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	<title>Sharad Purnima श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>शरद पूर्णिमा की दिव्यता में जन्मे दो तपस्वी रत्न आचार्य श्री विद्यासागर महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी: इनका जीवन आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत </title>
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		<pubDate>Tue, 07 Oct 2025 12:06:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शरद पूर्णिमा पर जन्मे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी जैन धर्म के दो ऐसे दीपस्तंभ हैं जिन्होंने अपने जीवन से करोड़ों को प्रकाश दिया। आज उनका जीवन केवल जैन अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक उदाहरण है। उनके तप, त्याग, ज्ञान और सेवा को स्मरण करना और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शरद पूर्णिमा पर जन्मे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी जैन धर्म के दो ऐसे दीपस्तंभ हैं जिन्होंने अपने जीवन से करोड़ों को प्रकाश दिया। आज उनका जीवन केवल जैन अनुयायियों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए एक उदाहरण है। उनके तप, त्याग, ज्ञान और सेवा को स्मरण करना और उनके सिद्धांतों पर चलना — यही उनके प्रति सच्ची विनयांजलि होगी। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भारत की अध्यात्म प्रधान परंपरा में समय-समय पर ऐसी दिव्य आत्माओं का अवतरण हुआ है, जिन्होंने न केवल अपने आचरण, तपस्या और ज्ञान से धर्म को पुनः प्रतिष्ठित किया, बल्कि जनमानस को भी मोक्षमार्ग पर प्रेरित किया। ऐसे ही दो अप्रतिम रत्न जैन धर्म को प्राप्त हुए हैं — आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज और आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी। इन दोनों महान संतों का जन्म भारतीय पंचांग के अनुसार एक अत्यंत शुभ और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तिथि — शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था।</p>
<p>शरद पूर्णिमा भारतीय संस्कृति में न केवल चंद्रमा की पूर्णता का प्रतीक है, बल्कि यह रात्रि आध्यात्मिक ऊर्जा, साधना और चेतना के उच्चतम बिंदु को भी प्रकट करती है। यह संयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जैन धर्म के दो महान संतों ने इसी तिथि पर जन्म लेकर धर्म के गगन को आलोकित किया।</p>
<p>आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक राज्य के बेलगांव जिले के सदलगा नामक ग्राम में हुआ था। उनका जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ, जिसे उनकी तपोमयी जीवन यात्रा की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। बाल्यकाल में उनका नाम विद्याधर था। पिता श्री मल्लप्पा और माता श्रीमती मालूबाई ने उन्हें धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत वातावरण में पाला। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही विद्याधर में वैराग्य की भावना जागृत हो गई थी।</p>
<p>कम उम्र में ही सांसारिक मोह से विरक्ति लेकर उन्होंने संयम जीवन की ओर कदम बढ़ाया और वर्ष 1968 में आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से मुनि दीक्षा प्राप्त की। मात्र चार वर्षों में ही उनकी साधना और संयम से प्रभावित होकर वर्ष 1972 में उन्हें आचार्य पद प्रदान किया गया। आचार्य विद्यासागर जी ने जैन मुनि परंपरा में लुप्त हो चुकी कठोर तपस्या की विधियों को पुनर्जीवित किया। वे नंगे पैर, बिना किसी वाहन या सुविधा के वर्ष भर भारत के विभिन्न प्रदेशों में विहार करते थे। उनका संपूर्ण जीवन संयम, तप, और आत्मशुद्धि का प्रतिरूप रहा।</p>
