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	<title>self-respect &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>अपनी झोपड़ी में राज करना, दूसरों के महल में गुलामी से बेहतर : मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी ने धर्मसभा में स्वाभिमान को जीवन का सूत्र बताया  </title>
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		<pubDate>Sat, 22 Nov 2025 09:20:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी महाराज ने यहां पर धर्मसभा को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मित्रों, जीवन में एक बात बहुत गहरी है-स्वाभिमान, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान। सागर से पढ़िए, अभिषेक पाटील की यह खबर&#8230; सागर। मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी महाराज ने यहां पर धर्मसभा को संबोधित किया। इस अवसर पर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी महाराज ने यहां पर धर्मसभा को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मित्रों, जीवन में एक बात बहुत गहरी है-स्वाभिमान, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान। <span style="color: #ff0000">सागर से पढ़िए, अभिषेक पाटील की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर</strong>। मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी महाराज ने यहां पर धर्मसभा को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मित्रों, जीवन में एक बात बहुत गहरी है-स्वाभिमान, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान। मनुष्य चाहे कितने ही कष्टों में क्यों न हो, यदि उसके पास अपना निर्णय लेने की स्वतंत्रता है तो वह वास्तव में जीवन का राजा है लेकिन, यदि आदमी महल में रहे, विलासिता में रहे, पर उसके विचार, उसके निर्णय और उसकी पहचान किसी ओर की पकड़ में हो तो वह बाहर से भले ही राजा दिखे पर भीतर से गुलाम होता है। मुनि श्री सर्वार्थ सागर जी की भक्त मनाली पाटणी ने बताया कि मुनिश्री ने आगे अपने प्रवचन में कहा कि झोपड़ी और महल हमारे बाहरी घर नहीं बल्कि, हमारे जीवन की परिस्थिति हैं। झोपड़ी उस सरल स्थिति का प्रतीक है, जहां कम साधन होते हैं पर स्वतंत्रता पूरी होती है और महल उस चकाचौंध का प्रतीक है, जहां सबकुछ दिखता तो है पर स्वयं का स्वामित्व खो जाता है। इसलिए कहा गया कि अपनी झोपड़ी में राज करना बेहतर है क्योंकि, वहां निर्णय हमारे होते हैं। विचार हमारे होते हैं और जीवन हमारी मर्जी से चलता है। मुनिश्री ने कहा कि दूसरों के महल में रहने का क्या अर्थ है? जहां आपका मूल्य तभी है जब आप किसी के काम आएं। जहां सम्मान आपको नहीं, आपके उपयोग को मिलता है। ऐसी जगह का वैभव भी मन में खालीपन छोड़ जाता है। उन्होंने कहा कि सच्चा सुख स्वतंत्रता में है। चाहे वह छोटी हो, सीमित हो पर अपनी हो। मन के स्वाभिमान से बड़ी कोई संपत्ति नहीं। इसलिए हमें चाहिए कि</p>
<p>अपनी परिस्थिति को छोटा न समझें, अपने संघर्ष को बोझ न मानें और अपने सम्मान को किसी भी सुविधा से ऊपर रखें क्योंकि, अंत में राज वही करता है, जो स्वयं का मालिक है।</p>
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		<title>जीवन और व्यवहार में विनम्रता का भाव होना ही मार्दव धर्म है: दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में पर्यूषण पर्व पर हुए प्रवचन  </title>
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		<pubDate>Fri, 29 Aug 2025 16:25:40 +0000</pubDate>
