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	<title>Samaysaar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Samaysaar &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान महावीर जन्म कल्याणक 30 मार्च को : भगवान महावीर की शिक्षाएं एवं पर्यावरण परस्परोपग्रहो जीवानाम् </title>
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		<pubDate>Thu, 26 Mar 2026 16:31:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और अहिंसक सहअस्तित्व की जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित होती हैं। पढ़िए, डॉ यतीश जैन का यह आलेख&#8230; भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और अहिंसक सहअस्तित्व की जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित होती हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, डॉ यतीश जैन का यह आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>भगवान महावीर की शिक्षाएँ जैन दर्शन में केवल आत्मकल्याण का मार्ग नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के साथ संतुलित और अहिंसक सहअस्तित्व की जीवन-पद्धति के रूप में प्रतिपादित होती हैं। महावीर जन्मकल्याणक महोत्सव के पावन अवसर पर जब हम उनके जीवन और उपदेशों का स्मरण करते हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि उनका दर्शन आज के पर्यावरण संकट से जूझती मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक और मार्गदर्शक है। जैन परंपरा के प्रमुख ग्रंथ आचार्य उमास्वामी कृत तत्त्वार्थसूत्र, आचार्य कुंदकुंददेव कृत समयसार, पंचास्तिकाय, आचार्य अमृतचंद्र कृत पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, तथा आचार्य पुझ्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि- इन सभी में महावीर की शिक्षाओं का दार्शनिक एवं व्यावहारिक स्वरूप विस्तार से मिलता है।</p>
<p>महावीर जन्मकल्याणक केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि एक चेतना का पर्व है, जो हमें उनके द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह, अनेकांत और संयम जैसे सिद्धांतों को जीवन में उतारने की प्रेरणा देता है। तत्त्वार्थसूत्र का प्रसिद्ध सूत्र:-</p>
<p><strong>“परस्परोपग्रहो जीवानाम्” (5.21) </strong></p>
<p>इस अवसर पर विशेष रूप से स्मरणीय है, क्योंकि यह हमें बताता है कि समस्त जीव एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यही सिद्धांत आधुनिक पर्यावरण विज्ञान का आधार है। जब हम जन्मकल्याणक मनाते हैं, तो यह केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रहकर इस विचार को भी आत्मसात करने का अवसर होना चाहिए कि पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और वनस्पति- ये सभी जीव हैं और इनके प्रति हमारा व्यवहार अहिंसात्मक होना चाहिए।</p>
<p><strong>इसी ग्रंथ में कहा गया है:-</strong></p>
<p>“पृथिव्यापस्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः”</p>
<p>(तत्त्वार्थसूत्र 2.13)</p>
<p>अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति भी जीव हैं। महावीर जन्मकल्याणक के अवसर पर यदि इस सूत्र को व्यवहार में उतारा जाए तो पर्यावरण संरक्षण अपने आप एक धार्मिक कर्तव्य बन जाता है। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण—ये सभी केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि अहिंसा के प्रत्यक्ष रूप हैं।</p>
