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	<title>Sagar  श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>सेवानिवृत शिक्षक स्वरूपचंद्र को नम आंखों से अंतिम विदाई : अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में समाजजन हुए शामिल, अर्पित की श्रद्धांजलि  </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Feb 2026 13:45:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[समीपस्थ ग्राम मडदेवरा निवासी 80 वर्षीय वरिष्ठ समाजसेवी, सेवानिवृत्ति शिक्षक स्वरूपचंद्र जैन का सोमवार को देव शास्त्र गुरु का स्मरण करते हुए आकस्मिक देह परिवर्तन होने से मडदेवरा, शाहगढ़, सागर, बकस्वाहा क्षेत्र ही नहीं अपितु संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र के समाजजनों में शोक की लहर व्याप्त हो गई। बकस्वाहा से पढ़िए, रत्नेश जैन रागी की यह [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>समीपस्थ ग्राम मडदेवरा निवासी 80 वर्षीय वरिष्ठ समाजसेवी, सेवानिवृत्ति शिक्षक स्वरूपचंद्र जैन का सोमवार को देव शास्त्र गुरु का स्मरण करते हुए आकस्मिक देह परिवर्तन होने से मडदेवरा, शाहगढ़, सागर, बकस्वाहा क्षेत्र ही नहीं अपितु संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र के समाजजनों में शोक की लहर व्याप्त हो गई। <span style="color: #ff0000">बकस्वाहा से पढ़िए, रत्नेश जैन रागी की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>बकस्वाहा</strong>। समीपस्थ ग्राम मडदेवरा निवासी 80 वर्षीय वरिष्ठ समाजसेवी, सेवानिवृत्ति शिक्षक स्वरूपचंद्र जैन का सोमवार को देव शास्त्र गुरु का स्मरण करते हुए आकस्मिक देह परिवर्तन होने से मडदेवरा, शाहगढ़, सागर, बकस्वाहा क्षेत्र ही नहीं अपितु संपूर्ण बुंदेलखंड क्षेत्र के समाजजनों में शोक की लहर व्याप्त हो गई। पिछले वर्ष से वह क्षमासागर छात्रावास अंकुर एक्टेंशन मकरोनिया सागर में अपने पुत्रों सुमतिप्रकाश और अनुपम परिवार के साथ रह रहे थे। जहां पर देह परिवर्तन होने पर रजाखेड़ी सागर मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार किया गया।उनके पुत्रों ने मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार किया। उनके अंतिम संस्कार में हजारों जनप्रतिनिधि, समाजसेवी, अनेक संस्थाओं के पदाधिकारी सदस्य, महानुभावों ने नम आंखों से भावपूर्ण अंतिम विदाई देकर श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
<p><strong>तीर्थ विकास में उनका था अग्रणी योगदान </strong></p>
<p>स्वरूपचंद्र जैन मडदेवरा के निकटवर्ती नगर शाहगढ़ के शासकीय हायर सेकंडरी स्कूल में शिक्षक के रूप में समर्पित सेवा, धर्म प्रभावना, तीर्थों के विकास में अग्रणी, देव शास्त्र गुरु के प्रति समर्पित, सहज सरल वात्सल स्नेह हंसमुख मिलनसार व्यक्तित्व के कारण लोगों के हृदय में स्थान बनाए हुए थे। मडदेवरा जैन मंदिर, जैन समाज के अध्यक्ष के साथ ही जैन तीर्थ नैनागिरि की प्रबंध समिति के लंबे समय से सदस्य के रूप में अपनी समर्पित सेवाएं देकर तीर्थ विकास में अग्रणी योगदान दे रहे थे। नैनागिरि, द्रोणगिरि तीर्थ ही नहीं अनेक तीर्थों तथा जिनालयों के विकास के लिए समर्पित अग्रणी, सबके प्रति सम्मान और सहयोग की भावना रखने वाले गंभीर व्यक्तित्व के धनी का आकस्मिक देह परिवर्तन से सबका मन विचलित हो गया। आप राजेंद्रकुमार, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त सेवानिवृत प्रधान अध्यापक अजित कुमार के भाई तथा सुरेशचंद्र और राजेश रागी के चचेरे भाई एवं प्राचार्य सुमतिप्रकाश, अरविंदकुमार, शिक्षक अनुपम, अभिनंदन जैन के पिताजी तथा अक्षय, अभय के बड़े पापा एवं संयुक्त कलेक्टर आयुषी जैन के बड़े ससुर थे।</p>
<p><strong>इन्होंने श्रद्धांजलि अर्पित की </strong></p>
<p>स्वरूपचंद्र जैन के दुःखद देह परिवर्तन पर प्रतिष्ठाचार्य पं सनत कुमार, विनोद कुमार रजवांस, सुरेश जैन आईएएस, न्यायमूर्ति विमला जैन, संतोषकुमार जैन घड़ी, कपिल मलैया, महेंद्र बड़ागांव, देवेंद्र लुहारी, डॉ. सुमतिप्रकाश जैन सेनि प्रोफेसर छतरपुर, वरिष्ठ पत्रकार सनत जैन, पवन घुवारा, सुनील घुवारा, सनत कुटौरा, पं अशोक बम्हौरी, आलोक दाऊ, शील डेवडिया, प्रमोद पाटनी, निर्मल बारों, हीरालाल बैंक, सुरेश सिंघई सुनवाहा, सुशील मोदी सहित जैन तीर्थ नैनागिरि, द्रोणगिरि के साथ ही बुंदेलखंड के अनेक तीर्थ , संस्थाओं के पदाधिकारी व सदस्य तथा जनप्रतिनिधि, समाजसेवियों ने श्रद्धांजलि प्रेषित करते हुए शोक संतप्त परिवार को इस अपार दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करने की भगवान से प्रार्थना की है।</p>
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		<title>जो कुछ भी तुम करते हो, उसका शगुन धर्म से कर लिया करोः निर्यापक मुनिपुंगव सुधासागरजी महाराज </title>
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		<pubDate>Thu, 02 Jan 2025 13:47:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अंजुली के जल के समान जीवन प्रतिक्षण खाली हो रहा है, जो हमारे हाथ से निकल गया, उस पर हमारा कोई अधिकार नही है, जो हमारे पास बचा है वही हमारे हाथ मे है। 2025 अब आया नही है, जा रहा है। सूर्य उगता है एक सेकेंड के लिए, उसके बाद तो प्रभात काल जा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>अंजुली के जल के समान जीवन प्रतिक्षण खाली हो रहा है, जो हमारे हाथ से निकल गया, उस पर हमारा कोई अधिकार नही है, जो हमारे पास बचा है वही हमारे हाथ मे है। 2025 अब आया नही है, जा रहा है। सूर्य उगता है एक सेकेंड के लिए, उसके बाद तो प्रभात काल जा रहा है। ये कहना हैं मुनिपुंगव सुधासागरजी महाराज का। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की पूरी खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>2025 अब आया नही है, जा रहा है </strong></p>
