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	<title>recitation &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना भी बड़ी तपस्या: मुनिश्री विलोकसागर जी ने ‘समयसार’ ग्रंथ की वाचना कर बताए जीवन के रहस्य  </title>
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		<pubDate>Wed, 15 Oct 2025 13:35:58 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230; [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना।</strong> मुनिश्री विलोकसागरजी महाराज ने बड़े जैन मंदिर में सिद्धांत ग्रंथ ‘समयसार’ की व्याख्या करते हुए कहा कि विपरीत परिस्थितियों में मन की स्थिति को अनुकूल रखना भी एक साधना है। पूजा पाठ भक्ति अनुष्ठान व्रत उपवास तो कोई भी कर सकता है और करता भी है। वर्तमान में सांसारिक प्राणी इन्हीं सब को धर्म और तपस्या समझ रहा है लेकिन, सबसे बड़ी तपस्या मन को काबू में रखना है। विषम परिस्थितियों में समता भाव रखना ही सबसे बड़ी तपस्या है। अधिकांशतः प्राणी पाप कर्मों में लिप्त रहता है, दूसरों की निंदा करता है, दूसरों के खोट देखता है, दूसरों का बुरा सोचता है। बुरा सोचते-सोचते वह अच्छे कार्यों से दूर होता चला जाता है। भौतिकवादी चकाचौध में मनुष्य ने पाप कर्मों से डरना छोड़ दिया है लेकिन, यही कर्म जब उदय में आते हैं तो करोड़पति को खाकपति बनने में देर नहीं लगती। कर्मों की मार मनुष्य का कचूमर निकाल देती है।</p>
<p>इसलिए हमें बुरे कर्मों से डरना चाहिए, उनका पूर्णतः त्याग करना चाहिए। हमारे परिणाम बुरे है तो कर्म बुरे फल देगा और आपके परिणाम अच्छे हैं तो कर्म अच्छे फल देगा। कर्म की मार को सभी को झेलना होगा। जिसका भाग्य ही दुर्भाग्य में बदल गया हो उसे कोई क्या मारेगा, उसे तो उसके कर्म ही मारेंगे। मनुष्य अपने अवगुणों को नजरअंदाज करते हुए दूसरों के अवगुणों को देखता है, दूसरों के भावों को देखता है। हमें जो भी परिणाम मिलेगे अपने भावों की परिणीति से मिलेंगे। किसी अन्य के भावों की परिणीति से हमारा कल्याण होने वाला नहीं है। स्वयं के कर्मों को सुधारने से ही इस संसार सागर से मुक्ति मिल सकती है।</p>
<p><strong>जैन धर्म कर्म सिद्धांत पर आधारित है </strong></p>
<p>कर्म सिद्धांत की व्याख्या करते हुए मुनिश्री विबोधसागरजी ने बताया कि जैन दर्शन कर्म सिद्धांत पर आधारित है। कर्म सिद्धांत एक ऐसा सिद्धांत है जो कहता है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों (अच्छे या बुरे) के फलों के लिए स्वयं जिम्मेदार है, और इन कर्मों का प्रभाव वर्तमान और भविष्य में उसके जीवन को निर्धारित करता है। इसका मतलब है कि अच्छे कर्म अच्छे परिणाम लाते हैं, जबकि बुरे कर्म दुख का कारण बनते हैं। यह एक ष्जैसा बोओगे वैसा काटोगेष् का सिद्धांत है। जैन धर्म के अनुसार, आत्मा के कर्मों का फल केवल आत्मा को ही भोगना पड़ता है। कोई भी तंत्र मंत्र गुरु भगवान, किसी को उसके कर्मों के फल से नहीं बचा सकता। स्वयं ही कर्मों की निर्जरा करके आत्मा को कर्मों के बंधनों से मुक्त होना पड़ता है। जब तक तेरे पुण्य का, बीता नहीं करार, अवगुण तेरे माफ हैं, चाहे करो हजार। पूर्वाचार्यों ने कहा है कि जब तक मनुष्य के पुण्य कर्मों का उदय चल रहा है, तब तक वह खूब मौज मस्ती करले, सभी सुखों को भोग ले, खूब अनीति, अनाचार और पाप करले, सभी माफ हैं, लेकिन जब पाप कर्मों का उदय आएगा तो तेरा बेड़ा गर्क हो जाएगा। इसीलिए अच्छे समय में भी हमें अच्छे कर्म ही करना चाहिए, ताकि जीवन में, भविष्य में दुखों का सामना न करना पड़े।</p>
<p><strong>कर्मों के अनुरूप ही मिलता है फल</strong></p>
<p>कर्म का फल मुख्य रूप से ईश्वर ही देता है, क्योंकि वही सबसे न्यायप्रिय और सर्वशक्तिमान है। ईश्वर भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं करता। वह भी आपको कर्मों के फलस्वरूप ही परिणाम देता है। ईश्वर ही कर्मों का अंतिम और सबसे सच्चा फलदाता है क्योंकि, वह सभी के कर्मों का पल-पल का लेखा जोखा रखता है। वह अदृश्य शक्ति, वह सर्व शक्तिमान बिना किसी भेदभाव व बिना किसी पक्षपात के सभी को उनके कर्मों के अनुरूप उचित फल देता है। अपने अच्छे, बुरे भावों और विचारों से ही जीवन शांत-अशांत और सुख, दुःख का कारण बनता है। परिणामों का खेल बड़ा विचित्र है, क्योंकि स्वर्ग, नरक से लेकर मोक्ष तक की स्थिति में भी परिणामों का प्रतिफल ही एकमात्र कारण है।</p>