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<p><strong>अभिमान अहंकार व्यक्तित्व के विकास में बाधक है। महान वही बनता है जो विनम्र होकर मार्दव धर्म का पालन करता है। यह उद्गार दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर पर प्रवचन देते हुए ब्रह्मचारी अंशु भैया (सांगानेर राजस्थान) ने व्यक्त किए। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> मनुष्य के जीवन और व्यवहार में अहंकार ना होना और विनम्रता एवं सरलता का भाव होना ही मार्दव धर्म है। आचार्यों ने मान को महा विष रूप कहा है। व्यक्ति में स्वाभिमान हो, लेकिन अभिमान नहीं होना चाहिए क्योंकि अभिमान अहंकार व्यक्तित्व के विकास में बाधक है। महान वही बनता है जो विनम्र होकर मार्दव धर्म का पालन करता है। यह उद्गार दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर पर प्रवचन देते हुए ब्रह्मचारी अंशु भैया (सांगानेर राजस्थान) ने व्यक्त किए। भैया जी ने आगे कहा कि आज मानव मान के कारण मानवता मर रही है कुल, वंश, जाति, रूप, बल एवं ज्ञान और पद का मान दुर्गति का कारण है। अतः सभी को विनम्रता और सरलता से रहते हुए मान का मर्दन करने का प्रयास करना चाहिए।</p>
<p>प्रवचन के पूर्व प्रातः चार स्वर्ण कलशों से श्रीजी का अभिषेक करने का सौभाग्य डॉक्टर जैनेंद्रए राजेश जैन दद्दू , डीएल जैन, कमल जैन टेलीफोन एवं अमन कासलीवाल ने प्राप्त किया एवं शांति धारा करने का सौभाग्य अनिल जैन एवं अरविंद अखिलेश सोधिया ने प्राप्त किया। इस अवसर पर जिनालय ट्रस्ट अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, ब्रह्मचारी शुभांशु भैया, डॉ.वीसी जैन, नीलेश जैन आदि उपस्थित थे।</p>
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		<title>जैन समाज में बढ़ता दिखावा उपेक्षित निर्धन वर्ग एक चिंतन: वास्तविक सेवा, जो धर्म का सार है। वह कहीं पीछे छूटी  </title>
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		<pubDate>Fri, 23 May 2025 10:31:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[धर्म का उद्देश्य केवल रीति-रिवाजों और आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका मुख्य लक्ष्य समाज के हर व्यक्ति को सन्मार्ग की ओर ले जाना है। विशेषकर उस व्यक्ति को जो स्वयं वहां तक नहीं पहुंच सकता। जैन धर्म का सार ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ में है, न कि वैभव प्रदर्शन में। समय की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धर्म का उद्देश्य केवल रीति-रिवाजों और आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका मुख्य लक्ष्य समाज के हर व्यक्ति को सन्मार्ग की ओर ले जाना है। विशेषकर उस व्यक्ति को जो स्वयं वहां तक नहीं पहुंच सकता। जैन धर्म का सार ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ में है, न कि वैभव प्रदर्शन में। समय की मांग है कि हम समाज के उस उपेक्षित वर्ग की सुध लें। <span style="color: #ff0000">पलवल से पढ़िए, जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम के संयोजक नितिन जैन की कलम से यह अभिव्यक्ति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पलवल।</strong> आज जैन समाज एक ओर जहां भव्य आयोजनों, विशाल रथयात्राओं, चमचमाते मंचों और अमूल्य भेंटों के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग उपेक्षा और उपेक्षा भाव का शिकार होता जा रहा है। ये वर्ग है, निर्धन, पिछड़ा और साधनों से वंचित जैन परिवारों का, जो न तो मंचों पर स्थान पाते हैं, न ही किसी संस्था या साधु-संत की दृष्टि में उनके लिए कोई योजना है।</p>