<p>अपन समझते हैं कि हम उम्र में बड़े हो रहे हैं लेकिन सत्य यह है कि प्रतिदिन उम्र में छोटे हो रहे हैं। अंजुली के जल के समान जीवन प्रतिक्षण खाली हो रहा है, जो हमारे हाथ से निकल गया, उस पर हमारा कोई अधिकार नही है, जो हमारे पास बचा है वही हमारे हाथ मे है। 2025 अब आया नही है, जा रहा है। सूर्य उगता है एक सेकेंड के लिए, उसके बाद तो प्रभात काल जा रहा है। उजाला जाता हुआ दिखता है, रात्रि आते हुई दिखती है।</p>
<p><strong>ब्रह्ममुहूर्त का महत्व बताया</strong></p>
<p>निर्यापक मुनिपुंगव सुधासागरजी महाराज कहते हैं-क्यों बदलते है 24 घण्टे में ये मुहूर्त, ये संकेत है हमारे भविष्य के निर्णायकों होते है, हम उन क्षणों में कैसे जी पाये। ब्रह्ममुहूर्त क्यों कहा जाता है, कुछ नही 24 घण्टे तो घण्टे है लेकिन हमें कहा जाता है कि प्रातः काल होने वाला है, ये एक मुहूर्त तुम कैसे व्यतीत करोगे, वही तुम्हारे दिन का निर्णय, भविष्यवाणी होगी। वह प्रभु का मुहूर्त क्यों कहा, ब्रह्म शब्द का अर्थ होता है निर्माता, बनाने वाला, तो पूरा हमारा दिनभर शुभ होगा, उसको बनाने वाला होता है ब्रह्ममुहूर्त क्योंकि इससे तुम्हारे दिन का निर्माण होगा, तुम्हारे दिन की उपलब्धि होगी। इसका निर्माता है ब्रह्ममुहूर्त। अब वो मुहूर्त तुमने कैसे निकाला जागते हुए या सोते हुए, अच्छा करते हुए या बुरा करते हुए निकाला।</p>
<p><strong>शेष तुम्हारी किस्मत सँभाल लेगी </strong></p>
<p>महाराजजी आगे विस्तारपूर्वक अपने प्रवचन में कहते है-24 घण्टे तुम क्या करते हो इसकी चर्चा नहीं की, बस तुम ब्रह्ममुहूर्त संभाल लेना, बाकी तुम्हारी किस्मत सँभाल लेगी। जैनधर्म मे तो स्पष्ट कहा कि ब्रह्ममुहूर्त को मत जाने देना, ब्रह्ममुहूर्त को मत सोना, ब्रह्ममुहूर्त को मत खोना। हम साधुओ के लिए भी विशेष उपाधि, विशेष रूप दे दिया। इसी प्रकार से तुम्हारा जन्मदिन आता है, वो क्यों कहा जाता है कि अच्छे से मनाओ क्योंकि जैसा तुम्हारा पहला दिन जैसा गुजरा है वही जिंदगी का निर्णय है। क्यों मनाया गया नया साल, तुमने एक जनवरी को किस रूप में बिताया, सालभर वैसे ही निकलेगा।</p>
<p><strong>तूफानों से आँख मिलाना सीखो, सैलाबों से प्यार करना </strong></p>
<p>तूफानों से आँख मिलाना सीखो, सैलाबों से प्यार करना सीखो, मल्लाहो के भरोसे मत बैठो, अपने हाथों से तैरना सीखो। परिस्थिति नहीं है तो उनसे आँख मिलाओ पर कभी ऐसी परिस्थिति आ जाए सैलाब की, उनसे प्यार करना सीखों, परिस्थितियों से भागो मत, परिस्थितियों का सामना करो और तैरकर पार करो, इस संसार को। कोई भी प्रारंभ हो शुभ करना चाहिए, रोटी भी खाओ, खाने के पहले रोटी को शुभ में लगाना चाहिए।</p>
<p><strong>आहार दान करों</strong></p>
<p>क्यों आहार के पहले आहार दान को कहा जाता है, आहार दान नहीं मिला तो भावना करने को कहा जाता है। क्यों पहली रोटी गाय की कही जाती, दूसरी तीसरी खिला दो, नही वो रोटी तुम्हे सिद्धि का कारण नही बनेगी, अन्नपूर्णा, शगुन नही बनेगी। पहली रोटी बनाई तो महिला को भाव आना चाहिए कि पहली रोटी पेट में नहीं, धर्म में, दान में जाएगी। रोटी, दवाई खाना मजबूरी है लेकिन जब रोटी, वही दवाई किसी दूसरे को दे देता है और तो पुण्यबन्ध का कारण बन जाती है।</p>
<p><strong>पहला दिन सालभर के लिए शगुन है </strong></p>
<p>जन्म का जो पहले दिन हो उसमें कोई पाप मत करना, कोई अशुभ कार्य मत करना, बुरा मत देखना, बुरा मत सोचना क्योंकि वो पहला दिन तुम्हारे सालभर के लिए शगुन है। उस जन्म के दिन अच्छे कार्य करो अच्छे स्थान पर जाओ, एक दिन के धर्म करने से तुम धर्मात्मा नहीं बन जाओगे लेकिन एक दिन के धर्म करने से तुम्हारा साल भर सुरक्षित हो जाएगा। ऐसे ही तुम धन कमाते हो लेकिन बचा हुआ धन नहीं देना, बचा हुआ धन देने से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन वह तुम्हें सिद्धि का कारण नहीं बनेगा इसलिए धन का भोग करने के पहले संकल्प करना चाहिए कि जब तक मैं अपनी कमाई से कोई शुभ कार्य नहीं कर लूंगा तब तक मैं धन का उपयोग नहीं करूँगा। उस धन से जो बाद में तुम जो कुछ कार्य भी करोगे उससे तुम्हें सफलता मिलेगी।</p>
<p><strong>पुण्य की कहानी छुपी है</strong></p>
<p>निर्यापक मुनिपुंगव सुधासागरजी महाराज आगे कहते हैं-महानुभावों कुछ भी तुम्हें मिलता है उसके पीछे कोई न कोई पुण्य की कहानी छुपी रहती है, तुम्हारी आंख में ज्योति है जरूर तुमने किसी एकाध अजीव को बचाया होगा। कभी भगवान का दर्शन करके तुम्हारे मन में आनंद आया होगा। कान अच्छे मिले, जरूर तुमने किसी दुखिया की बात सुनकर कानों का उपयोग किया होगा। दो शब्द बोलने की ताकत है, कभी तुमने अपने मुख से किसी को दो शब्द सुनाएं होंगे।</p>
<p><strong>प्रारंभ 9 बार णमोकार मंत्र से करना </strong></p>
<p>तुम्हारी जितनी भी इच्छाये है वो सब पूरी हो जाएगी, गुरु कहते हैं कि हमने जो कुछ मांगा मैं उसकी सफलता का आशीर्वाद देता हूँ लेकिन ध्यान रखना उसके बाद या तो सब छोड़ देना है या जो कुछ होगा उसको धर्ममय व्यतीत करना है, संकल्प करते ही गुरु उसे तथास्तु कह देते है। जो कुछ भी तुम करते हो उसका शगुन धर्म से कर लिया करो। जिंदगी की, दिन की, साल की, धन, रोटी, कपड़े जो तुम्हारी जिंदगी में आये उसकी शुरुआत धर्म से करना, सुबह की शुरुआत 9 बार णमोकार मंत्र से करना। कपड़ों की शुरुआत करो पहली बार कपड़े पहनकर के मैं 9 बार णमोकार मंत्र पढूँगा, मैं मंदिर जाऊँगा। गाड़ी ली है, सबसे पहले मैं किसी तीर्थ पर जाऊंगा। पहले पूजा करूंगा बाद में भोजन करूंगा। यह कहकर निर्यापक मुनिपुंगव सुधासागरजी अपना प्रवचन समाप्त करते है।</p>
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		<title>वैश्य महासम्मेलन जिला बैठक एवं कैलेंडर विमोचन कार्यक्रम संपन्न :  विभिन्न आवश्यक मुद्दों पर विचार किया गया </title>
