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	<title>sammedshikhar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का मोक्ष कल्याणकः तिथि के अनुसार मोक्ष कल्याणक इस बार 3 अप्रैल को मनाया जाएगा सारांश </title>
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		<pubDate>Thu, 03 Apr 2025 11:39:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के तीसरें तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 3 अप्रैल को आ रही है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विभिन्न अनुष्ठान और विधान किए जाएंगे। भगवान का अभिषेक और शांतिधारा के साथ ही अष्ट द्रव्य समर्पित कर निर्वाण लाडू चढ़ाए जाते [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के तीसरें तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का मोक्ष कल्याणक चैत्र शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 3 अप्रैल को आ रही है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विभिन्न अनुष्ठान और विधान किए जाएंगे। भगवान का अभिषेक और शांतिधारा के साथ ही अष्ट द्रव्य समर्पित कर निर्वाण लाडू चढ़ाए जाते हैं। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में आज उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संयोजित प्रस्तुति पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का 3 अप्रैल को मोक्ष कल्याणक है। देश के कोने-कोने में दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन विशेष विधान आदि होंगे। भगवान संभवनाथ जी के मोक्ष कल्याण सहित अन्य जानकारी से रूबरू होते हैं। दिव्य जीवन रूप से संभवनाथ भगवान का जन्म भरत क्षेत्र में स्थित श्रावस्ती नगरी में राजा जितारी और रानी सेना देवी के घर हुआ था। जब भगवान संभवनाथ रानी सेना देवी के गर्भ में थे। पुराणों के अनुसार भगवान संभवनाथ जी का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उनका चिन्ह अश्व (घोड़ा) था।</p>
<p>उन्होंने सम्मेत शिखर पर अपने सभी कर्मों का क्षय कर निर्वाण प्राप्त किया था। उन्होंने अपने पुत्र को राज्य सौंपकर जनता की गरीबी दूर करने का काम किया था। उन्होंने मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन श्रमण दीक्षा स्वीकार की थी। 14 वर्ष की साधना के बाद कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ था। उनके पहले शिष्य का नाम चारूदत और पहली शिष्या का नाम श्यामा था। उनके पहले गणधर चारूजी थे। तीर्थंकर श्री संभवनाथ भगवान का अंतिम जन्म घातकी खंड द्वीप के ऐरावत क्षेत्र में स्थित क्षेमपुरी शहर में राजा विपुलवाहन के रूप में हुआ था। जन्म से ही भगवान संभवनाथ के पास तीन प्रकार का ज्ञान था, श्रुत, मति और अवधि।</p>
<p>राजकुमार संभवनाथ राजसी सुख-सुविधाओं के बीच पले-बढ़े, लेकिन उन्हें विलासितापूर्ण जीवनशैली में कोई रुचि नहीं थी। कर्मफल और माता-पिता की आज्ञा के अनुसार, राजकुमार संभवनाथ का विवाह हुआ और उचित आयु में राज्याभिषेक हुआ। बहुत लंबे और शांतिपूर्ण शासन के बाद, देवताओं के अनुरोध पर भगवान संभवनाथ ने दीक्षा ली। दीक्षा लेने के बाद, भगवान ने एक साल तक खूब दान किया (वर्षिदान) और उसके बाद उनका दीक्षा समारोह मनाया गया। तीर्थंकर भगवान के दीक्षा समारोह की पूरी व्यवस्था देवताओं ने की थी। राजा संभवनाथ के साथ 20 हजार अन्य राजाओं ने भी दीक्षा ली थी। 14 वर्ष की दीक्षा के पश्चात राजा संभवनाथ ने अपने संज्वलन कर्म समाप्त किए और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को सर्वज्ञता, केवलज्ञान प्राप्त किया।</p>
<p>भगवान संभवनाथ के मुख्य गणधर चारु थे। उन्होंने संभवनाथ भगवान से पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया और फिर लोगों को उपदेश दिए; वे लोगों के जीवन में मोक्ष के बीज बो रहे थे। भगवान के दर्शन मात्र से ही कई लोग सर्वज्ञ हो गए और सभी कष्टों से मुक्त हो गए। भगवान संभवनाथ ने सम्मेद शिखर पर जाकर चैत्र शुक्ल षष्ठी के दिन मोक्ष प्राप्त किया। यह दिन जैन समाज के लिए बड़ी आस्था और श्रद्धा का दिन है।</p>
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		<title>आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु का गर्भ कल्याणक 19 मार्च को: तिथि के अनुसार चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन आता है मोक्ष कल्याणक इस बार 6 मार्च को। </title>
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		<pubDate>Tue, 18 Mar 2025 06:21:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु जी का गर्भ कल्याणक इस बार 19 मार्च बुधवार को आ रहा है। भगवान चंद्रप्रभु ने चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन गर्भ में स्थान प्राप्त किया था। भगवान के गर्भ कल्याणक पर दिगंबर जैन समाज के विभिन्न मंदिरों, चैत्यालयों में श्रद्धा और भक्ति के साथ विधान होंगे। श्रीफल जैन न्यूज की [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु जी का गर्भ कल्याणक इस बार 19 मार्च बुधवार को आ रहा है। भगवान चंद्रप्रभु ने चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन गर्भ में स्थान प्राप्त किया था। भगवान के गर्भ कल्याणक पर दिगंबर जैन समाज के विभिन्न मंदिरों, चैत्यालयों में श्रद्धा और भक्ति के साथ विधान होंगे। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में उप संपादक प्रीतम लखवाल की ओर से यह संकलित जानकारी पढ़िए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैनधर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु का गर्भ कल्याणक 19 मार्च को मनाया जाएगा। इस दिन देशभर के प्रसिद्ध जैन मंदिरों में विभिन्न विधान और शांतिधारा आदि के महोत्सव आयोजित किए जाएंगे। भगवान श्री चंद्रप्रभु जी के गर्भ और जन्म कल्याणक के बारे में पुराणों में वर्णित है कि जब इनकी 6 महीने की आयु बाकी रह गई। तब जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में चंद्रपुर नगर के महासेन राजा की लक्ष्मणा महादेवी के यहां रत्नों की वर्षा होने लगी। चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन गर्भ कल्याणक महोत्सव हुआ एवं पौष कृष्ण एकादशी के दिन भगवान चंद्रप्रभ का जन्म हुआ। तीन माह का छद्मस्थ काल व्यतीत कर भगवान ने दीक्षा वन में नाग वृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन केवल ज्ञान प्राप्त किया। चंद्रप्रभु भगवान सभी देशों में विहार कर धर्म की प्रवृत्ति करते हुए सम्मेदशिखर पर पहुंचे।</p>
