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	<title>Samadhi Diwas &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>Samadhi Diwas &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>ज्ञान, साहित्य और श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक थे डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक : 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धापूर्वक किया गया स्मरण </title>
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		<pubDate>Sat, 20 Jun 2026 08:03:25 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कोल्हापुर स्थित श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश एवं जैन दर्शन, साहित्य तथा श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। पढ़िए विशेष रिपोर्ट। कोल्हापुर। श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश, धर्म दिवाकर सहितासूरी, जिन आगम एवं श्रमण संस्कृति के परम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कोल्हापुर स्थित श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश एवं जैन दर्शन, साहित्य तथा श्रमण संस्कृति के महान संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। <span style="color: #ff0000">पढ़िए विशेष रिपोर्ट।</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कोल्हापुर</strong>। श्री लक्ष्मीसेनजी जैन मठ के मठाधीश, धर्म दिवाकर सहितासूरी, जिन आगम एवं श्रमण संस्कृति के परम संरक्षक परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक के 7वें समाधि दिवस पर देशभर के श्रद्धालुओं एवं समाजजनों ने उनकी पुण्य स्मृति को श्रद्धापूर्वक नमन किया।</p>
<p><strong>अल्पायु में ग्रहण किया भट्टारक पद</strong></p>
<p>डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने मात्र 23 वर्ष की आयु में भट्टारक पद की दीक्षा ग्रहण की थी। दीक्षा के पश्चात भी उन्होंने शिक्षा का क्रम जारी रखा और हिंदी में प्रवीणता, संस्कृत में काव्यतीर्थ तथा अर्धमागधी एवं प्राकृत में एम.ए. की उपाधियां प्राप्त कीं।</p>
<p><strong>शिक्षा और ज्ञान के प्रति अद्भुत समर्पण</strong></p>
<p>ज्ञानार्जन के प्रति उनकी निष्ठा का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि 75 वर्ष की आयु में उन्होंने शिवाजी विश्वविद्यालय से जैनोलॉजी विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने वाले वे प्रथम भट्टारक के रूप में विख्यात हुए।</p>
<p><strong>जैन साहित्य आंदोलन को दी नई दिशा</strong></p>
<p>सन 1984 से महाराष्ट्र जैन साहित्य परिषद के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने महाराष्ट्र एवं कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में 23 जैन साहित्य सम्मेलनों का सफल आयोजन कराया। उनके नेतृत्व में जैन साहित्य एवं इतिहास के संरक्षण और प्रचार-प्रसार को नई गति मिली।</p>
<p><strong>शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान</strong></p>
<p>श्री लक्ष्मीसेन विद्यापीठ के माध्यम से कोल्हापुर, रामबाण और बेलगांव में अनेक शैक्षणिक संस्थाओं का संचालन किया गया। उन्होंने शिक्षा को समाज निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम माना और जीवनभर इसके लिए कार्य किया।</p>
<p><strong>ग्रंथ लेखन और प्रकाशन में उल्लेखनीय भूमिका</strong></p>
<p>डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने श्री लक्ष्मीसेन दिगंबर जैन ग्रंथमाला प्रकाशन संस्था के माध्यम से 12 महत्वपूर्ण ग्रंथों का लेखन एवं प्रकाशन कराया। साथ ही उन्होंने &#8220;रत्नत्रय&#8221; मासिक पत्रिका का प्रकाशन कर जैन साहित्य को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।</p>
<p><strong>धर्मप्रभावना के लिए देश-विदेश में किया प्रवास</strong></p>
<p>उन्होंने पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सवों, जिनालयों के जीर्णोद्धार, मौंजीबंधन, प्रायश्चित्त संस्कार सहित अनेक धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाई। अहिंसा, पर्यावरण संरक्षण और व्यसनमुक्ति के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने भारत के साथ अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा और नेपाल सहित कई देशों की यात्राएं कीं।</p>