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		<pubDate>Thu, 19 Dec 2024 13:02:23 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नगर गढ़ाकोटा में वैश्य महासम्मेलन जिला स्तरीय बैठक का आयोजन संपन्न हुआ। जिसमें विभिन्न आवश्यक मुद्दों पर विचार किया गया एवं वैश्य महासम्मेलन के वार्षिक कैलेंडर का विमोचन किया गया। पढ़िए मनीष विद्यार्थी सागर की एक रिपोर्ट&#8230; सागर। नगर गढ़ाकोटा में वैश्य महासम्मेलन जिला स्तरीय बैठक का आयोजन संपन्न हुआ। जिसमें विभिन्न आवश्यक मुद्दों पर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>नगर गढ़ाकोटा में वैश्य महासम्मेलन जिला स्तरीय बैठक का आयोजन संपन्न हुआ। जिसमें विभिन्न आवश्यक मुद्दों पर विचार किया गया एवं वैश्य महासम्मेलन के वार्षिक कैलेंडर का विमोचन किया गया।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए मनीष विद्यार्थी सागर की एक रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> नगर गढ़ाकोटा में वैश्य महासम्मेलन जिला स्तरीय बैठक का आयोजन संपन्न हुआ। जिसमें विभिन्न आवश्यक मुद्दों पर विचार किया गया एवं वैश्य महासम्मेलन के वार्षिक कैलेंडर का विमोचन किया गया। इस अवसर पर वैश्य महासम्मेलन के संगठन जिला शाहगढ़ की बैठक गढ़ाकोटा में संपन्न हुई। जिसमें रहली, गढ़ाकोटा, देवरी केसली, बंडा, शाहगढ़ आदि तहसीलों के पदाधिकारी, सागर जिला एवं संभाग और प्रदेश पदाधिकारी भी सहभागी हुए। इस अवसर पर बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में प्रदेश महामंत्री निकेश गुप्ता जी एवं संभागीय अध्यक्ष गिरजेश सोनी जी उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथि शाहगढ़ जिला प्रभारी कमल जी एवं जिला अध्यक्ष निक्की ब्रजपुरिया और जिला महिला अध्यक्ष श्रीमती प्रीति पटवारी जी, मनीष विद्यार्थी जिला महामंत्री, नीरज जैन तहसील अध्यक्ष देवरी रहे। गढ़ाकोटा तहसील संयोजक प्रदीप चौदह, तहसील अध्यक्ष रविंद्र जैन उमरा, मुख्य सलाहकार राजेंद्र प्रसाद अग्रवाल एवं बैठक में पधारे सभी अतिथियों का स्वागत गढ़ाकोटा तहसील की ओर से राघव नेमा, वरुण सोनी जिला अध्यक्ष युवा इकाई शाहगढ, सपन अग्रवाल, श्रीराम साहू पत्रकार द्वारा किया गया।</p>
<p><strong>आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा पर भी विचार-विमर्श किया गया</strong><br />
बैठक में संगठन के विस्तार एवं आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा पर विचार-विमर्श किया गया। जिसमें आगामी 5 जनवरी को गढ़ाकोटा में एक वृहद कार्यक्रम की रूपरेखा पर विचार किया गया। जिसमें सभी की सहमति से रूपरेखा और आयोजन पर विचार विमर्श किया गया। इस अवसर पर वैश्य महासम्मेलन के वार्षिक कार्यक्रमों की जानकारी प्रदान की गई और वार्षिक कैलेंडर का विमोचन समस्त पदाधिकारी सदस्यों द्वारा किया गया। समापन कार्यक्रम के अवसर पर वरुण सोनी द्वारा सभी का आभार व्यक्त किया गया।</p>
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		<title>विजाति और विधर्मी विवाह आगम सम्मत नहीं है- निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराजः महाराज के प्रवचनों को सुनने के लिए जिन समुदाय में उल्लास का माहौल </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/extra_casteand_heterodox_marriages_are_not_acceptable_nirayapk_munipungav_shri_sudhasagar_ji_maharaj/</link>
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		<pubDate>Thu, 28 Nov 2024 13:27:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सागर में विराजित मुनिश्री सुधा सागर जी महाराज ने प्रबोधन में जीवन के कई पहलुओं पर ध्यान आकर्षित किया। उनके प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230; सागर। तुम जैन हो इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि तुम्हारे बाप जैन थे। जैन तुम्हें [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सागर में विराजित मुनिश्री सुधा सागर जी महाराज ने प्रबोधन में जीवन के कई पहलुओं पर ध्यान आकर्षित किया। उनके प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। <span style="color: #ff0000">पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> तुम जैन हो इसमें कोई संदेह नहीं क्योंकि तुम्हारे बाप जैन थे। जैन तुम्हें बलदियत में मिला है क्योंकि, जैन शब्द जातिवाचक हो गया, गुणवाचक नहीं रहा। पहले जितनी भी जातियां थी वे वर्ण या कर्म के आधार पर थी। एक घर में क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तीनों पाए जा सकते हैं, एक भाई क्षत्रिय है, एक भाई व्यापार कर रहा है तो वैश्य है और एक भाई शिल्प का काम कर रहा है तो शुद्र है। इसलिए ऋषभदेव ने यह वर्ण की व्यवस्था कर्म के आधार पर की थी। जो जैसा कर्म करेगा वो वो है, भाई या रिश्तेदार से मतलब नहीं है। यह प्रबोधन सागर में विराजित निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा में दिए।</p>
<p><strong>सभी</strong> <strong>को 72 कलाएं आनी चाहिए</strong></p>
<p>जितनी 72 कलाएं हैं यह सब क्षत्रिय कर सकता है, राजा या रानी कोई भी हो सबको ये 72 कलाएं आना चाहिए। जिनको इनका ज्ञान नहीं है उनको गृहस्थ होने का अधिकार नहीं है। ऋषभदेव कहते है यदि आपको 72 कलाओं का ज्ञान नहीं है तो आपकी गृहस्थी संकट में पड़ेगी। आप से और अपने बच्चों को भी 72 कलाओं का ज्ञान करवाओ। आज की शिक्षा एकांकी है यदि सफल हो गए तो ऊंचाई पर पहुंचोगे और असफल हो गये तो बेरोजगार बनोगे। आपको बर्तन बनाने, कपड़े सिलने, जूते बनाने, झाड़ू लगाना, गंदगी साफ करना भी आना चाहिए। आपको जुआ खेलना, चोरी करना भी आना चाहिए, आपको संगीत, नाचना भी आना चाहिए, ये बहुत काम की चीजें है। ये जिंदगी के बहुत बड़े रहस्य है।</p>
<p><strong>कला को अपनी आजीविका का साधन बना लो</strong></p>
<p>अपराध शास्त्र जो व्यक्ति नहीं जानता है, उसकी जिंदगी का बहुत बड़ा शोषण होगा, चोर तुम्हारे यहां चोरी करते रहेंगे और तुम लूटते रहोगे इसलिए तुम्हें ज्ञान होना चाहिए चोरी कैसे की जाती है, जुआ कैसे खेला जाता है, ये सब शास्त्र है। रामचंद्र जी को गुरु ने बर्तन बनाना सिखाया था, बर्तन बनाना तो कुम्हार का काम है। अब यहां पर आपको सीखना बस है, लेकिन आप जिस कला को अपनी आजीविका का साधन बना लेंगे तो वहीं से वर्ण व्यवस्था चालू हो जाएगी। आपने चोरी को आजीविका का साधन बना लिया तो आप डाकू कहलाएंगे। ऋषभदेव ने चोर कला, चोरी करने के लिए नहीं, चोरों से सावधान रहने के लिए सिखाइर्, क्योंकि जब तक अपराधी की कल नहीं जानेंगे, अपराधी तक पहुंच नहीं पाएंगे।</p>