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		<title>चातुर्मास आत्म शुद्धि और तपस्या का विशेष अवसर : साधना से आत्मा को प्रकाशित करते हैं जैन साधु-संत  </title>
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		<pubDate>Sat, 21 Jun 2025 16:15:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व काफी बताया गया है। दिगंबर जैन समाज के धर्मावलंबी चातुर्मास के लिए कितने उत्साहित रहते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि मुनियों, आचार्यों और साधुओं के नगर आगमन पर उनसे अपने शहर, गांव और कस्बे में वर्षायोग करने के लिए विशेष तौर अनुनय-विनय किया जाता [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व काफी बताया गया है। दिगंबर जैन समाज के धर्मावलंबी चातुर्मास के लिए कितने उत्साहित रहते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि मुनियों, आचार्यों और साधुओं के नगर आगमन पर उनसे अपने शहर, गांव और कस्बे में वर्षायोग करने के लिए विशेष तौर अनुनय-विनय किया जाता है। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चार महीने की अवधि होती है। यह अवधि आमतौर पर जुलाई या अगस्त से अक्टूबर या नवंबर तक होती है, जब मानसून का मौसम होता है। <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर</strong>। जैन धर्म में चातुर्मास का महत्व काफी बताया गया है। दिगंबर जैन समाज के धर्मावलंबी चातुर्मास के लिए कितने उत्साहित रहते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि मुनियों, आचार्यों और साधुओं के नगर आगमन पर उनसे अपने शहर, गांव और कस्बे में वर्षायोग करने के लिए विशेष तौर अनुनय-विनय किया जाता है। आखिर ऐसा क्या है, चातुर्मास में। इन्हीं प्रश्नों का जबाव जानने की कोशिश करते हैं। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चार महीने की अवधि होती है। यह अवधि आमतौर पर जुलाई या अगस्त से अक्टूबर या नवंबर तक होती है, जब मानसून का मौसम होता है। जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास का महत्व इस प्रकार बताया गया है। तपस्या और आत्म शुद्धि के लिए जैन समाज के लोग सहित मुनिराज भी तत्पर रहते हैं। चातुर्मास के दौरान साधु और श्रावक तपस्या और आत्मशुद्धि के लिए विशेष प्रयास करते हैं। वे अपने आध्यात्मिक विकास के लिए कठोर तपस्या करते हैं और अपने जीवन को अधिक पवित्र बनाने का प्रयास भी करते हैं। चातुर्मास के दौरान जैन समुदाय में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इनमें पूजा, पाठ, और अन्य धार्मिक गतिविधियां शामिल होती हैं। इससे जहां भगवान भक्ति, साधुओं के प्रति कृतज्ञता और उनसे आशीष पाने की आकांक्षा भी रहती है। चातुर्मास केवल श्रावक-श्राविकाओं के लिए विशिष्ट अवसर लेकर नहीं आता बल्कि इसमें साधुओं के लिए महत्व है। वे चातुर्मास के दौरान एक ही स्थान पर रहते हैं। जिससे वे अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकें। इस दौरान वे अपने अनुयायियों को धार्मिक शिक्षा प्रदान करते हैं और उनके साथ धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। दूसरी ओर यह भी विशेषतौर पर जानना बेहद जरूरी है कि वर्षाकाल में तेज बारिश से मार्ग दुर्गम हो जाते हैं। बाढ़, कीचड़ और गंदगी चारों ओर फैलती है। इससे साधुओं, मुनियों को पद विहार में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वर्षाकाल में कई जीवों की उत्पत्ति भी होती है, जो बारिश के पानी में धरती पर विचरण करते हैं। इसलिए जीवदया की दृष्टि से भी पद विहार संभव नहीं हो पाता।</p>
<p><strong>चातुर्मास के दौरान विशेष कार्यक्रम जो अनिवार्यतः होते हैं</strong></p>