<p><strong>श्रद्धा और प्रेरणा का अमिट स्रोत</strong></p>
<p>तेजस्वी, ओजस्वी और शांत व्यक्तित्व के धनी डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक ने अपना संपूर्ण जीवन धर्म, शिक्षा, समाज सेवा और संस्कृति संरक्षण को समर्पित किया। वे जैन इतिहास, साहित्य और श्रमण संस्कृति के सशक्त प्रेरणास्रोत रहे।</p>
<p><strong>20 जून 2019 को हुए समाधिस्थ</strong></p>
<p>परम पूज्य डॉ. लक्ष्मीसेनजी भट्टारक महास्वामी 20 जून 2019 को प्रातःकाल लगभग 78 वर्ष की आयु में समाधिस्थ हुए थे। उनके द्वारा स्थापित आदर्श, साहित्यिक योगदान और धर्मप्रभावना का कार्य आज भी समाज का मार्गदर्शन कर रहा है।</p>
<p><strong>कोटिशः इच्छामि अर्पित</strong></p>
<p>उनके 7वें समाधि दिवस पर श्रद्धालुओं ने उनकी पुण्य स्मृति को विनम्र नमन करते हुए कोटिशः इच्छामि अर्पित की तथा उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प व्यक्त किया।</p>
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		<title>झुमरी तिलैया में श्रद्धा-भक्ति से मनाया गया आचार्य श्री ज्ञानसागर जी का समाधि स्मृति महोत्सव : मुनि श्री धर्म सागर जी और भाव सागर जी के सानिध्य में गुरु भक्ति, पूजन और प्रवचनों से भक्तिमय बना वातावरण </title>
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		<pubDate>Sun, 17 May 2026 09:47:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[झुमरी तिलैया के बड़े जैन मंदिर में आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महामुनिराज का समाधि स्मृति महोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में गुरु पूजन, दीप प्रज्वलन और मुनि संघ के प्रेरणादायी प्रवचन हुए। पढ़िए झुमरी तिलैया की यह रिपोर्ट&#8230;. झुमरी तिलैया के बड़े जैन मंदिर में शुक्रवार को जैन संत आचार्य [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>झुमरी तिलैया के बड़े जैन मंदिर में आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महामुनिराज का समाधि स्मृति महोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। कार्यक्रम में गुरु पूजन, दीप प्रज्वलन और मुनि संघ के प्रेरणादायी प्रवचन हुए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए झुमरी तिलैया की यह रिपोर्ट&#8230;.</span></strong></p>
<hr />
<p>झुमरी तिलैया के बड़े जैन मंदिर में शुक्रवार को जैन संत आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महामुनिराज का समाधि स्मृति महोत्सव श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। कार्यक्रम पूज्य मुनि श्री 108 धर्म सागर जी महाराज एवं मुनि श्री 108 भाव सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में संपन्न हुआ।</p>
<p><strong>दीप प्रज्वलन और गुरु पूजन</strong></p>
<p>कार्यक्रम की शुरुआत चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र अर्पण के साथ हुई। इसके बाद सुबोध आशा जैन गंगवाल के निर्देशन में संगीतमय गुरु पूजन आयोजित की गई, जिसमें समाजजनों ने भावपूर्ण सहभागिता निभाई।</p>
<p><strong>मुनि श्री ने दिया प्रेरक संदेश</strong></p>
<p>अपने मंगल प्रवचनों में मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज ने कहा कि जो केवल अपने लिए जीते हैं, उनका जीवन सीमित रह जाता है, लेकिन जो दूसरों के कल्याण के साथ आत्मकल्याण करते हैं, उन्हें समाज हमेशा याद रखता है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म केवल जीने की नहीं, बल्कि श्रेष्ठ मृत्यु यानी समाधि की कला भी सिखाता है।</p>
<p><strong>सल्लेखना का महत्व बताया</strong></p>
<p>मुनि श्री 108 भाव सागर जी महाराज ने कहा कि संतजन कषाय और शरीर की सल्लेखना करते हुए मृत्यु को भी महोत्सव बना देते हैं। आत्मकल्याण के लिए सल्लेखना साधना का विशेष महत्व है, जिसमें त्याग, तप और आत्मशुद्धि का मार्ग अपनाया जाता है।</p>
<p><strong>गुरु परंपरा का गौरव</strong></p>