<p><strong>धर्मराज को दासता का अनुभव करना पड़ा</strong></p>
<p>पुरुषों को स्त्री बनना भी आना चाहिए। यहां तक की हिजड़ा बना भी आना चाहिए क्योंकि, अर्जुन ने अज्ञातवास में इसी तरह अपनी रक्षा की थी। किसी की दासता करना भी आना चाहिए क्योंकि, धर्मराज को दासता का अनुभव करना पड़ा। तुम्हें भीख मांगना भी आना चाहिए क्योंकि, यह दुनिया है यहां कुछ भी हो सकता है। 72 कलाएं जिनके पास होती हैं वे कभी भूखो नहीं मर सकते, चाहे भली उन्हें देश निकाला दे दो। श्रीराम को झोपड़ी बनाना नहीं आता तो पेड़ के नीचे बैठे-बैठे क्या होता। नाच गान आपको सीखना है लेकिन नाच गान से आजीविका मत चलाना, आप शुद्र की कोटि में चले जाएंगे।</p>
<p><strong>यदि शुद्र की कन्या आएगी तो तुम्हारे रिश्तेदार की कन्या है</strong></p>
<p>जिसको जूता चप्पल बनाना आता है उससे साधु आहार ले सकते हैं लेकिन, आजीविका नहीं होना चाहिए। जूत्ते चप्पल की दुकान वाला न तो अभिषेक कर सकता है और न ही आहार दे सकता है, उसके लिए वही नियम होंगे जो शुद्र पर होते हैं क्योंकि, वह उससे आजीविका कर रहा है। शास्त्रों में 72 कलाएं लिखी हैं। 72 आजीविका के साधन नहीं लिखे। आजीविका के कारण वर्तमान में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र के भेद किए गए। यदि शुद्र की कन्या आएगी तो तुम्हारे रिश्तेदार की कन्या है, उसको हम पुनः व्यापार छुड़ायेंगे, आप इस आजीविका से कमाया हुआ धन नहीं खाओगे, पीहर में पानी भी नही पियेंगे क्योंकि, अब आप क्षत्रिय कुल में आ चुके हैं, अब वो साधु को आहार दे सकती है। पिता का संबंध तो रहेगा लेकिन आजीविका का संबंध टूट जाएगा, खान पान छूट जाएगा। वहां का दाना भी ग्रहण नहीं करेगी, रिश्तेदारी का व्यवहार भी नही लेगी क्योंकि, उसी कमाई से आएगा।</p>
<p><strong>&#8230;तो नियम से मिथ्यात्व की कोटि में ही आएगा</strong></p>
<p>वर्तमान में जाति व्यवस्था अलग हो गई तो धर्म भी अलग होगा, गुरु भी अलग होगा, आचार विचार भी अलग होगा। आज जातिगत बंटवारा होने से जाति का संबंध जाति में ही बनेगा, विवर्ण में बन सकता था, विजाति में नहीं तो विजाति व विधर्मी विवाह आगम सम्मत नहीं है। आप उनसे जो संबंध बनाएगा वह नियम से मिथ्यात्व की कोटि में ही आएगा। जो कार्य जैन कर सकता है, उतने ही कार्य विजाति विवाह करने वाला करेगा।</p>
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		<title>जैन मिलन क्षेत्र क्रमांक 10 का क्षेत्रीय महिला सम्मेलन संपन्न : सशक्त नारी सशक्त समाज विषय पर रखे अपने विचार  </title>
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		<pubDate>Wed, 27 Nov 2024 10:19:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन मिलन क्षेत्र क्रमांक 10 की महिला जैन मिलन भगवानगंज के तत्वावधान में क्षेत्रीय महिला सम्मेलन आदर्श गार्डन मोती नगर सागर में संपन्न हुआ। सशक्त नारी सशक्त समाज विषय पर अपने विचार रखे गए। पढ़िए मनीष शास्त्री विद्यार्थी की रिपोर्ट&#8230; सागर। जैन मिलन क्षेत्र क्रमांक 10 की महिला जैन मिलन भगवानगंज के तत्वावधान में क्षेत्रीय [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन मिलन क्षेत्र क्रमांक 10 की महिला जैन मिलन भगवानगंज के तत्वावधान में क्षेत्रीय महिला सम्मेलन आदर्श गार्डन मोती नगर सागर में संपन्न हुआ। सशक्त नारी सशक्त समाज विषय पर अपने विचार रखे गए।<span style="color: #ff0000"> पढ़िए मनीष शास्त्री विद्यार्थी की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> जैन मिलन क्षेत्र क्रमांक 10 की महिला जैन मिलन भगवानगंज के तत्वावधान में क्षेत्रीय महिला सम्मेलन आदर्श गार्डन मोती नगर सागर में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मा. सांसद लता वानखेड़े ने कहा कि आज मंच पर विराजमान विशिष्ट महिला वर्ग इस बात का प्रमाण है कि नारी समाज का सम्मान आज भी है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विधायक शैलेंद्र जैन ने कहा कि नारी शक्ति की अमर कहानी हमेशा हम लोग सुनते आ रहे हैं। इंदौर की अहिल्याबाई, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती यह सभी नारी शक्ति की पहचान है। भारतीय जैन मिलन के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय जैन गुना ने कहा कि नारी बेटी है, मां है, पत्नी और भारतीय संस्कृति की पहचान है। इस देश में नदियों को भी नारी का नाम दिया गया है। नारी सम्मान से ही हमारी पहचान है। सशक्त नारी सशक्त समाज आज के कार्यक्रम में उपस्थित नारी शक्ति इसका उदाहरण है।</p>
<p><strong>भारतीय जैन मिलन की देश-विदेश में 1500 से ज्यादा शाखाएं हैं</strong></p>
<p>राष्ट्रीय मंत्री एडवोकेट कमलेंद्र जैन ने कहा भारतीय जैन मिलन की देश-विदेश में 1500 से ज्यादा शाखाएं हैं। महिलाओं के लिए अलग से शाखा रहती है और उनके द्वारा आयोजित गतिविधियां देशभर में अपनी संस्कृति को प्रदर्शित करती हैं। कार्यक्रम के गौरव राष्ट्रीय अध्यक्ष अतिवीर, विजय जैन गुना, मुख्य अतिथि अतिवीर कमलेंद्र जैन राष्ट्रीय मंत्री, मा. लता वानखेड़े सांसद सागर, मा. शैलेन्द्र जैन विधायक सागर, विशिष्ट अतिथि श्रीमती मंदाकिनी पांडे महाप्रबंधक जिला व्यापार एवं उद्योग केंद्र सागर, सुश्री विनीता जी एसडीएम निवाड़ी, लवली सोनी एसडीओपी सागर, दिगंबर जैन महिला परिषद की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीमती शकुंतला जैन महिला परिषद, क्षेत्रीय अध्यक्ष अरुण चंदेरिया, क्षेत्रीय मंत्री कविता ऋषभ जैन दमोह उपस्थित थे।</p>
<p><strong>मंचासीन अतिथियों ने किया दीप प्रज्जवलन</strong></p>
