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	<title>Self Study &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>महरौनी में श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर का आयोजन : धर्म और संस्कारों से जुड़ रही नई पीढ़ी </title>
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		<pubDate>Tue, 09 Jun 2026 17:39:49 +0000</pubDate>
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<p><strong>ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान बच्चों, युवाओं एवं महिलाओं को धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने के उद्देश्य से श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर, महरौनी में आयोजित श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। <span style="color: #ff0000">महरौनी से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>महरौनी।</strong> ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान बच्चों, युवाओं एवं महिलाओं को धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने के उद्देश्य से श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर, महरौनी में आयोजित श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। शिविर में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं तथा बालक-बालिकाएं सहभागिता कर धार्मिक, सामाजिक एवं नैतिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संचालित इस संस्कार शिविर का मार्गदर्शन सांगानेर के विद्वान प्रशिक्षक अतिशय जैन एवं अक्षय जैन द्वारा किया जा रहा है। उनके निर्देशन में प्रतिभागियों को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों, आचार-विचार, संस्कारों, व्यक्तित्व विकास, सामाजिक दायित्वों तथा आदर्श जीवनशैली के विषय में विस्तार से जानकारी दी जा रही है। शिविर में प्रतिदिन प्रार्थना, नमोकार मंत्र, स्वाध्याय, धार्मिक प्रश्नोत्तरी, संस्कार गीत, जैन इतिहास, तीर्थंकरों के जीवन प्रसंग तथा व्यवहारिक जीवन में धर्म के महत्व पर आधारित विभिन्न सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। बच्चों को खेल-खेल में नैतिक शिक्षा प्रदान की जा रही है, जिससे वे अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहज रूप से आत्मसात कर सकें। वहीं महिलाओं एवं श्राविकाओं को पारिवारिक संस्कार, सामाजिक समरसता तथा आध्यात्मिक जीवन के महत्व से अवगत कराया जा रहा है।</p>
<p><strong>महिलाओं के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक</strong></p>
<p>अखिल भारतीय जैन महिला परिषद की संभागीय अध्यक्ष रश्मि मलैया ने बताया कि वर्तमान समय में बच्चों को मोबाइल और डिजिटल माध्यमों से हटाकर संस्कारों की ओर प्रेरित करना अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य को लेकर आयोजित यह शिक्षण शिविर बच्चों एवं महिलाओं के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायक सिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहा कि शिविर के माध्यम से प्रतिभागियों में धर्म के प्रति आस्था, अनुशासन, सेवा, सदाचार एवं आत्मविकास की भावना विकसित हो रही है। शिविर में भाग लेने वाले बच्चों और श्रावक-श्राविकाओं ने बताया कि उन्हें यहां धर्म, संस्कृति और जीवन मूल्यों को समझने का उत्कृष्ट अवसर प्राप्त हो रहा है। शिविर के माध्यम से नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, जैन परंपरा एवं आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ने का जो प्रयास किया जा रहा है, वह समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायी एवं अनुकरणीय है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक वातावरण में संचालित यह शिविर क्षेत्र में संस्कार निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है, जिसका लाभ बड़ी संख्या में बच्चे, युवा और महिलाएं प्राप्त कर रहे हैं।</p>
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		<title>श्रावक-श्राविकाओं को प्रतिदिन छह आवश्यक कर्म करना जरूरी : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्रावक के षट् आवश्यक कर्त्तव्य का किया विवेचन  </title>