<p><strong>आचार्य कुंदकुंददेव कृत समयसार में कहा गया है:-</strong></p>
<p>“रागादयो हि संसारः”</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अर्थात् राग, लोभ और आसक्ति ही संसार के बंधन का कारण हैं।</p>
<p>जन्मकल्याणक के महोत्सव में जब हम भगवान महावीर के वैराग्य और त्याग का स्मरण करते हैं, तब यह भी समझना आवश्यक है कि आज का पर्यावरण संकट कहीं न कहीं मानव के असीमित उपभोग और संग्रह की प्रवृत्ति का परिणाम है। यदि हम अपरिग्रह को अपनाएँ, तो संसाधनों का संतुलित उपयोग संभव हो सकेगा।</p>
<p><strong>आचार्य अमृतचंद्र कृत पुरुषार्थसिद्ध्युपाय का सूत्र: </strong></p>
<p>“प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा”</p>
<p>(गाथा 44)</p>
<p>यह बताता है कि असावधानी से भी जीवों को कष्ट पहुँचाना हिंसा है। आज के संदर्भ में प्लास्टिक का अंधाधुंध उपयोग, जल और वायु का प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग &#8211; ये सभी प्रमादजन्य हिंसा के उदाहरण हैं। महावीर जन्मकल्याणक का वास्तविक संदेश यही है कि हम अपने जीवन में सजगता लाएँ और ऐसे आचरण से बचें जो प्रकृति को हानि पहुँचाते हैं।</p>
<p>पंचास्तिकाय में जीवों की स्वतंत्र सत्ता और उनके अस्तित्व का सम्मान करने की बात कही गई है। यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि प्रकृति पर अधिकार नहीं, बल्कि सहअस्तित्व का भाव रखना चाहिए।</p>
<p>जन्मकल्याणक के अवसर पर यदि यह भावना विकसित हो जाए, तो पर्यावरण संरक्षण केवल एक कार्यक्रम न रहकर जीवन का हिस्सा बन सकता है। भगवान महावीर का जीवन स्वयं इस बात का उदाहरण है कि सरलता, संयम और अहिंसा के माध्यम से ही सच्ची प्रगति संभव है। आज जब हम जन्मकल्याणक महोत्सव को धूमधाम से मनाते हैं, तब यह भी आवश्यक है कि हम इसे “हरित उत्सव” के रूप में मनाने का संकल्प लें &#8211; जैसे प्लास्टिक मुक्त आयोजन, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता अभियान। यही भगवान महावीर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। अतः कहा जा सकता है कि भगवान महावीर का जन्मकल्याणक केवल उनके अवतरण का उत्सव नहीं, बल्कि उनके सिद्धांतों को पुनः जागृत करने का अवसर है। दिगंबर ग्रंथों में प्रतिपादित अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और परस्पर सहयोग के सिद्धांत आज के पर्यावरण संकट का स्थायी समाधान प्रस्तुत करते हैं। यदि हम इस अवसर पर इन शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात कर लें, तो न केवल व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर परिवर्तन संभव है, बल्कि पृथ्वी को भी संतुलित और सुरक्षित बनाया जा सकता है। यही महावीर जन्मकल्याणक का वास्तविक संदेश और उद्देश्य है।</p>
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		<title>स्वयं के बांधे कर्मों का फल स्वयं को ही भोगना है: मुनिश्री विलोकसागर जी ने कथनी-करनी में भेद समझाया  </title>
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		<pubDate>Wed, 20 Aug 2025 11:56:21 +0000</pubDate>
