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	<title>rishabhadev &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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	<title>rishabhadev &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>तीर्थंकर नेमीनाथ विधान एवं महामस्तकाभिषेक का हुआ आयोजन: 1008 मुनि भक्तों का जत्था पहुंचा ऋषभदेव से गिरनार </title>
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		<dc:creator><![CDATA[Shreephal Jain News]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 25 Oct 2024 16:50:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[ऋषभदेव से गिरनार तक 1008 से अधिक भक्त पहुंचे। इनका यहां पहुंचने पर स्वागत किया गया। मंदिर जी में महाशांति धारा हुई। नेमीनाथ विधान में भक्तिमय माहौल में श्रद्धालु झूमने लगे। भक्तों ने तीर्थंकर नेमीनाथ को रजत छत्र भी चढ़ाया। पढ़िए ऋषभदेव से सचिन गंगावत की खबर ऋषभदेव। सकल दिगम्बर जैन समाज के 1008 से [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<hr />
<p><strong>ऋषभदेव से गिरनार तक 1008 से अधिक भक्त पहुंचे। इनका यहां पहुंचने पर स्वागत किया गया। मंदिर जी में महाशांति धारा हुई। नेमीनाथ विधान में भक्तिमय माहौल में श्रद्धालु झूमने लगे। भक्तों ने तीर्थंकर नेमीनाथ को रजत छत्र भी चढ़ाया। <span style="color: #ff0000">पढ़िए ऋषभदेव से सचिन गंगावत की खबर</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>ऋषभदेव।</strong> सकल दिगम्बर जैन समाज के 1008 से भी ज्यादा भक्त आज तीर्थंकर ऋषभदेव की असीम कृपा एवम राष्ट्रसंत आचार्य गुरुदेव पुलकसागर जी महाराज के आशीर्वाद से आज ऋषभदेव से गिरनार पहुंचे। यात्रा संयोजक मधु सुमेश वाणावत ने बताया कि गिरनार पहुंचने के बाद सभी मुनि भक्तों का स्वागत किया गया। उसके बाद विधानाचार्य सुधीर मार्तंड के नेतृत्व में सर्वप्रथम महाशांतिधारा संघपति प्रदीप मामा प्रतिभा मामी एवं यात्रा संयोजक मधु सुमेश वाणावत परिवार द्वारा की गई। बाद में तीर्थंकर नेमीनाथ विधान का पालिताना से आए मोहित बरोठ एंड पार्टी द्वारा भक्तिमय आयोजन किया गया। विधान में महिलाएं और पुरुषों ने एक जैसे वस्त्र पहन रखे थे।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-68899" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906.jpg" alt="" width="1600" height="1200" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906.jpg 1600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-1024x768.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-768x576.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-1536x1152.jpg 1536w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-990x743.jpg 990w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2024/10/1001273906-1320x990.jpg 1320w" sizes="(max-width: 1600px) 100vw, 1600px" />चांदी का छत्र चढ़ाया</strong></p>
<p>समवशरण मंदिर जी से संघपति मामा-मामी परिवार को रजत रथ में बैठाकर लाव लश्कर के साथ तलहटी मंदिर होते हुए बंदीलाल मंदिर जी तक सभी गुरुभक्त नाचते-झूमते हुए पहुंचे जहा पर तीर्थंकर नेमीनाथ को रजत छत्र चढ़ाया गया। साथ ही यात्रा संयोजक ने बताया कि रात को भव्य भक्ति संध्या का भी आयोजन किया गया।</p>
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		<item>
		<title>प्रथम तीर्थंकर : आदि पुरुष भगवान ऋषभदेव-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज </title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/aadi-purush-bhagavan-rishabhdev-antarmukhi-muni-pujya-sagar-maharaj/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[अंतर्मुखी]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 23 Jan 2023 13:00:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[aadinath bhgvan]]></category>
