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	<title>Samavasarana &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Samavasarana &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>आचार्य श्री प्रज्ञा सागर जी के सान्निध्य में हो रही पदयात्रा अलौकिक : रामगंजमंडी, भवानीमंडी एवं हाडोती के भक्तों ने कहा-अद्भुत आध्यात्मिक आनंद का पल  </title>
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		<pubDate>Thu, 18 Dec 2025 09:46:03 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी के सान्निध्य में हाडोती की चंबल नदी के तट पर बसी धर्म प्राण नगरी कोटा से स्वस्तिधाम जहाजपुर के लिए ऐतिहासिक पदयात्रा निकाली जा रही है। यह यात्रा 15 दिसंबर से प्रारंभ हुई है और 20 दिसंबर को स्वस्तिधाम जहाजपुर में इसका समापन होगा। रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी के सान्निध्य में हाडोती की चंबल नदी के तट पर बसी धर्म प्राण नगरी कोटा से स्वस्तिधाम जहाजपुर के लिए ऐतिहासिक पदयात्रा निकाली जा रही है। यह यात्रा 15 दिसंबर से प्रारंभ हुई है और 20 दिसंबर को स्वस्तिधाम जहाजपुर में इसका समापन होगा। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री प्रज्ञा सागरजी के सान्निध्य में हाडोती की चंबल नदी के तट पर बसी धर्म प्राण नगरी कोटा से स्वस्तिधाम जहाजपुर के लिए ऐतिहासिक पदयात्रा निकाली जा रही है। यह यात्रा 15 दिसंबर से प्रारंभ हुई है और 20 दिसंबर को स्वस्तिधाम जहाजपुर में इसका समापन होगा। पदयात्रा का आलम यह है कि इसमें भक्ति आस्था का समन्वय देखने को मिल रहा है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण में भी यह एक पर्याय बनाकर परिलक्षित हो रही है। इस अलौकिक पदयात्रा में कोटा ही नहीं संपूर्ण हाडोती के साथ दूरदराज के भक्त भी सम्मिलित हो रहे हैं। बुधवार को इस पदयात्रा में रामगंजमंडी, भवानी मंडी, छबड़ा के भक्तजन पहुंचे। वे सभी पदयात्रा का वातावरण देख गदगद हो गए। पदयात्रा का रात्रि विश्राम चतरगंज कृषि विश्वविद्यालय में हुआ।</p>
<p><strong>इन समाजजनों ने शामिल होकर लिया धर्मलाभ </strong></p>
<p>जहां रामगंजमंडी से सुलोचना लुहाड़िया, शकुंतला मित्तल, भवानीमंडी से पारस सेठी, किरण सेठी, अजीत सेठी ने पहुंचकर पदयात्रा में सहभागिता की एवं आचार्य श्री संघ का आशीर्वाद लिया। उन्होंने पदयात्रा की तारीफ करते हुए कहा कि मिथुन मित्तल के संयोजन में यह पदयात्रा सही मायने में जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा अलौकिक प्रभावना का पर्याय बन गई है। इन्होंने पदयात्रा के प्रबंधन अनुशासन एवं संयोजन की भी जमकर तारीफ़ की और कहा कि हमें साक्षात समवशरण देखने को मिला है। उन्होंने कहा कि बग्गी, ऊंट गाड़ी, घोड़े आदि पर सवार भक्त भक्ति से परिपूर्ण नजर आ रहे थे।</p>
<p><strong>पदयात्रा में प्रज्ञा की ज्योति अपने आप में दिव्यमान</strong></p>
<p>क्या बच्चे क्या बुजुर्ग क्या युवा हर वर्ग पैदल चलते हुए भी थक नहीं रहे थे। भक्ति मय भजनों में झूमता नजर आ रहा था। उन्होंने सभी से अपील की कि जितने भी दिन पदयात्रा के शेष हैं, एक बार आप सब भी इस दिव्य पदयात्रा में सम्मिलित होकर पुण्य लाभ प्राप्त करें। यह पदयात्रा जैन धर्म की प्रभावना के साथ-साथ अहिंसा शाकाहार मैत्री का संदेश दे रही है। जो इस कलिकाल में अभूतपूर्व उदाहरण है। साथ ही उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से इस पदयात्रा में प्रज्ञा की ज्योति अपने आप में दिव्यमान होकर प्रज्वलित हो रही है।</p>
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		<title>श्री चंद्रप्रभु के दीक्षा तप कल्याणक पर आहार चर्या: समवशरण से दिव्य देशना हुई, भामाशाह अशोक पाटनी ने दिया प्रथम आहार </title>
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		<pubDate>Mon, 01 Dec 2025 11:05:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रीमद जिनेंद्र पंच कल्याणक समिति द्वारा सकल दिगंबर जैन समाज के सहयोग से आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव के चौथे दिन केवल ज्ञान कल्याणक पर श्री चंद्रप्रभु महामुनिराज को प्रथम आहार देने का सौभाग्य भामाशाह अशोक पाटनी, राजेंद्र कटारिया अहमदाबाद परिवार को प्राप्त हुआ। पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230; पीपल्दा (सवाईमाधोपुर)। आचार्यश्री वर्धमान सागर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रीमद जिनेंद्र पंच कल्याणक समिति द्वारा सकल दिगंबर जैन समाज के सहयोग से आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव के चौथे दिन केवल ज्ञान कल्याणक पर श्री चंद्रप्रभु महामुनिराज को प्रथम आहार देने का सौभाग्य भामाशाह अशोक पाटनी, राजेंद्र कटारिया अहमदाबाद परिवार को प्राप्त हुआ। <span style="color: #ff0000">पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>पीपल्दा (सवाईमाधोपुर)।