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		<pubDate>Tue, 02 Jun 2026 13:29:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चंद्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना कर रहे हैं। उन्होंने मंगलवार को श्रावक के षट् आवश्यक कर्त्तव्य में श्रावक की परिभाषा का विवेचन किया। जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की खबर&#8230; जयपुर। गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चंद्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना कर रहे हैं। उन्होंने मंगलवार को श्रावक के षट् आवश्यक कर्त्तव्य में श्रावक की परिभाषा का विवेचन किया। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, डॉ. राजेश पंचोलिया की खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्वमति जी की समाधि स्थली श्री चंद्रप्रभ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधु सहित ग्रीष्म कालीन वाचना कर रहे हैं। उन्होंने मंगलवार को श्रावक के षट् आवश्यक कर्त्तव्य में श्रावक की परिभाषा का विवेचन किया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि श्रा अर्थात श्रद्धावान, व मतलब विवेकवान क से आशय क्रियावान होता हैं। देव पूजा गुरुपास्ति, स्वाध्यायः संयमस्तपः। दानं चेति गृहस्थानां, षट्‌कर्माणि दिने-दिने।। की विवेचना में बताया कि श्रावक-श्राविकाओं को प्रतिदिन देवपूजा, गुरु-उपासना, स्वाध्याय, संयम तप और दान के भेद से गृहस्थों के प्रतिदिन करने योग्य छह आवश्यक कर्म हैं। देवपूजा ,जिनेंद्र देव की भक्ति, स्तुति, वंदना और अष्टद्रव्यों से पूजन पूर्वक जो गुणानुवाद किया जाता है, उसे देवपूजा कहते हैं। यह देवपूजा नित्यमह पूजा, चतुर्मुख पूजा, सर्वतोभद्रपूजा, कल्पद्रुम पूजा और इन्द्रध्वज पूजा पांच प्रकार की होती हैं।</p>
<p><strong>स्वयं का स्वयं के द्वारा अध्ययन</strong></p>
<p>सुरेश सबलावत,श्री भागचंद चूड़ीवाल ने कहा कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने गुरु-उपासना की विवेचना में समझाया है। उन्होंने कहा कि निर्ग्रंथ मुद्राधारी दिगंबर गुरुओं की स्तुति, वंदना करना और अष्ठद्रव्य से उनकी पूजा करना, उनका धर्माेपदेश सुनना आदि गुरु उपासना है। मुनिराज को नवधाभक्ति से शुद्ध आहार दान, औषध दान, वसतिका दान और शास्त्र दानादि करना, उनकी वैय्यावृत्य करना, उनकी ज्ञान वृद्धि के साधन जुटाना और उनकी चर्चा में सहायक बनना ये सब गुरुपास्ति (गुरु उपासना) के अंग है। स्वाध्याय ‘स्व’ यानी स्वयं और ‘अध्याय’ यानी अध्ययन करना अर्थात् स्वयं का स्वयं के द्वारा अध्ययन।</p>
<p><strong>स्वाध्याय के पांच भेद कह गए </strong></p>
<p>आत्म स्वरूप को उपलब्ध कराने में सहायक शास्त्रों का अध्ययन भी स्वाध्याय है। अपनी बुद्धि (क्षयोपशम) अनुसार जिनेंद्र देव की स्याद्वादमय अनेकांत वाणी पढ़ना-पढ़ाना, सुनना सुनाना चिंतन मनन करना भी स्वाध्याय है। स्वाध्याय को तप भी कहा जाता है। स्वाध्याय के पांच भेद कह गए हैं। स्वाध्याय से ज्ञान का विकास, कषाय की मंदता ,वैराग्य में वृद्धि ,पुण्य की प्राप्ति ,कर्मों की निर्जरा ,धर्म की प्रभावना श्रुत परंपरा का विकास, संदेह का निवारण, सम्यकज्ञान की प्राप्ति और परिणाम में निर्मलता आती है।</p>
<p>प्रातः श्रीजी के अभिषेक के बाद ललिता चीना मयंक पाटनी परिवार ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर भव्य पूजन किया। दोपहर को श्री चंद्र प्रभ जिनालय में 64 रिद्धि विधान की पूजा हुई।</p>
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		<title>दीपिका, खुशबू, दिशा, सुविधि और अनंत देंगे रत्नाकर अवार्ड परीक्षा : जनकपुरी में श्रमण संस्कृति संस्कार शिविर स्वाध्याय प्रभावना के साथ संपन्न </title>
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		<pubDate>Fri, 29 May 2026 10:01:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री दिगम्बर जैन मंदिर जनकपुरी ज्योतिनगर में 17 मई से चल रहे श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर स्वाध्याय व धर्म प्रभावना की भावना के साथ गुरुवार को भव्य समापन समारोह हुआ। जयपुर से पढ़िए, यह रिपोर्ट&#8230; जयपुर। श्री दिगम्बर जैन मंदिर जनकपुरी ज्योतिनगर में 17 मई से चल रहे श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर स्वाध्याय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री दिगम्बर जैन मंदिर जनकपुरी ज्योतिनगर में 17 मई से चल रहे श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर स्वाध्याय व धर्म प्रभावना की भावना के साथ गुरुवार को भव्य समापन समारोह हुआ। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जयपुर।</strong> श्री दिगम्बर जैन मंदिर जनकपुरी ज्योतिनगर में 17 मई से चल रहे श्रमण संस्कृति संस्कार शिक्षण शिविर स्वाध्याय व धर्म प्रभावना की भावना के साथ गुरुवार को भव्य समापन समारोह हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ राजकुमारी पाटनी व सुनीता भोंच द्वारा मंगलाचरण के साथ हुआ। कार्यक्रम संस्थान के मानद मंत्री सुरेश कासलीवाल, जयपुर शिविर प्रभारी विनीता जैन तथा दीपिका बिलाला के आतिथ्य में हुआ। दीप प्रज्वलन सुनील सीमा ठोलिया के साथ प्रबंध समिति के अध्यक्ष बुद्धि प्रकाश छाबड़ा, मंत्री देवेन्द्र कासलीवाल तथा अतिथियों ने किया। शिविर के मुख्य संयोजक पदम जैन बिलाला ने बताया की सुरेश कासलीवाल ने शिविरार्थियों को उद्बोधन में संस्थान की ओर से सभी प्रकार के सहयोग का आश्वासन दिया।</p>