		<category><![CDATA[rishabhadev]]></category>
		<category><![CDATA[Shreephalnews]]></category>
		<category><![CDATA[आदिनाथ]]></category>
		<category><![CDATA[ऋषदेव]]></category>
		<category><![CDATA[श्रीफल न्यूज]]></category>
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					<description><![CDATA[@लेखक- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव हैं। वे सुसीमा नगरी के राजा नाभिराय के पुत्र थे। ऋषभदेव ने ही आमजन को छह क्रियाएं- असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प का ज्ञान दिया। यही नहीं, ऋषभदेव ने ही सर्वप्रथम अपनी दो पुत्रियों को लिपिविद्या और अंकविद्या का ज्ञान दिया। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><img decoding="async" class="alignleft size-us_600_600_crop wp-image-24613" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/01/images-36-600x336.jpeg" alt="" width="600" height="336" />@लेखक- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज</span></p>
<p>जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव हैं। वे सुसीमा नगरी के राजा नाभिराय के पुत्र थे। ऋषभदेव ने ही आमजन को छह क्रियाएं- असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प का ज्ञान दिया। यही नहीं, ऋषभदेव ने ही सर्वप्रथम अपनी दो पुत्रियों को लिपिविद्या और अंकविद्या का ज्ञान दिया। भगवान ऋषभदेव जीवन में कर्म की प्रधानता और समाज में स्त्री शिक्षा के जनक के रूप में जाने जाते हैं। ऋषभदेव जयंती पर आइए जानते हैं, उनके जीवन के बारे में-</p>
<p><strong>ऋषभदेव का गर्भावतार</strong><br />
एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में रानी मरुदेवी ने ऐरावत हाथी, शुभ्र बैल, हाथियों द्वारा स्वर्ण घटों से अभिषिक्त लक्ष्मी, पुष्पमाला आदि सोलह स्वप्न देखे। उनके पति राजा नाभिराय ने जब स्वप्नों का अर्थ बताया तो मरूदेवी बहुत हर्षित हुईं। आषाढ़ कृष्ण द्वितीया के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में भगवान ऋषभदेवी मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण हुए।<br />
<strong>ऋषभदेव का जन्म महोत्सव</strong><br />
माता मरुदेवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सूर्योदय के समय भगवान् को जन्म दिया। सारे विश्व में हर्ष की लहर दौड़ गई। सौधर्म इन्द्र ने इन्द्राणी सहित ऐरावत हाथी पर चढ़कर नगर की प्रदक्षिणा की और भगवान को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर 1008 कलशों में भरे क्षीरसमुद्र के जल से उनका जन्माभिषेक किया। उनका नाम अनन्तर वस्त्राभरणों से अलंकृत करके ‘ऋषभदेव’ नाम रखा गया।<br />
<strong>ऋषभदेव का विवाहोत्सव</strong><br />
भगवान् के युवावस्था में प्रवेश करने पर महाराजा नाभिराज ने कच्छ, सुकच्छ राजाओं की बहन ‘यशस्वती’ और ‘सुनन्दा’ के साथ श्री ऋषभदेव का विवाह सम्पन्न कर दिया।<br />
<strong>भरत चक्रवर्ती आदि का जन्म</strong><br />
यशस्वती देवी ने चैत्र कृष्ण नवमी के दिन भरत चक्रवर्ती को जन्म दिया। इसके बाद निन्यानवे पुत्र एवं ब्राह्मी कन्या को जन्म दिया। उनकी दूसरी रानी सुनन्दा महादेवी ने भगवान बाहुबली और सुन्दरी नाम की कन्या को जन्म दिया।<br />
<strong>असि-मषि आदि षट्क्रियाओं का उपदेश</strong><br />
यह वह समय था जब प्रजाजन अपनी आवश्यकताएं कल्पवृक्षों से पूरी करते थे, लेकिन काल के प्रभाव से जब कल्पवृक्ष शक्तिहीन हो गए तो उस समय ऋषभदेव ने प्रजा को असि, मषि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प इन छह कर्मों का उपदेश दिया। उन्होंने ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन तीन वर्णों की स्थापना की और आजीविका के अनेकों पापरहित उपाय बताए।<br />
<strong>भगवान का वैराग्य और दीक्षा महोत्सव</strong><br />