<p>प्रवचनों में यह भी बताया गया कि आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महाराज ने अपने शिष्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज को ऐसा ज्ञान और संस्कार दिए, जिनका नाम और योगदान आज पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।</p>
<p>“गुरु परंपरा की साधना और संस्कार ही समाज को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं।”</p>
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		<title>आचार्य विमलसागरजी के समाधि दिवस पर विनयांजलि अर्पित: आचार्य श्री प्राणी मात्र के प्रति रखते थे कल्याण की भावना  </title>
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		<pubDate>Wed, 17 Dec 2025 03:39:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ आचार्य श्री विमलसागरजी निमित्त ज्ञानी संत थे और उनके हृदय में प्राणी मात्र के प्रति करुणा उदारता और लोक कल्याण की भावना समाहित थी। ये बात मंगलवार को आर्यिका यशस्विनी माताजी ने मंगलवार को दिगंबर जैन तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में आचार्य विमल सागर जी महाराज के 32वें समाधि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ आचार्य श्री विमलसागरजी निमित्त ज्ञानी संत थे और उनके हृदय में प्राणी मात्र के प्रति करुणा उदारता और लोक कल्याण की भावना समाहित थी। ये बात मंगलवार को आर्यिका यशस्विनी माताजी ने मंगलवार को दिगंबर जैन तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में आचार्य विमल सागर जी महाराज के 32वें समाधि दिवस पर उनका पुण्य स्मरण करते हुए कही। <span style="color: #ff0000">इंदौर से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> श्रमण संस्कृति के श्रेष्ठ आचार्य श्री विमलसागरजी निमित्त ज्ञानी संत थे और उनके हृदय में प्राणी मात्र के प्रति करुणा उदारता और लोक कल्याण की भावना समाहित थी। ये बात मंगलवार को आर्यिका यशस्विनी माताजी ने मंगलवार को दिगंबर जैन तीर्थ स्वरूप आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में आचार्य विमल सागर जी महाराज के 32वें समाधि दिवस पर उनका पुण्य स्मरण करते हुए कही। माताजी ने आगे कहा कि आचार्य श्री अनुशासन प्रिय महान तपस्वी थे। उन्होंने अपने साधनारत जीवन में 6 हजार से अधिक उपवास किए एवं उनका समूचा व्यक्तित्व अतिशयपूर्ण करुणा और वात्सल्य से परिपूर्ण था। उनमें बचपन से ही जैन धर्म और णमोकार मंत्र के प्रति अगाध श्रद्धा थी। वे सिद्ध पुरुष होने के साथ-साथ वास्तुविद, प्रतिष्ठाचार्य एवं आयुर्वेद के ज्ञाता भी थे। उन्होंने मंत्रों और सिद्धि के माध्यम से हजारों लोगों के कष्टों और शारीरिक व्याधियों को दूर किया और जैन धर्म की महती प्रभावना की जैन समाज उनके उपकारों को कभी नहीं भूल सकता।</p>
<p>धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि इस अवसर पर आर्यिका मनस्विनी माताजी, प्रद्युम्न पाटनी, भूपेंद्र जैन ने भी आचार्य श्री के संस्मरण सुनाते हुए उन्हें विनयांजलि अर्पित की। धर्मसभा का शुभारंभ आचार्य विमल सागर जी के चित्र के समक्ष डॉ. जैनेंद्र जैन, नीलेश जैन, अतुल जैन, रजनी जैन, सरिता जैन ने दीप प्रज्वलन से किया। संचालन सोनाली बागड़िया ने किया।</p>
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		<title>धर्मसभा में हुए प्रवचन : आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज का समाधि दिवस धूमधाम से मनाया  </title>
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		<pubDate>Fri, 07 Jun 2024 07:31:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का समाधि दिवस आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा, पूजन, विधान हुआ। पढ़िए राजीव सिंघई [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का समाधि दिवस आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा, पूजन, विधान हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुंडलपुर(दमोह)</strong>। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गुरु आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का समाधि दिवस आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रातः पूज्य बड़े बाबा का अभिषेक, शांति धारा, पूजन, विधान हुआ। पूज्य आचार्य श्री ज्ञान सागर जी महाराज, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज,आचार्य श्री समय सागर जी महाराज की भक्ति भाव से पूजा हुई। निर्यापक श्रमण योग सागर जी महाराज द्वारा पूजन का वाचन किया गया। अभय बनगांव द्वारा आचार्य श्री समय सागर जी महाराज को शास्त्र दान किए गए।</p>