<p><strong>हाइकू वाचन और भजन की प्रस्तुति दी</strong></p>
<p>विदुषी काजल व साक्षी ने प्रत्येक विषय के प्रथम द्वितीय व तृतीय स्थान के नाम की घोषणा की, जिन्हें अतिथियों ने प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। विषय में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले शिविरार्थी दीपिका बिलाला, ख़ुशबू जैन, दिशा काला, सुविधि जैन और अनंत जैन रत्नाकर अवार्ड परीक्षा के लिए पात्र घोषित किए गए। बालिका अवनी ने चौबीस तीर्थंकर के चिह्न तथा भाषण और हाइकू वाचन में प्रथम स्थान प्राप्त दिशा काला ने हाइकू का वाचन किया। भजन प्रतियोगिता में प्रथम मीनाक्षी जैन रही थी।</p>
<p><strong>विदुषियों को सम्मानित किया</strong></p>
<p>संयोजक राजेन्द्र ठोलिया, मिश्री लाल काला सहित सभी संयोजकों और स्थानीय शिक्षिका दर्शी का संस्थान की ओर से सम्मान किया गया। अशोक पदम कमलेश बंथलीवाला परिवार की ओर से संयोजकों द्वारा विदुषियों को सम्मानित किया गया। विनीता जैन ने अपने उद्बोधन में जनकपुरी के शिविर की सराहना करते हुए रत्नाकर अवार्ड परीक्षा तथा 31 मई को प्रात: होने वाले समापन समारोह के बारे में बताया। कार्यक्रम के अंत में पदम बिलाला ने संस्थान तथा छात्रावास की प्रबंध समिति, मंदिर प्रबंध समिति, संयोजक गण, शिविरार्थी, विदुषियों, स्थानीय शिक्षक सभी से प्राप्त सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।</p>
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		<title>प्राचीन मंदिरों का संरक्षण जीर्णाेद्धार अधिक महत्वपूर्ण : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने तीर्थों और मंदिरों की सुरक्षा पर दिया बल  </title>
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		<pubDate>Mon, 13 Apr 2026 08:02:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने सोमवार को श्री आदिनाथ जिनालय में प्रवचन में कहा कि मंदिर बनाना निश्चित ही पुण्य का कार्य है,लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है मंदिर का संरक्षण और उसका सही उपयोग करना। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230; जयपुर। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने सोमवार को [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने सोमवार को श्री आदिनाथ जिनालय में प्रवचन में कहा कि मंदिर बनाना निश्चित ही पुण्य का कार्य है,लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है मंदिर का संरक्षण और उसका सही उपयोग करना। <span style="color: #ff0000">जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>जयपुर।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने सोमवार को श्री आदिनाथ जिनालय में प्रवचन में कहा कि मंदिर बनाना निश्चित ही पुण्य का कार्य है लेकिन, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है मंदिर का संरक्षण और उसका सही उपयोग करना। देश के राज्यों और नगरों में मंदिरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वास्तव में वहां बैठकर आत्म चिंतन करना चाहिए। सुरेश सबलावत के अनुसार आचार्य श्री ने कहा कि भगवान मंदिर में विराजमान हैं। उन्होंने तप, त्याग और साधना से अपने कर्मों का नाश कर अनंत गुण प्राप्त किए लेकिन, हम 5 मिनट भी शांति से बैठकर यह विचार नहीं कर पाते कि हमें अपने जीवन को कैसे सुधारना है।</p>
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<p>सिर्फ मंदिर बनाना ही धर्म नहीं है,मंदिर में समय देकर धार्मिक क्रियाओं, अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय, तप से आत्मा की ओर लौटना ही सच्चा धर्म है। इसके पूर्व मुनि श्री प्रभव सागर जी ने उपदेश में सुख और दुःख की विवेचना की। मध्यप्रदेश धार जिले के अतिशय क्षेत्र कागदीपुरा में पंच कल्याणक के लिए विहार करने के लिए विनय छाबड़ा, इंजीनियर आशीष जैन, अजित छाबड़ा, श्रेणिक गंगवाल सहित अनेक श्रावकों ने दर्शन कर श्रीफल भेंट किया।</p>
