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	<title>Rath Yatra श्रीफल जैन न्यूज &#8211; श्रीफल जैन न्यूज़</title>
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		<title>भगवान महावीर जन्म कल्याणक 30 को मनाएंगे : जैन वीर मंडल कुचामन सिटी के तत्वावधान में होगा आयोजन  </title>
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		<pubDate>Tue, 24 Mar 2026 11:28:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जिओ और जीने दो सूत्र के प्रतिपादक, वर्तमान शांसन नायक, अहिंसा मय विश्वधर्म के प्रवर्तक जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर भगवान महावीर के 2625 वे जन्म कल्याणक पर कुचामन में श्री जैन वीर मंडल के तत्ववाधान में चैत्र सुदी तेरस सोमवार 30 मार्च को भव्य आयोजन किया जाएगा। कुचामनसिटी से पढ़िए, यह खबर&#8230; कुचामनसिटी। जिओ [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जिओ और जीने दो सूत्र के प्रतिपादक, वर्तमान शांसन नायक, अहिंसा मय विश्वधर्म के प्रवर्तक जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर भगवान महावीर के 2625 वे जन्म कल्याणक पर कुचामन में श्री जैन वीर मंडल के तत्ववाधान में चैत्र सुदी तेरस सोमवार 30 मार्च को भव्य आयोजन किया जाएगा। <span style="color: #ff0000">कुचामनसिटी से पढ़िए, यह खबर&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>कुचामनसिटी।</strong> जिओ और जीने दो सूत्र के प्रतिपादक, वर्तमान शांसन नायक, अहिंसामय विश्वधर्म के प्रवर्तक जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर भगवान महावीर के 2625 वे जन्म कल्याणक पर कुचामन में श्री जैन वीर मंडल के तत्ववाधान में चैत्र सुदी तेरस सोमवार 30 मार्च को भव्य आयोजन किया जाएगा। सौभागमल गंगवाल और सुभाष पहाडिया ने बताया कि सुबह साढ़े 6 बजे सभी जिनालयों में अभिषेक, शांतिधारा और भगवान महावीर के पूजा विधान किए जाएंगे। अजमेरी मंदिर के जयकुमार पहाडिया और मनोज पांड्या ने बताया कि प्रातः 9 बजे मंदिर से घटयात्रा जूलूस पलटन गेट, गोल प्याऊ, सब्जी मंडी स्थित महावीर चौक पर पहुंचेगा और यहां झंडारोहण कर बसस्टैंड, अंबेडकर सर्किल, डीडवाना रोरड, अहिंसा सर्किल होते हुए महावीर उद्यान में पांडुक शिला पर श्रीजी का कलशाभिषेक किया जाएगा। शांतिधारा के बाद जुलूस डीडवाना रोड होते हुए आथुना दरवाजा उपासरा गली से धानमंडी मंदिर पहुंचेगा। णमोकार महामंत्र का जाप किया जाएगा। शाम 4 बजे श्रीजी को रथ में विराजमान कर भव्य रथयात्रा पलटन गेट, आथुना दरवाजा होते हुए धान मंडी के मंदिर में पहुंचेगी और श्रीजी को मंदिर में विराजमान किया जाएगा। शाम को साढ़े सात बजे आरती और सांस्कृतिक प्रोग्राम होंगे।</p>
<p>जन्म कल्याणक के पूर्व दिवस 29 मार्च को जिओ और जीने दो के उद्देश्यों से जैन समाज और सर्व समाज द्वारा मानव सेवार्थ रक्तदान शिविर का आयोजन सुबह 9 से अपरान्ह 3 बजे तक महावीर भवन पुरानी धानमंडी में लगाया जाएगा। देवेंद्र पहाड़िया ने बताया कि शाम 7 बजे अहिंसा सर्किल डीडवाना रोड पर दीप प्रज्वलन कर आरती कर विश्व शांति के लिए णमोकार महामंत्र का जाप किया जाएगा। सुभाष रावका, अशोक झाझंरी ने बताया कि जुलुस में पुरुष सफेद वस्त्र और महिलाएं केसरिया परिधान पहनकर जुलूस में शामिल होंगे।</p>
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		<title>अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज का रहेगा सानिध्य : श्री आदिनाथ जयंती पर 12 मार्च से 30 मार्च तक होंगे विविध धार्मिक आयोजन </title>
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		<pubDate>Wed, 11 Mar 2026 07:53:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[प्रथम तीर्थंकर षट्कर्म उपदेशक 1008 श्री आदिनाथ भगवान की जयंती के उपलक्ष्य में इंदौर में 12 मार्च से 30 मार्च तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। कार्यक्रमों का आयोजन श्री दिगम्बर जैन पंचबालयति मंदिर, ए.बी. रोड, इंदौर में किया जाएगा। कार्यक्रम में अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रथम तीर्थंकर षट्कर्म उपदेशक 1008 श्री आदिनाथ भगवान की जयंती के उपलक्ष्य में इंदौर में 12 मार्च से 30 मार्च तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। कार्यक्रमों का आयोजन श्री दिगम्बर जैन पंचबालयति मंदिर, ए.बी. रोड, इंदौर में किया जाएगा। कार्यक्रम में अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज का सानिध्य रहेगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> प्रथम तीर्थंकर षट्कर्म उपदेशक 1008 श्री आदिनाथ भगवान की जयंती के उपलक्ष्य में इंदौर में 12 मार्च से 30 मार्च तक प्रतिदिन शाम 7 बजे से विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। कार्यक्रमों का आयोजन श्री दिगम्बर जैन पंचबालयति मंदिर, ए.बी. रोड, इंदौर में किया जाएगा। कार्यक्रम मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज के परम सान्निध्य में आयोजित होगा। इस अवसर पर अभिषेक, शांतिधारा, प्रवचन, भक्तामर आराधना तथा भजन संध्या जैसे धार्मिक कार्यक्रम होंगे। आयोजन के अंत में श्रद्धालुओं के लिए वात्सल्य भोज का भी आयोजन किया जाएगा।</p>