<p><strong>नहीं भुला सकते उपकार</strong></p>
<p>इस अवसर पर ज्येष्ठ आर्यिका श्री गुरुमति माताजी ने आचार्य ज्ञान सागर महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज का यह पर्व जीवन में धर्म रूपी शिखर पर कलशारोहण के समान है। जब मंदिर होगा तो उस पर शिखर होगा, शिखर होगा तो उस पर कलशारोहण भी आवश्यक है। जिन महान आत्माओं ने आज तक जिस रत्नात्रय रूपी धर्म को धारण किया है उनके जीवन में वह शिखर का निर्माण हुआ, उन्होंने कलशारोहण किया है। आज उनका 51 वां समाधि दिवस महान पर्व है। एक पर्व ऐसा है जो जो साधक रहेंगे मुक्ति ना हो जावे जब तक पाने की लालसा रहेगी। गुरु नाम गुरु आचार्य ज्ञान सागर जी थे जो ज्ञान देखा जा रहा है उस ज्ञान को देने वाले स्रोत थे। उनके ज्ञान की सुगंधि सारे ब्रह्मांड में सुगंधित हो रही है। एकमात्र श्रेय आचार्य ज्ञान सागर जी को है। आचार्य ज्ञान सागर जी ने अपने जीवन को ही सुभाषित नहीं किया है उन्होंने कई रत्न दिए और कई रत्नत्रय के पुष्प दिए एक पुष्प वह था चैतन्य महाकाव्य जिसका नाम आचार्य विद्यासागर है जिनको आज भी उनके उपकार को भुलाया नहीं जा सकता।</p>
<p><strong>उनके साहित्य पर हुई पीएचडी</strong></p>
<p>इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री अभय सागर जी महाराज ने कहा कि आचार्य भगवंत ज्ञान सागर जी महाराज के जीवन के कुछ प्रसंग जिनसे लोग अनभिज्ञ से हैं ऐसी दो-चार बातें आपके सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं।आचार्य भगवन ज्ञान सागर जी के विषय में भारत शासन से कुछ विशिष्ट कार्य हो एक डाक टिकट जारी करवाने का प्रयास करवाया। एक समस्या खड़ी हुई शासन के रिकॉर्ड अनुसार जन्मदिवस, जन्मस्थान, मृत्यु दिवस, मृत्यु स्थान आवश्यक होता है। जन्म स्थान तो राड़ेली मिल गया, 82 वर्ष उम्र में संल्लेखना हुई होगी। एक पंडित जी से उनकी कुंडली एवं पांचो भाइयों की कुंडली उपलब्ध हुई। तीन भाइयों की कुंडली पंडित भुरामल जी के हाथ की बनी है, मेरे पास उपलब्ध है। 1897 का जन्म था 24 अगस्त 1897 समय 12 बजकर कुछ मिनट पर जन्म हुआ। उन्होंने आचार्य वीर सागर जी के संघस्थ सभी साधुओं को पंडित भूरामल जी ब्रह्मचारी की अवस्था में अध्ययन कराया। संघस्थ साधुओं को विद्या अध्ययन कराते थे। पांच-पांच महाकाव्य का सृजन करने वाले जयोदय महाकाव्य जैसे उत्कृष्ट साहित्य का सृजन करने वाले आचार्य भगवन थे। गंजबासौदा की बहन ने उनके साहित्य पर पीएचडी की है।</p>
<p><strong>मरण का स्वागत करें</strong></p>
<p>इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनिश्री नियम सागर जी महाराज ने बताया कि संल्लेखना मरण का प्रसंग है। संल्लेखना उन जीवों की अनिवार्य आवश्यक विशेष मरण है जिस मरण को वह साधक अपने जीवन को त्याग और तपस्या के मार्ग पर समर्पित करता है। त्याग और तपस्या मय जीवन संल्लेखना मरण के द्वारा सार्थक होता है। मंदिर बनता है समय अपेक्षित होता है, अपेक्षित समय पर ही मंदिर की पूर्णता होती है। जितना समय मंदिर निर्माण के लिए लगता है उतना समय मृत्यु के लिए नहीं लगता। मैं आ रहा हूं कह कर भी आ सकता हूं और कहे बिना भी आ सकता हूं। साधक सावधान होकर मरण का स्वागत करता है। मरण का स्वागत करने के लिए समय लग सकता है और नहीं भी लग सकता है।स्वागत किया मरण कब होगा निश्चित नहीं स्वागत किया इसी वक्त मरण होगा आकस्मिक मरण की घटना घट सकती है। मृत्यु ही मृत्यु को दूर करने का साधन है इसमें कोई संदेह नहीं हम भी वही अवस्था प्राप्त करें जो अरिहंत प्रभु कर रहे हैं। यही उद्देश्य सभी साधक का रहता है। मरण के पांच प्रकार हुआ करते हैं। गुरु को हम याद करते हैं।</p>
<p><strong>मृत्यु महोत्सव मनाने का लाभ</strong></p>