<p>एक माह तक प्रतिमा योग से स्थित होकर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन ज्येष्ठा नक्षत्र में शाम के समय शुक्ल ध्यान द्वारा सर्वकर्म को नष्ट कर सिद्धपद को प्राप्त हुए। भगवान चंद्रप्रभु के तप कल्याणक के बारे में वर्णित है कि किसी समय दर्पण में अपना मुख देख रहे थे कि भोगों से विरक्त होकर देवों द्वारा लाई गई ‘विमला’ नाम की पालकी पर बैठकर सर्वर्तुक वन में गए। वहां पौष कृष्ण एकादशी के दिन हजार राजाओं के साथ दीक्षा ली।</p>
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		<title>नवें तीर्थंकर पुष्पदंतनाथ भगवान का गर्भकल्याणक 22 फरवरी : गर्भकल्याणक तिथि से आता है फाल्गुनी कृष्ण नवमी को </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/birth_welfare_of_lord_pushpadantanathji_the_ninth_tirthankar_of_jainism/</link>
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		<pubDate>Fri, 21 Feb 2025 10:46:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म की समृद्ध धार्मिक विरासत में नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंतनाथ जी का गर्भ कल्याणक फाल्गुन कृष्ण नवमीं के दिन संपूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 22 फरवरी को आ रही है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा सहित अन्य पूजन विधानादि किए जाएंगे। आइए भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म की समृद्ध धार्मिक विरासत में नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंतनाथ जी का गर्भ कल्याणक फाल्गुन कृष्ण नवमीं के दिन संपूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस बार यह तिथि 22 फरवरी को आ रही है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में अभिषेक, शांतिधारा सहित अन्य पूजन विधानादि किए जाएंगे। आइए भगवान श्री पुष्पदंतनाथ जी के बारे में श्रीफल जैन न्यूज की अपनी विशेष श्रंखला में पौराणिक जानकारी से अवगत होते हैं। <span style="color: #ff0000">इसमें संयोजन और संकलन उप संपादक प्रीतम लखवाल का है। </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> सुविधिनाथ, जो पुष्पदंतनाथ के नाम से भी जाने जाते हैं। वर्तमान काल के 9वें तीर्थंकर हैं। इनका चिन्ह ‘मगर’ हैं। किसी दिन भूतहित जिनराज की वंदना करके धर्माेपदेश सुनकर विरक्तमना राजा दीक्षित हो गए। ग्यारह अंगरूपी समुद्र का पारगामी होकर सोलह कारण भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया और समाधिमरण के प्रभाव से प्राणांत स्वर्ग का इंद्र हो गए। पंचकल्याणक वैभव-इस जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र की काकंदी नगरी में इक्ष्वाकु वंशीय काश्यप गोत्रीय सुग्रीव नाम का क्षत्रिय राजा था, उनकी जयरामा नाम की पट्टरानी थी। उन्होंने फाल्गुन कृष्ण नवमी के दिन ‘प्राणतेंद्र’ को गर्भ में धारण किया और मार्गशीर्ष शुक्ला प्रतिपदा के दिन पुत्र को जन्म दिया। इंद्र ने बालक का नाम ‘पुष्पदंत’ रखा। पुष्पदंतनाथ राज्य करते हुए एक दिन उल्कापात से विरक्ति को प्राप्त हुए। तभी लौकांतिक देवों से स्तुत्य भगवान इंद्र द्वारा लाई गई ‘सूर्यप्रभा’ पालकी में बैठकर मगसिर सुदी प्रतिपदा को दीक्षित हुए। शैलपुर नगर के पुष्पमित्र राजा ने भगवान को प्रथम आहार दान दिया था।</p>
<p><strong>केवल ज्ञान की प्राप्ति</strong></p>
<p>छद्मस्थ अवस्था के चार वर्ष के बाद नाग वृक्ष के नीचे विराजमान भगवान को कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन केवल ज्ञान हुआ। आर्यदेश में विहार कर धर्माेपदेश देते हुए भगवान अंत में सम्मेदशिखर पहुंचकर भाद्रपद शुक्ला अष्टमी के दिन सर्व कर्म से मुक्ति को प्राप्त हो गए।</p>
<p><strong>ऋषभनाथ भगवान की परंपरा को पुनर्स्थापित की</strong></p>
<p>उपलब्ध जानकारी के अनुसार भगवान पुष्पदंत जी की जन्मतिथि विक्रम संवत के मार्गशीर्ष कृष्ण मास की पंचमी तिथि थी। नौवें तीर्थंकर पुष्पदंत भगवान ने ऋषभनाथ भगवान द्वारा शुरू की गई परंपरा में चार-भाग वाले संघ को फिर से स्थापित किया था। पुष्पदंत प्रभु मगरमच्छ प्रतीक, मल्ली वृक्ष, अजिता यक्ष और महाकाली (दिग्गज) और सुतारका (श्वेत) यक्षी से जुड़े हैं।</p>
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		<title>सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ भगवान का ज्ञान और मोक्ष कल्याणक: दिगंबर जैन जिनालयों में धूमधाम से मनाए जाएंगे कल्याणक </title>
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		<pubDate>Mon, 17 Feb 2025 11:21:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैनधर्म के सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ भगवान का 18 फरवरी को ज्ञान और 19 फरवरी को मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा। फाल्गुन कृष्ण छटवीं को भगवान को केवल्य ज्ञान हुआ और सप्तमी तिथि को उन्होंने मोक्ष भी पाया। यह अद्भुत संयोग बहुत पुण्यकारी है। भगवान सुपार्श्वनाथ भगवान के ज्ञान और मोक्ष कल्याणक के साथ एक और संयोग [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैनधर्म के सातवें तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ भगवान का 18 फरवरी को ज्ञान और 19 फरवरी को मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा। फाल्गुन कृष्ण छटवीं को भगवान को केवल्य ज्ञान हुआ और सप्तमी तिथि को उन्होंने मोक्ष भी पाया। यह अद्भुत संयोग बहुत पुण्यकारी है। भगवान सुपार्श्वनाथ भगवान के ज्ञान और मोक्ष कल्याणक के साथ एक और संयोग आ रहा है। वह है भगवान चंद्रप्रभु का ज्ञान और मोक्ष कल्याणक 19 फरवरी फाल्गुन कृष्ण सप्तमी पर है। इस अवसर पर जिनालयों में विशेष महामस्ताभिषेक, शांतिधारा और निर्वाण लाडू आदि विधान पूर्ण मनोयोग से किए जाएंगे। श्री फल जैन न्यूज की इस श्रंखला में आज उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह प्रस्तुति पढ़िए&#8230;</strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ जी अवसर्पिणी काल के दुरूषमा-सुषमा चौथे काल में उत्पन्न हुए थे। जंबूदीप के भरत क्षेत्र में वाराणसी नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ की रानी पृथिवीषेणा के गर्भ में ये भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन विशाखा नक्षत्र में स्वर्ग से अवतरित हुए थे। इनका जन्म ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन अग्निमित्र नामक शुभ योग में हुआ था। इनका यह नाम जन्माभिषेक करने के बाद इंद्र ने रखा था। इनके चरणों में स्वस्तिक चिह्न था। इनकी आयु बीस लाख पूर्व वर्ष की थी। शरीर दो सौ धनुष ऊँचा था। इन्होंने कुमार काल के पांच लाख वर्ष बीत जाने पर धन का त्याग (दान) करने के लिए साम्राज्य स्वीकार किया था। इनके निरूस्वेदत्व आदि आठ अतिशय तथा पद्मपुराण और हरिवंशपुराण के अनुसार दश अतिशय प्रकट हुए थे। इनकी आयु अनपवर्त्य थी। वर्ण प्रियंगु पुष्प के समान था।</p>
