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	<title>Scientific Religious Leader Kanak Nandi Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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	<title>Scientific Religious Leader Kanak Nandi Ji &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>शिष्य का प्रथम महत्वपूर्ण गुण जो श्रवण करे : वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने बताए योग्य शिष्य के महत्वपूर्ण गुण </title>
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		<pubDate>Mon, 08 Jun 2026 16:23:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230; बांसवाड़ा। वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, बांसवाड़ा से अजीत कोठिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बांसवाड़ा।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार को संबोधित किया। इसमें उन्होंने में योग्य शिष्य के गुणों का बखान किया। उन्होंने कहा कि एक योग्य शिष्य में क्या-क्या गुण होने चाहिए। उन्होंने कहा कि जो सदा से गुरुकुल में रहता है। गुरु आज्ञा का नित्य पालन करता है। समता में रहता है उपधान पूर्वक अर्थात नियम पूर्वक शास्त्र अध्ययन करता है, वह प्रिय भाषी होता है और शिक्षा को श्रवण करके ग्रहण करता है। शिष्य का पहला गुण सुश्रुषा अर्थात श्रवण करने वाला होना चाहिए। परम उपलब्धि की भावना से शिष्यत्व ग्रहण करने वाला सर्वश्रेष्ठ है। श्रोता सुख का अभिलाषी होना चाहिए क्योंकि, जो सुख चाहेगा वही शास्त्र श्रवण करेगा। श्रोता 8 गुणों से युक्त होता है। उसके पास सुव्यवस्थित ज्ञान होना चाहिए। अनेक भाषाओं के ज्ञान रखने वाले की स्मरण शक्ति अधिक होती है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव जो बोलते हैंज़ उसे भावना पूर्वक एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए। भगवान ने हमें पांच इंद्रियां दी हैं। स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण। इनमें कर्ण इंद्री सबसे श्रेष्ठ है। जो सुन नहीं पाते हैंज़ वह बोल भी नहीं पाते हैं। प्राचीन काल में अनेक अंधे भी श्रेष्ठ कवि हुए हैं। जो अधिक सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता होता है। जो हितोपदेश नहीं सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता नहीं बन सकता।</p>
<p><strong> एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते</strong></p>
<p>आचार्य श्री ने कहा कि योग्य शिष्य का दूसरा गुण प्रति प्रच्छना अर्थात पूछना जिज्ञासा करना परम तप है। तत्व जिज्ञासा करनी चाहिए परंतु, तत्व जिज्ञासा करने में अहंकार बाधक होता है। एकाग्रचित होकर सुनना यह श्रोता का तीसरा गुण है। आचार्य श्री हमेशा स्वाध्याय कराते हुए कहते हैं कि मुझे ही देखो मुझे ही सुनो मेरे सामने ही देखो। एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते। शिष्य का चौथा गुण ग्रहण करना है। एक कान से सुनना दूसरे कान से निकाल देना। यह श्रेष्ठ श्रोता का लक्षण नहीं है। अयोग्य शिष्य कहता है मैं घर्म जानूंगा पर धर्म नहीं करूंगा। मैं अधर्म जानता हूं परंतु, अधर्म नहीं छोडूंगा।</p>
<p><strong>शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा</strong></p>
<p>जो सुनता है, वह आचरण में लाने वाला श्रेष्ठ श्रोता है। बुरा ना सोचना यह सबसे श्रेष्ठ है। गांधी जी के तीन बंदर बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो, बुरा ना बोलो इतना ही पूर्ण नहीं है उसके साथ-साथ बुरा ना सोचो जोड़ना चाहिए यह श्रेष्ठ विचार है। अच्छा भोजन करें परंतु पचे नहीं तो जहर बन जाता है। तत्व जिज्ञासु बने बिना सही विद्यार्थी नहीं बन सकते। उपाहोऊ अर्थात सोचना चाहिए विज्ञान में परिकल्पना को अधिक महत्व दिया गया है। परिकल्पना से बुद्धिमता अधिक बढ़ती है। लोक में प्रचलित मान्यता को सही मानना रूढ़िवादिता है, अंधविश्वास है। धारण करना स्मरण ज्ञान बिना जोड़ रूप ज्ञान नहीं होगा। शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा। गुरु से प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारना चाहिए प्रयोग में लाना चाहिए। सुख-सुविधाओं से विद्यार्थी अधिक निकम्मे बन जाते हैं।</p>
<p>जो स्वर्ग मोक्ष ले जाए वह मोक्ष विनय है। विनय मोक्ष का द्वार है।</p>
<p><strong>जो विनयवंत है वही शिष्य हैं</strong></p>
<p>विनय से ही अनुशासन होता है। विनय ही अनुशासन है। अतः शिष्य को विनय से युक्त होना चाहिए। शिक्षा का फल विनय है। विनय का फल सर्व जीवो का कल्याण है। विनयवंत को ही गुरु अनुशासित करते हैं। स्वयं अनुशासित रहने वाला ही अपने शिष्यों को भक्तों को अनुशासित कर सकता है। विनय से संयम,विनय से तप, विनय से दान आदि होता है। विनयवंत पर ही अनुग्रह किया जाता है। विनयवान शिष्य पर ही गुरु अनुग्रह निग्रह करते हैं सभी पर नहीं। साधु पत्नी के पति नहीं त्रिलोक्य पति होते हैं। अविनीत शिष्य बनना संभव नहीं है, जिसको अनुशासित करके पढ़ा करके आगे बढ़ाया जा सके वह शिष्य है जो विनयवंत है वही शिष्य हैं।</p>