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<p><strong>जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की , यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> जैनाचार्यश्री आर्जवसागरजी महाराज के शिष्य मुनिश्री विलोकसागरजी एवं मुनिश्री विबोधसागरजी महाराज के आध्यात्मिक वर्षायोग में प्रतिदिन प्रवचनों के माध्यम से अमृतवर्षा हो रही है। बुधवार को धर्मसभा में मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने कुंद-कुंद स्वामी द्वारा रचित सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार की वाचना करते हुए कथनी-करनी के संदर्भ में बताया। दुनिया में छह द्रव्य जीव पुदगल धर्म अधर्म आकाश और काल के बारे में समझाते हुए कहा कि जीव और पुदगल का संयोग जब होता है तब कर्म बंध होता है। शेष चार द्रव्य धर्म, अधर्म, आकाश और काल तो अपने आप में रहते हैं। जो भी कर्म बंध होता है वह जीव और पुदगल के संयोग से ही होता है। जो भी शुभ अशुभ फल होता है, जो भी बंध होता है वह हमारे स्वयं के द्वारा ही होता है। जब हम कूलर या एसी की हवा खाते हैं तो उसका बिल किसे भरना पड़ेगा, हमें ही तो भरना पड़ेगा, हमें ही तो चुकाना पड़ेगा।</p>
<p><strong>भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे</strong></p>
<p>इसी प्रकार हम जिस प्रकार की सांसारिक क्रियाओं में लिप्त रहते हैं तो उनके द्वारा बांधे गए कर्माें का फल हमको ही भोगना पड़ेगा। कोई दूसरा हमारा अच्छा या बुरा नहीं कर सकता। यदि हम अधर्म के कामों में, पाप कर्मों में लिप्त रहेंगे तो परमात्मा भी हमारे दुःखों को हमारे कष्टों को दूर नहीं कर सकता। हमें स्वयं को इसके लिए पुरुषार्थ करना होगा, हमें ही जागृत होना पड़ेगा। जब हम जागृत हो जाएंगे, भेद विज्ञान को समझ लेंगे, तब हमारे वस्त्र स्वयं ही छूट जाएंगे। हम स्वयं ही संसार से विरक्त हो जाएंगे। वस्त्र उतारे नहीं जाते, स्वयं ही उतर जाते हैं। त्याग विरक्ति तो अंतरंग से आती है। जब सच्चाई का ज्ञान हो जाता है, जब स्व और पर का भेद समझ आ जाता है, तब मन संसार से विरक्त होकर जीव मोक्ष मार्गी हो जाता है।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में कर्मों के बंधन से मुक्त होना ही मुख्य लक्ष्य</strong></p>
<p>जैन धर्म में, जीव और पुद्गल दो अलग-अलग द्रव्य हैं जो इस ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं। जीव चेतन तत्व है, जबकि पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है। जीव को आत्मा भी कहा जाता है, जो शाश्वत और चेतन तत्व है। यह सुख-दुःख का अनुभव करता है और कर्मों के बंधन में बंधा होता है। जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराना है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति हो सके। पुद्गल जड़ (निर्जीव) पदार्थ है, जो विभिन्न रूपों में मौजूद है। यह दिखाई देने वाला, स्पर्श करने योग्य और परिवर्तनशील है। पुद्गल में वर्ण (रंग), गंध (गंध), रस (स्वाद) और स्पर्श (स्पर्श) गुण होते हैं। शरीर, मन, वचन और सांसें सभी पुद्गल से बनी हैं। जैन धर्म में, पुद्गल को कर्मों के रूप में भी माना जाता है जो आत्मा के साथ बंधते हैं।</p>
<p><strong>जैन दर्शन में जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त होना ही मुख्य ध्येय</strong></p>
<p>जैन धर्म के अनुसार, जीव और पुद्गल अनादि काल से एक दूसरे से बंधे हुए हैं। जीव पुद्गल के साथ मिलकर संसार में जन्म-मरण के चक्र में फंसा रहता है। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, यानी कर्मों से छुटकारा पाना होगा। पुद्गल से मुक्ति पाने के लिए, जीव को सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र का पालन करना होता है। जैन धर्म में जीव और पुद्गल दो अलग-अलग तत्व हैं, लेकिन वे एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। जीव को कर्मों के बंधन से मुक्त कराने के लिए, उसे पुद्गल से अलग होना होगा, जो जैन धर्म का मुख्य लक्ष्य है।</p>