<p><strong>सहेतुक वन में शिरीष वृक्ष के नीचे हुआ केवल ज्ञान</strong></p>
<p>बीस पूर्वांग कम एक लाख पूर्व की आयु शेष रहने पर इन्हें वैराग्य हुआ। ये मनोगति नामक शिविका पर आरूढ़ होकर सहेतुक वन गए तथा वहां इन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी के दिन सायं बेला में एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। संयमी होते ही इन्हें मनरूपर्ययज्ञान हुआ। सोमखेट नगर के राजा महेंद्रदत्त ने इन्हें आहार दिया था। ये छद्मस्थ अवस्था में नौ वर्ष तक मौन रहे। सहेतुक वन में शिरीष वृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के दिन सायंकाल के समय इन्हें केवलज्ञान हुआ था।</p>
<p><strong>संघ में यह थे भगवान के</strong></p>
<p>इनके चतुर्विध संघ में 95 गणधर, 2 हजार 30 पूर्वधारी, 2 लाख 44 हजार 920 शिक्षक, 9 हजार अवधिज्ञानी, 11 हजार केवलज्ञानी, 15 हजार 3 सौ विक्रिया ऋद्धिधारी, 9 हजार 150 मनरूपर्ययज्ञानी, 8 हजार 600 वादी थे। इस प्रकार कुल 3 लाख मुनि, 3 लाख 30 हजार आर्यिकाएं, 3 लाख श्रावक, 5 लाख श्राविकाएं असंख्य न देव-देवियां और संख्यात तिर्यंच थे।</p>
<p><strong>सप्तमी के दिन विशाखा नक्षत्र में मोक्ष हुआ</strong></p>
<p>विहार करते हुए आयु का एक मास शेष रहने पर ये सम्मेदशिखर आए। यहां एक हजार मुनियों के साथ इन्होंने प्रतिमा योग धारण कर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन विशाखा नक्षत्र में सूर्याेदय के समय मोक्ष प्राप्त किया था । दूसरे पूर्वभव में ये धातकीखंड के पूर्व विदेह क्षेत्र में सुकच्छ देश के क्षेमपुर नगर के नंदिषेण नामक नृप थे। प्रथम पूर्वभव में मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र नामक मध्यम विमान में अहमिंद्र रहे।</p>
<p><strong>जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु भगवान का परिचय</strong></p>
<p>इस मध्य लोक के पुष्कर द्वीप में पूर्व मेरू के पश्चिम की ओर विदेह क्षेत्र में सीतोदा नदी के उत्तर तट पर एक ‘सुगंधि नाम का देश है। उस देश के मध्य में श्रीपुर नाम का नगर है। उसमें इंद्र के समान कांति का धारक श्रीषेण राजा राज्य करता था। उसकी पत्नी धर्मपरायणा श्रीकांता नाम की रानी थी। दंपत्ति पुत्र रहित थे अतरू पुरोहित के उपदेश से पंच वर्ण के अमूल्य रत्नों से जिन प्रतिमाएं बनवाईं, आठ प्रातिहार्य आदि से विभूषित इन प्रतिमाओं की विधिवत् प्रतिष्ठा करवाई। पुनरू उनके गंधोदक से अपने आपको और रानी को पवित्र किया और आष्टान्हिकी महापूजा विधि की। कुछ दिन बाद् रानी ने उत्तम स्वप्नपूर्वक गर्भधारण किया। पुनरू नव मास के बाद पुत्र को जन्म दिया। बहुत विशेष उत्सव के साथ उसका नाम ‘श्रीवर्मा’ रखा गया। किसी समय ‘श्रीपद्म’ जिनराज से धर्माेपदेश को ग्रहण कर राजा श्रीषेण पुत्र को राज्य देकर दीक्षित हो गया। एक समय राजा श्रीवर्मा भी आषाढ़ मास की पूर्णिमा के दिन जिनपूजा महोत्सव करके अपने परिवारजनों के साथ महल की छत पर बैठा था कि आकस्मिक उल्कापात देखकर विरक्त होकर श्रीप्रभ जिनेंद्र के समीप दीक्षा लेकर श्रीप्रभ पर्वत पर सन्यास मरण करके प्रथम स्वर्ग में श्रीप्रभ विमान में श्रीधर नाम का देव हो गया। धातकी खंड द्वीप की पूर्व दिशा में जो इष्वाकार पर्वत है। उसके दक्षिण की ओर भरतक्षेत्र में एक पूर्व धातकीखंड द्वीप में सीता नदी के दाहिने तट पर एक मंगलावती नाम का देश है। इसके रत्न संचय नगर में कनकप्रभ राजा राज्य करते थे। उनकी कनकमाला रानी थी। वह अच्युतेन्द्र वहां से आकर इन दोनों के पद्मनाभ नाम का पुण्यशाली पुत्र हुआ। किसी समय पद्मनाभ राजा श्रीधर मुनि के समीप धर्माेपदेश श्रवण कर दीक्षित हो गए। सोलह कारण भावनाओं का चिंतवन कर ग्यारह अंग में पारंगत होकर सिंह निरूक्रीडित आदि कठिन-कठिन तप करने लगे। तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके आयु के अंत में विधिवत् मरण करके वैजयंत विमान में अहमिंद्र हो गए। इनके श्रीवर्मा, श्रीधरदेव, अजितसेन चक्रवर्ती, अच्युतेन्द्र, पद्मनाभ, अहमिन्द्र, चंद्रप्रभ भगवान ये सात भव प्रसिद्ध हैं।</p>
<p><strong>गर्भ और जन्म कल्याणक</strong></p>
<p>जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर भगवान चंद्रप्रभु के गर्भ और जन्म कल्याणक के बारे में पुराणों में वर्णित है कि अनंतर जब इनकी छह माह की आयु बाकी रह गई, तब जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में चंद्रपुर नगर के महासेन राजा की लक्ष्मणा महादेवी के यहां रत्नों की वर्षा होने लगी। चैत्र कृष्ण पंचमी के दिन गर्भ कल्याणक महोत्सव हुआ एवं पौष कृष्ण एकादशी के दिन भगवान चंद्रप्रभ का जन्म हुआ।</p>
<p><strong>भगवान चंद्रप्रभु का तप कल्याणक </strong></p>
<p>किसी समय दर्पण में अपना मुख देख रहे थे कि भोगों से विरक्त होकर देवों द्वारा लाई गई ‘विमला’ नाम की पालकी पर बैठकर सर्वर्तुक वन में गए। वहां पौष कृष्ण एकादशी के दिन हजार राजाओं के साथ दीक्षा ले ली। पारणा के दिन नलिन नामक नगर में सोमदत्त के यहां आहार हुआ था।</p>
<p><strong>केवलज्ञान और मोक्ष कल्याणक </strong></p>
<p>तीन माह का छद्मस्थ काल व्यतीत कर भगवान दीक्षावन में नागवृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन केवल ज्ञान को प्राप्त हो गये। ये चंद्रप्रभ भगवान समस्त आर्य देशों में विहार कर धर्म की प्रवृत्ति करते हुए सम्मेदशिखर पर पहुंचे। एक माह तक प्रतिमा योग से स्थित होकर फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन ज्येष्ठा नक्षत्र में सायंकाल के समय शुक्लध्यान के द्वारा सर्वकर्म को नष्ट कर सिद्धपद को प्राप्त हुए।</p>
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		<title>6ठे तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ का मोक्ष कल्याणकः मोक्ष कल्याणक पर जिनालयों में होगी आराधना </title>