<p><strong>दिखावे की दौड़ः धर्म या प्रदर्शन ?</strong></p>
<p>जैन धर्म का मूलभूत संदेश तप, संयम, त्याग और अहिंसा है। भगवान महावीर ने न केवल राजमहलों को त्यागा, बल्कि हर जीव मात्र की पीड़ा को समझने का मार्ग दिखाया। परंतु वर्तमान समय में धार्मिक आयोजनों में यह मूल भावना कहीं खो सी गई है। अब धर्म के नाम पर मंचों पर होने वाला दिखावा अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। महंगे परिधान, आभूषणों की होड़, चढ़ावों की बोली और समाज सेवा के नाम पर फोटो खिंचवाने की ललक। वास्तविक सेवा, जो धर्म का सार है। वह कहीं पीछे छूट गई है। निर्धन जैन परिवार, जो साधनों के अभाव में अपने बच्चों को धर्म की शिक्षा तक नहीं दिला पाते, जो तीर्थ यात्रा के लिए तरसते हैं, जो एक साधु के दर्शन को तरसते हैं। उनके लिए कोई आयोजन नहीं होता।</p>
<p><strong>उपेक्षित निर्धन वर्ग किसकी जिम्मेदारी?</strong></p>
<p>वर्तमान परिदृश्य में जैन समाज का निर्धन वर्ग कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा हैः-</p>
<p>ऽ शैक्षिक पिछड़ापनः आर्थिक संकट के कारण कई बच्चे उचित शिक्षा से वंचित हैं।</p>
<p>ऽ धार्मिक दूरीः धनाभाव के कारण मंदिर, तीर्थ और आयोजनों में उनकी भागीदारी नगण्य है।</p>
<p>ऽ आर्थिक उपेक्षाः किसी संस्था या संगठन द्वारा इस वर्ग के लिए कोई स्थायी सहायता योजना नहीं चलाई जा रही।</p>
<p>ऽ मानसिक पीड़ाः समाज द्वारा उपेक्षा का भाव, आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है, जिससे यह वर्ग खुद को समाज से कटता हुआ महसूस करता है।</p>
<p><strong>साधु-संत और संस्थाएंः क्यों हैं मौन?</strong></p>
<p>समाज के धर्मगुरुओं और संस्थाओं का कर्तव्य है कि वे समाज के हर वर्ग तक पहुंचे, विशेषकर उस वर्ग तक जो सबसे कमजोर है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि अधिकांश साधु-संत केवल धनाढ्य वर्ग के यहां ही ठहरते हैं, वहीं धर्म प्रवचनों और आयोजन की योजना बनती है। निर्धन वर्ग तक कोई धर्मगुरु न पहुंचता है, न उनकी पीड़ा को सुनता है।</p>
<p><strong>समाधानः कुछ आवश्यक पहल</strong></p>
<p>1. सामूहिक सेवा योजनाः समाज की हर संस्था को कम से कम 20ः संसाधन निर्धन वर्ग की शिक्षा, चिकित्सा और धार्मिक सहभागिता हेतु समर्पित करने चाहिए।</p>
<p>2. समावेशी आयोजनों की शुरुआतः आयोजनों में निर्धन परिवारों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए दृ उन्हें विशेष आमंत्रण दिया जाए, यात्रा और आवास की व्यवस्था की जाए।</p>
<p>3. जागरूकता अभियानः धर्मगुरु और वक्ता अपने प्रवचनों में समाज के भीतर के भेदभाव पर बात करें और इसे मिटाने का मार्ग दिखाएं।</p>
<p>4. साधुओं की जिम्मेदारीः साधुओं को केवल भव्य धर्मशालाओं में न रहकर गाँवों और निर्धन बस्तियों में भी धर्म की अलख जगानी चाहिए।</p>
<p>5. युवाओं को प्रेरित करनाः युवा वर्ग को सेवा कार्यों में सक्रिय किया जाए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ एक संवेदनशील समाज की नींव रखें।</p>
<p><strong>निष्कर्ष</strong></p>
<p>धर्म का उद्देश्य केवल रीति-रिवाजों और आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका मुख्य लक्ष्य समाज के हर व्यक्ति को सन्मार्ग की ओर ले जाना है। विशेषकर उस व्यक्ति को जो स्वयं वहां तक नहीं पहुंच सकता। जैन धर्म का सार ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’ में है, न कि वैभव प्रदर्शन में। समय की मांग है कि हम समाज के उस उपेक्षित वर्ग की सुध लें, जो आज स्वयं को जैन कहलाने से भी संकोच करता है। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे जैन समाज का निर्माण करें जो सच्चे अर्थों में समावेशी, करुणामय और धर्मपरायण हो। जहां दिखावे नहीं, सेवा और संवेदना की प्रधानता हो। (यह लेखक के अपने विचार हैं )</p>