</strong> आचार्यश्री वर्धमान सागर ससंघ के सान्निध्य पंच कल्याणक कार्यक्रम में हेलीकाप्टर से भामाशाह अशोक पाटनी आरके मार्बल ग्रुप किशनगढ़ एवं राजेंद्र कटारिया अहमदाबाद प्रभु और गुरु दर्शन के लिए परिवार सहित पधारे। श्रीमद जिनेंद्र पंच कल्याणक समिति द्वारा सकल दिगंबर जैन समाज के सहयोग से आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव के चौथे दिन केवल ज्ञान कल्याणक पर श्री चंद्रप्रभु महामुनिराज को प्रथम आहार देने का सौभाग्य भामाशाह अशोक पाटनी, राजेंद्र कटारिया अहमदाबाद परिवार को प्राप्त हुआ। अनेक पुण्यशाली समाजजनों का आहार देने का सौभाग्य मिला। इस अवसर पर देवकृत रत्नवर्षा, पुष्पवर्षा, गंधोदक वृष्टि, शीतल मंद सुगंधित वायु प्रवाह, दुंदुभी बाजे पंचाश्चर्य होते हैं। इस अवसर पर धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि श्री चंद्रप्रभु भगवान को केवलज्ञान होने पर धर्म तीर्थ का प्रवर्तन स्थान-स्थान पर होने से समवशरण में धर्म देशना दी। भारत की अनेक नगरों में जिनालयों का निर्माण कर भगवान की प्रतिमा विराजित की जाती है। प्रतिमा और भगवान में यह अंतर है कि आचार्य साधु परमेष्ठी प्रतिष्ठाचार्य के माध्यम से प्रतिमा में भगवान के गुणों का आरोपण सूरी मंत्रोच्चार से देते हैं तब वह प्रतिमा भगवान बनकर पूजनीय हो जाती है। सौधर्म इंद्र और अन्य इंद्र परिवार ने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में भाग लिया है। इंदौर जैसे महानगर में रहने वाले समर कंठाली छोटे से ग्राम के पंच कल्याणक प्रतिष्ठा में सौधर्मइंद्र बने हैं। उनके साथ अनेक राज्यों, नगरों के भी इंद्र बने हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कहा कि आहार दान की पात्रता श्रेष्ठ पुण्यशाली मनुष्यों को होती है। देवताओं को आहार देने की पात्रता नहीं होती है। सौधर्म इंद्र रत्नों जड़ित भव्य समवशरण की रचना करेंगे। जिसमें महामुनि श्री चंद्रप्रभु दिव्य देशना से धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करेंगे। मनुष्य जीवन में आपने कितना धर्म धारण कर पालन किया है। इसका स्वयं मूल्यांकन कीजिए। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में पाटनी और कटारिया परिवार की देव शास्त्र और गुरुओं के प्रति चारों दान की प्रशंसा की।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-95735" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015.jpg" alt="" width="1600" height="1064" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-1024x681.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-768x511.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-1536x1021.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-990x658.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/12/IMG-20251201-WA0015-1320x878.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />आगामी 5 वर्षों में जैनेश्वरी दीक्षा का संकल्प लिया</strong></p>
<p>जीवन के किसी भी पल में वैराग्य उमड़ सकता है। संसार में रह कर प्राणी संसार को तज सकता है। इन पंक्तियों को चरितार्थ किया सनावद मप्र के गुरु भक्त 56 वर्षीय अजय पंचोलिया ने। उन्होंने आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से वर्ष 2030 श्रवण बेलगोला में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी को श्रीफल भेंट कर दीक्षा लेने का संकल्प लिया। अजय गृहस्थ अवस्था के पिता मुनि चरित्र सागर जी के पुत्र, आर्यिका श्री महायश मति जी के चाचा और आर्यिका श्री निर्माेह मति जी के भाई हैं।</p>
<p><strong>समवशरण में आचार्य गणधर बने </strong></p>