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		<pubDate>Sat, 15 Feb 2025 11:30:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 6ठे तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ का मोक्ष कल्याणक 16 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन जिनालयों में श्रद्धा भक्ति से महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा, पूजन, अर्चन सहित अन्य विधान मंत्रोच्चार के साथ किए जाएंगे। भगवान पद्मप्रभ का मोक्ष फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी के दिन हुआ था। भगवान पद्मप्रभ के दिव्य संदेशों में अहिंसा पर अधिक प्रेरणा [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 6ठे तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ का मोक्ष कल्याणक 16 फरवरी को मनाया जाएगा। इस दिन जिनालयों में श्रद्धा भक्ति से महामस्तकाभिषेक, शांतिधारा, पूजन, अर्चन सहित अन्य विधान मंत्रोच्चार के साथ किए जाएंगे। भगवान पद्मप्रभ का मोक्ष फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी के दिन हुआ था। भगवान पद्मप्रभ के दिव्य संदेशों में अहिंसा पर अधिक प्रेरणा दी गई है। उनकी देशनाएं जैन धर्म की मार्गप्रदर्शक साबित हुई हैं और आगे भी हो रही हैं। आज हम भगवान पदमप्रभ के मोक्ष कल्याणक के अवसर पर उनकी यह जानकारी संजोकर लाए हैं। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में पढ़िए यह कड़ी&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म और समाज के पूज्य और आराध्य 6ठें तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभु का मोक्ष कल्याणक 16 फरवरी को फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी के दिन है। लंबे समय तक धर्म का प्रचार करते रहे। भगवान पद्मप्रभ भारतवर्ष में घूमते रहे और सम्मेद शिखर पर पहुंचेे। यहां पर फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। वैसे ग्रंथों में ज्ञात है कि भगवान को माघ कृष्ण 6 को गर्भ कल्याणक मनाया जाता है। इस दिन वे अपनी माता रानी सुसीमादेवी के गर्भ में अवतरित हुए थे। इससे पूर्व उनकी माता को स्वप्न हुआ था, जिसमें उन्होंने स्वप्न लाल कमल के फूलों से सजी सेज देखी थी। सुबह उन्होंने सोने के लिए लाल पद्म की सेज की इच्छा जताई। उसकी पूर्ति देवताओं ने की। भगवान पद्मप्रभु का जन्म कार्तिक कृष्ण 12 को हुआ था। भगवान पदमप्रभु के मोक्ष कल्याणक पर जिनालयों में भगवान के अभिषेक, शांतिधारा, पंचामृत अभिषेक सहित अन्य विधियों से पूजन होगा। मप्र में इंदौर, आलिराजपुर सहित हर जगह पर उनके दिव्य मंदिरों में भक्ति और आराधना की जाती है। पद्मप्रभ, जिन्हें पद्मप्रभु के नाम से भी पूजा जाता है। वर्तमान युग के छठे तीर्थंकर थे।</p>
<p><strong>कौशांबी में हुआ था भगवान पद्मप्रभु जन्म </strong></p>
<p>जैन परंपरा में ऐसा माना जाता है कि पद्मप्रभ का जन्म इक्ष्वाकु वंश के राजा श्रीधर और रानी सुसीमादेवी के घर कौशांबी में हुआ था। जो उत्तरप्रदेश में है। पद्मप्रभ का संस्कृत में अर्थ है ‘लाल कमल जैसा चमकीला’। ऐसी किंवदंती है कि जब वे गर्भ में थे, तब उनकी मां को लाल कमल पद्म के एक सेज(बिस्तर) की चाहत थी। भगवान पद्मप्रभु का जन्म कार्तिक कृष्ण 12 को हुआ था। फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन भगवान पद्मप्रभ अन्य 308 संतों के साथ मुक्त हुए और सम्मेद शिखर (पर्वत) पर मोक्ष प्राप्त किया।</p>
<p><strong>भगवान पद्मप्रभु का पूर्व जन्म</strong></p>
<p>महाराज अपराजित वत्स देश के पूर्व विदेह क्षेत्र के धातकी राज्य में स्थित सुसीमा नगर पर शासन करते थे। वे सरल और धार्मिक व्यक्ति थे। अरिहंत के प्रवचन सुनकर उन्हें वैराग्य हुआ और उन्होंने आचार्य पिहिताश्रवा से दीक्षा ली। दीर्घकालीन साधना के फलस्वरूप उन्हें तीर्थंकर नाम, गोत्र और कर्म की प्राप्ति हुई। अपनी आयु पूर्ण करने पर उन्होंने ग्रैवेयक लोक में देव रूप में पुनर्जन्म लिया। देवताओं के राज्य से अपराजित नामक प्राणी कौशांबी के राजा श्रीधर की पत्नी रानी सुसीमा के गर्भ में उतरा। एक दिन रानी सुसीमा को कमल के फूलों से बने बिस्तर पर सोने की इच्छा हुई। चूंकि यह एक गर्भवती मां की इच्छा थी, इसलिए देवताओं ने इसकी पूर्ति के लिए व्यवस्था की। कार्तिक महीने की कृष्ण द्वादशी (पतझड़ के पखवाड़े का बारहवां दिन) को रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया।</p>
<p><strong>रंग लाल, कमल जैसा नाम रखा पद्मप्रभ</strong></p>
<p>नवजात शिशु की त्वचा कमल के फूलों जैसी कोमल गुलाबी चमक वाली थी। राजा ने उसका नाम ‘पद्मप्रभ’ (अर्थात कमल जैसी चमक वाला) एक लंबे और सफल शासन के बाद जब उन्होंने अपने त्रिविध ज्ञान से जाना कि सही समय आ गया है तो वे तपस्वी बन गए। 6 महीने की साधना के बाद चौत्र मास की पूर्णिमा के दिन उन्हें एक वट वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान हुआ।</p>
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		<title>15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ का जन्म एवं तप कल्याणक 10 फरवरी को: देश के विख्यात मंदिरों में होगी मंगल आराधना </title>
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		<pubDate>Mon, 10 Feb 2025 07:21:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक माघ माह की शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है। इसी दिन भगवान धर्मनाथ का जन्म हुआ और इसी दिन भगवान ने दीक्षा ग्रहण की। भगवान धर्मनाथ जैन धर्म की पताका फहराकर अपनी देशना से विश्व में कल्याण की भावना जगाने वाले तीर्थंकर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक माघ माह की शुक्ल त्रयोदशी को मनाया जाता है। इसी दिन भगवान धर्मनाथ का जन्म हुआ और इसी दिन भगवान ने दीक्षा ग्रहण की। भगवान धर्मनाथ जैन धर्म की पताका फहराकर अपनी देशना से विश्व में कल्याण की भावना जगाने वाले तीर्थंकर हैं। जन्म एवं तप कल्याणकों पर विख्यात जिनालयों में भगवान धर्मनाथ की भक्ति, अभिषेक और शांतिधारा सहित मंगल आराधना होगी। श्रीफल जैन न्यूज ने भगवान श्री धर्मनाथ जी के जन्म एवं कल्याणक पर विशेष जानकारी संजो-सहेजी है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से श्रीफल जैन न्यूज के उप संपादक प्रीतम लखवाल की यह स्पेशल रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> धर्म के आलोक से विश्व को आलोकित करने वाले 15वें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ जी का जन्म माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन रत्नपुर के राजा भानु की पट्ट महिषी सुव्रतादेवी की रत्नकुक्षी से हुआ। प्रभु के जन्म से इस धरती पर चारों ओर हर्ष, आनंद और शांति का संचार हुआ। पुत्र के युवावस्था में प्रवेश करने पर माता-पिता ने अनेक राजकन्याओं के साथ उनका विवाह संपन्न किया। भारी समारोह रचकर पिता ने धर्मनाथ को राजगद्दी पर प्रतिष्ठित किया। धर्मनाथ जी के धर्म शासन में अधर्म का अंधकार सर्वथा विलीन हो गया। कालांतर में राजपद का परित्याग कर माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन भगवान श्री धर्मनाथ जी ने दीक्षा ग्रहण की।</p>