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		<title>पूर्ण ज्ञान तथा कर्म सिद्धांत का ज्ञान होना आवश्यक: धर्मसभा में मुनिश्री के प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं धर्मप्रेमी श्रद्धालु  </title>
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		<pubDate>Sat, 03 Jan 2026 15:28:27 +0000</pubDate>
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<p><strong>संत अपनी इच्छा से शरीर छोड़ते हैं, क्योंकि वे शरीर के बंधन से मुक्त होते हैं । यह उदगार मुनि श्री संभव सागरजी महाराज ने भगवती आराधना ग्रंथ का स्वाध्याय कराते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शरीर मोक्ष प्राप्ति का एक मात्र साधन हैं। <span style="color: #ff0000">विदिशा से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>विदिशा।</strong> संत अपनी इच्छा से शरीर छोड़ते हैं, क्योंकि वे शरीर के बंधन से मुक्त होते हैं । यह उदगार मुनि श्री संभव सागरजी महाराज ने भगवती आराधना ग्रंथ का स्वाध्याय कराते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शरीर मोक्ष प्राप्ति का एक मात्र साधन हैं। इसलिए साधकों को आत्मकल्याण और मोक्ष मार्ग पर चलने के लिये आवश्यक सैद्धांतिक ज्ञान और व्यवहारिक मार्ग दर्शन तथा मृत्यु के अंतिम समय में किस प्रकार की साधना तथा कैसा आचरण होना चाहिए। इस बात का वर्णन भगवती आराधना में किया गया है। एक क्षपकराज को सावधानी पूर्वक आलस्य और हिंसा का त्याग करते हुए जाग्रत और सावधान रहकर समितियों एवं गुप्तिओं का पूर्णतया पालन करना चाहिये इसके लिये एक क्षपक को तत्वों का पूर्ण ज्ञान तथा कर्म सिद्धांत का ज्ञान होना आवश्यक है। जिससे वह संयम,विनय तथा आवश्यक नियमों के साथ मन और आत्मा के संतुलन के साथ शांति से मृत्यु प्राप्त कर सके। तभी उसकी समाधि सल्लेखना पूर्ण होगी है।</p>
<p><strong>मिथ्यात्व और सम्यकत्व की सरल शब्दों में व्याख्या की </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि क्षपक यानि जिसकी सल्लेखना होंने जा रही है वह अपने कर्मों का प्रतिक्रमण,कायोत्सर्ग, विनय और स्वाध्याय तथा अनुप्रेक्षा में 12 भावनाओं में युक्त होता हुआ अनुशासन का पालन करता है,इस प्रकार निर्यापकाचार्य उस क्षपक को श्रुत ज्ञान के अनुसार संसार से भय और बैराग्य उत्पन्न करने वाली शिक्षा उसके कानों में देते है। मुनि श्री ने कहा कि सल्लेखना शुरु होंने के पहले निर्यापक क्षपक को बार बार याद दिलाता है कि कहीं आप मिथ्यात्व में तो नहीं चले गये? उन्होंने मिथ्यात्व और सम्यकत्व की सरल शब्दों में व्याख्या बताते हुये कहा कि एक बार एक अजेन मित्र आचार्य शांतिसागर महाराज के पास बैठे थे। उन्होंने मिथ्यात्व और सम्यकत्व की परिभाषा पूंछी तो गुरुदेव ने दो लाईन में इसका उत्तर दे दिया आत्मा में डूबने का नाम सम्यकत्व और आत्मा से बाहर आ गये तो मिथ्यात्व शुरू हो गया।</p>
<p><strong>एक बार सम्यक् दर्शन हो गया सो हो गया </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि आध्यात्म तो यही कहता है कि जो आत्मा से बाहर आ गया वह सभी मिथ्यादृष्टि है। मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन कहता है कि यह जरुरी नहीं कि एक बार सम्यक् दर्शन हो गया सो हो गया ऐसा कुछ भी नहीं है। यहां तो आप मिथ्यात्व में गये नहीं कि जीरो पर आऊट हो जाओगे सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। इसलिये क्षपक एक बार फिर से देख लेता है कि उसको सल्लेखना देने वाले पात्र योग्य है कि नहीं, जिससे वह निःशल्य होकर अपनी अंतिम सल्लेखना समाधि की ओर अग्रसर हो सके।</p>
<p><strong>अष्टदृव्यों के साथ संगीतमय पूजन </strong></p>
<p>अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री दोपहर में तीन बजे से चार बजे तक भगवती आराधना का स्वाध्याय करा रहे है। जिसमें मुनि श्री निस्सीम सागर जी, मुनि श्री संस्कार सागर जी महाराज के साथ क्षुल्लक जी एवं ब्रहमचारी के साथ सभी तत्व जिज्ञासु भी भाग लेकर अपनी जिज्ञासा का समाधान भी पा रहे हैं। प्रतिदिन प्रातः 8. 45 से आचार्य विद्यासागरजी महाराज एवं वर्तमान आचार्य समयसागर महाराज की अष्टदृव्यों के साथ संगीतमय पूजन किया जा रहा है।</p>
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		<title>झांकियों में साकार किए जैन धर्म के सिद्धांत: सिद्धचक्र महामंडल विधान के तहत दिग्विजय यात्रा में उमड़ा सकल समाज  </title>