<p>इस अवसर पर निर्यापक श्रमण मुनि श्री योग सागर जी महाराज ने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि आज पावन पर्व है महोत्सव है आज तो मृत्यु महोत्सव है। जिन्होंने अपने जीवन में जिनवाणी की आराधना करते-करते मृत्यु महोत्सव मनाने का लाभ हुआ आचार्य ज्ञान सागर महाराज का समाधि दिवस है। 1968&#8211; 69 में 2 साल उनके चरण वंदन करने चरण रज लगाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आचार्य ज्ञान सागर महाराज प्रवचन करते तो णमोकार मंत्र का मंगलाचरण करते थे। उनके मुख से सुनते सुनते मुझे ज्ञान हुआ और मैं विद्या सरोवर में समा गया। ज्ञान सागर जी महाराज का दर्शन किया आज भी वह दृश्य हमें दिखाई देता है। उनकी कृपा से उनके आशीष से हम लोग यहां आए जिस निधि को उन्होंने प्राप्त किया है उस निधि को हमें भी प्राप्त करना है।</p>
<p style="padding-left: 40px"><strong>शोक न करें</strong></p>
<p>इस अवसर पर आचार्य भगवन श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा जिनके जीवन में वैराग्य के क्षण नहीं आते उसका उपादान बहुत कमजोर है निमित्त मिलने के बाद भी वैराग्य के क्षण मिले। शब्द के माध्यम से अर्थ की गति हो अर्थ से भाव की गति होती जिस ज्ञान बोलते। योग उपादान से ही कार्य संपादित होते। शब्द कुछ नहीं करते ऐसा नहीं किंतु शब्द एकमात्र माध्यम है शब्द के माध्यम से अर्थ को गति मिलती। शोक करने की आवश्यकता नहीं जिसका मरण हुआ उसका जन्म हुआ है किंतु मरण के उपरांत जन्म हो यह निश्चित नहीं। पंडित पंडित मरण है मरण याने विश्राम विराम लग जाता है ।बार-बार जन्म और मरण का जो प्रसंग आता है आज तक संसारी प्राणी का जीवन चल रहा है।आयु समाप्त होते ही आगे भव का उदय होता है। नया जीवन प्रारंभ होता पुराना विस्मृत हो जाता। संवेदन अलग संवेदन वर्तमान का होता है। किंतु अतीत में जो पर्याय होती है ज्ञान का विषय बन सकती है। आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज की 75&#8211;80 की उम्र थी। आकुलता ना करें, साथ-साथ प्रमाद न करें निरंतर पुरुषार्थ शील बने रहें।</p>
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		<title>समाधि दिवस विशेष : दिगंबर मुनि की चर्या से समाज को परिचित कराया प्रशममूर्ति आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216;छाणी&#8217; ने  </title>
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		<pubDate>Thu, 16 May 2024 07:41:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216;छाणी&#8217; ने उत्तर भारत में भ्रमण कर मुनि परंपरा को संरक्षित एवं व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है&#124; यद्यपि आचार्य श्री को दीक्षोपरांत मात्र 22 वर्ष ही धर्म प्रचार हेतु मिले परन्तु जैन मुनि परंपरा में उनका योगदान अत्यंत विशिष्ट है। आपने 1923 से लेकर 1944 के [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216;छाणी&#8217; ने उत्तर भारत में भ्रमण कर मुनि परंपरा को संरक्षित एवं व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है| यद्यपि आचार्य श्री को दीक्षोपरांत मात्र 22 वर्ष ही धर्म प्रचार हेतु मिले परन्तु जैन मुनि परंपरा में उनका योगदान अत्यंत विशिष्ट है। आपने 1923 से लेकर 1944 के मध्य लगभग समस्त उत्तर भारत में दिगम्बर जैन मुनि के रूप में सतत विहार किया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए समीर जैन का विशेष आलेख&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p>परम पूज्य आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216;छाणी&#8217; का जन्म सन 1888 में कार्तिक बदी ग्यारस को राजस्थान प्रान्त के उदयपुर नगर के समीप स्थित छाणी ग्राम में हुआ था। आपने सन 1922 में क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की तथा एक वर्ष पश्चात ही सन 1923 में भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी तदनुसार 23 सितम्बर 1923 को राजस्थान के सागवाड़ा नगर में मुनि दीक्षा अंगीकार कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर आरुढ़ हुए। मुनि रूप में आपने दिगम्बर मुनि की चर्या, उनके मूलगुणों की साधना तथा उनके तपश्चर्या के विविध आयामों से जैन समाज को परिचित करवाया।</p>
<p><strong>सच्चे समाज सुधारक</strong></p>