<p><strong>स्वर्ण रथ यात्रा से होगी शुरुआत</strong></p>
<p>कार्यक्रम के मुख्य सूत्रधार ब्रह्मचारी जिनेश जैन ने बताया कि 12 मार्च, गुरुवार को सुबह 8 बजे स्वर्ण रथ यात्रा निकाली जाएगी। यह रथ यात्रा तुलसीनगर जैन मंदिर से प्रारंभ होकर महालक्ष्मी नगर जैन मंदिर होते हुए पंचबालयति मंदिर पहुंचेगी। इसी दिन स्कीम नंबर 78 से भी स्वर्ण रथ यात्रा पंचबालयति मंदिर तक निकाली जाएगी। कार्यक्रम में संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागरजी महाराज का स्मरण करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए धर्मानुरागी बंधुओं से इष्ट मित्रों सहित उपस्थित होकर पुण्य लाभ अर्जित करने का आह्वान किया गया है।</p>
<p><strong>इनका रहेगा संयोजक</strong></p>
<p>स्वर्ण रथ के सारथी नवीन गौधा, हर्ष तृप्ति जैन (शाश्वत ग्रुप), आर. के. जैन, वीरेन्द्र चंद्रकांता, वियान और वानिका हैं। इस आयोजन में श्री दि. जैन पंचबालयति पारमार्थिक एवं धार्मिक ट्रस्ट, श्री दि. जैन मंदिर सुखलिया, श्री आदिनाथ दि. जैन मंदिर कुमेढ़ी, श्री दि. जैन रेक्टिरेंज प्रतिभास्थली, श्री दि. जैन मंदिर बजरंग नगर, श्री नंदानगर दि. जैन मंदिर, श्री दि. जैन मंदिर सेठवाल समाज, श्री पद्मप्रभु चैत्यालय नन्दानगर, श्री दि. जैन मंदिर परदेशीपुरा, श्री दि. जैन मंदिर क्लर्क कॉलोनी, इंदौर, श्री दि. जैन मंदिर गौरीनगर, दि. जैन मंदिर भागीरथपुरा, श्री दि. जैन मंदिर पाटनीपुरा, श्री दि. जैन मंदिर न्यू देवास रोड, श्री दि. जैन मंदिर स्नेहलतागंज, श्री दि. जैन मंदिर एलआईजी, श्री शांतिनाथ मंदिर जावरा वाला, श्री पार्श्वनाथ मंदिर विजयनगर, स्कीम 78 नया एवं पुराना मंदिर, श्री दि. जैन मंदिर सेटेलाइट, श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर सिंगापुर टाउनशिप ब्रिटिश पार्क फेस-1, श्री दि. जैन मंदिर शिखर जी ड्रीम, श्री दि. जैन मंदिर विस्तारा, दि. जैन मंदिर महालक्ष्मी नगर, श्री दि. जैन मंदिर तुलसीनगर, श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन एम्पायर मेट्रो बायपास इंदौर और श्री दिगम्बर जैन मंदिर द एड्रेस सहित कई संस्थाओं का सहयोग रहेगा।</p>
<p>कार्यक्रम का आयोजन पूर्वात्तर क्षेत्र एवं समस्त इंदौर नगर के सहयोग से किया जा रहा है।</p>
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		<title>गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में हुआ इंद्रध्वज विधान : विधान में माताजी का मिला परम् आशीर्वाद, गदगद हुए श्रावक-श्राविकाएं </title>
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		<pubDate>Sat, 07 Mar 2026 06:29:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[शाश्वत तीर्थ अयोध्या में नवनिर्मित 101 भगवान के मंदिर में प्रथम बार इंद्रध्वज विधान का आयोजन हुआ। खूब धूमधाम से पूर्णाहुति हवन एवं रथयात्रा के साथ विधान के समापन पर गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ। पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह रिपोर्ट&#8230; अयोध्या। शाश्वत तीर्थ अयोध्या में नवनिर्मित 101 भगवान [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>शाश्वत तीर्थ अयोध्या में नवनिर्मित 101 भगवान के मंदिर में प्रथम बार इंद्रध्वज विधान का आयोजन हुआ। खूब धूमधाम से पूर्णाहुति हवन एवं रथयात्रा के साथ विधान के समापन पर गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ। <span style="color: #ff0000">पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>अयोध्या।