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		<pubDate>Tue, 04 Nov 2025 10:40:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के तहत तिलक नगर से दिग्विजय यात्रा निकाली गई। इसमें दिगंबर समाज के श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल हुए। यात्रा में बैंडबाजों के साथ भक्ति संगीत और आकर्षक झांकियां शामिल थी। इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों का सजीव चित्रण किया गया। इंदौर से पढ़िए, यह साभार संकलित और संशोधित खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के तहत तिलक नगर से दिग्विजय यात्रा निकाली गई। इसमें दिगंबर समाज के श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल हुए। यात्रा में बैंडबाजों के साथ भक्ति संगीत और आकर्षक झांकियां शामिल थी। इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों का सजीव चित्रण किया गया। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह साभार संकलित और संशोधित खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान के तहत तिलक नगर से दिग्विजय यात्रा निकाली गई। इसमें दिगंबर समाज के श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल हुए। यात्रा में बैंडबाजों के साथ भक्ति संगीत और आकर्षक झांकियां शामिल थी। इसमें जैन धर्म के सिद्धांतों का सजीव चित्रण किया गया। सुबह विधान की शुरूआत वंदना से हुई। इस अवसर पर अभिषेक-अर्घ्य, स्वाध्याय, पूजन और कलश की स्थापना की गई। शाम को आरती और ध्यान सत्र का आयोजन हुआ। आयोजन समिति के अध्यक्ष राहुल जैन केसरी ने बताया कि चक्रवर्ती वीरेंद्रकुमार, विनोद जैन परिवार और सौधर्म इंद्र रमेश आरोन का स्वागत किया गया। इस अवसर पर विधान संरक्षक राजेश उदावत, विमल अजमेरा, सचिन उद्योगपति, मयंक जैन, विधानाचार्य राजेश भैया, जिनेश मलैया और मनोज छाबड़ा सहित कई समाज जन मौजूद रहे।</p>
<p><strong>भगवान महावीर के उपदेशों का नाट्य रूपांतरण किया </strong></p>
<p>दिग्विजय यात्रा में महिलाएं कलश लेकर चल रही थीं। बच्चों और युवाओं ने पुष्पवृष्टि से यात्रा का स्वागत किया। रथ के साथ निकी जैन धर्म के सि़द्धांतों पर आधारित झांकियां आकर्षण का केंद्र रहीं। कलाकारों ने भगवान महावीर के उपदेशों पर आधारित नाटक का मंचन किया। कार्यक्रम का संचालन दिगंबर जैन मंदिर तिलकनगर धार्मिक एवं पारमार्थिक न्यास समिति ने किया।</p>
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		<title>आत्मा को शुद्ध और जीवन को सार्थक बनाने का माध्यम सिद्धचक्र विधान: तिलकनगर में आचार्यश्री विनम्रसागर जी महाराज के सान्निध्य में हुई विधान की शुरूआत  </title>
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		<pubDate>Thu, 30 Oct 2025 09:58:12 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्यश्री विनम्रसागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में आठ दिवसीय श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान की शुरूआत हुई। तिलकनगर जैन मंदिर परिसर में महोत्सव को लेकर बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह साभार संकलित खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> आचार्यश्री विनम्रसागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में आठ दिवसीय श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान की शुरूआत हुई। तिलकनगर जैन मंदिर परिसर में महोत्सव को लेकर बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। महोत्सव के अध्यक्ष राहुल जैन केसरी ने बताया कि विधान में प्रतिदिन सुबह 6.45 बजे वंदना, अभिषेक, अर्घ्य, स्वाध्याय, पूजन, कलश स्थापना, प्रवचन और शाम को आरती और ध्यान सत्र का आयोजन किया जाएगा। 5 नवंबर को शांतिधारा, महापूजन और महाआरती के साथ विधान का समापन होगा। पहले दिन सुबह मंगलाचरण और पूजा-अर्चना के बीच ध्वजारोहण नम्रता प्रवीण दिवाकर द्वारा किया गया। मंडप उद्घाटन नवीन शिवानी गोधा, धमेंद्र संध्या जैन और मनीष संगीता नायक ने किया।</p>
<p>आयोजन में समाज के संरक्षक राजेश उदावत, विमल अजमेरा और राजू श्रीफल विशेष रूप से उपस्थित थे। इस अवसर पर आचार्यश्री विनम्रसागर जी महाराज ने कहा कि विधान का आयोजन केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि आत्मा को शुद्ध करने और जीवन को सार्थक बनाने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि सिद्धचक्र विधान वर्ष में एक बार अवश्य किया जाना चाहिए।</p>
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		<title>तीर्थंकर कुल का मनुष्य जीवन कीमती रत्न के समान है : आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने कहा- इसकी कर्म रूपी चोरों से सुरक्षा जरूरी  </title>