<p>महामुनिराज श्री चंद्र प्रभु के दिव्य समवशरण में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने गणधर रूप में भगवान की दिव्य देशना प्रसारित कर सौधर्म, मुख्य श्रोता और श्रावक श्राविकाओं की अनेक जिज्ञासा का आगम सम्मत समाधान किया। महामुनि को मनपर्यय, ज्ञान दीक्षा लेते होता हैं। केवल ज्ञान होने पर 10 अतिशय के धारी होते हैं। बजरंगलाल एवं मनोज जैन सोगानी ने बताया कि श्रीमद जिनेंद्र पंचकल्याणक प्रतिष्ठा प्राण महामहोत्सव के ज्ञान कल्याणक के चौथे दिन विमान शुद्धि कलश यात्रा निकाली गई। प्रतिष्ठाचार्य मनोजकुमार के निर्देशन में महायज्ञनायक दीपक प्रधान सहित सभी इंद्र द्वारा मंदिर वेदी वास्तु और हवन का आयोजन किया गया। आचार्य श्री वर्धमान सागरजी ससंघ की मौजूदगी में केवलज्ञान संस्कार क्रिया, अधिवासना, मुखोद्घाटन, नयनोन्मिलन, सूरीमंत्र, गुणारोपण, केवल ज्ञान पूजा, हवन, पद्दोद्घाटन, समवसरण दर्शन और 46 दीप से आरती, दिव्य ध्वनि का आयोजन किया गया। इस दौरान हजारों जैन समाज के लोगों ने भगवान श्री चंद्रप्रभु एवं आचार्य श्री वर्धमानसागर महाराज के जयकारों से पांडाल को गूंजा दिया। आचार्यश्री वर्धमान सागर महाराज के सान्निध्य में दीप प्रज्वलन और चित्र अनावरण तथा आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन एवं जिनवाणी भेंट भामाशाह अशोक पाटनी किशनगढ़ एवं राजेंद्र कटारिया अहमदाबाद ने परिवार की। सांयकालीन आरती करने के सौभाग्यशाली परिवार के लोग वर्धमान सभागार पहुंचे। जहां पर श्रीजी की महाआरती की गई। शास्त्र सभा के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम किए गए।</p>
<p><strong>2 दिसंबर को होगा मोक्ष कल्याणक</strong></p>
<p>श्री चंद्रप्रभु भगवान आयु के अंत में योग निरोध करते हैं। विहार और धर्म उपदेश बंद हो जाता है। भगवान के मोक्ष जाने के बाद अग्निकुमार देव अंतिम संस्कार करते हैं और मोक्ष कल्याणक का पूजन किया जाता है। इस प्रकार तीर्थंकर बालक के गर्भ में आते ही गर्भ सवाई माधोपुर, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष कल्याणक के रूप में पांच कल्याणक मनाए जाते हैं।</p>
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		<title>भगवान अरहनाथ जी का तप कल्याणक 30 नवंबर को : तिथि के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी को मनाया जाएगा भगवान का तप कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Sat, 29 Nov 2025 11:57:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक 30 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में भगवान का विशेष पूजन, आराधना और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। तिथि के अनुसार भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के दिन आता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्र्ंखला [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक 30 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में भगवान का विशेष पूजन, आराधना और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। तिथि के अनुसार भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के दिन आता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्र्ंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 18वें तीर्थंकर भगवान अरहनाथ का तप कल्याणक 30 नवंबर को मनाया जाएगा। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों, चैत्यालयों में भगवान का विशेष पूजन, आराधना और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। तिथि के अनुसार भगवान अरहनाथ का तपकल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी के दिन आता है। तप कल्याणक के बारे में जैन धर्म ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि तप कल्याणक वह अवसर है जब उन्होंने 21 हजार वर्ष तक राज्य करने के बाद 42 हजार वर्ष की आयु पूरी कर सांसारिक जीवन का त्याग कर दिया था। उन्होंने आम्र वृक्ष के नीचे रेवती नक्षत्र में दीक्षा ली और 12 सभाओं से घिरे हुए समवशरण में 20 हजार 984 वर्ष तक केवली के रूप में रहे। भगवान अरनाथ ने राज-पाट का त्याग करके दीक्षा धारण की। उन्होंने आम्र वृक्ष के नीचे रेवती नक्षत्र में जैन दीक्षा धारण की। दीक्षा लेने से पहले उन्होंने एक माह तक तेला का नियम (तीन दिन उपवास) का पालन किया।</p>
<p>भगवान अरनाथ के दीक्षा धारण करने पर चक्रपुर नगर के राजा अपराजित को आहारदान देने से पंचाश्चर्य प्राप्त हुए। यह भगवान अरहनाथ जी के पांच कल्याणकों में से एक है, जिसमें वह सांसारिक मोह-माया का त्याग कर आत्म-साधना के पथ पर अग्रसर हुए थे। तप कल्याणक के बाद भगवान अरहनाथ केवली ने अवस्था के दौरान छद्मस्थ अवस्था के 16 वर्ष पूरे होने के बाद आम्रवन के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त किया। उनके समवशरण में 30 गणधर, 50 हजार मुनि, 60 हजार आर्यिकाएं, 1 लाख 60 हजार श्रावक, 3 लाख श्राविकाएं, असंख्यात देव-देवियां और संख्यात तिर्यंच शामिल थे। केवल ज्ञान के बाद उन्होंने 20 हजार 984 वर्ष तक केवली अवस्था में व्यतीत किए। चैत्र कृष्ण अमावस्या के दिन रेवती नक्षत्र में रात्रि के पूर्व भाग में सम्मेदशिखर पर सिद्धपद को प्राप्त हुए।</p>
