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	<title>Samvasharan Tirth &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<description>ताज़ा खबरे हिन्दी में</description>
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		<title>चारों दिशाओं में मुख किए हुए भगवान चन्द्रनाथ स्वामी की प्रतिमाएं विराजमान हैं यहां : चौबीस तीर्थंकर भगवानों के दीक्षा-वृक्षों का आरोपण किया गया है इस मंदिर में </title>
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		<pubDate>Sun, 09 Nov 2025 09:59:44 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[उदयपुर-अहमदाबाद राजमार्ग पर गोवर्धनसागर झील के किनारे निर्मित मुक्ताकाश समवशरण तीर्थ जैन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा और कलात्मक स्थापत्य का अद्भुत संगम है। शास्त्रों के अनुसार खुले आकाश के नीचे वलयाकार संरचना में बना यह तीर्थ श्वेत संगमरमर के मानस्तम्भ, जिनालयों, वापिकाओं, फव्वारों और चौबीस तीर्थंकरों के जीवन-वृत्तों से सुसज्जित है। इसके मध्य में अशोक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>उदयपुर-अहमदाबाद राजमार्ग पर गोवर्धनसागर झील के किनारे निर्मित मुक्ताकाश समवशरण तीर्थ जैन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा और कलात्मक स्थापत्य का अद्भुत संगम है। शास्त्रों के अनुसार खुले आकाश के नीचे वलयाकार संरचना में बना यह तीर्थ श्वेत संगमरमर के मानस्तम्भ, जिनालयों, वापिकाओं, फव्वारों और चौबीस तीर्थंकरों के जीवन-वृत्तों से सुसज्जित है। इसके मध्य में अशोक वृक्ष के नीचे भगवान चन्द्रनाथ स्वामी की चार विशाल प्रतिमाएं चारों दिशाओं में मुख किए विराजमान हैं, जो समानता और सर्वहित का संदेश देती हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज की संपादक रेखा संजय जैन का यह विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>मेवाड़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से सुसज्जित नगरी उदयपुर अपने सौंदर्य, झीलों और अध्यात्मिक चेतना के लिए जानी जाती है। इसी नगर की नैसर्गिक छटा के मध्य, उदयपुर-अहमदाबाद राजमार्ग के पांचवें किलोमीटर पर, गोवर्धनसागर झील के तट पर एक अद्वितीय आध्यात्मिक धरोहर के रूप में मुक्ताकाश समवशरण तीर्थ का निर्माण किया गया है। छोटी पहाड़ी पर कलात्मक सौंदर्य के साथ निर्मित यह तीर्थकला और श्रद्धा का ऐसा समन्वय प्रस्तुत करता है, जिसका उदाहरण देश में अन्यत्र नहीं मिलता। इसका शिलान्यास 3 जनवरी 1997 को हुआ था, जबकि पंचकल्याणक 29 जनवरी, 2007 को हुआ था।</p>
<p>यह समवशरण तीर्थ, जैन शास्त्रों में वर्णित दिव्य धर्मसभा का जीवंत रूप प्रतीत होता है। खुले आकाश के नीचे, शास्त्रानुसार निर्मित यह स्थल वलयाकार संरचना, कोट-पगार और परिखा से परिवेष्ठित है। प्रवेश द्वार से भीतर प्रवेश करते ही श्वेत संगमरमर से निर्मित ऊंचा मानस्तम्भ श्रद्धा का प्रतीक बन खड़ा दिखाई देता है। उसके समीप गुलाबी पत्थर से बने भव्य जिनालय और देव भवन दर्शक के मन में अध्यात्म का भाव जागृत कर देते हैं। तीर्थ परिसर में निर्मित नाट्यशालाएं, वापिकाएम (कुंड) और जलवृक्ष (फव्वारे) इसकी सौंदर्य-रचना को और भी आकर्षक बनाते हैं।</p>
<p>परिसर में चौबीस तीर्थंकर भगवानों के दीक्षा-वृक्षों का आरोपण किया गया है। वहीं परिक्रमा मार्ग में श्वेत संगमरमर की शिलाओं पर उनके जीवन-वृत्त को बड़ी ही सुंदरता से उकेरा गया है, जो दर्शक की दृष्टि को बांधे रखता है और उन्हें जैन दर्शन की गहराइयों से परिचित कराता है।</p>
<p>समवसरण के मध्य में अशोक वृक्ष के नीचे आठवें तीर्थंकर भगवान चन्द्रनाथ स्वामी की चार विशाल पद्मासन प्रतिमाएं विराजमान हैं, जो चारों दिशाओं में समान रूप से मुख किए हुए हैं। यह व्यवस्था इस भावना का प्रतीक है कि भगवान का उपदेश सबके लिए समान रूप से उपलब्ध है — वे सर्वतोभद्र, सर्वहितकारी और सर्वसुलभ हैं। बारह सभाओं का यह प्रतीकात्मक विन्यास समता और अहिंसा के सिद्धांत का सशक्त संदेश देता है। भगवान के प्रभामंडल से प्रसारित होती तेजस्विता भक्तों के हृदय में मंगल की प्रेरणा भर देती है, जबकि अशोक वृक्ष की छाया भय और शोक को दूर कर आत्मशांति का अनुभव कराती है।</p>
<p>यह संपूर्ण रचना अपने आप में नयनाभिराम, कलात्मक और भावनात्मक रूप से अत्यंत प्रभावशाली है। नव-निर्मित मुक्ताकाश समवसरण तीर्थ अर्हंत भगवान की उस दिव्य धर्मसभा का साकार रूप है, जिसके माध्यम से जिनधर्म की परंपरा अनादिकाल से मानवता को संयम, करुणा और समता का संदेश देती आई है।</p>
<p>इस अद्भुत तीर्थ के निर्माण के पीछे स्वर्गीय श्री मोतीलाल मिण्डा और श्रीमती गुलाबबाई मिण्डा की दूरदर्शी कल्पना रही। उनके इस स्वप्न को साकार करने का कार्य उनके उत्तराधिकारी श्री महावीर मिण्डा एवं परिवारजनों ने पूर्ण उदारता, समर्पण और श्रद्धा के साथ किया। उन्होंने अपनी संपत्ति का उपयोग समाज और धर्म के हित में कर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।</p>
<p>मुक्ताकाश समवसरण तीर्थ न केवल वास्तु-कला का चमत्कार है, बल्कि यह आस्था, ज्ञान और वैराग्य का संगम बनकर उदयपुर की आध्यात्मिक पहचान को और अधिक प्रखर बना देता है।</p>
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