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	<title>Ravi Yoga &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान ऋषभनाथ जी ने अक्षय तृतीया पर ही किया था पारणा: इस बार अक्षय तृतीया तिथि अनुसार 30 अप्रैल को </title>
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		<pubDate>Tue, 29 Apr 2025 13:22:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जैन समाज के साथ हिन्दु समाज में अक्षय तृतीया का धार्मिक उल्लास है। इस बार अक्षय तृतीया 30 अप्रैल को आ रही है। इस दिन भगवान ऋषभनाथ जी को लगभग एक वर्ष के बाद आहार मिला था। उन्होंने इक्षु रस से पारणा किया था। यह इंदौर वासियों के लिए भी सौभाग्य की बात है कि [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जैन समाज के साथ हिन्दु समाज में अक्षय तृतीया का धार्मिक उल्लास है। इस बार अक्षय तृतीया 30 अप्रैल को आ रही है। इस दिन भगवान ऋषभनाथ जी को लगभग एक वर्ष के बाद आहार मिला था। उन्होंने इक्षु रस से पारणा किया था। यह इंदौर वासियों के लिए भी सौभाग्य की बात है कि इसी दिन 30 अप्रैल को आचार्यश्री विशुद्धसागरजी महाराज को पट्टाचार्य की पदवी से विभूषित किया जाएगा। यह सुसंयोग सुमतिधाम की धरा पर बन रहा है। अक्षय तृतीया को लेकर वैसे तो असंख्य मान्यताएं हैं, लेकिन इनमें से प्रमुख मान्यताओं के बारे में <span style="color: #ff0000">श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में उपसंपादक प्रीतम लखवाल की कलम से जानिए&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> जैन समाज के साथ हिन्दु समाज में अक्षय तृृतीया का धार्मिक उल्लास है। इस बार अक्षय तृतीया 30 अप्रैल को आ रही है। जब भगवान ऋषभदेव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हो तप और मौन साधना करने के बाद आहार के लिए नगर और ग्रामों में विहार करने लगे, कोई भी अज्ञानता के कारण विधि पूर्वक उन्हें आहार नहीं देता था। छह माह बाद जब पुनः आहार के लिए हस्तिनापुर पहुंचे तब वहां के राजा श्रेयांस ने उन्हें इक्षु रस प्रदान किया। इससे उन्होंने आहार प्राप्त किया। जिस दिन यह आहार प्राप्त किया। उस दिन वैशाख मास की अक्षय तृतीया थी। इधर, यह इंदौर वासियों के लिए भी सौभाग्य की बात है कि इसी दिन 30 अप्रैल को आचार्यश्री विशुद्धसागरजी महाराज को पट्टाचार्य की पदवी से विभूषित किया जाएगा। यह सुसंयोग सुमतिधाम की धरा पर बन रहा है। अक्षय यानि कभी जिसका क्षय न हो, इस तिथि का जैन धर्म से गहरा संबंध है। हिन्दु धर्म में यह अति पुण्यकारी तिथि के रूप में वर्णित है। यह भी मान्यता है कि इस तिथि पर होने वाले विवाह भी अक्षय होते हैं। हिन्दू धर्म में अक्षय तृतीया पर्व का बहुत अधिक महत्व है। अक्षय तृतीया का पर्व इस वर्ष अत्यंत विशिष्ट संयोगों के साथ मनाया जाएगा। 30 वर्षों बाद इस पावन दिन पर बुधवार का दिन रोहिणी नक्षत्र, शोभन योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग एक साथ बन रहे हैं। ज्योतिषाचार्यों के इस दुर्लभ संयोग में किया गया हर पुण्यकर्म अक्षय फल देने वाला होगा और जीवन में सुख, समृद्धि तथा उन्नति के द्वार खोलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया को युगादि तिथि भी कहा जाता है। इसी दिन त्रेता युग का प्रारंभ हुआ था। इस दिन दान, जप, तप, हवन आदि कर्मों का फल अनंत गुना हो जाता है। जैन धर्म के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने पारणा इसी दिन राजा श्रेयांश द्वारा इक्षुरस (गन्ने के रस) से किया था। इसलिए आहार दान, जलदान और औषधि दान का विशेष महत्व है। जैन धर्म में अक्षय तृतीया को इक्षु तृतीया भी कहा जाता है।</p>
<p><strong>जैन धर्म में अक्षय तृतीया का महत्व</strong></p>
<p>प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ ने 6 महीने आहार और 6 महीने बिना आहार व्रत ले रखा था। जब वे आहार के लिए विहार करते तो उन्हें विधि-विधान से आहार नहीं मिला। ऐेसे में उन्हें आहार मिले एक वर्ष बीत गया। एक वर्ष बाद जब उन्हें विधि अनुसार आहार मिला उस दिन अक्षय तृतीया थी। हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस ने आहार दान किया था। इसलिए इस दिन दान का महत्व भी बहुत अधिक है। अक्षय तृतीया पर जैन समाजजन दान करते हैं, क्योंकि यह माना जाता है कि भगवान ऋषभनाथ ने सबसे पहले समाज में दान का महत्व समझाया था। जैन धर्म में अक्षय तृतीया को इक्षु तृतीया भी कहा जाता है। अक्षय तृतीया पर दान में जैन धर्म के लोग आहार दान, ज्ञान दान, औषधि दान या मंदिरों में दान करते हैं।</p>