<p>इस परंपरा के पंचम पट्टाधीश परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्याभूषण सन्मति सागर जी महाराज के प्रमुख शिष्य परम पूज्य आचार्य श्री 108 अतिवीर जी मुनिराज ने पूज्य आचार्य-प्रवर के समाधि दिवस के अवसर पर उनके चरणों में अपनी विनयांजलि अर्पित करते हुए बताया कि आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216;छाणी&#8217; ने उत्तर भारत में भ्रमण कर मुनि परंपरा को संरक्षित एवं व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है| यद्यपि आचार्य श्री को दीक्षोपरांत मात्र 22 वर्ष ही धर्म प्रचार हेतु मिले परन्तु जैन मुनि परंपरा में उनका योगदान अत्यंत विशिष्ट है। आपने 1923 से लेकर 1944 के मध्य लगभग समस्त उत्तर भारत में दिगम्बर जैन मुनि के रूप में सतत विहार किया। आप एक सच्चे समाज सुधारक थे तथा आपने समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का साहसिक प्रयत्न किया। मृत्यु उपरांत छाती पीटने की प्रथा, दहेज़ प्रथा, बलि प्रथा, कन्या विक्रय प्रथा, विधवा स्त्री को काले कपडे़ पहनाने की प्रथा आदि की घोर निंदा की। आपके अहिंसात्मक एवं धर्ममय प्रवचनों के माध्यम से इन कुप्रथाओं पर बंदिश लगी| गिरिडीह (झारखण्ड) प्रवास के दौरान आपके संस्कारित प्रवचनों से प्रभावित होकर एवं आगमोक्त चर्या को देखकर स्थानीय समाज ने सन 1926 में आपको आचार्य पद से सुशोभित किया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-60653" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240516-WA0010.jpg" alt="" width="1000" height="1400" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240516-WA0010.jpg 1000w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240516-WA0010-214x300.jpg 214w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240516-WA0010-731x1024.jpg 731w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240516-WA0010-768x1075.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/05/IMG-20240516-WA0010-990x1386.jpg 990w" sizes="(max-width: 1000px) 100vw, 1000px" />विहार का मार्ग किया प्रशस्त</strong></p>
<p>आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216;छाणी&#8217;, प्रथम ऐसे दिगम्बर मुनिराज थे जिन्होंने उत्तर भारत के नगरों की दूर-दूर तक पदयात्रा करके दिगम्बर साधु के विहार का मार्ग प्रशस्त किया। आपने सन् 1926 में अपने संघ सहित कानपुर, लखनऊ, गोरखपुर, अयोध्या और बनारस आदि प्रमुख नगरों में धर्मप्रभावना करते हुए शाश्वत तीर्थाधिराज श्री सम्मेद शिखर जी की ओर मंगल विहार किया था। इस अभूतपूर्व यात्रा घटनाक्रम के विषय में आचार्य श्री की जीवन-परिचय पुस्तिका में उद्धृत है कि &#8220;मुनिसंघ के आगमन का समाचार सुनकर बीसपंथी कोठी के मुनीम तथा हजारीबाग के जैन श्रावक शिखरजी से हाथी लेकर मुनिसंघ की अगवानी के लिए उनके पास आये और कहने लगे कि प्रभावना के निमित्त से हम हाथी लाये हैं क्योंकि पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों के बीच अभी तक कोई मुनिराज यहां नहीं पधारे।</p>
<p><strong>समता और समन्वय का पाठ पढ़ाया </strong></p>
<p>राजस्थान के ब्यावर में इस युग के दो महान आचार्य &#8211; चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216; दक्षिण&#8217; एवं प्रशममूर्ति आचार्य श्री 108 शान्ति सागर जी महाराज &#8216;छाणी&#8217; का वर्षायोग एक साथ सानंद संपन्न हुआ। दोनों अभ्रथ संतों ने समत्व की अभूतपूर्व साधना की। दोनों आचार्यों ने समता और समन्वय का पाठ पढ़ाया एवं जन-जन को संस्कारित किया| बिना किसी पंथ भेद के, बिना किसी विभाव के &#8211; सिर्फ और सिर्फ सद्भाव| आपके धर्मप्रेरक उपदेशों से प्रभावित होकर समाज ने अनेक विद्यालय, धर्मपाठशालाओं, वाचनालय, साधना आश्रम तथा साहित्य प्रकाशक संस्थाओं की स्थापना की।</p>
<p><strong>राजस्थान में समाधि</strong></p>
<p>सन 1944 में ज्येष्ठ बदी दशमी तदनुसार दिनांक 17 मई 1944 को राजस्थान के सागवाड़ा नगर में समाधिपूर्वक मरण कर इस नश्वर देह का त्याग किया| पूज्य आचार्य श्री का जितना विशाल एवं अगाध व्यक्तित्व था, उनका कृतित्व उससे भी अधिक विशाल था। आचार्य श्री के कर-कमलों द्वारा अनेक भव्य जीवों ने जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार कर अपना जीवन धन्य किया। इस गौरवशाली महान परम्परा में वर्तमान में सहस्त्राधिक दिगम्बर साधु समस्त भारतवर्ष में धर्मप्रभावना कर रहे हैं तथा भगवान महावीर के संदेशों को जनमानस तक पहुंचा रहे हैं।</p>