<p>चातुर्मास के दौरान जैन समुदाय में विभिन्न विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें पूजा और पाठ तो होते ही हैं। चातुर्मास के दौरान जैन मंदिरों में पूजा और पाठ के साथ धर्मसभाओं के माध्यम से दैविक ज्ञान का प्रसार भी होता है। साधु और विद्वान धार्मिक प्रवचन देते हैं, जिसमें वे जैन धर्म के सिद्धांतों और मूल्यों पर चर्चा करते हैं। चातुर्मास में जैन श्रावक तपस्या और उपवास भी करते हैं। जिससे वे अपने आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा दे सकें। इसी तरह जैन समुदाय सामूहिक अनुष्ठानों में भाग लेता है, जैसे कि सामूहिक पूजा और पाठ, अभिषेक, शांतिधारा, विधान आदि।</p>
<p><strong>निष्कर्ष यह है कि </strong></p>
<p>चातुर्मास जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण कालखंड होता है। जिसमें साधु और श्रावक विशेष धार्मिक अनुष्ठानों और तपस्याओं में संलग्न रहते हैं। इस दौरान वे अपने आध्यात्मिक विकास के लिए कठोर तप, आराधना करते हैं और अपने जीवन को अधिक पवित्र बनाने का प्रयास करते हैं। हां, जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के लिए विशेष संदेश है। जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास को एक महत्वपूर्ण समय माना जाता है, जिसमें साधु और श्रावक अपने आध्यात्मिक विकास को परम गहराई तक ले जाने के लिए चार महीने तक लीन रहते हैं।</p>
<p><strong>जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास का महत्व </strong></p>
<p>जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के बारे में कई उल्लेख मिलता है। आचार्य कुंदकुंद के ग्रंथ में आचार्य कुंदकुंद ने चातुर्मास के महत्व पर प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा है कि चातुर्मास के दौरान साधुओं को अपने आध्यात्मिक विकास के लिए विशेष प्रयास करना चाहिए। वहीं आचारांग सूत्र में चातुर्मास के नियमों और अनुष्ठानों का वर्णन है। इसमें कहा गया है कि चातुर्मास के दौरान साधुओं को एक ही स्थान पर रहना चाहिए और अपने आध्यात्मिक विकास के लिए कठोर तपस्या करनी चाहिए।</p>
<p><strong>चातुर्मास के लिए विशेष संदेश</strong></p>
<p>जैन धर्म ग्रंथों में चातुर्मास के लिए विशेष संदेश भी परिलक्षित होता है। जिसमें साधुओं और श्रावकों को अपने आध्यात्मिक विकास के लिए विशेष प्रयास करना चाहिए। चातुर्मास के दौरान, साधुओं और श्रावकों को तपस्या और आत्म-शुद्धि के लिए कठोर प्रयत्न कर जीवन में संयम, तप और साधना के मार्ग को अपनाना चाहिए। जैन समुदाय विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित कर पूजा, पाठ, और अन्य धार्मिक गतिविधियों के माध्यम से भगवान की जितनी अधिक आराधना कर सकें जरूर करें। धर्म प्रभावना के लिए यह बेहद जरूरी है।</p>
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		<title>अभिषेक से रोग, शोक और संकट होते हैं दूर : अभिषेक शांतिधारा पाठ में दिखा धार्मिक उल्लास </title>
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		<pubDate>Wed, 26 Mar 2025 03:33:40 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[आचार्य श्री विश्वरत्न सागर जी आदि ठाणा जैन श्वेताबर मंदिर में विराजमान हैं। आचार्य श्री की निश्रा में अभिषेक, शांतिधारा पाठ, विभिन्न मंत्रोचार द्वारा करवाया गया। इसमें बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। रामगंजमंडी से अभिषेक जैन की यह खबर&#8230; रामगंजमंडी। यहां आचार्य श्री विश्वरत्न सागर जी आदि ठाणा जैन श्वेताबर मंदिर में विराजमान है। [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>आचार्य श्री विश्वरत्न सागर जी आदि ठाणा जैन श्वेताबर मंदिर में विराजमान हैं। आचार्य श्री की निश्रा में अभिषेक, शांतिधारा पाठ, विभिन्न मंत्रोचार द्वारा करवाया गया। इसमें बड़ी संख्या में समाजजन मौजूद रहे। <span style="color: #ff0000">रामगंजमंडी से अभिषेक जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>रामगंजमंडी।</strong> यहां आचार्य श्री विश्वरत्न सागर जी आदि ठाणा जैन श्वेताबर मंदिर में विराजमान है। आचार्य श्री की निश्रा में महा प्रभावशाली, महा चमत्कारी, परमात्मा का अभिषेक, शांतिधारा पाठ, विभिन्न मंत्रोचार द्वारा करवाया गया। अलग-अलग प्रकार की औषधियों से प्रभु का संगीतमय अभिषेक किया। जिसमें सकल श्री संघ के महिला, पुरुष और बच्चों ने इस अभिषेक लाभ लिया। इंदौर से पधारी अदिति कोठारी ने अपनी मधुर वाणी से इस अभिषेक में भजनों से उल्लास मय वातावरण बना दिया।</p>
