर्ण जीवन हम सबको निरंतर सच्चे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित करता रहेगा।</p>
<p>18 . विद्यासागर जी का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को विद्याधर के रूप में कर्नाटक के बेलगांव जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। आचार्य शांतिसागर जी के शिष्य आचार्य ज्ञानसागर ने विद्यासागर जी को 30 जून 1968 में अजमेर में 22 वर्ष की आयु में दीक्षा दी और 22 नवम्बर 1972 को आचार्य पद प्रदान किया गया। वे पूरे भारत में ऐसे विरले आचार्य हैं जिनका पूरा परिवार ही संयम के साथ मोक्षमार्ग पर चल रहा है। उनके गृहस्थ जीवन तथा आध्याात्मिक जीवन के वृहत परिवार के सभी मुनिवरों एवं आर्यिकाओं को शत-शत वंदन।</p>
<p>19. आचार्य समयसागर जी के चरणों में अनंत प्रणाम करते हुए उनसे प्रार्थना है कि वे पारस रज और अपने गुरुवर की पावन पगतलियों से पवित्र पथ पर चलते हुए नैनागिरि की सिद्धशिला पर बैठकर तपस्या करें और सिद्धत्व के पथ पर अपने यश और कीर्ति की पताका पूरे विश्व में लहराते रहें।<br />
<strong>प्रस्तुति &#8211; राजेश जैन रागी</strong></p>
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		<title>अध्यात्म पथ के &#039;राही&#039; थे और उसी पथ के &#039;हीरा&#039; बन गए : आचार्यश्री शब्द का पर्यायवाची बन गए थे आचार्य विद्यासागरजी महाराज </title>
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		<pubDate>Tue, 20 Feb 2024 07:29:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अनेकों साहित्य कृतियों के साथ सैकड़ों दिगम्बर मुनियों व हजारों चैतन्य कृतियों के प्रेरणा पुंज आचार्य विद्यासागरजी ने जैन दर्शन के प्रति जो समर्पण किया है वह स्तुत्य है, शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है। पढ़िए राजेन्द्र जैन &#8216;महावीर&#8217;, सनावद का विशेष विनयांजलि आलेख&#8230; सनावद। जैन समाज हो या जैनेतर समाज सभी के बीच [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>अनेकों साहित्य कृतियों के साथ सैकड़ों दिगम्बर मुनियों व हजारों चैतन्य कृतियों के प्रेरणा पुंज आचार्य विद्यासागरजी ने जैन दर्शन के प्रति जो समर्पण किया है वह स्तुत्य है, शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजेन्द्र जैन &#8216;महावीर&#8217;, सनावद का विशेष विनयांजलि आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> जैन समाज हो या जैनेतर समाज सभी के बीच यदि &#8216;आचार्यश्री&#8217; शब्द निकल जाए तो आम जनमानस के मन में एक ही छवि उभरती है वह है आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज की। आमजन जिनको एक झलक पाने को घण्टों कतार में इंतजार करते हैं। अनेक सेलीब्रिटी, राजनेता उनकी चर्चा अनुसार अपना कार्यक्रम सेट करते हैं, मीलो पैदल चलते है, एक मधुर मुस्कान के पीछे दीवाने हो जाते है, ऐसे आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के जीवन में आखिर ऐसा क्या था, यह जानने के लिए हमें अपनी चर्चा के साथ उनका अभूतपूर्व साहित्य जो उन्होंने मौलिक रुप से सृजन किया है उसे पढ़ना बहुत आवश्यक है। अनेकों साहित्य कृतियों के साथ सैकड़ों दिगम्बर मुनियों व हजारों चैतन्य कृतियों के प्रेरणा पुंज आचार्य विद्यासागरजी ने जैन दर्शन के प्रति जो समर्पण किया है वह स्तुत्य है, शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है। आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज ने उन्हें कड़ी परोक्षा में उत्तीर्ण