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		<title>स्मार्ट गर्ल ट्रेंनिंग स्वस्ति धाम जहाजपुर में 5-6 जून को होगी: 1000 युवतियों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य  </title>
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		<pubDate>Tue, 20 May 2025 11:47:11 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नवोदित तीर्थ स्वस्ति धाम जहाजपुर भीलवाड़ा में भारतीय जैन संगठन पुणे के सहयोग से स्मार्ट गर्ल प्रशिक्षण का आयोजन 5 व 6 जून 2025 को होने जा रहा है। उक्त आयोजन में 13 से 20 वर्ष की आयु वाली 1000 युवतियों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। स्वस्तिधाम जहाजपुर से पढ़िए, राजेंद्र जैन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>नवोदित तीर्थ स्वस्ति धाम जहाजपुर भीलवाड़ा में भारतीय जैन संगठन पुणे के सहयोग से स्मार्ट गर्ल प्रशिक्षण का आयोजन 5 व 6 जून 2025 को होने जा रहा है। उक्त आयोजन में 13 से 20 वर्ष की आयु वाली 1000 युवतियों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। <span style="color: #ff0000">स्वस्तिधाम जहाजपुर से पढ़िए, राजेंद्र जैन महावीर की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>स्वस्तिधाम (जहाजपुर)</strong>। 1008 श्री मुनिसुव्रत भगवान के अतिशय से आच्छादित आर्यिका स्वस्ति भूषण माता जी की प्रेरणा और मार्गदर्शन में निर्मित नवोदित तीर्थ स्वस्ति धाम जहाजपुर भीलवाड़ा में भारतीय जैन संगठन पुणे के सहयोग से स्मार्ट गर्ल प्रशिक्षण का आयोजन 5 व 6 जून 2025 को होने जा रहा है। उक्त आयोजन में 13 से 20 वर्ष की आयु वाली 1000 युवतियों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है। प्रशिक्षण के दौरान जीवन कौशल, आत्मविश्वास, आत्म सुरक्षा, आत्मसम्मान, संवाद और भावनात्मक सशक्तिकरण के साथ आत्मनिर्भर बनने की ट्रेनिंग, विशेष प्रशिक्षण प्राप्त मास्टर ट्रेनर के माध्यम से प्रदान की जाएगी। प्रशिक्षण कार्यक्रम के प्रमुख वरिष्ठ समाजसेवी हंसमुख जैन गांधी ने बताया कि स्मार्ट गर्ल प्रशिक्षण आवासीय रूप से जैन युवतियों के लिए 5 और 6 जून को स्वातिधाम जहाजपुर में आयोजित किया जा रहा है। जिसमें पूज्य आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी के मार्गदर्शन में क्षेत्र कमेटी द्वारा आवास भोजन आदि समस्त व्यवस्थाएं निशुल्क उपलब्ध रहेगी।</p>
<p>क्लासरूम टीचिंग के साथ पेरेंट्स के लिए होगा विशेष सेशन। प्रशिक्षण में 40-40 युवतियों की क्लास होगी जिसमें भारतीय जैन संगठन के मास्टर ट्रेनर पीपीटी प्रेजेंटेशन के माध्यम से युवतियों को प्रशिक्षण प्रदान करेंगे। सभी के लिए शानदार आवास भोजन के साथ किट और माता जी के निःशुल्क साहित्य की व्यवस्था की गई है।</p>
<p>’संपूर्ण देश से युवतियों को आमंत्रित किया गया है। प्रशिक्षण प्रमुख हंसमुख जैन गांधी ,शरद पाणोत इंदौर , स्वस्ति धाम के महामंत्री ज्ञानेंद्र जैन ने कहा कि प्रशिक्षण में संपूर्ण देश से युवतिया भाग ले सकती हैं। इसके लिए उन्हें गूगल फॉर्म या बार कोड स्कैन कर अपना रजिस्ट्रेशन करना होगा। 25 मई तक रजिस्ट्रेशन की अंतिम तारीख रखी गई है।</p>
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