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		<title>भगवान महावीर का तप कल्याणक 14 नवंबर को: तिथि के अनुसार मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी को मनाया जाता है तप कल्याणक </title>
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		<pubDate>Thu, 13 Nov 2025 12:11:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का तप कल्याण 14 नवंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन पूरे धार्मिक उल्लास और पारंपरिक भक्ति के अनुसार मनाया जाएगा। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संशोधित प्रस्तुति&#8230; इंदौर। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का तप कल्याण 14 नवंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन पूरे धार्मिक उल्लास और पारंपरिक भक्ति के अनुसार मनाया जाएगा। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संशोधित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का तप कल्याण 14 नवंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन पूरे धार्मिक उल्लास और पारंपरिक भक्ति के अनुसार मनाया जाएगा। मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन भगवान महावीर ने दीक्षा ग्रहण कर तप आरंभ किया था। इस दिन देश और विदेश के दिगंबर जैन मंदिरों में भगवान महावीर की विशेष आराधना, पूजन, विधान, अभिषेक, शांतिधारा, पाठ सहित अन्य धार्मिक क्रियाएं की जाएंगी। इंदौर शहर के भी सभी प्रमुख दिगंबर जैन मंदिरों तथा चैत्यालयों में भी तप कल्याणक पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। भगवान महावीर का जन्म करीब ढाई हजार वर्ष पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली गणराज्य के क्षत्रिय कुंड में क्षत्रिय परिवार हुआ था। 30 वर्ष की आयु में महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव का त्याग कर दिया और संन्यास धारण कर आत्म कल्याण के पथ पर निकल पड़े। 12 वर्षाें की कठिन तपस्या के बाद उन्हें मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। इसके बाद भगवान महावीर ने समवशरण में ज्ञान का प्रकाश प्रसारित किया।</p>
<p>72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी से मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस दौरान महावीर स्वामी के कई अनुयायी भी बने। जिसमें उस समय के प्रमुख राजा बिम्बिसार, कुणिक और चेटक भी शामिल थे। जैन समाज महावीर स्वामी के जन्म दिवस को महावीर जयंती तथा उनके मोक्ष दिवस को दीपावली के रूप में धूमधाम से मनाता है। कार्तिक शुक्ल एकम को निर्वाण लाडू चढ़ाया जाता हैं।</p>
<p><strong>तीर्थंकर सभी जीवों को बताते हैं आत्मिक सुख का उपाय </strong></p>
<p>जैन ग्रंथों के अनुसार समय-समय पर धर्म तीर्थ के प्रवर्तन के लिए तीर्थंकरों का जन्म होता है। जो सभी जीवों को आत्मिक सुख प्राप्ति का उपाय बताते हैं। तीर्थंकरों की संख्या चौबीस ही कही गयी है। भगवान महावीर वर्तमान अवसर्पिणी काल की चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर थे और हिंसा, पशु बलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तीर्थंकर महावीर स्वामी ने अहिंसा को सबसे उच्चतम नैतिक गुण बताया। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए। इनमें अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय),ब्रह्मचर्य हैं। उन्होंने अनेकांतवाद, स्यादवाद और अपरिग्रह जैसे अद्भुत महाव्रती सिद्धांत दिए।</p>
<p><strong>महावीर का आत्मधर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान </strong></p>
<p>महावीर के सर्वाेदयी तीर्थों में क्षेत्र, काल, समय या जाति की सीमाएं नहीं थीं। भगवान महावीर का आत्मधर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। दुनिया की सभी आत्मा एक-सी हैं, इसलिए हम दूसरों के प्रति वही विचार एवं व्यवहार रखें जो हमें पसंद हो। यही महावीर का ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत है।</p>
<p><strong>12 वर्ष तक किया था भगवान महावीर ने तप </strong></p>
<p>भगवान महावीर का साधना काल 12 वर्ष का था। दीक्षा लेने के बाद भगवान महावीर ने जिन कल्पी श्रमण की कठिन चर्या को अंगीकार किया। उन्होंने केवल ज्ञान की प्राप्ति भी जिनकल्पी अवस्था में ही की। अपने पूरे साधना काल के दौरान महावीर ने कठिन तपस्या की और मौन रहे। इन वर्षों में उन पर कई उपसर्ग भी हुए, जिनका उल्लेख कई प्राचीन जैन ग्रंथों में मिलता है। जैन ग्रंथों के अनुसार केवल ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान महावीर ने उपदेश दिया। उनके 11 गणधर (मुख्य शिष्य) थे, जिनमें प्रथम इंद्रभूति थे।</p>