पाया और 30 जून 1968 को दिगम्बर मुनि दीक्षा प्रदान की तब कोई नहीं जानता था कि वे जैन धर्म के समर्थ आचार्य बनेंगे। आचार्यश्री ज्ञानसागरजी महाराज ने 22 नवंबर 1972 को मुनिश्री विद्यासागरजी को आचार्य पद प्रदान करते हुए स्वयं उनका निर्यापकत्व स्वीकार किया, यह घटना जैन इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। आचार्य पद व शिष्यत्व दोनों पदों से न्याय करते हुए उन्होंने ज्ञानसागरजी महाराज की ऐसी सेवा की जो उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम बनाती है।</p>
<p>संत शिरोमणि की समाधि मेरी अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी</p>
<p>17 फरवरी 2024 की मध्यरात्रि 2.35 बजे छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरि तीर्थ पर आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज ने सल्लेखना समाधिपूर्वक इस नश्वर देह को त्यागा तो संपूर्ण राष्ट्र में शोक की लहर छा गई। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय अधिवेशन में आचार्यश्री की समाधि को अपूरणीय व व्यक्तिगत क्षति बताया। रुंधे गले से भावुक होकर उन्होंने कहा कि मैं विगत कुछ माह पहले ही उनके दर्शन लाभ लेकर आया था। तब मुझे नहीं पता था कि उनके दर्शन अब दोबारा नहीं होंगे। उल्लेखनीय है कि विगत 5 नवंबर 2023 को चंद्रगिरि डोंगरगढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आचार्यश्री के दर्शन कर राष्ट्र के लिए मार्गदर्शन लिया था । 55 वर्षों से दिगम्बरत्व का अनुषीलन कर &#8216;मूकमाटी&#8217; जैसा महाकाव्य प्रदान करने वाले आचार्य विद्यासागरजी आज &#8216;आचार्यश्री&#8217; शब्द का पर्याय बन गए है। यह उपलब्धि एक दिन की नहीं लगातार 55 वर्ष दिगम्बरत्व की साधना की है व लगातार आचार्य पद पर 50 वर्षों की तपस्या के साथ अपनी चर्या के प्रति न्याय की पराकाष्ठा है जो उन्हें जगतपूज्य &#8216;आचार्यश्री&#8217; बनाती थी ।</p>
<p>दिगम्बर जैन धर्म की अनादिकालीन परम्परा में दिगम्बर साधु का स्वरुप, उनकी चर्चा, उनका आचार विचार आदि सभी पर विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है । वर्तमान युग उस वर्णन को पढ़कर अपनी बुद्धि, विवेक से मूल्यांकन करता है, सबके अपने-अपने तरीके होते है । वस्तु का स्वरुप समझाने वाले जैन दर्षन में सबसे पहले कहा जाता है कि सबसे पहले स्वयं को देखों, स्वयं को समझो, तभी आप इस जैन दर्षन व संसार को समझ सकते हो। 10 अक्टूबर 1946 शरद पूर्णिमा की रात्रि में जन्में विद्याधर के बारे में जब हम पढ़ते है तो हमें बड़ा आश्चर्य होता है, वर्तमान समय का ऐसा परिवार जहां परिवार के सारे के सारे सदस्य माता-पिता, भाई-बहन सभी दिगम्बर पथ के अनुयायी हुए हो, ऐसा देखने-सुनने को नहीं मिलता।</p>
<p>कन्नड़ भाषी &#8216;विद्याधर&#8217; वास्तव में विद्याधर थे जिन्होंने अपने गुरु आचार्य ज्ञानसागरजी के कथन &#8220;पढ़ लेना, तुम भी पढ़ लेना, अभी तक पढ़ने वाले तुम्हारे जैसे कई ब्रह्मचारी और भी आये है, लेकिन सब पढ़कर चले गए रुका कोई नहीं।&#8221; अपने गुरु का यह कथन सुनकर जीवन में कुछ करने निकले विद्याधर ने अपना संकल्प इस तरह व्यक्त किया कि &#8220;मैं आज से जीवन पर्यन्त वाहन/यान आदि सभी आवागमन के साधनों का त्याग करता हूँ, जितना चलूंगा अब आपकी आज्ञा से आपके पीछे-पीछे ही चलूंगा। अपनी कृपा बनायें।