<p><strong>भगवान श्री धर्मनाथ के 43 गणधर</strong></p>
<p>धर्म तीर्थ की स्थापना कर तीर्थंकर कहलाए। अरिष्ट आदि 43 प्रमुख शिष्य प्रभु के गणधर थे। प्रभु के धर्म परिवार में 64 हजार श्रमण, 62 हजार 400 श्रमणियां, 2 लाख 44 हजार श्रावक एवं 4 लाख 13 हजार श्राविकाएं थीं। पांचवे वासुदेव पुरुषसिंह एवं बलदेव सुदर्शन प्रभु के अनन्य उपासक थे। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन सम्मेद शिखर पर्वत से प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया। तीसरे चक्रवर्ती मघवा एवं चौथे चक्रवर्ती सनतकुमार भी प्रभु श्री धर्मनाथ के शासन काल में ही हुए। धर्मनाथ तीर्थंकर का चिन्ह वज्र है। वज्र इंद्र देव का शस्त्र है। इसलिए इंद्र को वज्रपाणि कहा जाता है। वज्र कठोरता का प्रतीक है। वज्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कष्टों में भी वज्र के समान दृढ़ रहना चाहिए। धर्म पालन में दृढ़ रहना चाहिए। अज्ञान, मोह और मिथ्यात्व पर वज्र प्रहार करने से ही सच्चे धर्म की प्राप्ति होती है। धर्मनाथ भगवान का चिन्ह धर्म मार्ग पर वज्र की तरह दृढ़ होकर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।</p>
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		<title>द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का 6 को तप और 7 फरवरी को जन्म कल्याणकः तप और जन्म कल्याणक पर जिनालयों में होंगे विविध धार्मिक आयोजन </title>
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		<pubDate>Thu, 06 Feb 2025 14:22:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान अजितनाथ जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर हैं और भगवान अजितनाथ जी का तप कल्याणक माघ शुक्ल नवमीं को है। यह तिथि इस बार 6 फरवरी गुरुवार को आ रही है। इसके ठीक एक दिन बाद भगवान का जन्म कल्याणक भी आ रहा है। यानि 7 फरवरी शुक्रवार को माघ शुक्ल 10 को भगवान का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान अजितनाथ जैन धर्म के दूसरे तीर्थंकर हैं और भगवान अजितनाथ जी का तप कल्याणक माघ शुक्ल नवमीं को है। यह तिथि इस बार 6 फरवरी गुरुवार को आ रही है। इसके ठीक एक दिन बाद भगवान का जन्म कल्याणक भी आ रहा है। यानि 7 फरवरी शुक्रवार को माघ शुक्ल 10 को भगवान का जन्म कल्याणक मनाया जाएगा। बता दें कि विगत 10 जनवरी को ही भगवान अजितनाथ का ज्ञान कल्याणक मनाया गया है। <span style="color: #ff0000">इस बार भी श्रीफल जैन न्यूज की ओर से यह स्पेशल रिपोर्ट उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन से। </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भगवान अजितनाथ जैन धर्म के 24 तीर्थकरों की दिव्य श्रृंखला के द्वितीय सौपान के रूप में पूजित, वंदित और अभिनंदित हैं। दूसरे तीर्थंकर के रूप में भगवान अजितनाथ का जन्म माघ शुक्ल 10 को अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय राज परिवार में हुआ था। भगवान का दीक्षा कल्याणक यानि तप कल्याणक माघ शुक्ल 9 को हुआ। अयोध्या नगरी के सेहतुक वन में भगवान का तप कल्याणक हुआ। भगवान के मंदिरों में अभिषेक और शांतिधारा सहित महामस्तकाभिषेक के धार्मिक आयोजन पूरी भक्ति भावना से किए जाते हैं। देश के विभिन्न प्रांतों में विद्यमान दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान के तप और जन्म कल्याणक पर धार्मिक विधान होंगे। जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित संदर्भों के अनुसार भगवान अजितनाथ ने जैन धर्म को आगे बढ़ाते हुए अपने संदेशों और उपदेशों के माध्यम से देशनाएं दी। ज्ञात स्रोतों के अनुसार भगवान अजितनाथ के पिता जितशत्रु थे और माता विजया देवी थीं। इनका चिन्ह हाथी है। भगवान अजितनाथ की आयु 72 लाख पूर्व की वर्णित है।</p>
<p><strong>देवों ने किया जन्माभिषेक कल्याणक</strong></p>
<p>जेठ महीने की अमावस पर जब रोहिणी नक्षत्र का कला मात्र से अवशिष्ट चंद्रमा के साथ संयोग था तब ब्रह्म मुहूर्त के पहले महारानी विजयसेना ने चौदह स्वप्न देखे थे। महा रानी विजया ने देखा कि हमारे मुख कमल में एक मदोन्मत्त हाथी प्रवेश कर रहा है। सुबह महारानी ने जित शत्रु महाराज से स्वप्नों का फल पूछा उन्होंने उनका फल बतलाया कि तुम्हारे स्फटिक समान निर्मल गर्भ में विजय विमान से तीर्थंकर पुत्र अवतीर्ण हुआ है। वह पुत्र, निर्मल तथा पूर्वभव से साथ आने वाले मति-श्रुत-अवधिज्ञान रूपी तीन नेत्रों से देदीप्यमान है। भगवान् आदिनाथ के मोक्ष चले जाने के बाद जब 50 लाख करोड़ सागर वर्ष बीत चुके तब द्वितीय तीर्थंकर का जन्म हुआ था। जन्म होते ही सुंदर शरीर धारक तीर्थंकर भगवान् का देवों ने मैरू पर्वत पर जन्माभिषेक कल्याणक किया और इनका नाम अजितनाथ नाम रखा।</p>
<p><strong>एक हजार तपस्वियों के साथ अंतिम ध्यान किया</strong></p>
<p>उन्होंने बाह्य और अभ्यंतर के सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। जब उनके अंतिम क्षण निकट आ रहे थे। भगवान अजितनाथ सम्मेद शिखर पर चले गए। एक हजार अन्य तपस्वियों के साथ उन्होंने अपना अंतिम ध्यान आरंभ किया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में था, प्रातःकाल के समय प्रतिमा योग धारण करने वाले भगवान अजितनाथ ने मुक्ति पद प्राप्त किया।</p>
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		<title>धर्म के अलोक से जगत को आलोकित करने वाले हैं 15वें तीर्थंकर भगवान धर्मनाथः 13 जनवरी को श्रद्धा-भक्ति से मनाया जाएगा ज्ञान कल्याणक </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/lord_dharmanath_the_15th_tirthankar_is_the_one_who_will_enlighten_the_world_with_the_light_of_religion/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 13 Jan 2025 06:14:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[छद्मस्थ अवस्था का एक वर्ष बीत जाने पर दीक्षावन में सप्तच्छद वृक्ष के नीचे पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन भगवान धर्मनाथजी ने केवलज्ञान प्राप्त किया। भगवान धर्मनाथ जैन धर्म की पताका फहराकर अपनी देशना से विश्व में कल्याण की भावना जगाने वाले 15वें तीर्थंकर के रूप में विख्यात हुए। उन्होंने अपनी धर्म प्रबोधना में अनेकोनेक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>छद्मस्थ अवस्था का एक वर्ष बीत जाने पर दीक्षावन में सप्तच्छद वृक्ष के नीचे पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन भगवान धर्मनाथजी ने केवलज्ञान प्राप्त किया। भगवान धर्मनाथ जैन धर्म की पताका फहराकर अपनी देशना से विश्व में कल्याण की भावना जगाने वाले 15वें तीर्थंकर के रूप में विख्यात हुए। उन्होंने अपनी धर्म प्रबोधना में अनेकोनेक बार लाखों-लाख श्रावक-श्राविकाओं को ज्ञान का अमूल्य पुण्य प्रदान किया। 