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		<title>संगति से भी हमारा पाप, पुण्य में परिवर्तित होता हैः मुनिश्री सुधासागर जी महाराज के प्रवचनों से हो रहा धर्म-ज्ञानार्जन </title>
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		<pubDate>Wed, 23 Jul 2025 13:25:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित जिनालय में धर्मसभा में प्रवचन कर रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। उनकी वाणी सुनकर वे धर्म-ज्ञानार्जन कर रहे हैं। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; अशोकनगर। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित जिनालय में धर्मसभा में प्रवचन कर रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। उनकी वाणी सुनकर वे धर्म-ज्ञानार्जन कर रहे हैं। <span style="color: #ff0000">अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अशोकनगर।</strong> मुनिश्री सुधासागर जी महाराज नगर के सुभाषगंज स्थित जिनालय में धर्मसभा में प्रवचन कर रहे हैं। रोज उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन यहां पहुंच रहे हैं। उनकी वाणी सुनकर वे धर्म-ज्ञानार्जन कर रहे हैं। मंगलवार को उन्होंने अपने प्रवचन में कि यदि हमारे चारों तरफ पुण्य आत्मा हो तो हमारा पाप भी कम हो जाता है, पुण्य बढ़ जाता है, उनके घर में कोई भी व्यक्ति ऐसा पुण्य लेकर नहीं आया था कि मैं अकाल में हीं मरूँगा लेकिन, तीर्थंकर के पुण्य से कोई अकाल में नहीं मरता और यदि गर्भ में ऐसा कोई पापी जीव आ जाए तो बड़े-बड़े पुण्यात्माओं का भी पुण्य क्षय हो जाता है। संगति क्यों कराई जाती है क्योंकि, संगति से भी हमारा पाप, पुण्य में परिवर्तित होता है और हमारा पुण्य, पाप में भी परिवर्तित होता है।</p>
<p>निमित्त के अनुसार हमारे कर्मों की उदीरणा होती है। निमित्त मिलने पर भी कर्मों का संक्रमण होता है। जो किस्मत ने लिखा है वही होगा, नहीं हम किस्मत बदल सकते हैं। कितनी भी बुरी किस्मत हो मत घबराना, जो आज चरवाहे थे एक दिन के बाद राजा बन गए और कितनी ही अच्छी किस्मत हो मत इतराना, आज जो राजा बनने वाले थे, कल वे जंगलों में जाते दिखते हैं।</p>
<p><strong>आत्मशक्ति को जागने का मूल सूत्र है समयसार</strong></p>
<p>एक व्यक्ति के साथ हजार लोग खड़े रहते हैं और एक व्यक्ति बुलाए तो भी कोई साथ में नहीं आता। एक व्यक्ति की किस्मत में पीक दान भी सोने की है और एक व्यक्ति वो है जिसको सगाई में मिली अंगूठी भी रोल्ड गोल्ड की है, ऐसा क्यों होता है? संसार में सबसे बड़ा कोई है तो वह है आत्मा, आत्मशक्ति को जागने का मूल सूत्र है समयसार आध्यात्म ग्रंथ, जिसमें मात्र आत्म शक्तियों का जागरण बताया गया है। उन आत्मसशक्ति के जागरण के लिए हम शुरुआत कैसे करे। सारा तीन लोक झुक सकता है लेकिन, एक बार आत्मशक्ति यदि जाग गयी तो वह कभी पराजित नहीं हो सकती। आत्मशक्ति जागृत होने के बाद तीन लोक उलट पलट जाये लेकिन, सिद्ध भगवान का कुछ भी नहीं होने वाला नहीं।</p>
<p><strong>ब्रह्मांड हिल जाएगा शूली सिंहासन बन जाएगी</strong></p>