&#8221; इतने कठोर संकल्प को दृढ़ निश्चय के साथ सहज में ले लेने वाले संत षिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज लोकपूज्य थे। जैन दर्शन की आन-बान-शान थे, उनका यह संकल्प न केवल गुरु के प्रति निष्ठा को प्रदर्षित करता है। बल्कि यह संदेष देता है कि यदि जीवन में कुछ भी पाना है तो गुरु शरण में समर्पित हो जाओं, सौदेबाजी मत करों। समर्पण में इतिहास बनता है, सौदेबाजी समाप्त कर देती है।सक्षम गुरु के समर्थ षिष्य थे समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज 1969 से नमक, बूरा, शक्कर आदि का त्याग कर दिया था स्वर्ण के समान चमकने वाले गुरुवर आचार्यश्री दीक्षा के एक वर्ष बाद ही नमक, बूरा, शक्कर आदि का त्याग कर दिया था। यह उनकी दिगम्बरत्व के प्रति निष्ठा व समर्पण का परिचायक था। आपने 1985 में चटाई का भी त्याग के बाद ही 1994 में सभी वनस्पतियों को त्याग कर एक अलौकिक संत बने थे । आपको देखकर अनेक श्रावक-श्राविका बिना कहे त्याग करने को आतुर हो जाते थे। आपकी मधुर मुस्कान के दीवाने युवा अपना सब कुछ (संसार की भाषा में) छोड़कर अपना ही सब कुछ (आत्मज्ञान) पाने को दिगम्बरत्व स्वीकार कर लेते थे ।</p>
<p><strong>साहित्य के शिरोमणि थे आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज</strong></p>
<p>75 से अधिक समर्थ कृतियों को जन्म देने वाले आचार्यश्री साहित्य के षिरोमणि थे, कन्नड़, मराठी, बंगला, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंष, हिन्दी, अंग्रेजी के कुषल अध्येता ने जब कलम चलाई तो जो निकला वह नवनीत आज भी जन-जन के अधरों पर है व आचार्य विद्यासागरजी महाराज ऐसे पहले आचार्य थे जिनके साहित्य, व्यक्तित्व, कृतित्व पर लगभग सौ से अधिक पी.एच.डी. की गई है। आपके द्वारा रचित &#8216;मूकमाटी&#8217; महाकाव्य तो विश्विद्यालयों के कोर्स में सम्मिलित होकर अनेक अध्येताओं का प्रिय विषय है। वे मूकमाटी में कहते है &#8216;राख&#8217; का उलट &#8216;खरा&#8217; होता है व &#8216;राही&#8217; का उलट &#8216;हीरा&#8217; होता है। ये उनको अभिव्यक्ति अनेकजनों को &#8216;खरा&#8217; बनाने व &#8216;हीरा&#8217; बनाने की ओर अग्रसर करती है। आचार्यश्री ने अपने नश्वर शरीर को भले ही &#8216;राख&#8217; बना लिया हो लेकिन वे अपने आपको &#8216;खरा&#8217; बनाकर ही हमारे बीच से गए। वे अध्यात्म पथ के &#8216;राही&#8217; थे और उसी पथ के &#8216;हीरा&#8217; बन गए। यह उनकी कथनी करनी की साम्यता का परिचायक है।</p>
<p><strong>बुन्देलखण्ड के जन-जन में विराजमान थे आचार्य विद्यासागरजी महाराज</strong></p>
<p>आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज की प्रिय भूमि बुन्देलखण्ड व मध्यप्रदेश हीरही है। आचार्यश्री से जब पूछा गया कि आप बन्देलखण्ड में क्यों ज्यादा रहते हैं तो उन्होंने कहा कि आप अपनी दुकान कहां खोलना चाहेंगे तो उत्तर आया कि जहां ग्राहक ज्यादा हो तो आचार्यश्री ने कहा कि बुन्देलखण्ड में हमारे ग्राहक ज्यादा है इसलिए हमें बुन्देलखण्ड प्रिय है। बुन्देलखण्ड के प्राचीन तीर्थ द्रोणगिरि, नैनागिरिजी, आहारजी, पपौराजी, कुण्डलपुर आदि ऐसे तीर्थ है जो घनघोर जंगल में है। ये सभी तीर्थ आचार्यश्री की पसंदीदा जगह थी। नैनागिरिजी को सिद्धशिला को &#8216;मूकमाटी&#8217; पूर्ण कराने का सौभाग्य प्राप्त है। प्रकृति प्रिय आचार्यश्री के सबसे ज्यादा शिष्य आज भी बुन्देलखण्ड के ही हैं। जिन्होंने आचार्यश्री के प्रति अपना सब कुछ समर्पित किया है। ग्राम ग्राम, गली-गली जैन जैनेत्तर समाज भी आचार्यश्री की एक मुस्कान के पीछे बुन्देलखण्ड दीवाना बना हुआ था।</p>
<p><strong>मांस निर्यात विरोध व गौशाला के प्रेरक</strong></p>