<p>कार्यक्रम की अध्यक्षता वीरांगना अनुश्री जी जैन प्रदेश उपाध्यक्ष लीगल राइट्स काउंसलिंग ने की। मंचासीन अतिथियों द्वारा दीपप्रज्जवलन एवं महावीर वंदना के साथ कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। महिला मिलन की सदस्यों द्वारा स्वागत नृत्य प्रस्तुत किया गया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-70359" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006.jpg" alt="" width="1600" height="720" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006-300x135.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006-1024x461.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006-768x346.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006-1536x691.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006-990x446.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/11/IMG-20241127-WA0006-1320x594.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />अतिथियों का सम्मान किया गया</strong></p>
<p>कार्यक्रम के प्रारंभ में मंचासीन अतिथियों का सम्मान किया गया एवं मंचासीन वरिष्ठ महिलाओं का नारी शक्ति गौरव से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में नेहानगर, सुभाष नगर, कटरा, बड़ा बाजार, बरौदिया, रंजवास, मालथौन, खिमलासा गढ़ाकोटा, दमोह से आई हुई सभी शाखाओं का सम्मान किया गया। लकी ड्रा के माध्यम से उपस्थित जन समुदाय को मंच तक लाने का प्रयास किया गया। कार्यक्रम का संचालन ममता जैन राष्ट्रीय संयोजिका एवं वीरांगना सुनीता पड़वार शाखा अध्यक्ष ने किया। आभार क्षमा डबडेरा ने माना।</p>
<p><strong>कार्यक्रम में ये सभी उपस्थित रहे</strong></p>
<p>कार्यक्रम में मुख्य रूप से वीरांगना ममता जी, कार्यक्रम में उपाध्यक्ष जिनेश बहरोंल, संजय शक्कर, मनीष शास्त्री मीडिया प्रभारी राष्ट्रीय संयोजक वृषभ जैन स्टेशन मास्टर दमोह राष्ट्रीय संयोजिका वीरां अनीता कमलेंद्र,वीरां संगीता चंदेरिया, ,वीरा संगीता पड़ेले वीरा साक्षी सराफ, वर्षा जैन, क्षमा दबदेरा ,दीप शिखा, हिमांशी, सपना जैन ,नीलम जैन, शिल्पी जैन, ज्योति, अलका दिवाकर, साक्षी जैन आदि शामिल रहे।</p>
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		<title>आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद बन रहा मंदिर : राजस्थान के सबसे बड़े भगवान की मूर्ति का तिलकदान और मुनिसुव्रतनाथ भगवान की सगाई का दस्तूर </title>
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		<pubDate>Mon, 21 Oct 2024 10:09:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ राजस्थान के सबसे बड़े भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति का सागर से रविवार को नौगामा के लिए विहार हुआ। शनि ग्रह अरिष्ट निवारक भगवान मुनिसुव्रतनाथ का भव्य मंदिर धर्म नगरी नौगामा में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद, निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव सुधासागरजी महाराज के सानिध्य और प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया सुयश अशोक नगर के दिशा-निर्देशन [&#8230;]]]></description>
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<p><strong> राजस्थान के सबसे बड़े भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति का सागर से रविवार को नौगामा के लिए विहार हुआ। शनि ग्रह अरिष्ट निवारक भगवान मुनिसुव्रतनाथ का भव्य मंदिर धर्म नगरी नौगामा में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद, निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव सुधासागरजी महाराज के सानिध्य और प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया सुयश अशोक नगर के दिशा-निर्देशन में बनने जा रहा है। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>नौगामा।</strong> राजस्थान के सबसे बड़े भगवान श्री मुनिसुव्रतनाथ की मूर्ति का सागर से रविवार को नौगामा के लिए विहार हुआ। शनि ग्रह अरिष्ट निवारक भगवान मुनिसुव्रतनाथ का भव्य मंदिर धर्म नगरी नौगामा में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आशीर्वाद, निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव सुधासागरजी महाराज के सानिध्य और प्रतिष्ठाचार्य प्रदीप भैया सुयश अशोक नगर के दिशा-निर्देशन में बनने जा रहा है। वास्तुविद श्रीपाल जैन और प्रवक्ता सुरेश गांधी ने बताया कि सागर में मूर्ति का प्रथम तिलकदान करने का सौभाग्य मूर्ति पूण्यार्जक परिवार प्रदीप पिण्डारमिया के परिवार की वर्षा पिण्डारमिया को मिला।</p>
<p>सागर के भाग्योदय तीर्थ पर सुखोदय भगवान का तिलकदान हुआ, और नौगामा जैन समाज के घर-घर में दीप जलाए गए। मुनि श्री ने कहा कि राजस्थान के सबसे बड़े मुनिसुव्रतनाथ भगवान की वागड़ ही नहीं, पूरे भारत के भगवान की आज सगाई का दस्तूर है। जब मूर्ति सुखोदय तीर्थ पर पहुंच जाए, तो सभी एक-एक नारियल ले जाकर बधाई दें और नारियल का पानी मूर्ति पर डालें। यह शगुन का श्रीफल है, जिसे अपने बच्चों के लिए घर ले जाएं। मुनि श्री ने कहा कि पहली बार वागड के सबसे बड़े भगवान का आगमन हो रहा है, इसलिए खाली हाथ मुंह दिखाई न करें, बल्कि कुछ न कुछ शगुन के रूप में चढ़ाएं।</p>
<p><strong>सागर से मूर्ति पहुंचेगी नौगामा</strong></p>
<p>उन्होंने नौगामा जैन समाज के प्रतिनिधिमंडल से कहा कि सागर से नौगामा मूर्ति पहुंचेगी, तब तक मार्ग में जितने भी नगर आते हैं, वहां श्रद्धालुओं को तीलकदान करने का अवसर दें। मूर्ति सुखोदय तीर्थ के कमलासन पर बैठेगी और तब तीलकदान होता रहेगा। मुनि श्री ने यह भी बताया कि काले पाषाण की विशाल मूर्ति, जो अभी प्रतिष्ठित नहीं हुई है, उसमें बहुत ऊर्जा है। जैसे ही यह प्रतिमा नौगामा पहुंचेगी, संपूर्ण वागड में खुशहाली होगी। नौगामा वासियों ने दीपदान किया। नगर के 51 नवयुवक मंडल सदस्यों ने नवयुवक मंडल अध्यक्ष मुकेश गांधी के सानिध्य में दीपदान किया। मूर्ति के आसपास श्रीफल फोड़कर उसका शुद्ध जल प्रतिमा पर डाला गया।</p>
<p>पुज्य सुधासागरजी महाराज और उपस्थित सभी संघ ने अपना आशीर्वाद प्रदान किया। आशीर्वाद के पश्चात भगवान श्री के जयकारों के साथ प्रतिमा का मंगल विहार नौगामा नगर की ओर हुआ। प्रवक्ता ने बताया कि 25 टन वजनी यह मूर्ति काले पाषाण की बनी हुई है, जिसकी चौड़ाई 12 फीट, ऊंचाई 15 फीट और गहराई 6 फीट है। यह मूर्ति 22 टन पत्थर से बने कमल के फूल पर विराजमान होगी, जिसका भव्य आगमन 22 को वागड में होगा।</p>