13 जनवरी सोमवार को पौष शुक्ल पूर्णमासी के दिन जिनालयों में भगवान धर्मनाथ की भक्ति, अभिषेक और शांतिधारा समेत कई विध से आराधना होगी। श्रीफल जैन न्यूज इस अवसर पर भगवान श्री धर्मनाथ जी के ज्ञान कल्याण पर विशेष जानकारी संजो-सहेजकर लाए हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए इंदौर से यह स्पेशल रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> धर्म के आलोक से विश्व को आलोकित करने वाले 15वें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ जी का जन्म माघ शुक्ल तृतीया के दिन रत्नपुर के राजा भानु की पट्ट महिषी सुव्रतादेवी की रत्नकुक्षी से हुआ। प्रभु के जन्म से धरा पर सर्वत्र हर्ष, आनंद और शांति का संचार हुआ। पुत्र के युवावस्था में प्रवेश करने पर माता-पिता ने अनेक राजकन्याओं के साथ उनका विवाह संपन्न किया। भारी समारोह रचकर पिता ने धर्मनाथ को राजगद्दी पर प्रतिष्ठित किया। धर्मनाथ जी के धर्म शासन में अधर्म का अंधकार सर्वथा विलीन हो गया। कालांतर में राजपद का परित्याग कर माघ शुक्ल त्रयोदशी के दिन भगवान श्री धर्मनाथ जी ने प्रव्रज्या में प्रवेश किया। प्रभु आत्म साधना में निमग्न होकर कर्म रिपुओं का हनन करने लगे। मात्र दो वर्ष की अवधि मंे कर्म रिपुओं को परास्त कर पौष शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रभु केवली बने।</p>
<p><strong>भगवान श्री धर्मनाथ के 43 गणधर</strong></p>
<p>धर्म तीर्थ की स्थापना कर तीर्थंकर कहलाए। अरिष्ट आदि 43 प्रमुख शिष्य प्रभु के गणधर थे। प्रभु के धर्म परिवार में 64 हजार श्रमण, 62 हजार 400 श्रमणियां, 2 लाख 44 हजार श्रावक एवं 4 लाख 13 हजार श्राविकाएं थीं। पांचवे वासुदेव पुरुषसिंह एवं बलदेव सुदर्शन प्रभु के अनन्य उपासक थे। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के दिन सम्मेद शिखर पर्वत से प्रभु ने निर्वाण प्राप्त किया। तीसरे चक्रवर्ती मघवा एवं चौथे चक्रवर्ती सनतकुमार भी प्रभु श्री धर्मनाथ के शासन काल में ही हुए।</p>
<p><strong>भगवान के चिन्ह का महत्व</strong></p>
<p>धर्मनाथ तीर्थंकर का चिन्ह वज्र है। वज्र इंद्र देव का शस्त्र है। इसलिए इंद्र को वज्रपाणि कहा जाता है। वज्र कठोरता का प्रतीक है। वज्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कष्टों में भी वज्र के समान दृढ़ रहना चाहिए। धर्म पालन में दृढ़ रहना चाहिए। अज्ञान, मोह और मिथ्यात्व पर वज्र प्रहार करने से ही सच्चे धर्म की प्राप्ति होती है। धर्मनाथ भगवान का चिन्ह धर्म मार्ग पर वज्र की तरह दृढ़ होकर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।</p>
<p><strong>भगवान धर्मनाथ का इतिहास</strong></p>
<p>भगवान का चिन्हः-उनका चिन्ह वज्रदंड है।</p>
<p>जन्म स्थानः-रत्नपुरी (जिला फैजाबाद)</p>
<p>जन्म कल्याणकः-माघ शु. 13</p>
<p>केवल ज्ञान स्थानः-पौष शु. 15, शालवन</p>
<p>दीक्षा स्थानः-शालवन</p>
<p>पिताः- महाराजा भानुराज</p>
<p>माताः-महारानी सुप्रभा</p>
<p>देहवर्णः-तप्त स्वर्ण सदृश</p>
<p>मोक्षः-ज्येष्ठ शु. 4, सम्मेद शिखर पर्वत</p>
<p>भगवान का वर्णः-क्षत्रिय (इश्च्छवाकु वंश)</p>
<p>लंबाई-ऊंचाई- 45 धनुष (135 मीटर)</p>
<p>आयुः-2500000 वर्ष</p>
<p>वृक्षः-सप्तपर्ण</p>
<p>यक्षः-किपुरुषदेव</p>
<p>यक्षिणीः-मानसी देवी</p>
<p>प्रथम गणधरः-श्री अरिष्टसेन</p>
<p>गणधरों की संख्याः-43</p>
<p><strong>भगवान धर्मनाथ का निर्वाण</strong></p>
<p>अंत में सम्मेदशिखर पर जाकर एक माह का योग निरोधकर 6 हजार 100 मुनियों के साथ चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन परमपद को प्राप्त किया।</p>
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		<title>पौष शुक्ल पक्ष एकादशी पर द्वितीय तीर्थंकर भगवान अजितनाथ को हुआ केवल ज्ञानः अयोध्या में जन्मे भगवान अजितनाथ </title>
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		<pubDate>Thu, 09 Jan 2025 12:11:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान अजितनाथ जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से दूसरे तीर्थंकर हैं और इनके भव्य मंदिर देश के विभिन्न प्रांतों, शहरों और कस्बों में हैं। 10 जनवरी को पौष शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन भगवान अजितनाथ को केवल ज्ञान हुआ था। इस दिन यानि 10 जनवरी शुक्रवार को भगवान अजितनाथ का ज्ञान कल्याणक मनाया जाएगा। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान अजितनाथ जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में से दूसरे तीर्थंकर हैं और इनके भव्य मंदिर देश के विभिन्न प्रांतों, शहरों और कस्बों में हैं। 10 जनवरी को पौष शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन भगवान अजितनाथ को केवल ज्ञान हुआ था। इस दिन यानि 10 जनवरी शुक्रवार को भगवान अजितनाथ का ज्ञान कल्याणक मनाया जाएगा। मंदिरजी में विविध धार्मिक आयोजन किए जाएंगे। भगवान अजितनाथ के बारे में जैन धर्मशास्त्रों में जो वर्णित है उसके आधार पर उनके जीवन से जुड़ी कहानी को यहां श्रीफल जैन न्यूज संजोकर लाया है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए प्रीतम लखवाल उप संपादक श्रीफल जैन न्यूज की यह स्पेशल रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> भगवान अजितनाथ जैन धर्म के 24 तीर्थकरों में से वर्तमान अवसर्पिणी काल के द्वितीय तीर्थंकर हैं। भगवान अजितनाथ का जन्म अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय राज परिवार में माघ के शुक्ल पक्ष की अष्टमी में हुआ था। इनके पिता जितशत्रु थे और माता विजया थीं। इनका चिह्न हाथी है। जैन धर्मग्रंथों में दी गई जानकारी के आधार पर भगवान अजितनाथ की कुल आयु 72 लाख पूर्व की थी। जेठ महीने की अमावस पर जब रोहिणी नक्षत्र का कला मात्र से अवशिष्ट चंद्रमा के साथ संयोग था तब ब्रह्ममुहूर्त के पहले महारानी विजयसेना ने चौदह स्वप्न देखे। उस समय उनके नेत्र बाकी बची हुई अल्प निंद्रा से कलुषित हो रहे थे। महारानी विजया ने चौदह स्वप्न देखने के बाद देखा कि हमारे मुख कमल में एक मदोन्मत्त हाथी प्रवेश कर रहा है। जब प्रातःकाल हुआ तो महारानी ने जितशत्रु महाराज से स्वप्नों का फल पूछा और देशावधि ज्ञानरूपी नेत्र को धारण करने वाले महाराज जितशत्रु ने उनका फल बतलाया कि तुम्हारे स्फटिक के समान निर्मल गर्भ में विजय विमान से तीर्थंकर पुत्र अवतीर्ण हुआ है। वह पुत्र, निर्मल तथा पूर्वभव से साथ आने वाले मति-श्रुत-अवधिज्ञान रूपी तीन नेत्रों से देदीप्यमान है। भगवान् आदिनाथ के मोक्ष चले जाने के बाद जब 50 लाख करोड़ सागर वर्ष बीत चुके तब द्वितीय तीर्थंकर का जन्म हुआ था। इनकी आयु भी इसी अंतराल में सम्मिलित थी।</p>