<p>मांस निर्यात के विरोध में आवाज उठाकर सबसे पहले पशुओं के संरक्षण की आवाज आचार्यश्री ने पुरजोर तरीके से उठाई व गौशालाएं खोलने का आह्वान किया था। उनकी प्रेरणा से देश में सैकड़ों गौशालाएं संचालित है। मध्यप्रेदश सरकार ने तो आचार्यश्री विद्यासागर गौ संवर्धन बोर्ड का गठन किया है। जिसके तहत गायों का संरक्षण किया जाता है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को अनुदान व गाय प्रदान की जाती है। बोनाबरहा में &#8220;शांतिधारा&#8221; दुग्ध योजना एक महत्वपूर्ण योजना है। आचार्यश्री ने जहां मांस निर्यात का विरोध किया वहीं उसके उपाय बताते हुए गायों के संरक्षण के कारगर उपाय प्रस्तुत किये जो लाखों-करोड़ों जीवों के प्रति करुणा का कारण है। धन्य थे ऐसे युग प्रवर्तक आचार्यश्री। जिन्होंने प्राणी मात्र के प्रति अपने करुणा भाव को प्रदर्शित करते हुए करोड़ो मूक पशुओं का उपकार किया।</p>
<p><strong>संस्कारों के साथ हिन्दी और आयुर्वेद के हिमायती थे आचार्यश्री</strong></p>
<p>बच्चों में संस्कृति के संस्कार प्रवाहमान हो इस हेतु प्रतिभास्थली जैसी संस्थाओं का गठन व &#8216;इण्डिया नहीं भारत कहो&#8217; हिन्दी बोलो, हिन्दी के संरक्षण के प्रयास आचार्यश्री की दूरगामी सोच को प्रदर्शित करती है। भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अध्यक्ष के कस्तूरीरंगन द्वारा शिक्षा नीति के बारे में आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज के सुझावों को शामिल किया गया। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा में शिक्षा को प्रधानता दी गई है जिसमें आचार्यश्री का मातृभाषा अभियान सार्थक हुआ है। पूर्णायु आयुर्वेदिक विष्वविद्यालय के माध्यम से भारतवर्ष की प्राचीन चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने के साथ प्रतिभा स्थली के माध्यम से अनेक प्रतिभाओं को समुत्रत बनाने का कार्य हो रहा है। राष्ट्रकल्याण की सार्वभौमिक सोच रखने वाले दूरदृश समाधिस्थ आचार्यश्री को सादर नमन है, वंदन है। जिन्होंने स्व कल्याण के साथ राष्ट्र कल्याण का भाव रखते हुए समूचे राष्ट्र का मार्गदर्शन किया।</p>
<p><strong>हथकरघा से अहिंसा का शंखनाद</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने हथकरघा उद्योग को प्रोत्साहित कर अहिंसा से आजीविका को जोड़ा, आज अहिंसा का शंखनाद हथकरघा उद्योग से कर भारतवर्ष को एक नई दिशा प्रदान की है जो संपूर्ण देश में अच्छा प्रतिसाद दे रही है। आज इस योजना से हजारों हाथ जुड़े है व तेजी से इस अहिंसक योजना को आमजन स्वीकार कर रहे है। ऐसे युग प्रवर्तक आचार्य भगवन ने अब तक 120 मुनिदीक्षा, 172 आर्यिका दीक्षा सहित कुल 443 दीक्षा प्रदान की है, सैकड़ों बाल ब्रह्मचारी भैया, दीदी, प्रतीक्षा में है। लाखों श्रावकों ने अनेक प्रतिमा धारण की है, त्याग मार्ग को स्वीकार किया है। ऐसे आचार्यश्री की कुछ प्रेरक कथन जो हमें उनके तलस्पर्शी ज्ञान को प्रदर्शित करते है-</p>
<p>■ जब तक &#8216;देह&#8217; के प्रति &#8216;नेह&#8217; है तब तक &#8216;गेह&#8217; भी है, जब तक &#8216;नेह-देह-गेह&#8217; है तो संदेह भी है, और जब तक &#8216;संदेह&#8217; है तब तक &#8216;विदेह&#8217; नहीं हो सकता ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ &#8216;वेतन&#8217; वाले &#8216;वतन&#8217; की ओर कम ध्यान दे पाते हैं, और &#8216;चेतन&#8217; वाले &#8216;तन&#8217; की ओर कब ध्यान दे पाते है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ तुम दिन रात बच्चों का ही नाम लेते रहते