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		<title>आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज का रहा सानिध्य : आचार्य विमल सागर जी का 19वां समाधि दिवस मनाया </title>
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		<pubDate>Sun, 31 Dec 2023 11:46:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य 108 श्री विमल सागर महाराज का समाधि दिवस स्थानीय बीस पंथी श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में धूमधाम से आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य में मनाया गया। पढ़िए संजीव जैन संजीवनी की रिपोर्ट&#8230; इंदौर। वात्सल्य वरिधि, निमित्त ज्ञानी आचार्य 108 श्री विमल सागर महाराज का समाधि दिवस स्थानीय बीस पंथी श्री [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य 108 श्री विमल सागर महाराज का समाधि दिवस स्थानीय बीस पंथी श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में धूमधाम से आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य में मनाया गया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए संजीव जैन संजीवनी की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> वात्सल्य वरिधि, निमित्त ज्ञानी आचार्य 108 श्री विमल सागर महाराज का समाधि दिवस स्थानीय बीस पंथी श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में धूमधाम से आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज के सानिध्य में मनाया गया। इस अवसर पर शांतिनाथ भगवान का पंचामृत अभिषेक एवं आचार्य श्री की पूजन अर्चना की गई।</p>
<p>समाधि दिवस के अवसर पर सैकड़ों भक्तजन कार्यक्रम में उपस्थित रहे। भजन गायक पंकज जैन द्वारा आचार्य श्री की आराधना स्तुति प्रस्तुत की। इस कार्यक्रम के प्रमुख आयोजन लाभार्थी अशोक कुमार अशर्फी लाल परिवार रहा। सभी उपस्थित भक्त जनों में प्रभावना बांटी गई। इस अवसर पर समाज के हेमंत दोषी, राजेश पांड्या, कमल जैन, अर्पित जैन वाणी, गायक मयूर जैन, स्मिता जैन, चंद्रकला जैन एवं प्रबुद्ध जन महिला एवं पुरुष उपस्थित रहे।</p>
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		<title>आचार्य श्री धर्म सागर का 36वां समाधि दिवस श्रद्धा व भक्तिपूर्वक मनाया गया: आचार्य श्री वर्धमान सागर ने केश लोचन किया  </title>
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		<pubDate>Fri, 14 Apr 2023 15:47:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री धर्म सागर का 36 वां समाधि दिवस आचार्य संघ के सानिध्य में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान आचार्य श्री के गुणों से भी समाजजनों को अवगत कराया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230; उदयपुर। आचार्य श्री धर्म सागर का 36 वां समाधि दिवस आचार्य संघ के सानिध्य में श्रद्धा और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री धर्म सागर का 36 वां समाधि दिवस आचार्य संघ के सानिध्य में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान आचार्य श्री के गुणों से भी समाजजनों को अवगत कराया। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>उदयपुर।</strong> आचार्य श्री धर्म सागर का 36 वां समाधि दिवस आचार्य संघ के सानिध्य में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस दौरान बताया गया कि आचार्य श्री धर्म सागर ने भक्ति आराधना को हृदय में विराजमान कर लिया था। 12 वर्ष की सल्लेखना साधना को महज 4 महीने में क्रमशः पूर्ण किया। सन 1969 में दीक्षित शिष्य आचार्य श्री वर्धमान सागर ने आचार्य धर्म सागर विधान में अज्ञात सल्लेख्ना साधना अध्य का उच्चारण करते हुए देशना दी।</p>
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<p><strong>आचार्य श्री के गुणों से अवगत कराया</strong></p>