एक दिन सभा में नर्तकी नीलांजना की नृत्य के दौरान ही मृत्यु हो गई। यह देखकर भगवान को वैराग्य हो गया। भगवान ने भरत का राज्याभिषेक करते हुए इस पृथ्वी को ‘भारत’ नाम दिया और बाहुबली को युवराज पद पर स्थापित किया। इसके बाद वे ‘सिद्धार्थक’ वन में पहुंचे और वटवृक्ष के नीचे बैठकर ‘ओम नमः सिद्धेभ्यः मन्त्र का उच्चारण कर पंचमुष्टि केशलोंच करके सर्व परिग्रह रहित मुनि हो गए।<br />
<strong>भगवान का आहार ग्रहण</strong><br />
भगवान छह महीने बाद आहार को निकले परन्तु चर्याविधि किसी को मालूम न होने के कारण आहार नहीं हो पाया। एक वर्ष उन्तालीस दिन बाद भगवान हस्तिनापुर नगर में पहुंचे। यहां राजा श्रेयांस ने भगवान को इक्षुरस का आहार दिया। वह दिन वैशाख शुक्ला तृतीया का था जो आज भी ‘अक्षय तृतीया’ के नाम से प्रसिद्ध है।<br />
<strong>भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति</strong><br />
हजार वर्ष तक तपस्या करने के बाद भगवान को पूर्वतालपुर के उद्यान में-प्रयाग में वटवृक्ष के नीचे ही फाल्गुन कृष्णा एकादशी के दिन केवलज्ञान हो गया। इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने बारह योजन प्रमाण समवसरण की रचना की। पुरिमताल नगर के राजा श्री ऋषभदेव भगवान के पुत्र वृषाभसेन प्रथम गणधर हुए। ब्राह्मी भी आर्यिका दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में प्रधान गणिनी हो गयीं।<br />
<strong>भगवान ऋषभदेव का निर्वाण</strong><br />
जब भगवान की आयु चौदह दिन शेष रह गई, तब कैलाश पर्वत पर जाकर माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के समय भगवान पूर्व दिशा की ओर मुँह करके मुनियों के साथ सिद्धलोक में जाकर विराजमान हो गये।</p>
<h2>आदिनाथ भगवान परिचय</h2>
<p>• नाम : आदिनाथ<br />
• पिता का नाम : नाभिराय<br />
• माता का नाम : मरूदेवी<br />
• कुल : इक्ष्वाकु वंश<br />
• गर्भ कल्याण स्थान : अयोध्या<br />
• तिथि : आषाढ़ बदी द्वितीय<br />
• नक्षत्र : रोहिणी<br />
• जन्म कल्याण स्थान : अयोध्या<br />
• तिथी : चैत्र बदी छठ<br />
• नक्षत्र : उत्तराषाढ़<br />
• राशी : धनु<br />
• चिन्ह (लक्षण) : बैल<br />
• वर्ण : स्वर्ण<br />
• शरीर की ऊंचाई : ५०० धनुष<br />
• दीक्षा कल्याण : वैराग्य का कारण<br />
• नीलांजना की मृत्यु होना<br />
• वन : सिद्धार्थ<br />
• वृक्ष : वटवृक्ष<br />
• कितने राजाओं ने संग दीक्षा ली : 4000<br />
• उपवास का नियम : 6 मास<br />
• प्रथम आहार दीक्षा के कितने दिन बाद : 404<br />
• स्थान : हस्तिनापुरी<br />
• आहार देने वाले राजा का नाम : श्रेयांस<br />
• आहार की वस्तु : गन्ने का रस<br />
• केवलज्ञान से पूर्व उपवास : 8<br />
• केवलज्ञान कल्याण तिथि : फाल्गुन बदी एकादशी<br />
• समय : प्रातःकाल<br />
• नक्षत्र : उत्तराषाढ़<br />
• स्थान : पुरियाताल पूरी<br />
• समवशरण विस्तार (योजन में) : 12<br />
• विस्तार (कोस में) : 48<br />
• कुल गणधर : 84<br />
• मुख्य गणधर : वृषभसेन<br />
• मुख्य आर्यिका : ब्राम्हीजी<br />
• मुख्य श्रोता : भरत चक्रवती<br />
• मुख्य यक्ष : गोमुख (गोवदन)<br />
• मुख्य यक्षिणी : चक्रेश्वरी<br />
• मोक्ष कल्याण तिथि : माघ बदी चतुर्दशी<br />
• समय : सूर्योदय<br />
• स्थान : कैलाश गिरि<br />
• विशिष्ठ स्थान नक्षत्र : उत्तराषाढ़<br />
• आसन : पद्मासन</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>निर्माण से निर्वाण तक निर्णायक हैं  तीर्थंकर ऋषभदेव की शिक्षाएं</title>
		<link>https://www.shreephaljainnews.com/nirman-se-nirvan-tak-nirnayak-hai-tirthankar-rrishabhadev-ki-shikshae/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[संपादक]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 28 Jan 2022 15:10:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[Adinath]]></category>
		<category><![CDATA[moksha]]></category>
		<category><![CDATA[rishabhadev]]></category>
		<category><![CDATA[आदिनाथ]]></category>
		<category><![CDATA[ऋषभदेव]]></category>
		<category><![CDATA[तीर्थंकर]]></category>
		<category><![CDATA[मोक्ष]]></category>