हो, इसलिए बच्चों वाले ही बने रहते हो ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ एक में &#8216;शांति&#8217; है अनेक में &#8216;अशांति&#8217; हैं, इसलिए एक (आत्मा) का ही चिंतन करें ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ &#8216;मिथ्या दृष्टि&#8217; की भक्ति का लक्ष्य &#8216;पद प्रतिष्ठा&#8217; होती है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■&#8217;सम्यकदृष्टि की भक्ति का लक्ष्य &#8216;मुक्ति&#8217; होती है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ एक किनारे से दूसरे किनारे पर जाना आसान है लेकिन मझधार से किनारे पर जाना बहुत मुश्किल है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ विवेकी खड़े-खड़े घर से निकल जाते है, और अविवेकी (अज्ञानी) को निकाल दिया जाता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ धर्म की शुरुआत मंदिर से नहीं घर से होती है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ बड़ी विडम्बना है, पषुओं के अंदर तो इंसानियत आ रही है, लेकिन मनुष्यों में पशुता आ रही है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>■ भले ही उपवास-एकासन न हो सके तो मत करना लेकिन किसी प्राणी के प्रति दुराभाव नहीं करना।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>जगत के उपकारी संत के रुप में वे संत शिरोमणि थे, अनेक उपाधियां उनके आगे इसलिए बौनी हो जाती हैं क्योंकि वे मानते हैं कि ये उपाधियां &#8216;व्याधियां&#8217; है। अपने गुरु द्वारा प्रदत्त उपाधि के साथ न्याय करते हुए वे अपने आचार्य पद को इतना प्रतिष्ठित किए हुए थे कि किसी के मुख से यदि &#8216;आचार्यश्री&#8217; शब्द निकले तो मन-मस्तिष्क में आचार्यश्री विद्यासागरजी की छवि ही ध्यान आती है, ऐसे महान आचार्य का चातुर्मास जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुआ तो म.प्र. के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान सहित उनका पूरा मंत्रिमण्डल उनकी अगवानी में कई किलोमीटर नंगे पैर कमण्डल थामे चला।</p>
<p><strong>भोपाल का वह चातुर्मास</strong></p>
<p>इतिहास के स्वर्णाक्षरों में लिखा गया जब भारत देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने अनेक मंत्रियों के साथ आचार्य संघ के दर्शन को पहुंचे थे । उल्लेखनीय है कि म.प्र. की प्रमुख राजनेता, पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती जी ने आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का शिष्यत्व स्वीकार कर उनके मार्गदर्शन में परिवार का त्याग किया है व उमा भारती दीदी नाम पाया है जो सिद्ध करता है कि आचार्यश्री जैन ही नहीं जन-जन के राष्ट्रसंत थे जिनका अभूतपूर्व त्याग, तपस्या उनके मुख मण्डल पर स्पष्ट दिखाई देता था ।</p>
<p>ऐसे युग प्रमुख आचार्य विद्यासागरजी ने अपने जीवन के 55 वर्ष से अधिक दिगम्बर मुनि के रूप में पूर्ण कर चुके हैं। हमारा यह सौभाग्य है कि हम उस युग में जन्में है जो आचार्यत्व श्री विद्यासागरजी का युग था। जिसमें हमें उनका प्रत्यक्ष रूप से आशीर्वाद प्राप्त हुआ है।</p>
<p>5 अक्टूबर 2019 में शिक्षक संदर्भ समूह के श्री दामोदरजी जैन द्वारा नेमावर में आयोजित विश्व शिक्षक दिवस पर मुझे संचालन करने व इन्दौर संभाग के तत्कालीन संयुक्त संचालक मनीष वर्मा के हाथों सम्मानित होने व आचार्यश्री के कक्ष में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 पर चर्चा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।</p>