<p><strong>भगवान महावीर ने बताए पांच व्रत</strong></p>
<p>सत्य― सत्य के बारे में भगवान महावीर स्वामी कहते हैं, हे पुरुष! तू सत्य को ही सच्चा तत्व समझ। जो बुद्धिमान सत्य की ही आज्ञा में रहता है, वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।</p>
<p>अहिंसा- इस लोक में जितने भी त्रस जीव (एक, दो, तीन, चार और पांच इंद्री वाले जीव) है, उनकी हिंसा मत कर, उनको उनके पथ पर जाने से न रोको। उनके प्रति अपने मन में दया का भाव रखो। उनकी रक्षा करो। यही अहिंसा का संदेश भगवान महावीर अपने उपदेशों से हमें देते हैं।</p>
<p>अचौर्य- दूसरे की वस्तु बिना उसके दिए हुए ग्रहण करना जैन ग्रंथों में चोरी कहा गया है।</p>
<p>अपरिग्रह- आवश्यक चीजों का उपयोग ही किया जाए।</p>
<p>ब्रह्मचर्य- महावीर स्वामी ब्रह्मचर्य के बारे में अपने बहुत ही अमूल्य उपदेश देते हैं कि ब्रह्मचर्य उत्तम तपस्या, नियम, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, संयम और विनय की जड़ है। तपस्या में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ तपस्या है। जैन मुनि, जैन साध्वी इन्हें पूर्ण रूप से पालन करते हैं, इसलिए उनके महाव्रत होते हैं और श्रावक, श्राविका इनका एक देश पालन करते हैं, इसलिए उनके अणुव्रत कहे जाते हैं।</p>
<p>क्षमा- क्षमा के बारे में भगवान महावीर कहते हैं-मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूं। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्री भाव है। मेरा किसी से बैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूं। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा मांगता हूं। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किए हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ। वे यह भी कहते हैं ‘मैंने अपने मन में जिन-जिन पाप की वृत्तियों का संकल्प किया हो, वचन से जो-जो पाप वृत्तियां प्रकट की हों और शरीर से जो-जो पापवृत्तियां की हों, मेरी वे सभी पापवृत्तियाँ विफल हों। मेरे वे सारे पाप मिथ्या हों।श्</p>
<p>धर्म- धर्म सबसे उत्तम मंगल है। अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। भगवान महावीर जी कहते हैं जो धर्मात्मा है, जिसके मन में सदा धर्म रहता है। उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। भगवान महावीर ने अपने प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह, क्षमा पर सबसे अधिक जोर दिया। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था।</p>
<p><strong>‘समाजवाद’ तब तक सार्थक नहीं होगा, जब तक है आर्थिक विषमता </strong></p>
<p>महावीर की अहिंसा केवल सीधे वध को ही हिंसा नहीं मानती है, अपितु मन में किसी के प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। वर्तमान युग में प्रचलित नारा ‘समाजवाद’ तब तक सार्थक नहीं होगा, जब तक आर्थिक विषमता रहेगी। एक ओर अथाह पैसा, दूसरी ओर अभाव। इस असमानता की खाई को केवल भगवान महावीर का श्अपरिग्रहश् का सिद्धांत भर सकता है। अपरिग्रह का सिद्धांत कम साधनों में अधिक संतुष्टि पर बल देता है। यह आवश्यकता से ज्यादा रखने की सहमति नहीं देता है।</p>
<p><strong>मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी दिखाई</strong></p>
<p>भगवान महावीर के अनुयायी उनके नाम का स्मरण श्रद्धा और भक्ति से करते हैं। उनका यह मानना है कि महावीर ने इस जगत को न केवल मुक्ति का संदेश दिया, अपितु मुक्ति की सरल और सच्ची राह भी दिखाई। भगवान महावीर ने आत्मिक और शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए अहिंसा धर्म का संदेश दिया।</p>
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		<title>ज्ञान का कार्य है जानना, श्रद्धान का काम विश्वास करना: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में मनाया ज्ञान कल्याणक  </title>
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		<pubDate>Tue, 11 Nov 2025 13:03:20 +0000</pubDate>