</strong> शाश्वत तीर्थ अयोध्या में नवनिर्मित 101 भगवान के मंदिर में प्रथम बार इंद्रध्वज विधान का आयोजन हुआ। खूब धूमधाम से पूर्णाहुति हवन एवं रथयात्रा के साथ विधान के समापन पर गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त हुआ। आयोजक अध्यात्म जैन, अर्पिता जैन पुत्र, सम्यक जैन लखनऊ परिवार उपस्थित थे। इस अवसर पर डॉ जीवन प्रकाश जैन जी ने कहा कि पद्मनंदिपंचविंशतिका के स्वाध्याय के कारण बचपन से ही विकसित वैराग्य के बीज 1952 में शरदपूर्णिमा के दिन ही प्रस्फुटित हुए, जब बाराबंकी में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी महाराज से सप्तम प्रतिमा (ब्रह्मचर्य) के व्रत अंगीकार किए। 1953 में चैत्र कृष्णा एकम् को श्री महावीर जी में आपने आचार्य श्री देशभूषण जी से क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण कर ‘वीरमती’ नाम प्राप्त किया। व्रत एवं नियमों का कठोरता से पालन करते हुए आप अपनी संज्ञा ‘वीरमती’ को तो सार्थक कर ही रही थीं, किन्तु आपको मात्र क्षुल्लिका के व्रतों से संतोष कहां। 19 वर्ष की यौवनावस्था में क्षुल्लिका के व्रतों का कठोरता से पालन करने के साथ ही आप निरन्तर वैराग्य के भावों को विकसित करती रहीं एवं अनन्तर इस युग के महान आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की आज्ञा से उनके ही पट्टशिष्य आचार्यश्री वीरसागर जी से वैशाख कृष्णा द्वितीया को 1956 ईसवीमाधोराजपुरा की पवित्र भूमि में आर्यिका के व्रतों को अंगीकार कर ‘ज्ञानमती’ की सार्थक संज्ञा प्राप्त की। धन्य हैं वे भविष्य दृष्टा आचार्य श्री वीरसागर जी, जिन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से इनकी प्रतिभा का आकलन कर इन्हें ‘‘ज्ञानमती’’ नाम दिया। आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के साक्षात तीन बार दर्शन करने वाली गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी जैनशासन के वर्तमान व्योम पर छिटके नक्षत्रों में दैदीप्यमान सूर्य की भांति अपनी प्रकाश-रश्मियों को प्रकीर्णित कर रहीं। गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी, जिन्होंने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी के तीन बार दर्शन किए हैं। नीरा (महाराष्ट्र ) में सन् 1954 में, बारामती (महा.) में सन् 1955 में, कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र (महा.) में सन् 1955 में सल्लेखना के समय। सन्1955 में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी ने कुंथलगिरि में देशभूषण-कुलभूषण जी की प्रतिमा के समक्ष 12 वर्ष की सल्लेखना ली थी।</p>
<p><strong>आचार्य श्री की प्रत्यक्ष सल्लेखना देखी</strong></p>
<p>ज्ञानमती माताजी उस समय क्षुल्लिका अवस्था में वीरमती माताजी थी,कुंथलगिरि में एक माह आचार्यश्री के श्रीचरणों में रहीं। क्षुल्लिकावस्था में आचार्य श्री की प्रत्यक्ष सल्लेखना तो देखी ही है, साथ ही उनके श्रीमुख से अनेक अनुभव वाक्य भी प्राप्त किए हैं। ज्ञानमती माताजी (क्षुल्लिका वीरमति) ने आचार्य श्री शांतिसागर महाराज जी से आर्यिका दीक्षा की याचना की थी किन्तु, आचार्य श्री ने कहा था कि मैंने सल्लेखना ले ली है और अब दीक्षा देने का त्याग कर दिया है। तुम मेरे शिष्य वीरसागर से आर्यिका दीक्षा लेना। अत: आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के आदेशानुसार उन्होंने 1956 की वैशाख कृष्ण दूज को माधोराजपुरा (जयपुर-राजस्थान) में आचार्य श्री शांतिसागर जी के प्रथम शिष्य पट्टाचार्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा (महिलाओं के लिए दीक्षा की सर्वोच्च अवस्था) ली और आर्यिका ज्ञानमती बन गईं एवं नाम के अनुसार सारे विश्व में एक विराट साहित्य की श्रृंखला का सृजन किया, जो कि न भूतो न भविष्यति।</p>
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		<title>गांव में जैन समाज का एक भी घर नहीं : चांसदा में निकाली भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा </title>
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		<pubDate>Sun, 22 Sep 2024 16:57:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पर्युषण पर्व के समापन पर कुराबड़ क्षेत्र के चांसदा में सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में रविवार को भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली गई। रथयात्रा से पहले भगवान की प्रतिमा को शांतिलाल कोटडिया ने रजत रथ में विराजमान किया। रथयात्रा बैंड-बाजे के साथ जैन मंदिर से निकली, जिसमें धर्म ध्वजा थामे भीमराज और [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पर्युषण पर्व के समापन पर कुराबड़ क्षेत्र के चांसदा में सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में रविवार को भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली गई। रथयात्रा से पहले भगवान की प्रतिमा को शांतिलाल कोटडिया