<p><strong>अंत में आचार्यश्री का एक कथन &#8211;</strong></p>
<p>&#8220;दुनिया को समझाना बहुत आसान है अपने आपको समझाना बहुत कठिन है।&#8221;</p>
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		<title>परम पूजनीय जिनधर्म प्रभाविका आर्यिका105 सृष्टि भूषण माताजी : 26 मार्च को संयम वर्ष वर्द्धन दिवस भाव भीनी अभिव्यक्ति </title>
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		<pubDate>Sat, 25 Mar 2023 13:10:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[लेखिका &#8211; संघस्थ बाल ब्रह्मचारिणी आर्यिका श्री विश्वयशमति संकलन &#8211; राजेश पंचोलिया, इंदौर साधना और मंगल भावना की संपूर्णता का नाम है पूज्य आर्यिका 105 श्री सृष्टि भूषण माताजी जी, पूज्य माता जी ने भारतवर्ष के मध्य प्रदेश प्रांत की मुंगावली की धरा पर 23 मार्च, 1964 को श्रद्धेय पिताश्री कपूर चंद जी एवं माता [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>लेखिका</strong> &#8211; संघस्थ बाल ब्रह्मचारिणी आर्यिका श्री विश्वयशमति</p>
<p><strong>संकलन</strong> &#8211; राजेश पंचोलिया, इंदौर</p>
<p>साधना और मंगल भावना की संपूर्णता का नाम है पूज्य आर्यिका 105 श्री सृष्टि भूषण माताजी जी, पूज्य माता जी ने भारतवर्ष के मध्य प्रदेश प्रांत की मुंगावली की धरा पर 23 मार्च, 1964 को श्रद्धेय पिताश्री कपूर चंद जी एवं माता श्री पदमा देवी की बगिया में जन्म लिया। नामकरण किया सुलोचना। यह परिवार की तीसरी संतान थीं। इसे विधि का विधान कहें कि इनसे पूर्व जन्मे दोनों ही पुत्र अल्प समय में ही इस मनुष्य पर्याय से पलायन कर गए। दोनों संतानों के चले जाने के बाद आपका जन्म हुआ।</p>
<p><strong>सपनों के माध्यम से आदेशित</strong></p>
<p>आपके जन्म से पहले ही आपकी मातृश्री को सपनों के माध्यम से आदेशित किया गया कि इस संतान को अपने पास ना रख कर कहीं और परवरिश कराई जाए अन्यथा संतान भी काल के में विलीन हो जाएगी। बड़े ही व्याकुल क्षण थे। इतना सुन मां ने अपने हृदय और भावनाओं पर पत्थर रखा। आपको जन्म के कुछ क्षणों बाद आपको श्रीमती रामप्यारी बाई को सौंप दिया, जो आपके गांव की एक वरिष्ठ महिला थीं। उनके पति का देहांत भी उनके विवाह के मात्र 6 महीने बाद ही हो गया था। उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी, अत: उन्होंने आपको हृदय से लगाकर अपनी खुद की संतान से भी ज्यादा प्यार देकर पाला-पोसा और संस्कारित किया।</p>
<p><strong>सभी के आकर्षण का केंद्र थीं</strong></p>
<p>पूरे गांव की लाडली सुलोचना पूरे कुटुंब का आकर्षण थीं। मेधावी छात्र को शिक्षकों ने भरपूर स्नेह दिया। इन्होंने आत्मीयता से शिक्षा को सम्पन्न किया।</p>
<p><strong>संन्यास की ओर बढ़ते कदम</strong></p>
<p>मुंगावली की इस कन्यारत्न को संपूर्ण धरा को ही वर्ण करना था और आभूषणों बनाना था। आपके गांव में 40 वर्षों के अंतराल के बाद एक जैन संत पूज्य ज्ञान सागर जी महाराज का आगमन हुआ। आचार्य श्री ने उनके विचारों को सुना और उनकी उपयोगिता का अनुभव किया। जीवन में आए इस बदलाव ने उन को संसार से विरक्त कर संन्यास की ओर अग्रसर होने की ओर प्रेरित किया।</p>
<p><strong>नहीं रुकेगी घर में </strong></p>