<p><strong>अक्षय तृतीया पर यह भी जानें</strong></p>
<p>अक्षय तृतीया के दिन नए युग की शुरूआत हुई थी। इस दिन से त्रेतायुग का आरंभ हुआ था। मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगवान विष्णु के छटवें अवतार के रूप में भगवान परशुराम का प्रकटीकरण हुआ था। अक्षय तृतीया के दिन से ही महर्षि वेद व्यास ने भगवान श्रीगणेश की सहायता से महाभारत का लेखन आरंभ करवाया था। एक अन्य मान्यता है कि इसी दिन लंका विजय के बाद भगवान श्रीराम ने अग्नि परीक्षा लेकर माता सीता को दुबारा अपनाया था। एक और किवदंती है कि पांडवों को इसी दिन अक्षय पात्र प्राप्त हुआ था, जिसमें कभी भोजन समाप्त नहीं होता था।</p>
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		<title>रविपुष्य, सर्वार्थ सिद्धि योग में 6 अप्रैल को मनेगी रामनवमी: रामनवमी पर दान और पूजा का बहुत फल मिलेगा </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Apr 2025 13:06:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान राम का जन्म हुआ था। भारतीय संस्कृति में इस दिन का अपूर्व पुण्य माना जाता है। इस दिन सरयू नदी में स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत, दान और पूजा करने से पुण्य लाभ मिलेगा। इस दिन विशेष संयोग भी बन रहा है। मुरैना से पढ़िए [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को भगवान राम का जन्म हुआ था। भारतीय संस्कृति में इस दिन का अपूर्व पुण्य माना जाता है। इस दिन सरयू नदी में स्नान का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत, दान और पूजा करने से पुण्य लाभ मिलेगा। इस दिन विशेष संयोग भी बन रहा है। <span style="color: #ff0000">मुरैना से पढ़िए मनोज जैन की यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>मुरैना</strong>। चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को कौशल्या की कोख से पुरुषोत्तम भगवान राम का जन्म हुआ था। भारतीय जीवन में यह दिन पुण्य पर्व माना जाता है। इस दिन पुण्य सलिला सरयू नदी में स्नान करके लोग पुण्य लाभ कमाते हैं। ज्योतिषाचार्य डॉ.हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस साल रामनवमी 6 अप्रैल रविवार को मनाई जाएगी और इस दिन सुकर्मा योग, रवि योग, रवि पुष्य योग, सर्वार्थ सिद्धि और पुष्य नक्षत्र का संयोग है। रविवार और रविपुष्य नक्षत्र के कारण इस बार रविपुष्य योग बन रहा है। इसलिए इस बार राम नवमी खास है। साथ ही दान और पूजा का बहुत फल मिलेगा। इस साल अष्टमी तिथि 5 अप्रैल शनिवार शाम को 7.26 मिनट तक रहेगी और इसके बाद नवमी तिथि शुरू हो जाएगी। इसलिए उदया तिथि को नवमी तिथि होने के कारण 6 अप्रैल राम नवमी मनाई जाएगी। जैन ने कहा नवमी के इस व्रत को करने से हमें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरित्र के आदर्शों को पहचाने का अवसर मिलता है। हमें उन आदर्शों को अपनाना चाहिए। भगवान की गुरु सेवा, जाति, पाति का भेदभाव मिटाना, शरणागत की रक्षा करना, भाइयों का प्रेम, मातृ-पितृ भक्त, एक पत्नी व्रत, पवनसुत हनुमान तथा अंगद की स्वामी भक्ति, गिद्धराज की कर्तव्यनिष्ठता तथा केवट आदि के चरित्रों की महानता को हमें पढ़ना चाहिए और उसका अनुसरण करना चाहिए।</p>
<p><strong> रामनवमी पूजन मुहूर्त</strong></p>
<p>रामनवमी पूजा अनुष्ठान आदि करने हेतु मध्यान्ह का समय सर्वाधिक शुभ होता है। मध्यान्ह काल 6 घटी अर्थात लगभग 2 घंटे 24 मिनट तक रहता है। मध्यान्ह के मध्य का समय श्रीराम जी के जन्म के क्षण को दर्शाता है तथा मंदिरों में इस क्षण को भगवान श्रीराम के जन्म काल के रूप में मनाया जाता है। इस दौरान भगवान श्रीराम के नाम का जाप और जन्मोत्सव अपने चरम पर होता है। पूजन मुहूर्त रामनवमी मध्यान्ह समय में 11.08 बजे से दोपहर 1.36 बजे तक इसका कुल समय 2 घंटे 28 मिनट। रामनवमी मध्यान्ह का क्षण दोपहर 12.22बजे रहेगा।</p>
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