ने रजत रथ में विराजमान किया। रथयात्रा बैंड-बाजे के साथ जैन मंदिर से निकली, जिसमें धर्म ध्वजा थामे भीमराज और गजेंद्र कोटडिया सहित सैकड़ों जैन समाजजन शामिल थे। <span style="color: #ff0000">पढ़िए धरणेन्द्र जैन की रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>खैरवाड़ा। </strong>पर्युषण पर्व के समापन पर कुराबड़ क्षेत्र के चांसदा में सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में रविवार को भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा निकाली गई। रथयात्रा से पहले भगवान की प्रतिमा को शांतिलाल कोटडिया ने रजत रथ में विराजमान किया। रथयात्रा बैंड-बाजे के साथ जैन मंदिर से निकली, जिसमें धर्म ध्वजा थामे भीमराज और गजेंद्र कोटडिया सहित सैकड़ों जैन समाजजन शामिल थे। महिलाएं केसरिया और लाल वस्त्र पहनकर, जबकि पुरुष वर्ग गुलाबी साफा बांधकर शामिल हुए। युवा वर्ग ने भक्ति गीतों पर नृत्य किया और आदिनाथ के जयकारे लगाए। रथयात्रा में रोशन लाल कोटडिया परिवार द्वारा निर्मित कैलाश पर्वत की झांकी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। यह रथ गांव के विभिन्न मार्गों से होते हुए राजकीय स्कूल प्रांगण पहुंचा, जहां एक समारोह आयोजित किया गया।</p>
<p>समारोह का आरंभ मंगलाचरण से हुआ, जिसमें हार्दी और सृष्टि जैन ने प्रस्तुति दी। अरिहंत बाल ग्रुप ने भगवान जन्म कल्याण की नाटिका प्रस्तुत की। श्रीजी की शांतिधारा खेमराज बसंती बाई निमड़ी वाले परिवार ने की। मुख्य अतिथि डॉ. जिनेन्द्र शास्त्री और अनिल स्वर्णकार उपस्थित थे, जिन्हें पवन, अनिल और सौरभ कोटडीया ने सम्मानित किया। दिलचस्प बात यह है कि चांसदा गांव में जैन समाज का एक भी घर नहीं है, फिर भी यहां 400 वर्ष पुराना दिगंबर जैन मंदिर है, जिसमें भगवान आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान है।</p>
<p>स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि पूर्व में इस क्षेत्र में जैन समाज के लोग रहते थे, लेकिन समय के साथ उनका पलायन हो गया। सालाना शोभायात्रा के जरिए आसपास के गांवों के जैन समाजजन अब भी भगवान आदिनाथ का पूजन करते हैं। हाल ही में जैन मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार किया गया है और संत भवन का निर्माण भी किया गया है, जिसका लोकार्पण आगामी समय में होगा।</p>
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		<title>आमंत्रण पत्रिका का हुआ विमोचन : चांसदा में भगवान आदिनाथ की रथयात्रा 22 को </title>
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		<pubDate>Fri, 20 Sep 2024 17:35:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[जगत के निकटवर्ती अतिशय क्षैत्र चांसदा गांव में सकल दिगंबर जैन समाज के तत्वाधान में पर्युषण महापर्व समापन पर श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर से भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा का आयोजन 22 सितंबर रविवार को प्रातः 8 बजे से होगा। पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230; खैरवाड़ा। जगत के निकटवर्ती अतिशय क्षैत्र चांसदा गांव में सकल दिगंबर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>जगत के निकटवर्ती अतिशय क्षैत्र चांसदा गांव में सकल दिगंबर जैन समाज के तत्वाधान में पर्युषण महापर्व समापन पर श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर से भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा का आयोजन 22 सितंबर रविवार को प्रातः 8 बजे से होगा। <span style="color: #ff0000">पढ़िए यह रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>खैरवाड़ा।</strong> जगत के निकटवर्ती अतिशय क्षैत्र चांसदा गांव में सकल दिगंबर जैन समाज के तत्वाधान में पर्युषण महापर्व समापन पर श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर से भगवान आदिनाथ की भव्य रथयात्रा का आयोजन 22 सितंबर रविवार को प्रातः 8 बजे से होगा। प्रवक्ता अनिल स्वर्णकार ने बताया कि 22 सितम्बर को प्रातः आदिनाथ भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, विशेष अष्ट द्रव्य से नाचते गाते पूजन के पश्चात मंदिर से चांसदा गांव में भव्य रथयात्रा का आयोजन होगा, साथ ही वेदी एव शिखर पर ध्वजा परिवर्तन पश्चात स्वामी वात्सल्य होगा।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि चांसदा गांव में जैन समाज का एक भी घर नहीं है लेकिन दिगंबर जैन मंदिर में 400 वर्ष प्राचीन अतिशयकारी भगवान आदिनाथ की प्रतिमा विराजमान है जिसके दर्शन मात्र से दुःख,रोग दूर हो जाते है । पर्युषण समापन पर सकल जैन समाज के तत्वाधान में रथयात्रा का आयोजन पिछले कुछ वर्षों से होता है।</p>