<p>उनका बचपन का एक प्रसंग याद आता है। बचपन में सुलोचना जी ने आर्यिका श्री सुपार्श्वमति माताजी के दर्शन परिजनों के साथ किये थे, तब ज्योतिष की जानकार आर्यिका माताजी ने कहा कि यह बालिका बड़ी होने पर किसी साधु के दर्शन करेगी तो घर पर नहीं रुकेगी। संन्यास मार्ग पर आगे बढ़ जाएगी। इस डर के कारण परिजन इन्हें साधु आगमन पर घर से निकलने नहीं देते थे लेकिन होनहार को कौन बदल सकता है। आपके परिवार का स्नेह आपको बांध नहीं सका। आपने अलौकिक शिक्षा में ग्रेजुएशन पूरी कर 19 वर्ष की अल्पायु में ही संन्यास के मार्ग पर कदम बढ़ा दिये। और आप स्वयं में जागरण के मार्ग पर बढ़ चलीं एवं 10 वर्ष के संन्यासी जीवन के अभ्यास एवं जैन धर्म एवं अन्य शास्त्रों में निपुणता प्राप्त कर आपने गुरु आचार्य 108 श्री सुमति सागर जी महाराज एवं आचार्य 108 विद्याभूषण सन्मति सागर महाराज के वरदहस्त से 26 मार्च, 1994 को सुलोचना से आर्यिका 105 श्री सृष्टि भूषण माताजी बन गईं। आपने अपने साधु जीवन को अपनी साधना संयम व्रत एवं तपस्या से तेजोमयी बनाया और अपनी सरल हृदयता से भक्तों के हृदय में भी स्थान प्राप्त किया।आपकी मंगल वाणी से बहती भक्ति गंगा में अवगाहन कर भक्तों ने स्वयं को धन्य किया। जहां-जहां भी आपका पद विहार हुआ, भक्तों का विशाल प्रभुत्व आपके चरण रज को स्पर्श करने के लिए बढ़ता चला गया।</p>
<p><strong>लाखों की संख्या में भक्त</strong></p>
<p>आज लाखों की संख्या में आपके भक्त हैं पर फिर भी आप में वही सरलता वात्सल्य सभी के प्रति रहती है। चाहे व्यक्ति किसी वर्ग से हो, आपके लिए सब समान हैं सर्वोपरि। आपका दीप्तिमान जीवन प्रतिक्षण प्राणी मात्र के कल्याण के लिए तत्पर है। आपके और आपके आशीर्वाद से आसपास अंधियारे को प्रकाश की किरण मिटाकर दुखियारों के आंचल को सुख समृद्धि एवं मुस्कान से भर रही है।</p>
<p><strong>25 हजार किलोमीटर पदयात्रा</strong></p>
<p>आपने अपने 29 वर्षीय संयमी जीवन में करीब 25000 किलोमीटर की पदयात्रा पूरी की। जिसमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा ,गुजरात आदि के प्रांतों के नगर एवं महानगर सम्मिलित हैं। आपने दीर्घ जीवन अपने लोगों के जीवन को निकटता से देखा है। आपने ना सिर्फ किताबों अखबारों के माध्यम से बल्कि लोगों के बीच में रहकर उन को होने वाली समस्याओं को नजदीक से देखा एवं महसूस किया है। तब आपने निर्णय लिया कि आप समाज एवं राष्ट्र में शांति मानवता एवं खुशहाली स्थापित करेंगी।</p>
<p><strong>आपके कार्य हैं ये</strong></p>
<p>आपके द्वारा महानगर दिल्ली समेत सिद्ध क्षेत्र श्री सम्मेद शिखरजी झारखंड, सिद्ध क्षेत्र सोनागिर जी मध्य प्रदेश, अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी राजस्थान मैं भक्तों के सहयोग से श्री सृष्टि मंगलम फाउंडेशन जैसी संस्थाओं की स्थापना करवाई। जिसके माध्यम से हर वर्ग के लोग लाभान्वित हो सकें। साथ ही प्यारी आत्माओं जो संयम के मार्गदर्शक हैं, निर्विकल्प अपनी संयम साधना कर सकें। ऐसी व्यवस्था प्रदान की गई है और भविष्य में भी की जाती रहेंगी। आपके आशीर्वाद से एवं निर्देशन में जगह जगह निशुल्क भोजनालय खुलवाए गए। छात्रवृत्ति शिक्षण शिविर, संस्कार शिविर, पूजन विधान शिविर, वस्त्र वितरण ट्राई साइकिल, बैसाखी, कानों की मशीन, सिलाई मशीन, कंबल, निशुल्क दवाइयों के वितरण के साथ- साथ असहाय गरीब लड़कियों की शादी करवाना एवं साथ-साथ बेरोजगार परिवारों को कार्य दिलवाने के कार्य किए जा रहे हैं। कैंसर और थैलेसीमिया जैसी दो बड़ी बीमारियों को ध्यान में रखते हुए आप की प्रेरणा से गठन हुआ श्री आदि सृष्टि कैंसर ट्रस्ट का।</p>
<p><strong>अनेक सेमिनार और जागरूकता शिविर आयोजित</strong></p>