<p>निज शक्ति जागरण के लिए थोड़ी थोड़ी सी बातों पर टेंशन नहीं करना है, थोड़ी-थोड़ी बातों पर बुरा नहीं मानना है, अंदर चिंतन करना है- कोई बात नहीं। अपनी छोटी सी भी गलती होने पर सीधा बोलना है, नहीं बहुत बड़ी बात है, आई एम सॉरी प्लीज। अपने से की हुई छोटी गलती हमें एक दिन बहुत बड़ा अपराधी बना देगी, इसलिए जब कोई छोटी सी गलती होवे उसे ताड़ बना दो और पश्चाताप की अग्नि में डाल दो अपने को। आपके प्रति दूसरे ने जो अपराध किया है तब भाव लाना है- कोई बात नहीं। फांसी का फंदा लग चुका है, मात्र बटन चटकाने की देरी है और उस समय तुम्हारी आत्मा से निकल जाए कोई बात नही, बस उसी समय ब्रह्मांड हिल जाएगा और शूली सिंहासन बन जाएगी, जैसे सेठ सुदर्शन। दुष्ट, मूर्ख, विक्षिप्त और नारी के सामने कभी सफाई मत देना। विद्वान, जज, गार्जियन, सज्जनों के सामने कभी कुछ छुपाना मत।</p>
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		<title>8 दिवसीय भक्तामर विधान की आराधना की जा रही हैः फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_8day_long_bhaktamar_vidhan_is_being_worshipped_on_the_ashtanika_festival_of_the_month_of_falgun/</link>
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		<pubDate>Sat, 08 Mar 2025 12:35:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सनावद में श्री महावीर स्वामी जिन मंदिर में फाल्गुन माह की अष्टानिका पर्व पर महावीर जिनालय में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का अभिषेक सामूहिक पूजन एवं जैन परिवार के द्वारा 8 दिवसीय भक्तामर विधान का पूजन किया जा रहा है। फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर भक्तामर विधान रचाया [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सनावद में श्री महावीर स्वामी जिन मंदिर में फाल्गुन माह की अष्टानिका पर्व पर महावीर जिनालय में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का अभिषेक सामूहिक पूजन एवं जैन परिवार के द्वारा 8 दिवसीय भक्तामर विधान का पूजन किया जा रहा है। फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर भक्तामर विधान रचाया गया है। प्रतिदिन विधान पर बड़े भक्ति भाव से 6 अर्घ्य समर्पित किये जा रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सनावद से सन्मति जैन काका की यह पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सनावद।</strong> धर्म नगरी सनावद में श्री महावीर स्वामी जिन मंदिर में फाल्गुन माह की अष्टानिका पर्व पर महावीर जिनालय में प्रतिदिन प्रातः श्रीजी का अभिषेक सामूहिक पूजन एवं डॉ. जगदीश जैन की स्मृति में जवरचंदजी जैन परिवार के द्वारा 8 दिवसीय भक्तामर विधान का पूजन किया जा रहा है। फाल्गुन माह में अष्टानिका पर्व का विशेष महत्व है। इस अवसर पर 7 मार्च से 14 मार्च तक भक्तामर विधान रचाया गया है। पंडित जतीशचंदजी एवं पंडित निलेश जैन ने बताया की प्रतिदिन विधान पर बड़े भक्ति भाव से 6 अर्घ्य समर्पित किये जा रहे हैं।</p>
<p><strong>विशेष प्रवचन हो रहे </strong></p>
<p>विवेक जैन कालू ने बताया की इस अवसर पर मैनपुरी (उ.प्र) से पधारे पंडित अंकुर शास्त्री एवं आदित्य पंचोलिया सनावद के नेतृत्व में बहुत ही भक्ति भाव से विधान पर हर एक टोक का विशेष वर्णन कर के अर्थ समझाया जा रहा है। रात्री में समयसार पर विशेष प्रवचन हो रहे है।</p>
<p><strong>समाजजन धर्म लाभ ले रहे </strong></p>
<p>इस अवसर पर डॉ. रविश जैन, संजय जैन, जनीशचंद जैन, दिनेशचंद, प्रकाशचंद जैन, जवाहरलाल जैन, शैली जैन, माया जैन, अनीता जैन, रितिका जैन, हंसा बहनजी, भावना पंचोलिया, चंदू बहनजी, नैना चौधरी, रीता जैन, सहित अनेक समाजजन इसका धर्म लाभ ले रहे हैं।</p>