<p>मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता &#8216;छोटी तुच्छ घास हूं सबसे मैं नीचे हूं पैर के नीचे सबसे तुच्छ हूं। सर्दी गर्मी वर्षा सब सहन करु हूं।&#8217;</p>
<p>द्वारा मंगलाचरण किया। इस अवसर पर मुनि श्री अध्यात्मनंदी सौम्यनदी, सुवत्सलमति माताजी, क्षु भक्ति श्री, ब्रह्मचारी वर्ण भैया, शैलेंद्र भट्ट, सारिका भट्ट, विदुषी उर्वशी, प्रतिभा, प्रेमलता,ममता, राजकुमारी, चंद्रलेखा, चंद्रकांत, श्रीपाल, धनपाल आदि भीलुड़ा कोटा पुनर्वास कॉलोनी खोड्न आदि से अनेक श्रावक उपस्थित थे। यह जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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		<title>दुनिया में सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है: वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी जी ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान और कर्म सिद्धान्त के बारे में बताया </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shree Phal News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 01 May 2026 12:40:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। <span style="color: #ff0000">भीलूड़ा से पढ़िए, अजित कोठिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>भीलूड़ा।</strong> वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी ने भीलूड़ा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबिनार में बताया कि हमारे प्राचीन आचार्यो ने मनोविज्ञान, प्राणी विज्ञान, कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मुनि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है।</p>
<p>जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है.। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डांट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है। वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है। बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है।</p>
<p><strong> सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं।</strong></p>
<p>शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। कर्म सिद्धांत का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह चित्त रूपी हाथी इतना प्रबल है कि उसका पराक्रम अनिवार्य है नहीं तो वह संयम रूपी घर को नष्ट कर देगा। चित्त को हाथी की उपमा दी है। हाथी सामान्यतः बुद्धिमान शाकाहारी भद्र सामाजिक प्राणी है तथापि काम वेदना से वह उत्तेजित होकर क्रूर बन जाता है. अन्य क्रूर प्राणियों से भी साठ गुना अधिक क्रूर हो जाता है। हाथी के संभोग के समय हारमोंस स्राव होता है. जिससे मदमस्त हो जाता है उसके मद झरता है। जिसका भाव उदार नहीं, शुभ नहीं वह समस्त पाप करता है। युद्ध, लड़ाई झगड़ा सब पहले भाव से होते हैं वास्तव में वह बाद में होते हैं। धर्म के नाम पर भी क्रुरता असंयम आदि से अधर्म हो रहा है। यह चंचल चित्त रूपी बंदर दौड़ता रहता है। गलत चिंतन करता है दूसरों की निंदा चुगली करके पाप बंध करता है। मन की चंचलता से अधिक पाप बंध होता है। आचार्य श्री यहां पर डाट लगाते हुए कहते हैं जो मन को कंट्रोल नहीं करता वह मूर्ख है वह धर्म की चर्चा करता हुआ लज्जित करता है। वह चित्त को तो जीत नहीं सका तथा ध्यान की चर्चा करता है धर्म की चर्चा करता है, पुण्य,त्याग तपस्या की चर्चा करता है तो वह मूर्ख, निर्लज्ज, ढीठ, पापी है।</p>
<p>बाह्य त्याग अंतरंग त्याग के लिए है। सबसे मुख्य प्रदूषण भाव प्रदूषण है। जब मन शुद्ध होता है भाव प्रदूषण नहीं होता तो कषाय प्रदूषण लड़ाई झगड़ा युद्ध ग्लोबल वार्मिंग आदि कुछ भी संभव नहीं है। चित्त शुद्धि बिना हीलिंग भी संभव नहीं है। भाव शुद्धि बिना चित्त स्थिर नहीं होगा। जिसके भाव में ख्याति पूजा लाभ की चाह है चित्त शुद्ध नहीं है वह मूर्ख है। चित्त को जीत नहीं सकता तथा ध्यान की चर्चा करता है वह साधु घनाघन पाप करता है। सुरा, सुंदरी शिकार आदि के कारण संग्राम होते हैं। शिकारी प्राणी शेर चीता एनाकोंडा शिकार करने से पहले घंटो तक स्थिर रहते हैं शिकार आने पर पकड़ कर क्रुरता से मारते हैं वह ध्यान नहीं है। मांसाहारी जीव रोज खाते नहीं कुछ सप्ताह के बाद कुछ महीनो के बाद कुछ वर्षों के बाद खाते हैं तो वह उपवास नहीं। यह जानकारी</p>
<p>विजय लक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।</p>
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