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		<title>उत्तम संयम धर्म पर दिए प्रवचन : गाली को मंत्र बना देने की ताकत का नाम है उत्तम संयमधर्म : निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 14 Sep 2024 12:52:36 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सत्य को भीड़ की जरूरत नहीं रहती सत्य अकेला ही रहता है। दूसरे को कठपुतली मत बनाना दूसरे को अंड़र में मत रखना, बस इतना सा नियम और ले ले तो सत्य के बाद संयम पर कलशारोहण हो जाएगा, वही सत्य-सत्यधर्म बन जायेगा। लोग कहते हैं कि ऐसा नियम बताओ कि मुझे किसी की नौकरी [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सत्य को भीड़ की जरूरत नहीं रहती सत्य अकेला ही रहता है। दूसरे को कठपुतली मत बनाना दूसरे को अंड़र में मत रखना, बस इतना सा नियम और ले ले तो सत्य के बाद संयम पर कलशारोहण हो जाएगा, वही सत्य-सत्यधर्म बन जायेगा। लोग कहते हैं कि ऐसा नियम बताओ कि मुझे किसी की नौकरी न करना पड़े, हो जाएगा तुम्हें एक नियम लेना पड़ेगा- प्रतिदिन ये भावना भानी पड़ेगी कि &#8216;कभी मुझे अपने कार्य के लिए किसी को नौकरी न कराना पड़े, हम किसी को दास न बनाये।&#8217; यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> सत्य को भीड़ की जरूरत नहीं रहती सत्य अकेला ही रहता है। दूसरे को कठपुतली मत बनाना दूसरे को अंड़र में मत रखना, बस इतना सा नियम और ले ले तो सत्य के बाद संयम पर कलशारोहण हो जाएगा, वही सत्य-सत्यधर्म बन जायेगा। लोग कहते हैं कि ऐसा नियम बताओ कि मुझे किसी की नौकरी न करना पड़े, हो जाएगा तुम्हें एक नियम लेना पड़ेगा- प्रतिदिन ये भावना भानी पड़ेगी कि &#8216;कभी मुझे अपने कार्य के लिए किसी को नौकरी न कराना पड़े, हम किसी को दास न बनाये।&#8217;</p>
<p>यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि बड़े आदमी क्यों दुर्गति जाते हैं क्योंकि वह सारी दुनिया को अपना दास बनाना चाहते हैं। जब तुम्हें गुलामियत पसंद नहीं है तो दूसरे को क्यों? कोई महिला नहीं चाहती कि वह दूसरे के जूठे बर्तन मांझे, यह वरदान तुम्हें मिल जाएगा, कभी कोई तुम्हारे झूठे बर्तन मांजे तो एक ही भाव करना, जब मैं किसी के जूठे बर्तन नहीं मांजना चाहती तो ये भी तो जीव है, किसी की माँ, किसी की पत्नी है। हे भगवान दो दशा में से एक वरदान पूरा कर दे- &#8216;मुझे ऐसी दशा में पहुंचा दे कि मुझे बर्तन जूठा करना ही न पड़े, यानी भूख से ऊपर उठा दे या फिर इसको इतना समर्थ बना दे कि दूसरे के जूठन बनकर रोटी ही ना कामना पड़े।&#8217;</p>
<p><strong>नियम बना लो</strong></p>
<p>तुम सोच रहे हो कि मुझे कभी किसी दूसरे के यहां नौकरी न करना पड़े, कभी सोचना कि संसार मे किसी को नौकरी न करना पड़े। जब व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि मेरे पास सब कुछ है तो वह किसी की परवाह नहीं करते, सिद्ध भगवान भी ऐसे ही है। सत्य व्यक्ति को निर्भीक बनाता है, मुझे किसी की जरूरत नहीं, मैं किसी से डरने वाला नहीं क्योंकि मेरे पास सत्य है, ये सत्य जो है विनाश कर सकता है, तब संयम कहता है कि तुम शक्तिमान हो तो दुनिया शक्तिहीन नहीं है, वो भी शक्तिमान है। तुम्हारा स्वाभिमान है तो सामने वाले का भी स्वाभिमान है। मैं जीना चाहता हूं तो दुनिया भी जीना चाहती है बस इतना सा नियम ले लो।एक हिंसक जानवर भी जीना चाहता है, एक मांसाहारी भी जीना चाहता है, हर व्यक्ति जीना चाहते है। यदि तुम जीने का वरदान चाहते हो तो महावीर स्वामी ने कहा तुम्हें एक नियम और लेना पड़ेगा दुनिया को जीने दो। यही भूल अपनी हो रही है कि अपन स्वयं आजाद रहना चाहते हैं, दूसरों को आजादी नहीं देना चाहते? जो दूसरों को नहीं बचा सकता, एक दिन उसे मरना पड़ेगा। अमर बनने के लिए सबसे पहले तुम्हे निरन्तर ये बनना पड़ेगा संसार में मेरे द्वारा किसी जीव की हत्या न हो। इन्द्रिय संयम उस दिन होगा जिस दिन तुम्हें अपने खुद के मन पर गर्व होगा और तुम्हारे मन पर दुनिया गर्व करेगी।</p>
<p><strong>बुरी नीयत से मत बोलो</strong></p>
<p>तुम बुरे हो तो इंद्रियां बुरी है, तुम अच्छे हो जाओगे तो तुम्हारी इंद्रियां भी अच्छी हो जाएगी। जिनको बीजाक्षरों का मंत्र बनाना आ गया, उसे संसार की कोई गाली नहीं लगती, उस गाली में भी दिखता है मंत्र। किसी ने मूर्ख कहा तो कर्ण इन्द्रिय का संयम वाला व्यक्ति कहता है- इसने गाली नही, मंत्र दिया है- म, उ, र, ख। ये बीजाक्षर है। सत्य है कि उसने मूर्ख कहा है लेकिन कर्ण इन्द्रिय का चमत्कार कहता है- म, उ, र, ख कहा है। ॐ भगवान, गुरु की सम्पत्ति है और ह्रीं हमारी खुद की संपत्ति है। गाली सुनकर शांत हो जाने का नाम संयम है और जो शब्द सुनाया है उस शब्द को मंत्र बना देने की ताकत का नाम संयमधर्म है। नाग का हार बन जाए, जहर अमृत बन जाए तब संयम धर्म है। गाली पर गाली दी जा रही है और कान में शब्द आते ही वह सब गाली खत्म। बुरी नीयत से मत बोलो, बुरा निकल भी जाएगा तो अच्छा ही होगा।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : सबसे बड़ा शगुन वह होता है जो अनायास होता है &#8211; मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sun, 08 Sep 2024 06:54:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जो स्वयं के कल्याण के साथ-साथ जगत के कल्याण के लिए भी शगुन जाती है, कल्याण तो उपदान से होता है लेकिन निमित्त कभी कभी किसी कल्याण का शगुन बन जाता है। महान आत्माएं वह नही ंहै जो महान मात्र है, वे महान आत्माएं जगत में पूज्य बन जाती है [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जो स्वयं के कल्याण के साथ-साथ जगत के कल्याण के लिए भी शगुन जाती है, कल्याण तो उपदान से होता है लेकिन निमित्त कभी कभी किसी कल्याण का शगुन बन जाता है। महान आत्माएं वह नही ंहै जो महान मात्र है, वे महान आत्माएं जगत में पूज्य बन जाती है जो दूसरों के लिए भी मंगलमय बन जाती है। कुछ आत्माएं हैं जो अपने आप में बड़े है लेकिन दूसरे को उठाने