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					<description><![CDATA[जैनधर्म के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के निर्वाणोत्सव, 31 जनवरी, 2022 के अवसर पर प्रासंगिक आलेख लेखक -डॉ0 सुनील जैन, संचय (जैन दर्शन के अध्येता, आध्यात्मिक चिंतक) &#160; अहिंसा, तप, त्याग, अपरिग्रह और क्षमा जैसे गुणों की अमूल्य धरोहर देकर जैन धर्म ने विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त किया है। जैन धर्म ही नहीं जीवन दर्शन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जैनधर्म के प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव के निर्वाणोत्सव, 31 जनवरी, 2022 के अवसर पर प्रासंगिक आलेख</strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">लेखक -डॉ0 सुनील जैन, संचय</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">(जैन दर्शन के अध्येता, आध्यात्मिक चिंतक)</span></strong></p>
<p><img decoding="async" class="size-us_600_600_crop wp-image-24596 aligncenter" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/01/20220128_203501-600x600.jpg" alt="" width="600" height="600" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/01/20220128_203501-600x600.jpg 600w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/01/20220128_203501-150x150.jpg 150w" sizes="(max-width: 600px) 100vw, 600px" /></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>अहिंसा, तप, त्याग, अपरिग्रह और क्षमा जैसे गुणों की अमूल्य धरोहर देकर जैन धर्म ने विश्व शांति का मार्ग प्रशस्त किया है। जैन धर्म ही नहीं जीवन दर्शन है, जो मानव मात्र को सम्यक दर्शन की ओर उन्मुख कर मोक्ष की राह दिखाता है। इस महान धर्म और दर्शन के प्रवर्तक हैं प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव या जिन्हें आदिनाथ, बडे़ बाबा या आदिदेव भी कहा जाता है। आदिनाथ का जन्म चैत्र कृष्णा नवमी को अयोध्या के महाराजा नाभिराय तथा महारानी मरूदेवी के यहां हुआ था। माघ कृष्णा चतुर्दशी को कैलाश पर्वत पर निर्वाण हुआ।<br />
दुनिया के प्राचीनतम लिपिबद्ध धर्म ग्रंथों में से एक वेद में तथा श्रीमद्भागवद् आदि में उल्लेख के साथ ही लगभग समस्त संस्कृतियों में ऋषभदेव की किसी न किसी रूप में उपस्थिति जैन धर्म की प्राचीनता और भगवान ऋषभदेव की सर्वमान्य स्थिति को व्यक्त करती है। उन्होंने मानव जाति को पुरूषार्थ का उपदेश दिया। जीवन निर्माण, परिवार, समाज और देश के लिए उन्होंने कर्म का संदेश दिया। बडे़ ही गर्व और गौरव की बात है कि इन्हीं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से इस देश का नामकरण ‘भारतवर्ष’ हुआ।<br />
भगवान आदिनाथ ने कर्मों पर विजय प्राप्त कर दुनिया को त्याग का मार्ग बताया। उनकी शिक्षाएं मानवता के कल्याण के लिए हैं। उनके उपदेश आज भी समाज के विघटन, साम्प्रदायिक विद्वेष एवं पर्यावरण प्रदूषण को रोकने में सक्षम एवं प्रासंगिक हैं। भगवान ऋषभदेव तत्समय भी महिला साक्षरता, सशक्तीकरण तथा स्त्री समानता को महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने अपनी दोनों पुत्रियों में से पहली ब्राह्मी को अक्षर ज्ञान के साथ-साथ व्याकरण, छंद, अलंकार, रूपक, उपमा आदि के साथ स्त्रियोचित अनेक गुणों के ज्ञान से अलंकृत किया। दूसरी पुत्री सुंदरी को अंकगणतीय ज्ञान से पुरस्कृत किया। उनके द्वारा निर्मित व्याकरण शास्त्र तथा गणितीय सिद्धांतों ने महानतम ग्रंथों में स्थान प्राप्त किया है। प्रशासनिक कार्य में इस भारत भूमि को उन्होंने राज्य, नगर, खेट, कर्वट, मटम्ब, द्रोण मुख तथा संवाहन में विभाजित कर सुयोग्य प्रशासनिक, न्यायिक अधिकारों से युक्त राजा, माण्डलिक, किलेदार, नगर प्रमुख आदि के सुर्पुद किया। आदर्श दण्ड संहिता का भी प्रावधान कुशलता पूर्वक किया।<br />