<p><strong>अभिषेक में इन्होंने भाग लिया</strong></p>
<p>अभिषेक में समाज के ज्ञानचंद डांगी, प्रकाश धारीवाल, धरमचंद सकलेचा, संदीप मेहता, प्रदीप तिल्लानी, विकास श्रीश्री माल, अभिषेक बम, विकल्प डांगी, महेंद्र तांतेड़, विनोद लोढ़ा चौमहला वाले, मंगल डांगी, महावीर मेहता, अंशुल मेहता, निलेश लोढ़ा संजय मेहताआदि ने सपरिवार उपस्थित होकर परमात्मा का अभिषेक किया। रात्रि में गुरुदेव के श्रीमुख से जिनवाणी का श्रवण श्री संघ द्वारा लिया गया।</p>
<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-77517" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250326-WA0000.jpg" alt="" width="720" height="1280" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250326-WA0000.jpg 720w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250326-WA0000-169x300.jpg 169w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2025/03/IMG-20250326-WA0000-576x1024.jpg 576w" sizes="(max-width: 720px) 100vw, 720px" />सुबह प्रवचन होंगे</strong></p>
<p>26 मार्च को सुबह 9 बजे आचार्य श्री के प्रवचन रहेंगे। अपरान्ह 3.30 बजे आचार्य श्री का भवानीमंडी की ओर विहार होगा। 30 मार्च को भवानीमंडी में गुरुदेव की महा मांगलिक भवानीमंडी में रहेगी।</p>
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		<title>उत्सव पर प्रकृति को प्रदूषित करना ठीक नही</title>
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		<pubDate>Wed, 19 Oct 2022 10:26:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज भगवान महावीर के निर्वाण और गौतम गणधर के केलवज्ञान से जुड़ा पर्व दीपावली आ रहा है। सुबह तो महावीर भगवान को मोक्ष हुआ था और उसी दिन शाम को गौतम गणधर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ था। ऐसे में दीपावली पर्व ना सिर्फ खुशी का पर्व है, बल्कि इसका धार्मिक महत्व [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज</strong></p>
<p><strong>भगवान महावीर के निर्वाण और गौतम गणधर के केलवज्ञान से जुड़ा पर्व दीपावली आ रहा है।</strong></p>
<p>सुबह तो महावीर भगवान को मोक्ष हुआ था और उसी दिन शाम को गौतम गणधर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ था। ऐसे में दीपावली पर्व ना सिर्फ खुशी का पर्व है, बल्कि इसका धार्मिक महत्व भी है। यही कारण है कि दीपावली पर आपको क्या करना चाहिए यह जानना भी महत्वपूर्ण है। पूजन, पाठ, अभिषेक, निर्वाण लड्डू चढ़ाना, सरस्वती पूजन, गौतम गणधर पूजन आदि इस पर्व की मुख्य कार्य हैं। इस पर्व पर अपनी प्रसन्नता हम दीपक जलाकर और जरूरतमंदों को दीपक, मिठाई, कपड़े बांट कर व्यक्त करें तथा धर्म प्रभावना करें।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-28418 size-full" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/PostDiwali.jpg" alt="" width="680" height="390" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/PostDiwali.jpg 680w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/PostDiwali-300x172.jpg 300w" sizes="(max-width: 680px) 100vw, 680px" /></p>
<p>लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि भगवान महावीर और गौतम गणधर से जुड़े उत्सव पर अगर प्रकृति प्रदूषित हो तो क्या उन्हें अच्छा लगेगा? आज हम जिस तरह से यह त्योंहार मना रहे हैं उससे जलवायु, पर्यावरण आदि प्रदूषित हो रहे हैं। पक्षियों की जान जा रही है। पटाखे फोड़ने से कितना नुकसान हो रहा है यह हम और आप सोच भी नहीं सकते।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone wp-image-28419 size-full" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/Screen-Shot-2019-10-24-at-6.21.55-PM-1.png" alt="" width="748" height="406" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/Screen-Shot-2019-10-24-at-6.21.55-PM-1.png 748w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/Screen-Shot-2019-10-24-at-6.21.55-PM-1-300x163.png 300w" sizes="(max-width: 748px) 100vw, 748px" /></p>