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<p><strong>आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज के सान्निध्य में हो रहे पंचकल्याण प्रतिष्ठा महोत्सव के चौथे दिन भगवान को केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। केवल ज्ञान कल्याणक महोत्सव की बेला में प्रतिदिन की भांति श्री जी का अभिषेक कर शांतिधारा हुई। इस बेला में आचार्य श्री ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान का कार्य जानना और विश्वास करना श्रद्धा का काम है। जानी हुई वस्तु पर श्रद्धा कैसी है, विश्वास कैसा है। इसे ही लाभ प्राप्त होता है। सोने का उदाहरण देते हुए कहा कि सोने को जानना और उस पर श्रद्धा करना होता है। सुनार भी उसे कसौटी पर कसता है, पीतल कीमती वस्तु है, उस पर श्रद्धान नहीं करता। कोई भी निर्णय श्रद्धा के बाद होता है। उन्होंने कहा कि श्रद्धान ज्ञान में बड़ी भूमिका निभाता है। सही जगह श्रद्धान होना चाहिए। मेहनत परिश्रम तप साधना करते हैं। तब जाकर पुण्य प्राप्त होता है। इसका मतलब तब जाकर केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है। झोली फैलाओ और शुभ भावनाओं भाओ कि केवलज्ञान की प्राप्ति हो। यदि यह हो जाएगा तो कल्याण निश्चित है।</p>
<p><strong>राजा सोम राजा श्रेयांश परिवार के यहां हुए आदिनाथ प्रभु के आहार </strong></p>
<p>इसी क्रम में एक वर्ष तक आदिनाथ प्रभु को विधि नहीं मिली और किसी को नवधा भक्ति विधि आहार की विधि भी नहीं पता थी और आहार चर्या का सौभाग्य राजा सोम राजा श्रेयांश परिवार को मिला, जो संजय ममता बाक़लीवाल एवं राजीव मनीषा बाकलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ। इसी के साथ प्रभु की दिव्य ध्वनि खिरी प्रभु को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई और प्रभु का पारणा गन्ने ईक्षु रस गन्ने से हुआ। दोपहर की बेला में समवशरण की रचना हुई। समवशरण के प्रथम दर्शन कराने एवं विमोचन करने का सौभाग्य कमल कुमार उमा देवी शामगढ़ निवासी को प्राप्त हुआ एवं इन्हीं के परिवार को ही समवशरण की प्रथम आरती का सौभाग्य मिला। समवशरण में दिव्य उपदेश हुआ। आचार्य श्री ने द्रव्यों के वर्णन को बताया। उन्होंने कहा कि संसार में 6 द्रव्य हैं, जिसमें जीव चेतन है, उसे अनुभूति है उसे सुख-दुख का अनुभव है।</p>
<p><strong>आचार्य के 36 मूलगुण उपाध्याय के 25 मूलगुणों का मार्ग बताया</strong></p>
<p>आचार्यश्री ने बताया कि भगवान ने दो धर्म का प्रतिपादन किया श्रावक धर्म और मुनि धर्म भगवान ने हमें महाव्रत धारण करके तप साधना का मार्ग बताया श्रावक के छह आवश्यक आठ मुलगुणों का पालन करने के साथ व्यसन त्याग का विस्तृत वर्णन किया।</p>
<p>भगवान ने आचार्य के 36 मूलगुण उपाध्याय के 25 मूलगुणों का मार्ग बताया। जन्म जरा मृत्यु पर्याय तक हमारी है। कर्म बंधन के कारण जीव कभी मनुष्य कभी देव कभी नरक पर्याय में जन्म लेता है।</p>
<p><strong>भगवान की दिव्यध्वनि सर्वांग से खिरती है </strong></p>
<p>आचार्य श्री ने भगवान की दिव्य ध्वनि के विषय में सभी को बताया। उन्होंने कहा कि जब दिव्या ध्वनि खिर रही थी। संपूर्ण संसार में मेघ गर्जन प्रचारित हो रही थी। उन्होंने कहा कि दिव्य ध्वनि जिनेंद्र वाणी है। जो सर्वांग से खिरती है। भगवान ने दिव्य ध्वनि के माध्यम से आगम को समझाया। केवल ज्ञान की महिमा अनंत है। केवलज्ञानी अनंत पर्याय को देखता है। यह केवल ज्ञान की महिमा है। संपूर्ण कार्यक्रम में छायाचित्र में सक्रिय सहयोग आशु जैन कटनी, सन्नी जैन कटनी एवं उनकी टीम ने किया। बुधवार को पिच्छिका परिवर्तन एवं मोक्ष कल्याणक महोत्सव मनाया जाएगा।</p>
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		<title>भोग विलास जीवन का साध्य नहीं, त्याग संयम जीवन का ध्येय हो: मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने त्याग और संयम को प्रवचन में किया विश्लेषित  </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/luxury_is_not_the_goal_of_life_sacrifice_and_restraint_should_be_the_aim_of_life/</link>
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		<pubDate>Sat, 11 Oct 2025 09:57:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[दुनियादारी में तो हम नित्य प्रतिदिन उलझे रहते है, भगवान की शरण में आने का मौका बहूत कम मिलता है। यह बात मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने अवधपुरी में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतिम दिन धर्म सभा में कही। अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230; अवधपुरी (भोपाल)। मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ससंघ के सानिध्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>दुनियादारी में तो हम नित्य प्रतिदिन उलझे रहते है, भगवान की शरण में आने का मौका बहूत कम मिलता है। यह बात मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने अवधपुरी में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतिम दिन धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अवधपुरी (भोपाल)।