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		<pubDate>Fri, 17 Oct 2025 15:11:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में शांतिनाथ विधान के पूजन के समय मंगल देशना में कहा कि आज श्री आदिनाथ जिनालय में आप श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजन भक्ति भाव से कर रहे हैं। पंचकल्याणक की धार्मिक क्रियाएं भी उत्साह से करना चाहिए। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में शांतिनाथ विधान के पूजन के समय मंगल देशना में कहा कि आज श्री आदिनाथ जिनालय में आप श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजन भक्ति भाव से कर रहे हैं। पंचकल्याणक की धार्मिक क्रियाएं भी उत्साह से करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>टोंक।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में शांतिनाथ विधान के पूजन के समय मंगल देशना में कहा कि आज श्री आदिनाथ जिनालय में आप श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजन भक्ति भाव से कर रहे हैं। पंचकल्याणक की धार्मिक क्रियाएं भी उत्साह से करना चाहिए। कुछ समय पूर्व श्री पारसनाथ भगवान की नूतन प्रतिमा नगर में आई हैं। अभी उनमें गुणों का आरोपण नहीं किया गया है। पंच कल्याणक के दौरान सूरी मंत्र द्वारा उस प्रतिमा को प्रतिष्ठित किया जाएगा। भगवान के प्रतिदिन दर्शन, अभिषेक ,पूजन ,ध्यान, स्वाध्याय निराकुलता पूर्वक करना चाहिए। मनुष्य जीवन बहुत ही दुर्लभ है। आपको वितरागी तीर्थंकर भगवान का कुल प्राप्त हुआ है। यह सौभाग्य के पल है, जीवन में प्रतिदिन उम्र बढ़ने के साथ आयु भी कम होती जाती है।</p>
<p><strong>भगवान की भक्ति करने से कर्मों की निर्जरा होती है</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने प्रवचन में आगे बताया कि मानव जन्म बहुत ही कठिनाई से संचित पुण्य से प्राप्त होता है। दिन प्रतिदिन आपकी उम्र कम होती जा रही है। आयु बढ़ने के साथ जीवन भी प्रतिपल कम होता जाता है। अब क्या करना है। इसका चिंतन भगवान को देखकर करना चाहिए कि भगवान ने जो प्राप्त किया है, वह आप कैसे प्राप्त कर सकते हैं। भगवान की भक्ति करने से कर्मों की निर्जरा होती है। कर्मों का हर पल भय, डर होना चाहिए नवीन कर्मों का आश्रव कैसे रुकेगा , धार्मिक विधान कार्य करने से कर्मों का क्षय होता है।</p>
<p><strong>मनुष्य जीवन भी कीमती रत्न </strong></p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि हर व्यक्ति भगवान से सुख की कामना करता है। धर्म कार्य करने से सुख मिलता है। भगवान की चरण-शरण से ही मुक्ति मिलती है। इसलिए जीवन में पुण्य अर्जित बढ़ाने का कार्य करना चाहिए। भगवान के शरण में चिंतन करें। श्री पारसनाथ भगवान का पंच कल्याणक होना है। पारसनाथ भगवान और कमथ पूर्व पर्याय में सगे भाई थे पर कमथ ने जीव ने 10 भवों तक पारसनाथ भगवान के जीव पर उपसर्ग किए किंतु पारसनाथ भगवान के जीव ने सभी उपसर्गों को समता भाव से सहन किया। जिस प्रकार कीमती रत्न को आप तिजोरी में सुरक्षित करते हैं। उसी प्रकार मनुष्य जीवन भी कीमती रत्न है। इसकी भी सुरक्षा कर्मों से करना चाहिए। भगवान की शरण का लाभ लेना चाहिए।</p>
<p><strong>सभी ने आचार्य श्री की पूजा की </strong></p>
<p>रमेश काला ने बताया कि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में 7 से 12 नवंबर तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा पुराने टोंक के नूतन जिनालय के लिए होगी। आज पंच कल्याणक प्रतिष्ठा समिति के सभी पात्रों और समाज के पदाधिकारियों महिला पुरुषों ने श्री शांतिनाथ मंडल विधान की पूजा की। सभी ने आचार्य श्री की पूजा भी की।</p>
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		<title>सिद्धत्व के लिए महावीर के पथ पर अग्रसर मुनि श्री सिद्धसागर जी: नांद्रे में मनाया जाएगा मुनिश्री का दीक्षा दिवस महोत्सव  </title>
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		<pubDate>Thu, 16 Oct 2025 08:57:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सिद्धसागर जी महाराज का दूसरा दीक्षा दिवस नांद्रे में श्रद्धा भक्ति से मनाया जाएगा। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी से भिंड में 15 अगस्त 2019 को मात्र 17 वर्ष की अल्पायु में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर संघ में प्रवेश किया। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर&#8230; नांद्रे। मुनि श्री सिद्धसागर जी महाराज का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सिद्धसागर जी महाराज का दूसरा दीक्षा दिवस नांद्रे में श्रद्धा भक्ति से मनाया जाएगा। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी से भिंड में 15 अगस्त 2019 को मात्र 17 वर्ष की अल्पायु में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर संघ में प्रवेश किया। <span style="color: #ff0000">नांद्रे से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>नांद्रे।</strong> मुनि श्री सिद्धसागर जी महाराज का दूसरा दीक्षा दिवस नांद्रे में श्रद्धा भक्ति से मनाया जाएगा। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने बताया कि मध्यप्रदेश में चंबल संभाग के भिंड जिले में प्रसिद्ध रूर नगर की पावन धरा पर श्रेष्ठीवर्य कपूरचंद की धर्मपत्नी उषा जैन की कुक्षी से 7 सितंबर 2002 में जन्म लेकर ‘सिद्धम’ नाम प्राप्त किया। रूर की भूमि सदैव वंदनीय रही है क्योंकी, जिस परिवार में आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज का जन्म हुआ। उसी घर में मुनि श्री सिद्धसागर जी का जन्म हुआ। आचार्य श्री विशुद्धसागर जी के पूर्वाश्रम के भतीजे हैं मुनि श्री सिद्धसागर जी। उन्होंने बताया कि सिद्धम भैया जी की लौकिक शिक्षा एचएससी तक हुई। देवपूजा, शास्त्र स्वाध्याय और तीर्थ यात्रा करना आपका मुख्य कर्तव्य था। मुनिराजों का विहार कराना, चातुर्मास कराना, वैयावृत्ति करना, आहार दान देना आदि में आप सदैव अग्रणी रहे। सिद्धम भैया ने धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी से भिंड में 15 अगस्त 2019 को मात्र 17 वर्ष की अल्पायु में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर संघ में प्रवेश किया। इसके पश्चात बाल ब्रह्मचारी सिद्धम भैया ने सन 2020 में पटना (बिहार) के चंडी गांव में द्वितीय प्रतिमा व्रत लिया। ओजस्वी वक्ता, ह्रदय के सच्चे, सरल व्यक्तित्व, गुरु भक्ति में निपुण सिद्धम भैया ने लगातार 4 वर्ष तक संघस्थ ब्रम्हचारी रहकर गुरु मुख से शास्त्रों का अध्ययन किया।</p>
<p><strong>बड़ौत में अपार जनसमूह के समक्ष मुनि दीक्षा ग्रहण की </strong></p>
<p>25 अक्टूबर 2023 का वह शुभ दिन आया, जब आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने आपकी योग्यता परखकर आपकी आध्यात्मिक यात्रा को आगे बढाते हुए बड़ौत में अपार जनसमूह के समक्ष मुनि दीक्षा प्रदान कर मुनि श्री सिद्धसागर जी कहकर पुकारा। मुनिश्री सिद्ध सागर जी महाराज का प्रथम मंगल वर्षायोग (चातुर्मास) वर्ष 2024 में नांदणी (महाराष्ट्र ) और सन 2025 का द्वितीय चातुर्मास नांद्रे में ही हो रहा है। मुनि श्री सिद्धसागर जी गुरु चरणों में रहकर निरंतर शास्त्रों का स्वाध्याय, ध्यान, उपवास में अपने समय का सदुपयोग करते रहते हैं।</p>
<p><strong>सतत धर्म प्रभावना में रत हैं मुनिश्री </strong></p>
<p>मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज का जीवन एक महान आदर्श है। आपके गृहस्थावस्था के भाई-बहन विकास जैन, पंकज जैन, सपना जैन और प्रीति जैन भी निरंतर धर्म साधना करते हुए शास्त्र-स्वाध्याय में लीन रहते हैं। समाज को आप जैसे मुनिराज पर गर्व है। आप गांव-गांव करते हुए जिनधर्म कि सतत धर्म प्रभावना कर रहे हैं।</p>
<p><strong> मुनिश्री के चरणों में मेरा शत-शत नमोस्तु</strong></p>
<p>धन्य हैं आपकी त्याग-तपस्या। आप स्वभाव के बडे मृदू, विनम्र एवं मितभाषी हैं। आपके प्रवचन प्रभावशाली होते हैं। मैं अपने आपको भाग्यशाली समझता हूं कि मुझे मुनि श्री सिद्ध सागर जी के रुप में मुझे सच्चे गुरु एवं सच्चे मित्र मिले हैं। मेरी यही भावना है कि जीवन के अंतिम सांस तक गुरु-शिष्य का यह नाता बना रहे। आप के चरणों में मेरा शत-शत नमोस्तु। सिद्धत्व के लिए महावीर स्वामी के पथ पर सिद्ध सागर जी महाराज भगवान महावीर जी के सिद्धांत जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं।</p>
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		<title>सूरी मंत्रोच्चार से प्रतिमाएं पंच कल्याणक में प्रतिष्ठित कर पूजनीय होती है : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्रीजी के दर्शन, अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय, दान के बारे में बताया  </title>