<p>बीबीसी हिंदी से बात करते हुए देश के प्रसिद्ध डॉक्टर अरविंद कुमार ने कहा, “जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसके फेफड़े गुलाबी होते हैं लेकिन बीते कुछ वक्त से मैं काले फेफड़े देख रहा हूँ। ये सब प्रदूषण की वजह से होता है। ये हम सबके शरीर को खोखला कर रहा है। एक चेस्ट डॉक्टर होने के नाते मैंये बातें अच्छे से समझता हूं। प्रदूषण फैलाने में पटाखों की भूमिका बहुत ज्यादा है। इसका पहला कारण यह है कि आप एक तय वक्त में बहुत ज्यादा मात्रा में पटाखे फोड़ते हैं। दूसरा कारण यह है कि पटाखे आप अपने एक मीटर के दायरे में फोड़ते हैं। ऐसे में उससे निकलने वाला धुंआ सीधा आपके शरीर में जाता है।</p>
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<p>डॉक्टर अरविंद समझाते हैं कि अगर एक ट्रक या बस से धुंआ निकल रहा है तो सबसे ज्यादा उस तेल के पाइप के पास से निकल रहा होता है, लेकिन कोई उस पाइप के पास जाकर खड़ा नहीं होता है। ऐसे में पटाखों के मुकाबले इसका कम असर होता है, लेकिन पटाखे हम बहुत पास से चलाते हैं और यही कारण है कि यह वाहनों के प्रदूषण से भी ज्यादा हानिकारक साबित होता है। तो आप स्वयं भी पटाखों से दूर रहिए और बच्चों को भी दूर रखिए, अन्यथा अस्थमा का अटैक आ सकता है। निमोनिया के मामले बढ़ सकते हैं। दिमाग के विकास में दिक्कत आ सकती है। फेफड़े से संबंधित होने वाली बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone  wp-image-28422" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/958011-firecraker-1-300x171.jpg" alt="" width="612" height="349" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/958011-firecraker-1-300x171.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/958011-firecraker-1.jpg 700w" sizes="auto, (max-width: 612px) 100vw, 612px" /></p>
<p>एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक फुलझड़ी जलने से होने वाला नुकसान 74 सिगरेट पीने के बराबर होता है। पटाखों में आने वाले स्नैक को जलाने से 462 सिगरेट पीने जितना असर होता है। वही अनार को जलाने से 34 सिगरेट पीने जितना असर पड़ता है। अब आप सोचिए कि हम पटाखे चला कर कैसे खुद को और पर्यावरण को खतरे में डाल रहे हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-medium wp-image-28423" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/unnamed-file-300x225.jpg" alt="" width="300" height="225" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/unnamed-file-300x225.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/unnamed-file-74x55.jpg 74w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/unnamed-file-111x83.jpg 111w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/unnamed-file-215x161.jpg 215w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2022/10/unnamed-file.jpg 686w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></p>
<p>जागरण डॉट कॉम ने लिखा है कि जब पटाखों से तेज आवाज निकलती है तो जीवों के लिए यह आवज 1 हजार गुना ज्यादा हो जाती है, जिससे इन जीवों के कान के पर्दे फटने का ज्यादा खतरा रहता है। पटाखों से निकलने वाली जहरीली गैस (सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, मोनोडाइआक्साइड) हमें ऑक्सीजन देने वाले पेड़-पौधो को नुकसान पहुंचाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां पर इन गैसों का प्रभाव ज्यादा होता है वहां पर कई बार पेड़-पौधे सूख तक जाते हैं या पीले पड़ जाते हैं। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि पटाखे कितना नुकसान पहुंचाते हैं।</p>
<p><strong>अब निर्णय आपको करना है भगवान महावीर के निर्वाणोत्सव जैसे पर्व पर हमें असंख्यात जीवों की हत्या का दोष लेना है या पर्यावरण सुरक्षित रखते हुए सभी जीवों के कल्याण की भावना के साथ इसे मनाना है।</strong></p>
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