<p>श्रीजी की भव्य रथयात्रा में कानपुर, लकड़वास, जगत, वली,जावद, गिंगला, भिंडर, खरका, उथरदा, खेड़ी, सलूंबर, उदयपुर सहित आसपास के जैन समाज के धर्मावलंबी बड़ी संख्या में उपस्थित रहेंगे।</p>
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		<title>गणधर विलय महामंत्र पर प्रवचन : ज्योतिष का संपूर्ण वर्णन जैन धर्म में सूक्ष्मता के साथ किया है-अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Tue, 08 Aug 2023 10:43:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में णमो अट्टंग महानिमित्त कुसलणं मंत्र पर व्याख्यान देते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि इस मंत्र में अष्टांग महानिमित्तों में कुशलता को प्राप्त जिनों को नमस्कार किया गया है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230; इंदौर। श्री1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में णमो अट्टंग महानिमित्त कुसलणं मंत्र पर व्याख्यान देते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि इस मंत्र में अष्टांग महानिमित्तों में कुशलता को प्राप्त जिनों को नमस्कार किया गया है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> श्री1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज गणधर विलय महामंत्र के 48 रिद्धि मंत्रों पर प्रवचन दे रहे हैं। इसके तहत वह प्रतिदिन एक-एक मंत्र की व्याख्या कर उसका महत्व बता रहे हैं। मंगलवार को णमो अट्टंग महानिमित्त कुसलणं मंत्र पर व्याख्यान देते हुए मुनि श्री ने कहा कि इस मंत्र में अष्टांग महानिमित्तों में कुशलता को प्राप्त जिनों को नमस्कार किया गया है। आज का मंत्र ज्योतिष से संबधित है। ज्योतिष का संपूर्ण वर्णन जैन धर्म में सूक्ष्मता के साथ किया है। अंग, स्वर, व्यञ्जन, लक्षण, छिन्न, भौम, स्वप्न और अन्तरिक्ष, ये महानिमित्तीक आठ अंग हैं।</p>
<p>-इनमें मनुष्य और तिर्यंचों के सत्य-स्वभाव, वात, पित्त व कफ तथा रस, रुधिर, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा एवं शुक्र तथा शरीर के निम्न व उन्नत वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श को देख कर जीवित, मरण, सुख, दुख, लाभ, अलाभ और प्रवासादि विषयक ज्ञान अंगगत महानिमित्त हैं।</p>
<p>-खर, पिंगल, (नेवला, बन्दर या सर्पविशेष) उल्लू, काक, शिवा, श्रृंगाल, नर और नारी के स्वर को सुनकर लाभ-अलाभ, सुख-दुख और जीवित-मरण आदि को जानना स्वर महानिमित्त कहा जाता है।</p>
<p>-तिल, आनुअ और मशा आदि को देखकर उन सुख-दुःखादिक को जानना व्यञ्जन महानिमित्त है।</p>
<p>-उर, ललाट, हस्ततल और पादतलादिक में यथाक्रम से एक सौ आठ, चौंसठ व बत्तीस स्वस्तिक, नन्द्यावर्त, श्रीवृक्ष, शंख, चक्र, अंकुश, चन्द्र, सूर्य एवं रत्नाकर आदि लक्षणों को देखकर तीर्थंकर- रत्व, चक्रवर्तित्व एवं बलदेवत्व व वासुदेवत्वका जानना लक्षण नामक महानिमित्त है।</p>
<p>-शरीर छाया की विपरीतता, वस्त्र व अलंकार का छेद तथा मनुष्य और तिर्यंच आदिकों की चेष्टा व आकार को देखकर शुभ-अशुभ का जानना छिन्न महानिमित्त कहा जाता है।</p>
<p>-भूमिगत लक्षणों को देखकर ग्राम, नगर, खेडा, कर्वट, घर व आराम आदिकों की वृद्धि-हानि को कहना भौम नामक महानिमित्त है।</p>
<p>-छिन्न स्वप्न और माला स्वप्न के स्वरूप को देखकर भावी कार्य को जानना स्वप्न नामक महानिमित्त है। उनमें वृषभ, हाथी, सिंह, समुद्र, चन्द्र, सूर्य, जल से परिपूर्ण कलश, लक्ष्मी का अभिषेक, अग्नि, तालाब, भवन-विमान, रत्न-राशि, सिंहासन, क्रीड़ा करती मछलियों का युगल और पुष्पमालाओं का युगल, इन परस्पर के सम्बन्ध से रहित सोलह स्वप्नों का सोती हुई जिन जननी को जो दर्शन होता है, वह छिन्न स्वप्न हैं । पूर्वापर से सम्बन्ध रहने वाले भावों का स्वप्नान्तर से देखना माला स्वप्न है।</p>
<p>-चन्द्र, सूर्य एवं ग्रह के उदय व अस्तमन तथा जय पराजय, ग्रह-घर्षण, बिजली का कड़कता इन्द्रधनुष, चन्द्र व सूर्य के परिवेष, उपराग एवं बिम्बभेदादि को देखकर शुभ-अशुभ का जानना अन्तरिक्ष नामक महानिमित्त है।</p>
<p>इस मंत्र का जाप करने से जीवन-मरण आदि का ज्ञान हो जाता है। यह ऋद्धि मुनिराजों को होती है।</p>