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		<pubDate>Mon, 13 Oct 2025 16:34:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आज अनेक श्रावकों और युवाओं ने श्री जी के अभिषेक के साथ पूजन करने का नियम लिया है। 55 वर्ष पूर्व दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी के सन 1970 चातुर्मास में दिए व्रत नियम के संस्कार आज भलीभूत दिख रहे हैं। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्री शांतिनाथ जिनालय बड़ा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आज अनेक श्रावकों और युवाओं ने श्री जी के अभिषेक के साथ पूजन करने का नियम लिया है। 55 वर्ष पूर्व दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी के सन 1970 चातुर्मास में दिए व्रत नियम के संस्कार आज भलीभूत दिख रहे हैं। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्री शांतिनाथ जिनालय बड़ा तख्ता मंदिर में श्री जी के विभिन्न द्रव्यों से किए गए पंचामृत अभिषेक के पावन अवसर पर धर्म सभा में प्रकट की। <span style="color: #ff0000">टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>टोंक।</strong> भगवान के अभिषेक के बिना पूजन अधूरी होती है। आगम में पुरुष और महिला दोनों को अभिषेक का अधिकार है। श्रावकाचार ग्रंथ पुरुष और महिला दोनों के लिए एक जैसा है। आज अनेक श्रावकों और युवाओं ने श्री जी के अभिषेक के साथ पूजन करने का नियम लिया है। 55 वर्ष पूर्व दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी के सन 1970 चातुर्मास में दिए व्रत नियम के संस्कार आज भलीभूत दिख रहे हैं। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने श्री शांतिनाथ जिनालय बड़ा तख्ता मंदिर में श्री जी के विभिन्न द्रव्यों से किए गए पंचामृत अभिषेक के पावन अवसर पर धर्म सभा में प्रकट की। उन्होंने कहा कि धर्म से नाता, अवलंबन से मनुष्य जीवन में उन्नति होती है। श्रीजी के दर्शन, अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय, दान आदि श्रावकों के मुख्य कर्तव्यों में है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में आगे बताया कि सन 1970 में दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्म सागर जी के साथ टोंक नगर में चातुर्मास किया था। बाद में पंचकल्याणक हुआ था। इसकी सुखद पुनरावृत्ति सन 2025 में हो रही है। पहले यहां वर्षायोग किया इसके बाद नवंबर में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होगी।</p>
<p><strong>णमोकार मंत्र में पंच परमेष्ठी बतलाए गए हैं </strong></p>
<p>जैन समाज द्वारा जिन मंदिर में नूतन प्रतिमा स्थापित करने के लिए पंचकल्याणक प्रतिष्ठा आचार्य भगवान के सानिध्य में सूरी मंत्रोच्चार के माध्यम से प्राण प्रतिष्ठा कराई जाती है। इन धार्मिक अनुष्ठान को पूर्ण मनोभाव से करने और देखने से असीम पुण्य की प्राप्ति होती है। इन पांच दिवसीय कार्यक्रम में भगवान के जन्म, गर्भकल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा तप कल्याणक, ज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक की धार्मिक क्रियाएं होती है। जिसमें ज्ञान और मोक्ष कल्याणक पर भगवान को सूरी मंत्र द्वारा प्रतिष्ठित किया जाता है। णमोकार मंत्र में पंच परमेष्ठी बतलाए गए हैं साधु, उपाध्याय, आचार्य, अरिहंत और सिद्ध भगवान जो वैराग्य धारण कर तप संयम से कर्मों की क्षय निर्जरा करते हुए सिद्धालय पर विराजित होते हैं।</p>
<p><strong><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-92413" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251013-WA0023.jpg" alt="" width="1200" height="1600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251013-WA0023.jpg 1200w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251013-WA0023-225x300.jpg 225w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251013-WA0023-768x1024.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251013-WA0023-1152x1536.jpg 1152w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/10/IMG-20251013-WA0023-990x1320.jpg 990w" sizes="(max-width: 1200px) 100vw, 1200px" />पंच कल्याणक कार्यक्रम के स्टीकर पोस्टर का विमोचन </strong></p>
<p>सुनील सराफ, पवन कंटान के अनुसार अनुसार आदिनाथ जिनालय से श्री शांतिनाथ जिनालय में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का भव्य मंगल प्रवेश हुआ। जगह-जगह समाजजनों ने आचार्य श्री की आरती कर चरण प्रक्षालन किए। विभिन्न पुण्यार्जक परिवारों द्वारा श्री जी का भव्य पंचामृत अभिषेक जल, नारियल रस, विभिन्न फलों के रस, शर्करा, धी, दूध, दही, सर्व औषधि; केशर लाल चंदन सफेद चंदन पुष्प हल्दी,सुगंधित जल आदि से किया। श्रीजी की शांतिधारा हुई। आचार्य श्री संघ सानिध्य में होने वाले पंच कल्याणक कार्यक्रम के स्टीकर पोस्टर का विमोचन समाज के पदाधिकारियों ने आचार्य श्री सानिध्य में किया। सोमवार को आर्यिका श्री महायश मति जी के केश लोचन हुए।</p>
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