डॉ एन.एन. बसु ने सिद्ध किया है कि लेखन कला और ब्राह्मी लिपी के जनक ऋषभदेव हैं। गांधीवादी चिंतक काका कालेकर का यह निष्कर्श उचित ही है -‘‘हिन्दू समाज को संस्कारी और सभ्य बनाने में ऋषभदेव का बड़ा योगदान है। कहा जाता है कि विवाह व्यवस्था, पाक शास्त्र, गणित, लेखन आदि संस्कृति के बीज समाज में ऋषभदेव ने बोए। यह सब करने के बाद अंत में उसका त्याग करके उन्होंने प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों मार्गों का आचरण करके दिखाया। ऋषभदेव ने कहा कि ‘‘कृषि करो या ऋषि बनो।‘‘<br />
ऋषभदेव का विस्तृत वर्णन श्रमण एवं वैदिक वांड्मय में तो हुआ ही है, कला में भी उनका उल्लेख प्राचीनकाल से होता आया है। ऋषभदेव की प्राचीनतम प्रतिमाएं कुषाणकाल और चौसा से मिली हैं। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों को पुरातत्व विभाग ने ऋषभदेव की बताया है। उनकी सर्वाधिक मूर्तियां उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में उत्कीर्ण हुयी हैं। मुख्यरूप से मथुरा, कुंडलपुर, अयोध्या, नवागढ़, लखनउ, ग्वालियर, खजुराहो, गोलाकोट आदि से प्राप्त प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। बिहार, उड़ीसा और बंगाल में भी अनेक महत्वपूर्ण प्राचीन प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।<br />
जैन साहित्य में भगवान ऋषभदेव की भक्ति सर्वप्रथम की जाती है। उनकी भक्ति में स्वतंत्र रूप से काव्य, पुराण, स्त्रोत, पूजाएं आदि काफी मात्रा में लिखे गए हैं। सातवीं शताब्दी में मुनिराज मानतुंग आचार्य ने भक्तामर स्तोत्र द्वारा संस्कृत में महान स्तवन भक्ति की है, जो आज जन-जन का कण्ठाहार बना हुआ है। ऋषभदेव ने एक ऐसी समाज व्यवस्था दी जो अपने आप में परिपूर्ण तो थी ही, साथ ही उसकी पृष्ठ भूमि में अध्यात्म पर आधारित नैतिकता की नींव भी थी।</p>
<p>भारतीय संस्कृति के प्रणेता एवं जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की जनकल्याणकारी शिक्षाओं द्वारा प्रतिपादित जीवन शैली आज के चुनौती भरे माहौल में बेहद प्रासंगिक है। राजनीति हो या सामाजिक जीवन हर स्थिति में उनके सिद्धांत सुमार्ग प्रशस्त करने वाले हैं। सामाजिक संरचना में उन्होंने प्रजाजनों को तीन श्रेणियों में विभाजित करते हुए उनको अपने अपने कर्तव्य, अधिकार तथा उपलब्धियों के बारे में प्रथम मार्गदर्शन किया। सर्वांगीण विकास के मूल आधारभूत तत्वों का विवेचन कर वास्तविक समाजवादी व्यवस्था का बोध कराया। प्रत्येक वर्ण व्यवस्था में पूर्ण सामंजस्य निर्मित करने हेतु तथा उनके निर्वाह के लिए आवश्यक मार्गदर्शक सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए स्वयं उसका प्रयोग या निर्माण करके प्रात्याक्षिक भी किया। अश्व परीक्षा, आयुध निर्माण, रत्न परीक्षा, पशु पालन आदि 72 कलाओं का ज्ञान प्रदर्शित किया। उनके द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं का वर्गीकरण कुछ इस प्रकार से किया जा सकता है-असि-शास्त्र विद्या, 2. मसि-पशुपालन, 3. कृषि- खेती, वृक्ष, लता वेली, आयुर्वेद, 4.विद्या- पढ़ना, लिखना, 5. वाणिज्य-व्यापार, 6.शिल्प-सभी प्रकार की कलाओं संबंधी कार्य।<br />
आज मानवता के सम्मुख भौतिकवादी चुनौतियों के कारण नाना प्रकार के सामाजिक एवं मानसिक तनाव तथा संकट व्यक्तिगत, सामाजिक एवं भूमण्डल स्तर पर दृष्टिगोचर हो रहे हैं। भगवान ऋषभदेव द्वारा बताई गई जीवन शैली की हमारी सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था में काफी प्रासंगिकता एवं महत्ता है। उनके द्वारा प्रतिपादित ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न क्षेत्रों में ऐसी झलकियां मिलती हैं, जिन्हें रेखांकित कर हम अपने सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।<br />
जैन समुदाय अपने प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के निर्वाण महोत्सव को बड़े ही धूमधाम से श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाता है। इस दिन पूरे देश में उनका अभिषेक-शांतिधारा, पूजा-विधान कर उनके चरणों में निर्वाण लड्डू समर्पित करते हैं।</p>
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