<p>उन्होंने अपने जीवन में हजारों उपवास किए, जिनमें अठाई, मासखमण, उन्मूल व्रत जैसे कठोर तप सम्मिलित हैं। उनकी मौन साधना, ध्यान की स्थिति और आत्मानुशासन ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जिसे देखकर साधारण व्यक्ति भी आत्मचिंतन के लिए प्रेरित हो जाता है। उनका उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, अपितु समाज और धर्म का पुनरुद्धार भी रहा है।</p>
<p>आचार्य श्री की प्रेरणा से सैकड़ों युवक संयम मार्ग पर प्रवृत्त होकर मुनि, ऐलक, क्षुल्लक और आर्यिका दीक्षा ले चुके हैं। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। संस्कृत और प्राकृत भाषा में गहरी पैठ रखने वाले आचार्यश्री ने अनेक काव्य रचनाएं की हैं, जिनमें भावना मंजरी, मुक्ति मार्ग, निष्ठा पंचम सूत्र जैसी कृतियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनके लिखे हुए पद और श्लोक आज विद्यार्थियों, तपस्वियों और श्रद्धालुओं के लिए पथप्रदर्शक बन चुके हैं।</p>
<p>देशभर में उनकी प्रेरणा से कई विद्यालय, तपस्थली, गुरुकुल, चिकित्सालय और गौशालाएं स्थापित हुई हैं। वे केवल धार्मिक ही नहीं, सामाजिक पुनरुत्थान के भी प्रवर्तक थे। उन्होंने लोगों को व्यसनमुक्त, नैतिक और संयमी जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। वे कहते थे कि संयम, श्रम और स्वाध्याय ही आत्मकल्याण के मूल साधन हैं। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरी दिगंबर तीर्थ में आचार्य विद्यासागर जी महाराज का 18 फरवरी 2024 को देह त्याग हुआ ।</p>
<p>दूसरी ओर, आर्यिका श्री ज्ञानमति माताजी का जन्म 22 अक्टूबर 1934 को उत्तर प्रदेश के ग्राम टिकरी में हुआ था। यह तिथि भी शरद पूर्णिमा की ही थी, जो ज्ञान की पूर्णता और चंद्रमा की समग्रता की प्रतीक है। बाल्यकाल से ही वे विशेष प्रतिभा और आध्यात्मिक प्रवृत्ति की थीं। माता-पिता ने उन्हें संस्कारयुक्त वातावरण प्रदान किया। कम आयु में ही वे धार्मिक पुस्तकों की ओर आकर्षित हुईं और आत्मकल्याण की दिशा में चलने का निश्चय किया।</p>
<p>महज 14 वर्ष की आयु में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और वर्ष 1952 में आर्यिका दीक्षा लेकर संयमित जीवन की ओर अग्रसर हुईं। ज्ञानमति माताजी का नाम उनके व्यक्तित्व के अनुरूप है — ज्ञान की साक्षात मूर्ति। उन्होंने जैन आगमों, तत्त्वज्ञान, जैन भूगोल, दर्शन, चरित्र ग्रंथों, तप और साधना पर आधारित 300 से अधिक ग्रंथों की रचना की। उनकी लेखनी ने न केवल लुप्तप्राय जैन ग्रंथों को पुनर्जीवित किया, बल्कि उन्होंने आगम की गूढ़ता को जनमानस के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत किया।</p>
<p>ज्ञानमति माताजी का सबसे प्रसिद्ध योगदान जम्बूद्वीप की रचना है। हस्तिनापुर स्थित इस दिव्य और भव्य रचना में उन्होंने जैन भूगोल को भौतिक स्वरूप प्रदान किया। यह रचना केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और स्थापत्य दृष्टिकोण से भी अद्वितीय है। जम्बूद्वीप मॉडल के माध्यम से उन्होंने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि उसका आधार ब्रह्मांड के संचालन से जुड़ा हुआ है।</p>
<p>इसके अतिरिक्त उन्होंने हस्तिनापुर में जैन सिद्ध क्षेत्र, महिला तपस्विनी प्रशिक्षण केंद्र, विद्या धर्म तीर्थ, और ज्ञानमती प्रकाशन जैसे अनेक संस्थानों की स्थापना की। उनके निर्देशन में सैकड़ों बालिकाएँ और महिलाएँ संयम जीवन की ओर प्रवृत्त हुईं। उन्होंने नारी शक्ति को धर्म के प्रचार में नई दिशा दी।</p>