में निमित्त नहीं है। इसलिए सर्वोत्तम कौन है, पहले देखें- क्या वह जगत के लिए मंगल है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> कुछ वस्तुएं ऐसी होती हैं जो स्वयं के कल्याण के साथ-साथ जगत के कल्याण के लिए भी शगुन जाती है, कल्याण तो उपदान से होता है लेकिन निमित्त कभी कभी किसी कल्याण का शगुन बन जाता है। महान आत्माएं वह नही ंहै जो महान मात्र है, वे महान आत्माएं जगत में पूज्य बन जाती है जो दूसरों के लिए भी मंगलमय बन जाती है। कुछ आत्माएं हैं जो अपने आप में बड़े है लेकिन दूसरे को उठाने में निमित्त नहीं है। इसलिए सर्वोत्तम कौन है, पहले देखें- क्या वह जगत के लिए मंगल है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि उत्तम को मंगल नहीं कहा गया, मंगल को उत्तम कहा गया। णमोकार मंत्र में सिद्ध को पहले रखना चाहिए क्योंकि वह बड़े है, जबकि अरिहंत का स्वरूप पहले आ गया वह छोटे थे।</p>
<p>अपन लोग यही सोचते हैं कि जो सबसे बड़ा है वही मंगल है जो श्रेष्ठ हो, महान हो तो ये मंगल की परिभाषा नही है। अनाज में बहुत बड़े बड़े अनाज होते हैं लेकिन सरसों के दाने को मांगलिक, शगुन कहा। बड़े-बड़े फूलों को मांगलिक नहीं कहा लेकिन छोटे फूल मांगलिक होते हैं। बड़े-बड़े जानवर होते हैं लेकिन कुछ छोटे जानवर गाय, हाथी, घोड़ा ये मंगल है। मनुष्यों में पुरुष बड़ा होता है लेकिन पुरुष को, बालक को मंगल नही कहा, कन्या को मंगल कहा। चौक के लिए सौभाग्यवती महिला को बुलाया जाएगा। सौधर्मेन्द्र को मंगल कहा, जबकि उससे बड़े भी इंद्र होते है। बड़े-बड़े पहाड़ होते हैं लेकिन कैलाश पर्वत को शगुन के रूप में प्रस्तुत किया।</p>
<p><strong>दूसरों का भला करो</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि यदि हमें असमर्थता महसूस हो, हम कैसे जाने कि हमारा कार्य, हमारी यात्रा सफल होगी तो उस समय हमें कोई ऐसी शक्ति चाहिए जो हमें संकेत दे दे जाओ तुम्हारा कार्य सफल होगा, वो चैतन्य हो, सर्वज्ञ हो ये नियम नहीं। सबसे बड़ा शगुन वो माना जाता है जो स्वयं किसी का भला करता नहीं, स्वयं में किसी के भली की सोचता नहीं और जो उसको देख लेता है उसका भला हो जाता है। कलश को भी नहीं मालूम कि मैं किसी का मंगल हो सकता हूं, महिला को भी नहीं मालूम कि मैं किसी का मंगल करने जा रही हूं वह तो मात्र पानी भरकर ला रही है अनायास किसी यात्री के सामने आ जाए तो वह देखते ही कहे की शगुन हो गया। इसी तरह बिल्ली अपशगुन करने नहीं निकलती लेकिन अनायास देखने वाले ने कहा अपशगुन हो गया। एक शगुन किया जाता है एक शगुन होता है, सबसे बड़ा शगुन वह होता है जो अनायास होता है। आपने ध्वजारोहण मंगल के लिए किया वह इतना बड़ा मंगल नहीं था, सबसे बड़ा मंगल है वो कि ध्वजा तुमने खोली, उस समय हवा ईशान कोण की चल गई, ये शगुन था। ध्वजा अपने आप में मंगल है ये पक्का है लेकिन ध्वज फहराते समय मंगल हो ये कोई नियम नहीं है। इसी ध्वजा से हम लोग अमंगल का ज्ञान करते हैं। ध्वजा किस कोने की ओर गयी हैं उससे निर्णय किया जाता है कि इस कार्यक्रम का क्या हंसल होगा। ध्वजा से संकेत मिलते हैं, इस तरफ से ध्वजा हुई तो पानी बरसेगा, इस तरफ से हुई तो पानी बरसेगा, इस तरफ अग्नि होगी, सारा ध्वजा पुराण है इस सम्बंध में।</p>
<p><strong>अरिहंत भगवान को देखना मंगल है</strong></p>
<p>मुनि श्री ने कहा कि आठ कोण व नीचे ऊपर की दश दिशाएं होती है लेकिन ईशान कोण वास्तु में सबसे ज्यादा शुभ माना गया, इसलिए वहां कहते हैं गंदगी नहीं करना, वहां वजन मत रखना क्योंकि वह शुभ है। कभी-कभी बड़ों की जरूरत नहीं है, मंगल, शगुन की जरूरत है। हर व्यक्ति को संदेह रहता है कि मैं ऐसा कर रहा हूं सफल होउगा कि नहीं, शगुन कहता है कि मैं बिना कहे, बिना बोले आपको संकेत दे दूंगा, जाओ आपकी फतेह होगी। सिद्ध भगवान जब विचार करेंगे तब मंगल है, अरिहंत भगवान का तो देखना भी मंगल हो जाता है। अरिहन्त भगवान देखने मे मंगल, उनका शरीर, सिंहासन, कल्पवृक्ष, चंवर, पुष्पवृष्टि मंगल, उनके समवशरण का एक एक अंग मंगल, जितना भी वैभव है सब मंगल है। वे दोनों लक्ष्मी के स्वामी हैं। अरिहन्त अंतरंग व बहिरंग, यानी बाहर से भी मंगल है और अंदर से भी। अष्टप्रातिहार्य अरिहंत नहीं है लेकिन उनसे जुड़े होने से वह परपदार्थ भी मंगल हो गया, ये है श्रेष्ठ मंगल। समवशरण क्या है एक स्वर्ण है, सोना मंगल नही होता, लेकिन समवशरण भगवान से जुड़ने से मंगल हो गया। जल को निम्नगा कहा- जो नीचे की तरफ जाता है, यदि वही जल भगवान को छू जाए तो मुनिराज के सिर पर पहुँच जाता है। जिस धुली ने, जिस जल ने भगवान को छू लिया है वह भी मांगलिक हो गया। जब आपको शगुन करना है, मुनि महाराज कोई है नहीं, मात्र आपके सामने आचार्य है उनके आशीर्वाद लेने, दर्शन करने जाओ तो आचार्य महाराज को भी आप साधु की दृष्टि में देखो, जाओ तुम्हारा शगुन ही शगुन हो गया। पूजा के लिए नहीं, शगुन के लिए कहा।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : झूठ बोलने की अपेक्षा, सत्य का न बोलना श्रेष्ठ है &#8211; मुनि श्री सुधासागर जी महाराज </title>
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		<pubDate>Sat, 07 Sep 2024 08:20:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[व्यवहार सत्य स्वरूपी होता है और निश्चय उस शक्ति को बताता है, शक्ति में कभी आनंद नही है, शक्ति में एक अहंकार आता है। जब जब किसी को शक्ति का भान होता है, उसका अहंकार बढ़ जाता है क्योंकि निश्चयनय हमें अपनी औकात से ऊपर उठाता है। अभी जमीन पर चलने की ताकत नहीं है [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>व्यवहार सत्य स्वरूपी होता है और निश्चय उस शक्ति को बताता है, शक्ति में कभी आनंद नही है, शक्ति में एक अहंकार आता है। जब जब किसी को शक्ति का भान होता है, उसका अहंकार बढ़ जाता है क्योंकि निश्चयनय हमें अपनी औकात से ऊपर उठाता है। अभी जमीन पर चलने की ताकत नहीं है और आकाश में उड़ना सिखाता है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कही। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट..</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>सागर।</strong> शक्ति की अपेक्षा हम स्वतंत्र रह सकते हैं, व्यक्ति की अपेक्षा कोई व्यक्ति स्वतंत्र नहीं हो सकता, हम मात्र अहंकार कर सकते हैं। व्यवहार सत्य स्वरूपी होता है और निश्चय उस शक्ति को बताता है, शक्ति में कभी आनंद नही है, शक्ति में एक अहंकार आता है। जब जब किसी को शक्ति का भान होता है, उसका अहंकार बढ़ जाता है क्योंकि निश्चयनय हमें अपनी औकात से ऊपर उठाता है। अभी जमीन पर चलने की ताकत नहीं है और आकाश में उड़ना सिखाता है। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन के दौरान कही।</p>