<p><strong>देवों ने मैरू पर्वत पर जन्माभिषेक कल्याणक किया </strong></p>
<p>जन्म होते ही सुंदर शरीर धारक तीर्थंकर भगवान् का देवों ने मैरू पर्वत पर जन्माभिषेक कल्याणक किया और इनका नाम अजितनाथ नाम रखा। 4 सौ पचास धनुष शरीर की ऊंचाई थी। अजितनाथ स्वामी के शरीर का रंग स्वर्ण के समान पीला था। उन्होंने बाह्य और आभ्यंतर के समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली थी। जब उनकी आयु का चतुर्थांश बीत चुका, तब उन्हें राज्य प्राप्त हुआ। उस समय उन्होंने अपने तेज से सूर्य का तेज भी जीत लिया था। एक लाख पूर्व कम अपनी आयु के तीन भाग तथा एक पूर्वांग तक उन्होंने राज्य किया।</p>
<p><strong>भगवान अजितनाथ की 12 सभाओं की संख्&#x200d;या है</strong></p>
<p>उनके सिंहसेन आदि नब्&#x200d;बे गणधर थे। 3 हजार 750 पूर्वधारी, 21 हजार 600 शिक्षक, 9 हजार 400 अवधि ज्ञानी, 20 हजार केवल ज्ञानी, 20 हजार 400 सौ विकिया-ऋद्धिवाले, 12 हजार 450 मनरूपर्ययज्ञानी और 12 हजार 400 अनुत्&#x200d;तरवादी थे। इस प्रकार सब मिलाकर एक लाख तपस्&#x200d;वी थे। प्रकुब्&#x200d;जा आदि 3 लाख 20 हजार आर्यिकाएं थीं, 3 लाख श्राव&#x200d;क थे। 5 लाख श्राविकाएं थीं और असंख्&#x200d;यात देव-देवियां थीं। इस तरह उनकी 12 सभाओं की संख्&#x200d;या थी।</p>
<p><strong>चैत्र शुक्ल पंचमी को पाया मुक्ति पद</strong></p>
<p>चैत्र शुक्ल पंचमी के दिन जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में था, प्रातःकाल के समय प्रतिमा योग धारण करनेवाले भगवान् अजितनाथ ने मुक्तिपद प्राप्&#x200d;त किया।</p>
<p><strong>बचपन से ही विरक्त थे भगवान अजितनाथ</strong></p>
<p>द्वितीय तीर्थंकर अजितनाथ के तीर्थ में सगर नाम का दूसरा चक्रवर्ती हुआ। जब राजा जितशत्रु वृद्ध हो गए और अपने जीवन का अंतिम भाग आध्यात्मिक कार्यों में लगाना चाहते थे। उन्होंने अपने छोटे भाई को बुलाया और उसे राजगद्दी संभालने के लिए कहा। सुमित्रा को राज्य की कोई इच्छा नहीं थी। वह भी तपस्वी बनना चाहता था। दोनों राजकुमारों को बुलाया गया और उन्हें राज्य देने की पेशकश की गई। अजित कुमार बचपन से ही स्वभाव से विरक्त व्यक्ति थे। इसलिए उन्होंने भी मना कर दिया। राजकुमार सगर राजगद्दी पर बैठे। राजा सगर ने इस काल में छह महाद्वीपों पर विजय प्राप्त की और चक्रवर्ती बन गए।</p>
<p><strong>राजा मेघवाहन को सगर ने सौंपा राज्य</strong></p>
<p>राजा मेघ वाहन और राक्षस द्वीप के शासक विद्याधर भीम, सम्राट सगर के समकालीन थे। एक बार वे भगवान अजितनाथ के प्रवचन में गए। वहां विद्याधर भीम आध्यात्मिक जीवन की ओर आकर्षित हुए। वह इतने विरक्त हो गए कि उन्होंने अपना राज्य लंका और पाताल लंका के प्रसिद्ध शहरों सहित राजा मेघवाहन को दे दिया। उन्होंने अपना सारा ज्ञान और चमत्कारी शक्तियां भी मेघवाहन को दीं। उन्होंने 9 बड़े और चमकीले मोतियों की एक दिव्य माला भी दी। मेघवाहन राक्षस कुल का पहला राजा था। जिसमें प्रसिद्ध राजा रावण का जन्म हुआ था।</p>
<p><strong>सगर के 60 हजार पुत्रों की मृत्यु</strong></p>
<p>सम्राट सगर की हज़ारों रानियां और 60 हज़ार पुत्र थे। उनमें सबसे बड़े थे जन्हु कुमार। एक बार सभी राजकुमार सैर पर गए। जब वे अस्तपद पहाड़ियों की तलहटी में पहंुचे, तो उन्होंने बड़ी-बड़ी खाइयां और नहरें खोदीं। अपनी युवावस्था में इन नहरों को गंगा के पानी से भर दिया। इस बाढ़ ने निचले देवताओं के घरों और गांवों को जलमग्न कर दिया। जिन्हें नाग कुमार कहा जाता है। इन देवताओं के राजा ज्वालाप्रभ आए और उन्होंने उन्हें रोकने की व्यर्थ कोशिश की। उपद्रवी राजकुमार राजसी शक्ति के नशे में चूर थे। अंत में ज्वालाप्रभ ने अपना आपा खो दिया और सभी 60 हज़ार राजकुमारों को राख में बदल दिया। अपने सभी पुत्रों की अचानक मृत्यु से सम्राट सगर को बहुत दुःख हुआ। उन्होंने साम्राज्य की बागडोर अपने सबसे बड़े पौत्र भगीरथ को सौंप दी और भगवान अजितनाथ से दीक्षा ले ली।</p>
<p><strong>शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को निर्वाण </strong></p>
<p>जब उनके अंतिम क्षण निकट आ रहे थे। भगवान अजितनाथ सम्मेद शिखर पर चले गए। एक हजार अन्य तपस्वियों के साथ उन्होंने अपना अंतिम ध्यान आरंभ किया। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ। दूसरे जैन तीर्थंकर अजितनाथ का जन्म अयोध्या में हुआ था। यजुर्वेद में अजितनाथ का नाम तो है, लेकिन इसका अर्थ स्पष्ट नहीं है। जैन परंपराओं के अनुसार उनके छोटे भाई सगर थे जो दूसरे चक्रवर्ती बने। उन्हें हिंदू धर्म और जैन धर्म दोनों की परंपराओं से जाना जाता है। जैसा कि उनके संबंधित हिंदू धर्मग्रंथों पुराणों में पाया जाता है।</p>
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		<title>आर्यिका माताजी स्वास्तिभूषण जी का दीक्षा का 27 वां वर्ष:  जहाजपुर में मुनिसुव्रतनाथ मंदिर  का निमार्ण कर जिन संस्कृति की वाहक बन गई माताजी </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Jan 2023 08:20:17 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[दिगंबर मंदिर]]></category>
		<category><![CDATA[रांची]]></category>
		<category><![CDATA[सम्मेदशिखर]]></category>
		<category><![CDATA[हुकुमचंद सेठ]]></category>
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					<description><![CDATA[सारांश भीलवाड़ा के जहाजपुर में ज्ञानतीर्थ के माध्यम से जिन दर्शन और संस्कृति को बढ़ा रही आर्यिका माताजी स्वास्तिभूषण जी की दीक्षा के आज 27 वां वर्ष है। इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज़ ने माताजी का विशेष साक्षात्कार लिया । विस्तारपूर्वक पढ़ें &#8230; श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211; पंचकल्याण की क्या तैयारी है ? माताजी [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p style="text-align: center;"><strong>सारांश</strong></p>