<p>ज्ञानमति माताजी ने जीवन भर केवल लेखन ही नहीं, बल्कि तप, ध्यान और साधना की भी गहरी निष्ठा से साधना की। उन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों तक भी प्रवचन, ग्रंथ लेखन और तीर्थ विकास का कार्य पूरी लगन से किया। उनका जीवन एक जीवंत उदाहरण है कि ज्ञान और साधना का संगम कैसे समाज में धर्म का दीपक जलाता है।</p>
<p>जब हम इन दोनों संतों की तुलना करते हैं, तो पाते हैं कि उनके जीवन में कई समानताएँ हैं। दोनों का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ — एक चंद्रमा की पूर्णता का दिन, जो भारतीय संस्कृति में सौंदर्य, शांति और ज्ञान का प्रतीक है। दोनों ने बचपन से ही वैराग्य और धर्म की ओर झुकाव दिखाया। दोनों ने संयम मार्ग अपनाया और असाधारण रूप से कठोर जीवन जिया। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में — आचार्यश्री ने तप और चरित्र में, और माताजी ने ज्ञान और सेवा में — अप्रतिम योगदान दिया।</p>
<p>इन दोनों महापुरुषों का जीवन आज के भौतिकवादी युग में एक प्रेरणास्त्रोत है। जहाँ एक ओर आचार्यश्री का जीवन संयम, तप और आत्मशुद्धि की ओर प्रेरित करता है, वहीं ज्ञानमति माताजी का जीवन ज्ञान, साधना और धर्म प्रचार की प्रेरणा देता है। ये दोनों उदाहरण सिद्ध करते हैं कि मोक्षमार्ग केवल सैद्धांतिक विषय नहीं, अपितु उसे व्यावहारिक रूप से जीया जा सकता है।</p>
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		<title>बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहेंगे मौजूद  :  शरद पूर्णिमा पर होगा विश्व की सबसे बड़ी स्फटिक मणि की प्रतिमा का अभिषेक </title>
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		<pubDate>Fri, 27 Oct 2023 09:06:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साउथ तुकोगंज स्थित दिगंबर जैन समवशरण मंदिर में स्वर्ण बेदी पर विराजित विश्व की सबसे बड़ी (51 इंच ऊंची) स्फटिक मणि की श्री 1008 शांतिनाथ भगवान की सुदर्शनीय एवं अतिशयकारी प्रतिमा का 28 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के अवसर अभिषेक किया जाएगा। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230; इंदौर। साउथ तुकोगंज स्थित दिगंबर जैन समवशरण [&#8230;]]]></description>
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<p><span style="color: #000000;">साउथ तुकोगंज स्थित दिगंबर जैन समवशरण मंदिर में स्वर्ण बेदी पर विराजित विश्व की सबसे बड़ी (51 इंच ऊंची) स्फटिक मणि की श्री 1008 शांतिनाथ भगवान की सुदर्शनीय एवं अतिशयकारी प्रतिमा का 28 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के अवसर अभिषेक किया जाएगा। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट&#8230;</span></span></p>
<hr />
<p>इंदौर। साउथ तुकोगंज स्थित दिगंबर जैन समवशरण मंदिर में स्वर्ण बेदी पर विराजित विश्व की सबसे बड़ी (51 इंच ऊंची) स्फटिक मणि की श्री 1008 शांतिनाथ भगवान की सुदर्शनीय एवं अतिशयकारी प्रतिमा का 28 अक्टूबर को शरद पूर्णिमा के अवसर पर श्रमण संस्कृति के महामहिम संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के अवतरण दिवस पर प्रातः 7:30 बजे देश के वयोवृद्ध और अनुभव समृद्ध मनीषी जैन विद्वान पंडित रतनलाल शास्त्री के सानिध्य एवं निर्देशन में विधि- विधान के साथ स्वर्ण कलशों से अभिषेक होगा।</p>
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<p>प्रचार प्रमुख राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर कई त्यागी व्रती, ब्रह्मचारी भैया एवं ब्रह्मचारिणी दीदी और काफी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहेंगे। मंदिर ट्रस्ट एवं तुकोगंज समाज के वरिष्ठ सर्व श्री अरुण सेठी, आजाद जैन, सी ए अशोक खासगीवाला, राजेश जैन लॉरेल, ऊषा रानी डोषी, हंसमुख गांधी, संजीव जैन संजीवनी, मनोज मुकेश बाकलीवाल एवं समवशरण ग्रुप के विकास जैन, अमित जैन, अभय जैन, शैलेश जैन एवं अजीत जैन आदि ने समाज जनों से अभिषेक समारोह में पधारने एवं पुण्यार्जन करने का आग्रह किया है।</p>