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		<title>गणधर विलय महामंत्र के 13वें महामंत्र पर प्रवचन : हमेशा ऐसी भावना रखें कि मनपर्ययज्ञानी बनकर अरिहंत अवस्था को प्राप्त हों- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Fri, 04 Aug 2023 11:10:26 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि हमें मनपर्ययज्ञानी बनना है तो मन को निर्मल पवित्र व स्वच्छ रखना होगा। हमें भी विचार करना होगा कि हमें मनपर्ययज्ञान की प्राप्ति हो। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> श्री1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज गणधर विलय महामंत्र के 48 रिद्धि मंत्रों पर प्रवचन दे रहे हैं। इसके तहत वह प्रतिदिन एक-एक मंत्र की व्याख्या कर उसका महत्व बता रहे हैं। गुरुवार को 13वें दिन उन्होंने णमो उजुमदीणं की व्याख्या करते हुए कहा कि ऋजुमति मनपर्ययज्ञानियों को नमस्कार हो। यहां उत्कृष्ट चारित्र के धारक मुनि जो होते हैं जिन्हें ऋजुमति मनपर्यय ज्ञान होता है उन्हें यहां नमस्कार किया गया है।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-50259" src="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019.jpg" alt="" width="1024" height="681" srcset="https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019.jpg 1024w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-300x200.jpg 300w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-768x511.jpg 768w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-414x276.jpg 414w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-470x313.jpg 470w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-640x426.jpg 640w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-130x86.jpg 130w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-187x124.jpg 187w, https://www.shreephaljainnews.com/wp-content/uploads/2023/08/IMG-20230804-WA0019-990x658.jpg 990w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></p>
<p>दूसरे के मन को प्राप्त वचन, काय और मनकृत अर्थ के विज्ञान से निर्र्वितत या ऋजु जिसकी मति है वह ऋजुमति कहलाता है। सब जीवों के सरल मन में स्थिति सभी प्रकार की बातों को जो जान लेते हैं, वह ऋजुमति मनोविज्ञानी होते हैं। जैसे किसी ने कुछ वर्षों पहले मन में क्या सोचा था, क्या कहा गया था, उस समय काय की चेष्टा कैसी चल रही थी, जिसने यह बात कही है। यह चार प्रकार का होता है। उनकी अपनी सीमाएं होती है। हमें मनपर्ययज्ञानी बनना है तो मन को निर्मल पवित्र व स्वच्छ रखना होगा। हमें भी विचार करना होगा कि हमें मनपर्ययज्ञान की प्राप्ति हो। तो किसी न किसी भव में हमें ऐसे पद की प्राप्ति होती है।</p>
<p>हमारे मन में अभी क्या चल रहा है, वचन में क्या चलता है। यह सब क्रियाएं हमारे अंदर पापकर्म का अर्जन कराती हैं। हमारे ज्ञान को कमजोर करती हैं, ज्ञान को नष्ट करती हैं। इसलिए हमें प्रति समय ऐसी आराधना करनी चाहिए कि हमारा ज्ञान बढ़े। मुनिश्री ने कहा कि हम टाकीज में, उद्यान में जाते हैं तो हमारा मन वहां लग जाता है। शरीर की थकावट नहीं होती। पर जब हम तीर्थ करने जाते हैं, तो मन से सहजता से यह बात निकल जाती है कि क्या भगवान को क्या इतनी ऊंची पहाड़ी से ही मोक्ष लेना था। ऐसे जब मन में विचार आ जाते हैं तो इस बात का अहसास हो जाता है कि हमें अभी भी ज्ञान व धर्म के प्रति रूचि पैदा नहीं हुई है।</p>
<p>जहां उत्साह नहीं होता, वहां इस प्रकार की बातें होती है वहां मन, वचन काय तीनों की क्रियाएं अलग-अलग होती हैं। जहां उत्साह होता है वहां तीनों की क्रियाएं एक जैसी होती हैं। आप भी प्रतिदिन ऐसी भावना करना कि हे प्रभु मैं भी एक दिन मनपर्ययज्ञानी बनकर अरिहंत अवस्था को प्राप्त करूं।सभा का संचालन तरुण भैया ने किया ।</p>
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		<title>गणधर विलय महामंत्र के 12वें महामंत्र पर प्रवचन :  ज्ञान और धर्म के रास्ते में आते हैं मुश्किलें, उन्हें पार करना जरूरी- अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Thu, 03 Aug 2023 11:41:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि बाहरी आडंबरों की चर्चा हम दिन में कई बार कर लेते हैं लेकिन जो स्वाध्याय किया है, उसकी चर्चा नहीं करते। ज्ञान पाने और उसे बढ़ाने के लिए ज्ञान की चर्चा बहुत जरूरी है, वरना वह धीरे-धीरे [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि बाहरी आडंबरों की चर्चा हम दिन में कई बार कर लेते हैं लेकिन जो स्वाध्याय किया है, उसकी चर्चा नहीं करते। ज्ञान पाने और उसे बढ़ाने के लिए ज्ञान की चर्चा बहुत जरूरी है, वरना वह धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज गणधर विलय महामंत्र के 48 रिद्धि मंत्रों पर प्रवचन दे रहे हैं। इसके तहत वह प्रतिदिन एक-एक मंत्र की व्याख्या कर उसका महत्व बता रहे हैं। बुधवार को 12वें दिन णमो बोहिय-बुद्धाणं मंत्र का अर्थ करते हुए कहा की गणधर के समान शुद्ध सम्यक्त्व को धारण करने वाले तप के बल से दिव्य ध्वनि के अनुसार ज्ञान प्राप्त कर लेते है और उच्च ज्ञानी होकर जो जिन बने है उनको नमस्कार हो ।</p>