</strong> मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ससंघ के सानिध्य में शनिवार को श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतिम दिवस भगवान के अभिषेक एवं शांतिधारा सिद्धभक्ति से हुई। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि विधानाचार्य एवं संगीतकार की मधुरस्वर में भक्ति गीत ‘कमाल हो गया, जी कमाल हो गया गुरु प्रमाण की वाणी से भोपाल में धमाल हो गया’ सभी श्रावक एवं श्राविकाओं ने भक्ति भाव के साथ भगवान के समवशरण में विराजमान 48 मंडलीय जिनेंद्र प्रभु के समक्ष नाचते-गाते झूमते हुए सामुहिक नृत्य प्रस्तुत किए। मुनिद्वय तथा सभी क्षुल्लक महाराज ने दोपहर डेढ़ बजे तक भगवान के 1008 सहस्त्रनामों का उल्लेख करते हुए सभी 1024 अर्घ्य समर्पित किए। इस अवसर पर मुनिश्री ने कहा कि भगवान का नाम जब-जब स्मरण में आता है तो मन मयूर की तरह नाच उठता है।</p>
<p><strong>हृदयकमल का खिल जाना, भक्ति की अभिव्यक्ति का श्रेष्ठतम स्वरूप</strong></p>
<p>हृदय कमल खिल उठता है-उन्होंने आचार्य मानतुंग स्वामी के भक्तामर स्तोत्र की गाथा प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘आस्तां तव स्तवन-मस्त -समस्त-दोष,त्वत्संकथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति,दूरे सहस्रकिरणरू कुरुते प्रभैव, पद्माकरेषु जल जानि विकास भांजि’ अर्थात भगवन् आपका दोष रहित स्तवन तो बहूत दूर की बात है, आपका नाम लेने मात्र से जगत के सभी जीवों के पाप नष्ट हो जाते हैं। जैसे सूर्य की किरणें आते ही सारे जगत में प्रकाश उत्पन्न हो जाता है तथा तालाब में कमल खिल जाते है। उसी प्रकार आपके नाम स्मरण मात्र से हृदयकमल का खिल जाना, भक्ति की अभिव्यक्ति का श्रेष्ठतम स्वरूप है।</p>
<p><strong>&#8230;आपके दोनों चरण कमल मेरे हृदय में समाहित हों </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा विधान का भले ही आज समापन हो जाए लेकिन, प्रभु से यह प्राथना करो कि जीवन का एक-एक पल आपकी भक्ति और आराधना में बीते। उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ति करने के लिये बहुत कम मौके मिलते हैं। दुनियादारी में तो हम नित्य प्रतिदिन उलझे रहते हैं। उन्होंने कहा कि यह जन्म जन्म के संस्कार है कि प्रभु की शरण में आने के बाद भी हमारा मन इधर उधर डोलता है। उन्होंने कहा कि प्रभु से प्रार्थना करो कि भगवन बस इतनी सी कृपा कर दो कि मेरा मन आपके चरणों में लग जाए और आपके दोनों चरण कमल मेरे हृदय में समाहित हों और यदि ऐसा सम्भव न हो तो मेरा हृदय आपके चरण कमलों में हो समाहित हो जाए।</p>
<p><strong>&#8230;.आपकी दशा और दिशा दोनों बदल जाएंगी </strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि यह भाव आपके अंतरंग में जग गया तो आपकी दशा और दिशा दोनों बदल जाएंगी और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो जाओगे। मुनि श्री ने कहा कि भोग विलास जीवन का साध्य नहीं है त्याग संयम हमारे जीवन का ध्येय होना चाहिए। भक्ति आलंबनीय नहीं है,भक्ति को अपने जीवन का आधार बनाकर मोक्ष मार्ग की ओर आगे बढ़ो। यही मेरा सभी को आशीर्वाद है। इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज ने मंत्रोच्चारण के साथ विधान समापन की क्रियाएं की।</p>
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		<title>भक्ति वह ताकत है जो भगवान को भी अपनी ओर खींच लेती है: शामली जैन समाज ने की भावना, विमर्श उत्सव हमारी नगरी में मनाया जाए  </title>
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		<pubDate>Mon, 06 Oct 2025 14:11:28 +0000</pubDate>
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<p><strong>जिनागम पंथ जयवंत हो और आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के गगनभेदी जयकारों से संपूर्ण वातावरण गुंजायमान हो गया, जब धर्मनगरी शामली से पधारे दो शतक (200) जिनागमपंथी गुरु भक्तों ने सहारनपुर के जैन बाग प्रांगण में पदार्पण किया। <span style="color: #ff0000">सराहनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की खबर&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सहारनपुर</strong>। जिनागम पंथ जयवंत हो और आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के गगनभेदी जयकारों से संपूर्ण वातावरण गुंजायमान