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		<title>अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज बहाएंगे ज्ञान और धर्म की गंगा :  शरद पूर्णिमा पर तीन दिवसीय विशेष प्रवचन माला 29 अक्टूबर से </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/three-day-special-sermon-series-on-sharad-purnima-from-29th-october/</link>
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		<pubDate>Thu, 26 Oct 2023 09:32:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शरद पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी दीक्षित एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से शिक्षित अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की तीन दिवसीय विशेष प्रवचन माला का आयोजन किया जाएगा। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, अंजनी नगर की ओर से आयोजित यह प्रवचन माला आगामी 29 अक्टूबर [&#8230;]]]></description>
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<p>शरद पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी दीक्षित एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से शिक्षित अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की तीन दिवसीय विशेष प्रवचन माला का आयोजन किया जाएगा। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, अंजनी नगर की ओर से आयोजित यह प्रवचन माला आगामी 29 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक चलेगी। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></p>
<hr />
<p>इंदौर। शरद पूर्णिमा के अवसर पर आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी दीक्षित एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से शिक्षित अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज की तीन दिवसीय विशेष प्रवचन माला का आयोजन किया जाएगा। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर, अंजनी नगर की ओर से आयोजित यह प्रवचन माला आगामी 29 अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक चलेगी। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती मंदिर के अध्यक्ष देवेंद्र सोगानी, उपाध्यक्ष ऋषभ पाटनी, सचिव संजय मोदी और कोषाध्यक्ष अशोक टोंग्या ने बताया कि पहले दिन प्रवचन का विषय रावण नहीं, राम बनकर धर्म करें। यह प्रवचन 29 अक्टूबर की सुबह 9.30 बजे चंद्रप्रभु मांगलिक भवन, अंजनी नगर में होगा। इसके बाद 30 अक्टूबर अंजनी नगर के पार्श्वसंत सदन में सुबह 9 बजे तीर्थ बचाओ, समाज और परिवार बचाओ विषय पर मुनि श्री प्रवचन देंगे। प्रवचन की श्रृंखला के अंतिम दिन 31 अक्टूबर को अंजनी नगर के पार्श्वसंत सदन में सुबह 9 बजे से संत और पंथ के नाम पर नहीं, धर्म के नाम पर कल्याण विषय पर मुनि श्री प्रवचन देंगे। कार्यक्रम में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर जी महाराज का भी सानिध्य रहेगा।</p>
<p><strong>होगा मंगल प्रवेश</strong><br />
प्रवचन श्रृंखला के लिए अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज का अंजनी नगर में मंगल प्रवेश 29 अक्टूबर को सुबह आठ बजे होगा। इस अवसर पर घर-घर मुनि श्री का पाद प्रक्षालन किया जाएगा। इसके बाद वह मंदिर में दर्शन करके चंदा प्रभु मांगलिक भवन में प्रवचन देंगे।</p>
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