<p style="text-align: left;">भीलवाड़ा के जहाजपुर में ज्ञानतीर्थ के माध्यम से जिन दर्शन और संस्कृति को बढ़ा रही आर्यिका माताजी स्वास्तिभूषण जी की दीक्षा के आज 27 वां वर्ष है। इस अवसर पर श्रीफल जैन न्यूज़ ने माताजी का विशेष साक्षात्कार लिया । <span style="color: #ff0000;"><strong>विस्तारपूर्वक पढ़ें &#8230;</strong></span></p>
<hr />
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211; <span style="color: #ff6600;">पंचकल्याण की क्या तैयारी है ?</span></strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>माताजी स्वास्तिभूषण जी &#8211; </strong></span>आचार्य श्री 108 ज्ञान सागर दी महाराज की प्रेरणा से निर्मित भगवान आदिनाथ के विशाल जिन बिम्ब ज्ञान तीर्थ का पंच कल्याणक होने जा रहा है । भक्तों में बहुत उत्साह है । कलश आवंटन, सम्मान के कार्यक्रम कई नगरों में हो रहे हैं तथा ज्ञानतीर्थ पर पांडाल मंच भोजन आदि की तैयारी चल रही है ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211; <span style="color: #ff6600;">अभी जो दीक्षा ले रहे हैं उनका अंतिम लक्ष्य तक वैराग्य कैसे रहे, कैसे सुनिश्चित होगा ?</span></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong></span> सांसारिक भोगों की इच्छा के त्याग का नाम दीक्षा है। जब आत्मा के सुख के दर्शन हो जाएं, ज्ञान हो जाए तो बाहर के सुख फीके लगते हैं । उन भावों को स्थाई बनाए रखने के लिए शास्त्रों का पठन-पाठन, चिंतन-मनन आवश्यक है । इसी के द्वारा वैराग्य दृढ़ और स्थिर होता है ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211; <span style="color: #ff6600;">आपके जीवन का लक्ष्य क्या है ?</span></strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong></span> हमारे जीवन का लक्ष्य संसार से मुक्ति, मोक्ष की प्राप्ति</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211; <span style="color: #ff6600;">श्रावक के व्रतों का पालन कैसे हो ?</span></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी-</strong> </span>श्रावक के व्रत जीव को व्यर्थ के पापों के कषायों से बचाते हैं। जीवन को शांत,संतोषी, समृद्ध बनाते हैं। इसका पालन करने वालों की संगति करके और पूजा भक्ति एवं स्वाध्याय से भी इसे भी दृढ़ किया जा सकता है ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211;<span style="color: #ff6600;"> बचपन में वैराग्य का क्या कारण रहा ? </span></strong><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong></span> चौदह वर्ष की उम्र में छिंदवाड़ा में दो माताजी की दीक्षा देखी थी। उन्हें देखकर अंदर से विचार आए कि मुझे भी ऐसा बनना है । मैं भी दीक्षा लूंगी । बस एक प्रेरणा का बीज अंदर पड़ गया । सौभाग्य से उसी वर्ष का चातुर्मास आचार्य पु्ष्पदंत सागर जी का वहां पर हुआ । मन की मुराद पूरी हो गई । सुबह पांच बजे से उनके पास पाठ,आदि में जाती । आहार देना, स्वाध्याय सामयिक करना आदि, संत संगति में वैराग्य में प्रबलता आई और मैं इस मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ गई ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211; <span style="color: #ff6600;">ऐसे क्या संस्कार थे, जिस वजह से आर्यिका बनीं</span></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong></span> इस जन्म के संस्कार तो नजर नहीं आते क्योंकि बचपन से ही त्याग करने का भाव स्वंयमेव होते रहते थे। एक सुना होगा &#8211; जो बिन बैरागी, वो पूर्व जन्म का त्यागी&#8230;बस ऐसा ही लगता है कि आत्म कल्याण की भावना से आर्यिका दीक्षा ग्रहण की ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211; <span style="color: #ff6600;">गुरु चयन की क्या प्रक्रिया अपनाई ?</span></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong> </span>आचार्य पुष्पदंत सागर जी के चातुर्मास में अनेक अवसर संयम और त्याग के मिले । शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी का आभा मंडल ऐसा है कि स्वयंमेव खींचता है । आचार्य विद्याभूषण ,108 सम्मति सागर जी का चातुर्मास 1991 में सिवनी में हुआ । संघ में माताजी और दीदियां भी थी। अत : धार्मिक,आध्यात्मिक लाभ खूब मिला । गुरु चयन करने का कार्य शायद हम नहीं करते, गुरु ही हमारा चयन करते हैं । गुरु का आभा मंडल स्वयंमेव हमें अपनी और खींच लेता है । वहीं हमारे जीवन में दिशा निर्देशन देते हैं ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज &#8211; <span style="color: #ff6600;">आपने जहाजपुर का मंदिर बनाया कैसे, कैसे भूगर्भ से प्रतिमा निकली ?</span></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong> </span>चैत्र का महीना,शुक्ल पक्ष, तेरस तिथि, मंगलवार,महावीर जयंती का दिन, भगवान मुनिसुव्रत नाथ एक अजैन के मकान की खुदाई में भूगर्भ से प्रकट हुए । अतिशयकारी प्रतिमाएँ देवों द्वारा रक्षित होती हैं । हमारा भी कुछ निमित्त था जो भगवान की सेवा करने का अवसर मिला । एक अतिशय क्षेत्र जहाज मंदिर बनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज –<span style="color: #ff6600;"> आपको आर्यिका बने, 27 वां साल है । आपके अच्छे और बुरे अनुभव क्या रहे ?</span></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong> </span>संत, घर-गृहस्थी संबंधी विचारों को छोडकर आत्मा और परमात्मा के रास्ते पर चलकर भी जिन धर्म की प्रभावना करता है । इसी बीच यह बताना चाहूंगी कि पहले जब कोई मेरे अनुसार काम नहीं करता तो मुझे क्रोध आ जाता था । बडे गांव में देखा कि विधान की तैयारी नहीं है और गुरु यहां पहुंच रह हैं। मुझे लगा कि अब गुरुजी को गुस्सा आएगा । पर उन्होंने जरा भी गुस्सा नहीं किया । पांच मिनट तैयारी करवाई और विधान शुद्ध हो गया । ये मेरे जीवन के लिए शिक्षा बन गई । मैनें भी क्रोध करना छोड़ दिया । गुरुवर की समाधि मेरे लिए एक बुरा अनुभव है जो अभी भी महसूस होती है ।</p>
<p><strong>श्रीफल जैन न्यूज़ &#8211;<span style="color: #ff6600;"> धार्मिक संकल्प के अलावा, नए बच्चों के संस्कार की कोई योजना है ?</span></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्तिभूषण माताजी &#8211;</strong></span> स्कूल के माध्यम से बच्चों को बहुत कुछ सिखाया जा सकता है । इसीलिए मैं स्कूल की प्रेरणा करती हूं । बच्चों के लिए शिक्षा संस्कार शिविर लगाती हूं और जहाजपुर में स्कूल की प्लानिंग चल रही है ।</p>
<p><strong>(इनपुट सहयोग &#8211; मनोज नायक )</strong></p>
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