<p>उन्होंने कहा कि कोई भी मंत्र बहुत छोटा सा होता है लेकिन उस मंत्र की प्राप्ति के लिए हमें क्या-क्या साधनों की आवश्यकता होता, कैसे हम अरिहंत पद को प्राप्त कर सकते हैं, यह हमें जानना जरूरी है। मुनि श्री ने कहा कि जब कुछ लोग साथ घूमने जाते हैं तो कुछ लोग बोलते रहते हैं और एक व्यक्ति मौन रहता है। बोलने वाले व्यक्ति आस-पास की चीजों की व्याख्या करते हैं लेकिन मौन रहने वाले व्यक्ति को उनके वार्तालाप से चिढ़ होती है।</p>
<p>ठीक उसी प्रकार आप प्रवचन सभा से निकलते हैं तो सभी चीजों की चर्चा करते हैं, लेकिन प्रवचन की चर्चा बिल्कुल नहीं करते। बाहरी आडंबरों की चर्चा हम दिन में कई बार कर लेते हैं लेकिन जो स्वाध्याय किया है, उसकी चर्चा नहीं करते। ज्ञान पाने और उसे बढ़ाने के लिए ज्ञान की चर्चा बहुत जरूरी है, वरना वह धीरे-धीरे खत्म होता जाएगा। इसलिए आज से संकल्प लें कि जब यहां से प्रवचन सुन कर जाएं तो किसी न किसी से प्रवचन की चर्चा जरूर करेंगे और हो सके तो प्रवचन की चार लाइनें टाइप करके उसे दूसरों को भी भेजेंगे।</p>
<p>मुनि श्री ने कटनी की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि एक महिला ने स्टेज पर चढ़कर मुनि महाराज को भला-बुरा कहा, वो मैसेज आप सभी ने कई-कई बार फारवर्ड किया होगा कि क्या आपने कभी साधु के दो मिनिट का प्रवचन बना कर उसे फारवर्ड किया, शायद नहीं। ज्ञान की चर्चा कर उसे बढ़ाना कुछ ऐसा ही है जैसे मक्खन से घी बनाना। अगर हम दूध में मक्खन निकाल लें तो जब तक उसे तपाएं नहीं, वह घी नहीं बनेगा। इसी तरह से ज्ञान की चर्चा करके उसे तपाना पढ़ता है।</p>
<p><strong>मन साफ रखें</strong></p>
<p>उन्होंने कहा कि ज्ञान के रास्ते में कई मुश्किलें आती हैं, लेकिन उन मुश्किलों से पार भी पाना पड़ता है। बस हमें सही रास्ता मालूम होना चाहिए। हमारे लिए जानना जरूरी है कि हम धर्म और ज्ञान के रास्ते पर चल रहे हैं या नहीं। अगर नीचता का भाव जाग्रत हो जाए तो हम कितना भी स्वाध्याय कर लें, उसका कोई फायदा नहीं होगा।</p>
<p>इसलिए अगर ज्ञान और धर्म के रास्ते पर चलना है तो मन साफ रखें। दूसरों से प्रशंसा पाना चाहते हैं तो उनकी प्रशंसा अवश्य करें। किसी की ईर्ष्या न करें, क्योंकि हम ईर्ष्या उसी से करते हैं, जिसे हम अपना सबसे बड़ा शत्रु मानते हैं। धर्मसभा का संचालन ब्रह्मचारी तरुण भैया ने किया।</p>
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		<title>गणधर महामंत्र विलय के 11वें महामंत्र पर प्रवचन : कषाय व मिथ्यात्व से बचें, प्रमाद न करें, सम्यकत्व का पालन करें &#8211; अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Wed, 02 Aug 2023 11:09:12 +0000</pubDate>
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<p><strong>1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में गणधर महामंत्र विलय के 11वें दिन णमो पत्तेय-बुद्धाणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि इस मंत्र की साधना से प्रतिवादी विद्या का नाश होता है। <span style="color: #ff0000;">पढ़िए एक रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
<hr />
<p><strong>इंदौर।</strong> 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में गणधर महामंत्र विलय के 11वें दिन णमो पत्तेय-बुद्धाणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि इस मंत्र की साधना से प्रतिवादी विद्या का नाश होता है। उपदेश के बिना जिस शक्ति के द्वारा ज्ञान, संयम, तप विधान का विशेष ज्ञान हो जाता है। ऐसी बुद्दि प्राप्त करने के लिए हमें जिनों की आराधना करनी चाहिए। ऐसे जिनों को नमस्कार करना चाहिए। कर्मों के उपशम से सम्यक ज्ञान व तप में वृद्धि होती है। यहां वर्तमान समय में भले ही गुरु का उपदेश नहीं मिला हो, लेकिन किसी न किसी भव में गुरु का उपदेश मिला था उसी के अनुसार शुभ कर्म के उदय के कारण ही हमें बिना गुरु के उपदेश के ही हमें शक्तियां, ज्ञान व संयम प्राप्त हो जाता है। इस सब में पुण्य कर्म का मुख्य कारण भी है। वर्तमान में कषाय, प्रमाद ,मिथ्यात्व का त्याग होना चाहिए। व्रतों का पालन करना चाहिए । मन वचन काय को संभाल कर रखना चाहिए तभी हम शुभ कर्म का बंध कर सकते हैं। उससे हमें पुण्य की प्राप्ति होगी वही पुण्य हमें अगले भव में काम आता है। कषाय के कारण पिता-पुत्र, पति-पत्नी में झगड़े हो जाते हैं। हम मनुष्य कुल के होते हुए भी राक्षण का रूप धारण कर लेते हैं।</p>