<p>अल्प समय मे ही देश के विभिन्न प्रांतों-जिलों, गांव-कस्बों के साथ विदेशों में भी जांच शिविर सेमिनार एवं जागरूकता अभियान शुरू किए गए। शासन प्रशासन का भरपूर सहयोग मिला। सरकारी योजनाओं के द्वारा लाभान्वित लोगों इलाज कराया गया एवं उसकी विस्तृत रूप में जानकारी दी गई। समाज की दान भक्ति का एक साथ सम्मेलन हुआ। आपके पुण्य प्रताप से पूरे भारतवर्ष के नामी गिरामी डॉक्टर्स का साथ मिलता चला गया। हजारों रोगियों को इसका लाभ मिलना प्रारंभ हो गया। अनेक कैंसर पीड़ित रोगियों की जीवन के प्रति निराशा एक बार फिर से आशा में प्रभावित हुई। आपने जनमानस के जीवन में मुस्कान बिखेरने का जो संकल्प रूपी बीज अपने हृदय में पल्लवित किया, वृक्ष का रूप लेकर लाखों लोगों को छांव प्रदान कर रहा है।</p>
<p><strong>मानव रत्न से अलंकृत</strong></p>
<p>प्रख्यात मानव सेविका एवं जिनधर्म प्रभाविका आर्यिका 105 श्री सृष्टि भूषण माताजी को मानव कल्याणार्थ किए गए अति विशिष्ट कार्यों के लिए इंटरनेशनल न्यूज एंड व्यूज कॉर्पोरेशन द्वारा मानव रत्न अलंकरण से सम्मानित किया गया है। उनको यह अलंकरण, कैंसर पीड़ित व्यक्तियों की सेवा के लिए चलाए जाए जा रहे आदि सृष्टि कैंसर सेवा ट्रस्ट के संचालन के लिए दिया गया है। कॉर्पोरेशन के मानव रत्न अवार्ड सिलेक्शन कमेटी के समन्वयक डॉ डीपी शर्मा, जो कि यूनाइटेड नेशंस की संस्था आईएलओ के अंतरराष्ट्रीय परामर्शक एवं भारत सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के राष्ट्रीय ब्रांड एंबेसडर हैं, ने बताया कि यह पुरस्कार सेवा के क्षेत्र में अति विशिष्ट कार्यों के लिए परंपरा से परे भागीरथ प्रयासों के लिए दिया जाता है। यह पुरस्कार उन्हें 29 सितंबर, 2019 को दिल्ली के राजवाडा पैलेस में एक भव्य समारोह में प्रदान किया गया है।</p>
<p><strong>वात्सल्य वारिधि आचार्य श्री का वात्सल्य</strong></p>
<p>प्रसंग है कि1993 में श्री बाहुबली भगवान के महामस्तकाभिषेक के दौरान, तब माताजी की दीक्षा नही हुई थी, वह ब्रह्मचारिणी थीं। वह भी 93 में मस्तकाभिषेक देखने संघ की अन्य दीदियों के साथ गई थीं। उन्होंने पंचम पट्टा धीश आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी से संघ के साथ अभिषेक देखने का निवेदन किया। आचार्य श्री ने सहज स्वीकृति देकर अगले दिन दोपहर को सामायिक के बाद का समय दिया। आचार्य श्री संघ समय पर बड़े पहाड़ के गेट तक पहुंच गए। किंतु दीदियों के नही पहुंचने पर इंतजार कर बुलाने भेजा और संघ के साथ लेकर चले गए। घटना छोटी है किंतु यह अन्य संघ के प्रति वात्सलय को दर्शाती है कि सचमुच आचार्य श्री का हृदय कितना विशाल एवं करुणामय है।</p>
<p><strong>उपाधियां</strong></p>
<p>आपको इन महान कार्यों के लिए निम्न उपाधियां भी पूर्व में सम्मान स्वरूप प्रदान की गई हैं&#8230;</p>
<p>हरियाणा समाज द्वारा सन 1998 &#8211; हरियाणा उद्धारक (200 देशों के शंकराचार्यों की उपस्थिति में) अजमेर समाज द्वारा सन 2005 &#8211; जिनधर्म प्रभाविका गुडगांव समाज द्वारा सन 2011 कविमना बूंदी राजस्थान समाज द्वारा सन 2012 -वात्सल्य मूर्ति महावीर जी समाज द्वारा सन 2016 समता शिरोमणि नजफगढ़ समाज द्वारा सन 2018 -वात्सल्य निधि, आचार्य अतिवीर जी महाराज जी द्वारा सन 2015 &#8211; गणनी पद की उपाधि दी गई है।</p>
<p><strong>भक्तों को सन्देश</strong></p>
<p>आपने अपने साथ जुड़े लाखों भक्तों को एक ही सन्देश दिया है-</p>
<p>‘‘मेरा तो है बस एक ही सपना,</p>
<p>स्वस्थ सुखी हो जीवन सबका’’</p>
<p>और आपकी इसी मंगल भावना और आशीर्वाद को साथ लेकर संकल्पित और समर्पित हैं आपके सभी भक्तगण।</p>
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