<p>उन्होंने कहा कि तीन व्यक्तियों को कभी शक्ति का ज्ञान नहीं होना चाहिए, एक असमर्थ व्यक्ति को, एक उन्मत्त व्यक्ति को और एक उस व्यक्ति को जो व्यक्ति पागल है। पागल का अर्थ है असंयमी क्योंकि वह अभी जमीन पर नहीं चल पा रहा है और उसे आकाश में उड़ने का ज्ञान मत होने देना अन्यथा वह कंही हाथ पैर और तोड़ बैठेगा। तुम कितने अमीर हो, कितने शक्तिमान हो कभी अपने बच्चे को ज्ञान मत होने देना, सबसे ज्यादा छल कपट करो अपने बच्चे के साथ।</p>
<p>सरकार को बताना पड़े तो बता देना, चोर डाकू घुसे तो उसे भी बता देना लेकिन कभी बेटे को अपनी अमीरी मत बताना। गुरु से और मां-बाप से कभी अपनी अमीरी छुपाना मत। जो कुछ है गुरु के सामने खुला दर्पण रखना और तुम लोग आजकल सबसे ज्यादा गुरु के सामने झूठ बोलने लगे हो वो भी सबसे ज्यादा त्याग व दान के सम्बंध में। न कहने की आदत डालो झूठ बोलने की अपेक्षा- आज मेरी श्रद्धा नहीं है, मेरे दान के भाव नहीं हो रहे हैं। न कहने में कोई पाप नहीं है, सात पीढ़ियों तक का इंतजाम है, बस महाराज जी मेरी दान के भाव नहीं हो रहे हैं। मेरे में शक्ति है, खूब त्याग कर सकता हूँ लेकिन मेरे त्याग के भाव नहीं हो रहे हैं। झूठ बोलने की अपेक्षा, सत्य का न बोलना श्रेष्ठ है। अब आपका कल्याण हो सकता है, आप पर उपदेश का प्रभाव पड़ सकता है, आप कल सुधर जाओगे, बहुत जल्दी आपके भाव होंगे क्योंकि आपने अपनी शक्ति को छुपाया नहीं, कहा- मात्र भाव ही नही हो रहे।</p>
<p>जो शगुन है मंगल है इनके सामने गरीब मत बनना, भिखारी मत बनना। वह संस्था सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है जिस संस्था के पदाधिकारियों का सबसे पहले पैसा पूरा जमा होता है फिर वो दूसरे के यहां मांगने जाते है। नैनागिर जी में आचार्य श्री से अलग विहार होते समय मैंने कहा था कि आचार्य श्री जी ये दुनिया ऐसी है, कैसे रहेंगे इन के बीच और आप तो आशीर्वाद देते हो तो सब सफल हो जाते है, हम लोगो के आशीर्वाद कभी सफल होंगे या नही, आचार्य श्री ने सफलता का सूत्र दिया- &#8216;अपना निजी स्वार्थ मत रखना, पर का कभी अहित मत करना, जाओ सफलता तुम्हारे आगे आगे दौड़ेंगी&#8217;। गुरु का वाक्य ही मंत्र है।</p>
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		<title>धर्मसभा में दिए प्रवचन : सही धार्मिक क्रिया वही है, जिसके पीछे आत्म कल्याण और विज्ञान छुपा है- आचार्य श्री निर्भय सागर </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/the_right_religious_practice_is_that_behind_which_self_welfare_and_science_are_hidden_acharya_shri_nirbhay_sagar/</link>
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		<pubDate>Thu, 09 May 2024 06:28:05 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[तपोवन तीर्थ में अक्षय तृतीया को विशेष आयोजन होगा। इसमें आचार्य संघ की आहार चर्या, प्रवचन, और भगवान आदिनाथ के जीवन पर विशेष चर्चा होगी। आचार्य श्री ने प्रात:कालीन सभा में कहा कि जैसे आप अपने मोबाइल रिचार्ज करते हैं, वैसे दान देकर अपनी आत्मा को पुण्य से रिचार्ज करना चाहिए। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>तपोवन तीर्थ में अक्षय तृतीया को विशेष आयोजन होगा। इसमें आचार्य संघ की आहार चर्या, प्रवचन, और भगवान आदिनाथ के जीवन पर विशेष चर्चा होगी। आचार्य श्री ने प्रात:कालीन सभा में कहा कि जैसे आप अपने मोबाइल रिचार्ज करते हैं, वैसे दान देकर अपनी आत्मा को पुण्य से रिचार्ज करना चाहिए। <span style="color: #ff0000">पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>सागर।</strong> वैज्ञानिक संत आचार्य श्री निर्भय सागर जी महाराज तपोवन तीर्थ सागर में एक माह से ससंघ सहित विराजमान हैं। तपोवन में ही अक्षय तृतीया को प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने मुनि अवस्था में एक वर्ष तक निर्जल उपवास की कठोर तपस्या करने के उपरांत प्रथम आहार लिया था। आहार देने का सौभाग्य राजा श्रेयांस को प्राप्त हुआ था। इसलिए तपोवन तीर्थ में अक्षय तृतीया को विशेष आयोजन होगा। इसमें आचार्य संघ की आहार चर्या, प्रवचन, और भगवान आदिनाथ के जीवन पर विशेष चर्चा होगी। आचार्य श्री ने प्रात:कालीन सभा में कहा कि जैसे आप अपने मोबाइल रिचार्ज करते हैं, वैसे दान देकर अपनी आत्मा को पुण्य से रिचार्ज करना चाहिए।</p>
<p>जैसी बैटरी डिस्चार्ज हो जाने पर करंट से चार्ज करते हैं, वैसे ही गुरु के उपदेश सुनकर अपने जीवन को चार्ज करना चाहिए। धर्म एक ऐसी शक्ति है जो अपने अंदर छुपी सहनशीलता रूपी क्षमता अर्थात शक्ति को उद्घाटित करती है। जब आपकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक और राजनीतिक शक्ति क्षीण हो जाती है तो कोई कद्र नहीं करता और हर कोई दबाने की कोशिश करता है अतः इस लोकतांत्रिक देश में अपनी शक्ति क्षीण नहीं होने देना चाहिए। सही धार्मिक क्रिया वही है, जिसके पीछे आत्म कल्याण और विज्ञान छुपा है। देखा देखी अज्ञानता और हट ग्राहित्ता के साथ की गई धार्मिक क्रिया से कल्याण नहीं होता है। धर्म मानकर हिंसा करना अज्ञानता और मूढ़ता की परिचायक है। अहिंसा सुख शांति की दायक और परमात्मा की परिचायक है। अहिंसा प्रकृति है और हिंसा विकृति है। हिंसा और अहिंसा दोनों युगपत थी है और रहेगी। इसलिए अहिंसा को धारण करके परमात्मा बनने की साधना करना चाहिए।</p>
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