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		<title>आचार्य भगवन विशुद्ध सागरजी संघ के बढते कदम मुंबई की ओर-सिद्ध सागरजीः नातेपूते में गुरू-शिष्य का मिलन होगा  </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Feb 2025 11:11:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अढीव पंढरपूर पंचकल्याणक के उपरांत आचार्यश्री विशुद्ध सागरजी ससंघ का विहार मुंबई की ओर प्रारंभ हुआ है। 8 फरवरी को नातेपूते में गुरू-शिष्य का मिलन होगा। श्रमण मुनिश्री सारस्वत सागरजी और श्रमण मुनिश्री जयंत सागरजी नातेपूते में पूर्व से ही विराजमान हैं। श्रमण मुनिश्री सिद्धसागर नेे कहा की समय परिणमनशील है, काल परिवर्तित होते है [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>अढीव पंढरपूर पंचकल्याणक के उपरांत आचार्यश्री विशुद्ध सागरजी ससंघ का विहार मुंबई की ओर प्रारंभ हुआ है। 8 फरवरी को नातेपूते में गुरू-शिष्य का मिलन होगा। श्रमण मुनिश्री सारस्वत सागरजी और श्रमण मुनिश्री जयंत सागरजी नातेपूते में पूर्व से ही विराजमान हैं। श्रमण मुनिश्री सिद्धसागर नेे कहा की समय परिणमनशील है, काल परिवर्तित होते है और धर्म सारथी के रुप में धर्मस्थ को प्रवाहित करते रहते है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए पंढरपूर, महाराष्ट्र से अभिषेक अशोक पाटील की यह पूरी खबर&#8230; </span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पंढरपूर (महाराष्ट्र)</strong> श्रमण मुनिश्री सिद्धसागर महाराजजी ने बताया की अढीव पंढरपूर पंचकल्याणक के उपरांत आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागरजी महाराज ससंघ का विहार मुंबई की ओर प्रारंभ हुआ है। 8 फरवरी को नातेपूते में गुरू-शिष्य का मिलन होगा। श्रमण मुनिश्री सारस्वत सागर जी महाराज और श्रमण मुनिश्री जयंत सागरजी महाराज नातेपुते में विराजमान हैं।</p>
<p><strong>शिथिल हुए धर्मरथ को गति </strong></p>
<p>श्रमण मुनिश्री सिद्धसागर महाराजजी ने आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागरजी के बारे में बताते हुए कहा की समय परिणमनशील है, काल परिवर्तित होते है और धर्म सारथी के रुप में महान पुरुष धर्मस्थ को प्रवाहित करते रहते है। इनकी पुण्य वर्गणाओ से शिथिल हुआ धर्मरथ गति प्राप्त करता है और अनेको जीव चल पडते है भगवत्ता प्राप्त करने के लिए। सम्प्रति मे ऐसे ही महापुरुष आचार्यश्री विशुद्ध सागरजी महाराज ने आकाश समधर्म को विस्तार प्रदान किया।</p>
<p><strong>डाकूओं का शहर साधुओं की नगरी बना</strong></p>
<p>गुरुदेव का जन्म मध्यप्रदेश के भिंड जिला के रूर ग्राम में हुआ। यह वही भिंड जिला जिसे कभी डाकुओ के शहर के नाम से जाना जाता था। परंतु जब से आचार्य भगवन का जन्म हुआ उनकी पुण्य वर्गणाओ के प्रभाव से अब यह शहर साधूओ की नगरी के नाम से संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। इस नगर से अनेको मुनि, आर्यिकाएं और व्रति बन चुके है।</p>
<p><strong>महान ग्रंथ समयसार का स्वाध्याय किया </strong></p>
<p>मेरा सौभाग्य रहा जिस ग्राम रूर में जिस परिवार में आचार्य भगवन श्री विशुद्ध सागरजी का जन्म हुआ उसी घर में मेरा भी जन्म हुआ। बुंदेलखंड में कहते है पूत के लक्षण पालने में दिख जाते है। आचार्यश्री बचपन से ही धार्मिक प्रवृत्ति के रहे, घर में रहते थे तब ही अल्प आयु में समयसार जैसे महान ग्रंथ का स्वाध्याय करते थे।</p>
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