<p>आचार्य श्री धर्म सागर का गुणानुवाद करते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर ने बताया कि आचार्य श्री धर्म सागर सीकर में एक माह से अधिक नहीं रुके। एक माह पूर्ण होने के पूर्व निकटवर्ती नगर के बाहर चले जाते थे वहीं रात्रि विश्राम कर अगले दिन का आहार वही लेकर पुनः सीकर में आते थे । इस प्रकार स्वास्थ्य कमजोर होने के बावजूद अपने नियमों के प्रति सजग रहे। आज आचार्य धर्म सागर विधान का आयोजन आचार्य श्री संघ सानिध्य में किया गया जिसमें उपवास के बावजूद आचार्य वर्धमान सागर जी ने सभी मंत्रों अध्य का उच्चारण किया और बीच-बीच में आचार्य श्री के गुणों को स्मरण कर समाज को अवगत कराया। आचार्य श्री ने बताया कि आचार्य श्री धर्म सागर दीक्षा के पूर्व गृहस्थ अवस्था में भी निस्पृह रहते थे। इंदौर में कपड़े की गठरी रख कर व्यापार किया मात्र केवल एक रुपए का मुनाफा होने पर व्यापार बंद कर वापस आ जाते थे। संघ के अन्य साधुओं ने भी अपनी भावांजलि प्रगट की।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-42211" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025.jpg" alt="" width="1599" height="899" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025.jpg 1599w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-300x168.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-1024x576.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-768x432.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-1536x864.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-990x557.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-1320x742.jpg 1320w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-470x264.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-640x360.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-215x120.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/04/IMG-20230414-WA0025-414x232.jpg 414w" sizes="(max-width: 1599px) 100vw, 1599px" /></p>
<p><strong>चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट करने को आतुर दिखे समाजजन </strong></p>
<p>विधान का वाचन मुनि श्री हितेंद्र सागर ने किया। आज के विधान में केशव नगर,आयड, प्रेम नगर, न्यू केशव नगर विभिन्न सेक्टरों की समाज ने पूजन में भाग लिया। जब से आचार्य श्री का उदयपुर आगमन हुआ है। प्रतिदिन अनेक नगरों के समाज चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट कर निवेदन कर रहे हैं। शुक्रवार को केशरिया जी के सैकड़ों श्रावक श्राविकाओं ने पंच कल्याणक व चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट किया। आज सुबह आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केश लोचन किया।</p>
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<p><strong>निर्मोहता के साथ बीता आचार्य श्री का प्राथमिक जीवन </strong></p>
<p>गंभीरा राजस्थान में पौष शुक्ला पूर्णिमा 12 जनवरी सन 1914 में 1008 श्री धर्म नाथ भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक दिवस पर उमराव देवी व बख्तावर मल के पुत्र चिरंजीलाल जी का प्राथमिक जीवन संघर्ष तथा निर्मोहता के साथ बिता। 30 वर्ष की उम्र मेंचैत्र कृष्णा 7 संवत 2000 को क्षुल्लक दीक्षा तथा तथा फुलेरा पंच कल्याणक में विक्रम संवत 2008 को ऐलक दीक्षा ली। 38 वर्ष की उम्र में कार्तिक शुक्ला 14 विक्रम संवत 2008 को उन्होंने आचार्य श्री वीर सागर जी से फुलेरा चातुर्मास में मुनि दीक्षा ली। संयोग देखिए कि श्री धर्म नाथ भगवान के कल्याणक दिवस पर जन्मे चिरंजीलाल जी का मुनि दीक्षा बाद नाम भी मुनि श्री धर्म सागर किया गया।</p>
<p>सन 1969 में आप द्वितीय पट्टाधीश आचार्य श्री शिव सागर जी की समाधि के बाद 24 फरवरी 1969 को तृतीय पट्टाधीश बनाए गए। आचार्य बनने पर उसी दिन 11 भव्य जीवों को दीक्षा दी। साधु जीवन के 43 वर्षो में आपने 76 दीक्षा दी जिसमें पंचम पट्टाधीश आचार्यश्री वर्धमान सागर जी आर्यिका श्री शुभ मति माताजी सहित वर्तमान में 7 शिष्य एवं शिष्या धर्म प्रभावना कर रहे हैं। वर्ष 2023 में यह उनका 36वां समाधि वर्ष है। वैशाख कृष्ण नवमी 22 अप्रैल सन 1987 में उनकी समाधि 1008 श्री मुनिसुब्रत नाथ भगवान के केवल ज्ञान कल्याणक के दिन सीकर में हुई।</p>
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