<p><strong>जीवन में बनाएं नियम </strong></p>
<p>हमें जीवन में छोटे-छोटे नियमों को धारण करना चाहिए। इनसे हम अपने जीवन की दिशा बदल सकते हैं। छोटे-छोटे व्रत एक दिन महाव्रत के रूप में तब्दील हो जाते हैं। मुनिश्री ने प्रमाद के बारे में बताया कि छोटे-छोटे प्रमाद के कारण हमें धर्म की क्रियाएं छोड़ देते हैं। आज नहीं, कल कर लूंगा और हमारा मन अशुभ क्रिया में लग जाता है।शुभ कर्म का बंध नहीं होता और पुराने कर्म की निर्जरा भी नहीं होती।</p>
<p>मन, वचन व काय की चंचलता भी बड़ा विषय है। इनकी वजह से भी हमारा कर्म का बंध होता है। धार्मिक अनुष्ठान करते हैं तो मन कहीं चला जाता है और वचन कहीं। इन सभी बातों पर विचार करना चाहिए। कषाय से बचें, प्रमाद न करें, मिथ्यात्व से बचें,व्रतों का पालन करें । सम्यकत्व का पालन करते हैं, व योग को अवस्थित रखते हैं तो हमारे जीवन में शुभ कर्मों का बंध होगा।</p>
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		<title>गणधर विलय महामंत्र के दसवें महामंत्र पर प्रवचन : इस संसार में यदि दुखों से निकालकर यदि सुख की ओर कोई ले जाता है तो वह मात्र गुरु है &#8211; अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज </title>
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		<pubDate>Tue, 01 Aug 2023 11:59:05 +0000</pubDate>
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<p><strong>श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में णमो सयं-बुद्धीणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि णमो सयं-बुद्धीणं का मतलब स्वयं बुद्ध जिनों को मेरा नमस्कार हो।<span style="color: #ff0000;"> पढ़िए एक रिपोर्ट&#8230;</span></strong></p>
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<p><strong>इंदौर।</strong> श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में णमो सयं-बुद्धीणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि णमो सयं-बुद्धीणं का मतलब स्वयं बुद्ध, जिनों को मेरा नमस्कार हो। यहां यह कहा गया है कि जो ज्ञान इस भव में बिना गुरु के हो जाता है और हम उन ज्ञान की बातों को जान जाते हैं, लेकिन यह ध्यान रखना कि यह ज्ञान बिना गुरु के क्यों आया। किसी न किसी भव में गुरु उपदेश का सुना था। उसकी स्मृति ही हमें इस भव में समय के साथ ऋद्धि प्राप्त हो जाती है और ये रिद्धियां मुनि बनकर प्राप्त होती है और ऐसे समय में हम अपनी बुद्धि के द्वारा सही गलत, पुण्य-पाप को पहचान जाते हैं। पाप को छोड़कर पुण्य की राह पर निकल पड़ते है और संयम अपनाते हैं। कहा गया है कि किसी भव में हमारे संस्कार रहे हैं तो अगले भव में वही संस्कार फलीभूत होकर प्राप्त होते हैं। इसलिए जीवन में यदि गुरु नहीं मिलता है तो भी हमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है। जैसे बच्चे को खाना, दौड़ना सिखाना नहीं पड़ता है वह अपने-आप ही सीख जाते हैं। हमारे जीवन में अनेक प्रकार के संकट व दुख दूर होते हैं। हमें अपने संस्कारों का बीजारोपण घर से करना चाहिए। हम अपने माता-पिता का विनय करते हैं। उन्हें सम्मान देते हैं तो यही संस्कार हमें गुरु तक ले जाते हैं और उनके महत्व को समझाते हैं।</p>
<p>धर्मगत संस्कार ही हमें जीवन में सिद्धि प्राप्त कराते हैं। इस मंत्र का जाप करने से हमें कवित्व,पांडित्य प्राप्त होता है। हम अच्छे विचारक, चिंतक, लेखक बन सकते हैं। बिना गुरु के आप अहिंसा को अपना सकते हैं। हम बैंक में अपना पैसा जमा करते हैं। एक समय आता है जब हमारा शरीर काम करना गवारा नहीं करता तो बैंक में जमा उसी पैसे से हम अपना परिवार चलाते हैं।</p>
<p>ऐसे ही ज्ञान भी है। अगर पूर्व भव में हमने किसी गुरु से ज्ञान लिया है और इस भव में हमें गुरु प्राप्त नहीं हुए हैं तो हम पुराने ज्ञान से भी जीवन को उन्नति व विकास की ओर ले जा सकते हैं। ये ध्यान रखें, हमें इस भव में गुरुओं के नजदीक जाना चाहिए। उनकी सेवा करनी चाहिए। आचार्यों ने कहा कि इस संसार में यदि दुखों से निकालकर यदि सुख की ओर कोई ले जाता है तो वह मात्र गुरु है। गुरु के उपदेश ही हमें इस संसार से पार करा सकते हैं।कार्यक्रम का संचालन तरुण भैया ने किया ।</p>
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