हो गया, जब धर्मनगरी शामली से पधारे दो शतक (200) जिनागमपंथी गुरु भक्तों ने सहारनपुर के जैन बाग प्रांगण में पदार्पण किया। प्रत्येक सिर पर थी जिनागम पंथ की टोपी और हर हाथ में था जिनधर्म का ध्वज अथवा आचा गुरुवर का चित्र। परिपूर्ण हर्ष-उत्साह-उमंग के साथ अपने नगर शामली में आने का भावभीना निवेदन किया। जी हाँ, शामली में चल रहे आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज के दो शिष्य मुनि श्री विव्रत सागर जी, विश्वार्थसागर जी मुनिराज के मंगल मय चातुर्मास ने शामली जैन समाज की धर्म पिपासा को और भी वृद्धिगत कर दिया है। श्रद्धाल भक्तगण आशान्वित हैं कि जब आचार्य संघ के दो मुनि रत्नों ने नगर में धर्म की बहार ला दी है तो जब स्वयं आचार्य भगवंत अपने चतुर्विध संघ सहित शामली पधारेंगे तब तो मानो साक्षात भगवान का समवशरण ही हमारे नगर में लग जाएगा। 5 अक्टूबर, रविवार की प्रातः बेला में आचार्य श्री विमर्शसागर महामुनिराज की धर्मसभा में शामली जैन समाज के अध्यक्ष आलोक जैन के साथ सभी कार्यकारिणी ने श्रीफल समर्पित करते हुए आग्रह किया कि हे गुरुवर ! चातुर्मास उपरांत आप संघ सहित विहार करते हुए शामली नगर पधारें। हम सभी राष्ट्रीय स्तर पर आपका अवतरण दिवस मनाना चाहते हैं।</p>
<p>आचार्य श्री ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि आज जब शामली वालों ने दीप प्रज्वलन किया तब मुझे तो हर भक्त प्रज्वलित दीप की तरह दिखाई दे रहा था। वास्तव में जहां इतने सारे प्रज्वलित दीप हों। वहां बुझा हुआ दीप भी प्रज्वलित हो जाया करता है। हम निग्रन्य मुनिराजों को यदि अपनी ओर कोई खींच सकता तो वह है एकमात्र भक्ति। भक्ति से तो तीर्थंकर भगवान भी समवशरण सहित खिंचे चले आते हैं। आपने बड़ागांव में अपनी भक्ति दिखाई थी उसका आपको फल दो मुनिराजों के चातुर्मास के रूप में मिला। आप अपना कर्तव्य भक्ति करते रहिए, समय आने पर आपको और भी लाभ प्राप्त होता रहेगा।</p>
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		<title>गणधरों ने अपनी स्मरण शक्ति से शास्त्रों की रचना की: आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जावद में दी मंगल देशना  </title>
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		<pubDate>Fri, 09 May 2025 13:06:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जावद में विराजित रहकर मंगल देशना दी है। इसमें धर्म, ग्रंथ और ज्ञान का महत्व बताया। देव शास्त्र और गुरु की महिमा का बखान किया है। जावद से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230; जावद। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधुओं सहित जावद विराजित हैं। शुक्रवार को उपदेश [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने जावद में विराजित रहकर मंगल देशना दी है। इसमें धर्म, ग्रंथ और ज्ञान का महत्व बताया। देव शास्त्र और गुरु की महिमा का बखान किया है। <span style="color: #ff0000">जावद से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>जावद।</strong> आचार्य श्री वर्धमान सागर जी 36 साधुओं सहित जावद विराजित हैं। शुक्रवार को उपदेश में आचार्यश्री ने बताया कि संसारी प्राणी चार प्रकार की संज्ञाओं से ग्रसित होकर शाश्वत ज्ञान से विमुख है। ज्ञान आत्मा का स्वभाव है ,हमारे अरिहंत सिद्ध भगवान ने कर्मों का नाश कर सिद्ध अवस्था प्राप्त कर अनंत दर्शन, अनंत ज्ञान, अनंत सुख, अनंत वीर्य आदि गुण प्रगट किए हैं। हमारे श्री आदिनाथ भगवान से लेकर श्री महावीर स्वामी तक सभी 24 तीर्थंकरों ने समवशरण में धर्म देशना दी। जिसे गणधरों ने ग्रहण कर अपनी स्मरण शक्ति से अनेक शास्त्रों की रचना की है, जो जिनवाणी के रूप में हमें प्राप्त हैं। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने जावद की धर्म सभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि जिन शासन प्रदत्त जैन धर्म में आत्मा को परमात्मा बनाने का मार्ग बताया गया हैं।</p>
<p>जिस प्रकार अंधकार को प्रकाश के माध्यम से दूर किया जाता हैं। उसी प्रकार मोह रूपी अज्ञान धर्म रूपी प्रकाश से दूर करने का देव शास्त्र एवं गुरु मार्ग दिखाते हैं। श्री जिनेंद्र जैन ने बताया कि आचार्य श्री की धर्म देशना के पूर्व मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने प्रवचन में बताया कि संसार के दुखों ओर विषय भोगों से विरक्त होकर दीक्षा ली जाती हैं। इससे ज्ञान और शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। यही निर्वाण का मार्ग है।</p>
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